लोक अदालत वैकल्पिक विवाद समाधान के सबसे प्रभावशाली उपकरण के रूप में सामने आया है

राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नाल्सा) नागरिकों को त्वरित और कम खर्च पर न्याय देने के लिए प्रतिबद्ध है। हाल ही में इसने वैकल्पिक विवाद प्रणाली के जरिए लंबित मामलों की संख्या को प्रभावी ढंग से कम करने में राष्ट्रीय लोक अदालत के योगदान को बढ़ाने का निर्णय लिया है।

विधिक सेवा प्राधिकरणों ने इस लक्ष्य को प्राप्त करने को लेकर लोक अदालतों के आयोजन के लिए गतिशील तैयारी की रणनीतियों पर ध्यान दिया है। एक शुरुआती उपाय के रूप में, नाल्सा ने ऐसी लोक अदालतों के दौरान अधिकतम निपटान की दिशा में उन्हें मार्गदर्शन करने के लिए सभी राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरणों के साथ पूर्व परामर्शी और समीक्षा बैठकों का आयोजन शुरू किया है। हर एक राष्ट्रीय लोक अदालत के आयोजन से पहले सभी राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों के कार्यकारी अध्यक्षों के साथ कई बैठकें आयोजित की गईं। इनमें लोक अदालतों के आयोजन की तैयारियों का जायजा लेने के साथ-साथ हितधारकों के मनोबल को बढ़ाने के लिए आमने-सामने बातचीत की गई।

सभी शुरुआती और गतिशील उपायों के संचयी प्रभाव के चलते साल 2021 के दौरान मामलों के निपटान के असाधारण आंकड़े सामने आए हैं। पूरे देश में आयोजित चार राष्ट्रीय लोक अदालतों में कुल 1,27,87,329 मामलों का निपटारा किया गया। इनमें बड़ी संख्या में लंबित मामले यानी 55,81,117 और मुकदमा दर्ज किए जाने से पहले के मामलों की एक रिकॉर्ड संख्या यानी 72,06,212 शामिल है। इन गतिविधियों के जरिए विधिक सेवा प्राधिकरणों ने बड़ी संख्या में मामलों का निपटारा किया है। इससे प्राधिकरणों ने लंबे समय तक चलने वाली कानूनी लड़ाई को समाप्त या रोककर आम नागरिकों को राहत देने का काम किया है।

मामलों के निपटान के इन अद्वीतीय आंकड़ों को प्राप्त करना आसान नहीं था। इस सफलता में तकनीकी उन्नति का एक बड़ा योगदान माना जा सकता है। विधिक सेवा प्राधिकरणों ने जून, 2020 में विवाद निपटान के पारंपरिक तरीकों के साथ तकनीक को एकीकृत किया और वर्चुअल लोक अदालतों की शुरुआत की। इन्हें ई-लोक अदालत भी कहा जाता है। उस समय से राष्ट्रीय लोक अदालतों सहित सभी लोक अदालतों का आयोजन वर्चुअल और हाइब्रिड मोड के जरिए किया जाता है। ई-लोक अदालत की कार्यवाही के दौरान एक निर्बाध अनुभव प्रदान करने के लिए पूरे देश में स्थित विधिक सेवा प्राधिकरण अपने डिजिटल बुनियादी ढांचे को लगातार उन्नत करने पर काम रहे हैं।

इन तकनीकी उन्नति के चलते लोक अदालतें अब पक्षों के दरवाजे तक पहुंच गई हैं। ये पक्ष अब अपने घरों या कार्यस्थलों से लोक अदालत की कार्यवाही में शामिल हो सकते हैं, जो मिनटों में समाप्त हो जाती है। इससे वे यात्रा करने और एक मामले के लिए पूरा दिन आरक्षित करने की परेशानी से बच जाते हैं। अधिकारियों ने देखा है कि लोक अदालत का जहां आयोजन होता है, उससे सैकड़ों किलोमीटर दूर बैठे लोग बड़ी संख्या में वर्चुअल कार्यवाही में शामिल हुए हैं। इसके अलावा तकनीक ने लोक अदालतों के पर्यवेक्षण और निगरानी के प्रभावी तरीके भी प्रदान किए हैं।

