भारत के राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद ने आज (23 जनवरी, 2022) नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 125वीं जयंती पर उन्हें राष्ट्रपति भवन में श्रद्धांजलि दी। उन्होंने राष्ट्रपति भवन में नेताजी की फ़ोटो के सामने पुष्पांजलि अर्पित की।

सुभाष चन्द्र बोस
सुभाष चन्द्र बोस जन्म : 23 जनवरी 1897, मृत्यु : 18 अगस्त 1945) भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के अग्रणी तथा सबसे बड़े नेता थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान, अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ने के लिये, उन्होंने जापान के सहयोग से आज़ाद हिन्द फौज का गठन किया था। उनके द्वारा दिया गया जय हिंद का नारा भारत का राष्ट्रीय नारा बन गया है। “तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आजादी दूँगा” का नारा भी उनका था जो उस समय अत्यधिक प्रचलन में आया। भारतवासी उन्हें नेता जी के नाम से सम्बोधित करते हैं।
कुछ इतिहासकारों का मानना है कि जब नेता जी ने जापान और जर्मनी से सहायता लेने का प्रयास किया था, तो ब्रिटिश सरकार ने अपने गुप्तचरों को 1941 में उन्हें खत्म करने का आदेश दिया था। नेता जी ने 5 जुलाई 1943 को सिंगापुर के टाउन हाल के सामने ‘सुप्रीम कमाण्डर’ के रूप में सेना को सम्बोधित करते हुए “दिल्ली चलो!” का नारा दिया और जापानी सेना के साथ मिलकर ब्रिटिश व कामनवेल्थ सेना से बर्मा सहित इंफाल और कोहिमा में एक साथ जमकर मोर्चा लिया। 21 अक्टूबर 1943 को सुभाष बोस ने आज़ाद हिंद फौज के सर्वोच्च सेनापति की हैसियत से स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार बनायी जिसे जर्मनी, जापान, फिलीपींस, कोरिया, चीन, इटली, मान्चुको और आयरलैंड सहित 11 देशो की सरकारों ने मान्यता दी थी। जापान ने अंडमान व निकोबार द्वीप इस अस्थायी सरकार को दे दिये। सुभाष उन द्वीपों में गये और उनका नया नामकरण किया।
1944 को आज़ाद हिंद फौज ने अंग्रेजों पर दोबारा आक्रमण किया और कुछ भारतीय प्रदेशों को अंग्रेजों से मुक्त भी करा लिया। कोहिमा का युद्ध 4 अप्रैल 1944 से 22 जून 1944 तक लड़ा गया एक भयंकर युद्ध था। इस युद्ध में जापानी सेना को पीछे हटना पड़ा था और यही एक महत्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुआ।
6 जुलाई 1944 को उन्होंने रंगून रेडियो स्टेशन से महात्मा गांधी के नाम एक प्रसारण जारी किया जिसमें उन्होंने इस निर्णायक युद्ध में विजय के लिये उनका आशीर्वाद और शुभकामनाएँ माँगीं। नेताजी की मृत्यु को लेकर आज भी विवाद है। जहाँ जापान में प्रतिवर्ष 18 अगस्त को उनका शहीद दिवस धूमधाम से मनाया जाता है वहीं भारत में रहने वाले उनके परिवार के लोगों का आज भी यह मानना है कि सुभाष की मौत 1945 में नहीं हुई। वे उसके बाद रूस में नज़रबन्द थे। यदि ऐसा नहीं है तो भारत सरकार ने उनकी मृत्यु से संबंधित (सम्बन्धित) दस्तावेज अब तक सार्वजनिक क्यों नहीं किये? (यथा संभव (सम्भव) नेता जी की मौत नहीं हुई थी)
16 जनवरी 2014 (गुरुवार) को कलकत्ता उच्च न्यायालय ने नेता जी के लापता होने के रहस्य से जुड़े खुफिया दस्तावेजों को सार्वजनिक करने की माँग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई के लिये विशेष पीठ के गठन का आदेश दिया। आज़ाद हिन्द सरकार के 75 वर्ष पूर्ण होने पर इतिहास में पहली बार वर्ष 2018 में भारत के प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले पर तिरंगा फहराया। 23 जनवरी 2021 को नेताजी की 125वीं जयन्ती है जिसे भारत सरकार ने पराक्रम दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया है।
- नेताजी एक भारतीय राष्ट्रवादी थे। उनका जन्म कटक में हुआ था। उन्होंने दर्शनशास्त्र में डिग्री हासिल की और बाद में भारतीय सिविल सेवा के लिए चुने गए। उन्होंने इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया क्योंकि वह ब्रिटिश सरकार की सेवा नहीं करना चाहते थे।
- नेताजी 1921 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए।
- नेताजी ने “स्वराज” नाम से एक अखबार शुरू किया था। उन्होंने “द इंडियन स्ट्रगल” नामक एक पुस्तक लिखी थी। इस पुस्तक में 1920 और 1942 के बीच भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को शामिल किया गया है।
- “जय हिंद” शब्द नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा गढ़ा गया था।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में नेताजी
- नेताजी को 1925 में उनकी राष्ट्रवादी गतिविधियों के लिए जेल में डाल दिया गया था। बाद में 1927 में उन्हें रिहा किया गया। उनकी रिहाई के बाद, वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के महासचिव बने।
- उन्होंने 1939 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक भाग के रूप में ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक का गठन किया।
- 1941 में बोस अफगानिस्तान और सोवियत संघ के रास्ते जर्मनी चले गये थे। जर्मनी में, नेताजी जर्मन नेताओं और अन्य भारतीय छात्रों और यूरोपीय राजनीतिक नेताओं से मिले।
- उन्होंने 4,500 भारतीय सैनिकों के साथ ‘Indian Legion’ की स्थापना की। इन सैनिकों को उत्तरी अफ्रीका से जर्मनों द्वारा कैद किया गया था। 1943 में, उन्होंने जापान के लिए प्रस्थान किया और ‘इंडियन नेशनल आर्मी’ को पुनर्जीवित किया।
SOURCE-PIB
PAPER-G.S.1