लोक अदालतों की इस सफलता का अन्य प्रमुख कारक राष्ट्रीय स्तर पर निर्णायक रणनीतियों का निर्माण रहा है। इन रणनीतियों के तहत राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों को विभिन्न हितधारकों के पूर्ण सहयोग और समन्वय को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से हर स्तर पर उनके साथ बैठकें आयोजित करने का निर्देश दिया गया था। प्राधिकरणों को एक वादी अनुकूल दृष्टिकोण का अनुपालन करने के साथ-साथ ऐसे वादियों को विधि के निर्धारित प्रस्तावों से जुड़े मामलों को निपटाने के लिए तैयार करने का भी निर्देश दिया गया था।

इसके अलावा विधि के कुछ क्षेत्रों जैसे कि एनआई अधिनियम के मामले, अन्य वित्तीय मामलों के साथ बैंक वसूली मामले में निपटान की अधिक संभावनाएं होती हैं। प्राधिकरणों को ऐसे मामलों में समझौता कराने की सभी संभावनाओं का पता लगाने का निर्देश दिया गया था। प्राधिकरणों को सलाह दी गई थी कि वे इस तरह के वित्तीय मामलों में प्रक्रियाओं को जारी करने और इन्हें पूरा करने की पूरी सक्रियता से निगरानी करने के साथ-साथ मामले को निपटाने के लिए पूर्व-लोक अदालत की बैठकें आयोजित करें।

इस तथ्य को लेकर कोई संदेह नहीं है कि मौजूदा महामारी के दौरान लंबित मामलों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। हालांकि, लोक अदालतों के जरिए बड़ी संख्या में मामलों के निपटान के साथ विधिक सेवा प्राधिकरणों ने देश के न्यायिक प्रशासन में एक संतुलन का निर्माण किया। इस बात को लेकर कोई दोराय नहीं है कि लोक अदालतों ने किसी भी अन्य विवाद समाधान प्रणाली की तुलना में अधिक संख्या में मामलों का निपटारा किया और वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र के सबसे प्रभावशाली उपकरण के रूप में सामने आया है।

साल 2021 के दौरान निपटाए गए मामलों की श्रेणीवार सूची में आपराधिक संयोजनीय मामलों की श्रेणी शीर्ष स्थान पर रही है। इसके तहत कुल 17,63,233 लंबित मामलों और मुकदमा दर्ज किए जाने से पहले के कुल 18,67,934 मामलों के निपटाए किए गए। इसके बाद राजस्व से संबंधित मामले हैं। इनमें 14,99,558 लंबित मामले और मुकदमा दर्ज किए जाने से पहले के कुल 11,59,794 मामले शामिल हैं। इनके अलावा निपटाए गए अन्य मामलों में एनआई अधिनियम के तहत चेक बाउंस मामले, बैंक वसूली मामले, मोटर दुर्घटना दावे, श्रम विवाद और विवाह से संबंधित मामले शामिल हैं।

वैकल्पिक विवाद समाधान (Alternative Dispute Resolution – ADR)

  • कानूनी तथा गैर-कानूनी मामलों की बढ़ती तादात को मद्देनज़र रखते हुए अदालतों पर पड़ने वाले अतिरिक्त दबाव को कम करने के लिये कुछ विशेष मामलों को वैकल्पिक तरीकों से सुलझाया जाना चाहिये।
  • इस संदर्भ में पंचाट, मध्यस्थता तथा समाधान (इन्हें संयुक्त रूप से पंचाट तंत्र कहा जाता है) कुछ ऐसे उपाय हैं जो वैकल्पिक क्षतिपूर्ति प्रणाली के आधार-स्तंभों के रूप में उपस्थित हैं।

पंचाट

  • यह वस्तुतः वह प्रक्रिया होती है जिसके अंतर्गत (तटस्थ रूप से उपस्थित) तीसरा पक्ष मामले की सुनवाई करता है तथा निर्णय देता है। भारत में पंचाट तंत्रों की स्थापना पंचाट एवं समाधान अधिनियम के तहत की गई है।

मध्यस्थता

  • इस प्रक्रिया का उद्देश्य, तीसरे (तटस्थ) पक्ष के माध्यम से विवादित पक्षों के मध्य पूर्ण सहमति से समस्या के समाधान को सुनिश्चित करना है।

समाधान

  • इस प्रक्रिया का उद्देश्य, दो पक्षों के मध्य सुलह अथवा स्वैच्छिक समझौते के माध्यम से समाधान को सुनिश्चित करना है।
  • पंचाट के विपरीत समाधान कराने वाले व्यक्ति को कोई बाध्यकारी परिणाम प्रदान करने की आवश्यकता नहीं होती है।
  • वादी तथा प्रतिवादी दोनों, समाधान कराने वाले व्यक्ति की सिफारिश को मंज़ूर भी कर सकते हैं और नकार भी सकते हैं। सामान्य तौर पर भारत में समाधानकर्त्ता अक्सर कोई सरकारी अधिकारी ही होता है, जबकि कानूनी मामलों के संदर्भ में यह दायित्व राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण (नालसा जो एक सांविधिक निकाय है) को प्रदान किया गया है।

लोक अदालतें

ऐसे मंच या फोरम हैं जहाँ न्यायालय में लंबित या मुकदमे के रूप में दाखिल नहीं किये गए मामलों का सौहार्द्रपूर्ण तरीके से निपटारा किया जाता है। यह सामान्य न्यायालयों से अलग होता है, क्योंकि यहाँ विवादित पक्षों के बीच परस्पर समझौते के माध्यम से विवादों का समाधान किया जाता है। लोक अदालत की स्थापना का विचार सर्वप्रथम भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश पी.एन. भगवती द्वारा दिया गया था। सबसे पहली लोक अदालत का आयोजन 1982 में गुजरात में किया गया था। 2002 से लोक अदालतों को स्थायी बना दिया गया। लोक अदालतों में सभी दीवानी मामले, वैवाहिक विवाद, नागरिक मामले, भूमि विवाद, मज़दूर विवाद, संपत्ति बँटवारे संबंधी विवाद, बीमा और बिजली संबंधी आदि विवादों का निपटारा किया जाता है। विधि के तहत ऐसे अपराध जिनमें राजीनामा नहीं हो सकता तथा ऐसे मामले जहाँ संपत्ति का मूल्य एक करोड़ रुपए से अधिक है, का निपटारा लोक अदालतों में नहीं हो सकता।

लोक अदालतों की निम्नलिखित विशेषताओं के माध्यम से हम भारतीय न्याय-तंत्र में इसके योगदान को समझ सकते हैं –

  • लोक अदालतों में किसी भी प्रकार की कोर्ट फीस नहीं लगती। यदि न्यायालय में लंबित मुकदमे में कोर्ट फीस जमा करा दी गई हो तो लोक अदालत में विवाद का निपटारा हो जाने पर वह फीस वापस कर दी जाती है।
  • इसमें दोनों पक्षकार जज के साथ स्वयं अथवा अधिवक्ता के माध्यम से बात कर सकते हैं, जो कि नियमित अदालत में संभव नहीं होता है।
  • लोक अदालतों द्वारा ज़ारी किया गया अवार्ड (पंचाट) दोनों पक्षों के लिये बाध्यकारी होता है। इसके विरुद्ध अपील नहीं की जा सकती।
  • स्थायी लोक अदालतों के गठन के पश्चात कोई भी पक्ष जिसका संबंध जनहित सेवाओं जैसे- बिजली, पानी व अस्पताल आदि से है, संबंधित विवादों को निपटाने के लिये स्थायी लोक अदालत में आवेदन कर सकता है।
  • स्थायी लोक अदालत अपने किये गए निर्णय के निष्पादन के लिये उसे क्षेत्रीय आधिकारिता रखने वाले न्यायालय के पास भेज सकती है और यह जिस न्यायालय के पास भेजा जाएगा, वह उस निर्णय का पालन उसी प्रकार करवाएगा, जैसे स्वयं द्वारा पारित निर्णय अथवा डिक्री की करवाता है।

SOURCE-PIB

PAPER-G.S.2