Current Affair 1 April 2021

1 April Current Affairs

दादा साहेब फाल्के पुरस्कार

करीब पांच दशकों से सिनेमा में सक्रिय अभिनेता रजनीकांत (Rajnikanth) को दादा साहब फाल्के अवॉर्ड (Dada Saheb Phalke Award) से नवाजा जाएगा। केंद्र सरकार ने गुरूवार सुबह, 1 अप्रैल, 2021 को इसकी सूचना दी है। रजनीकांत बीते पांच दशक से सिनेमा पर राज कर रहे हैं। इस साल ये सिलेक्शन ज्यूरी ने किया है। इस ज्यूरी में आशा भोंसले, मोहनलाल, विश्वजीत चटर्जी, शंकर महादेवन और सुभाष घई जैसे कलाकार शामिल रहे हैं।

केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री प्रकाश जावडेकर ने आज घोषणा की है कि सुपरस्टार रजनीकांत को 51वें दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। जावडेकर ने रजनीकांत को भारतीय सिनेमा के इतिहास में सबसे महान अभिनेताओं में से एक बताया। लेकिन प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक सवाल के बाद वह नाराज हो गए। जानिए वह सवाल क्या था।

दरअसल रजनीकांत दक्षिण राज्य तमिलनाडु से आते हैं भारत में सबसे लोकप्रिय सितारों में से एक रजनीकांत को भारत सरकार द्वारा 2000 में पद्म भूषण और 2016 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया जा चुका है। रजनीकांत ने तमिल सिनेमा में ‘अपूर्व रागंगल’ से डेब्यू किया था। उनकी कई हिट फिल्मों में ‘बाशा’, ‘शिवाजी’ और ‘एंथिरन’ जैसी फिल्में हैं। वे अपने प्रशंसकों के बीच थलाइवर (नेता) के रूप में जाने जाते हैं। कौन थे दादा साहब फाल्के।

दादा साहब फाल्के को भारतीय सिनेमा का जन्मदाता कहा जाता है। उनका जन्म 30 अप्रैल, 1870 को हुआ था। 1913 में उन्होंने ‘राजा हरिशचंद्र’ नाम की पहली फुल लेंथ फीचर फिल्म बनाई थी। दादा साहब सिर्फ एक निर्देशक ही नहीं बल्कि एक जाने माने निर्माता और स्क्रीन राइटर भी थे। उन्होंने 19 साल के फिल्मी करियर में 95 फिल्में और 27 शॉर्ट फिल्में बनाईं। लेकिन ‘द लाइफ ऑफ क्रिस्ट’ उनके करियर का टर्निंग प्वाइंट माना जाता है। भारतीय सिनेमा में दादा साहब के ऐतिहासिक योगदान के चलते 1969 से भारत सरकार ने उनके सम्मान में ‘दादा साहब फाल्के’ अवार्ड की शुरुआत की गई थी। बता दें कि दादा साहब फाल्के पुरस्कार भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च और प्रतिष्ठित पुरस्कार माना जाता है।

Source –PIB

 

उत्कल दिवस

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने उत्कल दिवस पर ओडिशा के लोगों को बधाई दी।

एक स्वतंत्र राज्य के रूप में पहचान के लिए संघर्ष के बाद ओडिशा राज्य के गठन को याद करने के लिए हर साल 1 अप्रैल को उत्कल दिवस या उत्कल दिबासा मनाया जाता है। ब्रिटिश शासन के तहत, ओडिशा बंगाल प्रेसीडेंसी का हिस्सा था, जिसमें वर्तमान के बिहार, पश्चिम बंगाल और ओडिशा शामिल थे। राज्य को मूल रूप से उड़ीसा कहा जाता था लेकिन लोकसभा ने इसका नाम बदल कर ओड़िशा करने के लिए मार्च 2011 में उड़ीसा विधेयक और संविधान विधेयक (113वां संशोधन) पारित किया।

ओडिशा के लोगों के लिए ओडिशा दिवस क्यों महत्वपूर्ण है

मौर्य शासन के विस्तार के लिए 261 ईसा पूर्व में मगध राजा अशोक द्वारा विजय प्राप्त करने के बाद यह क्षेत्र कलिंग का हिस्सा बन गया। मौर्य शासन के बाद, ओडिशा में राजा खारवेल का शासन शुरू हुआ। मगध को हराकर खारवेल मौर्य आक्रमण का बदला लेने में कामयाब रहा। इतिहासकारों ने खारवेल को कला, वास्तुकला और मूर्तिकला की भूमि के रूप में ओडिशा की प्रसिद्धि के लिए नींव रखने का श्रेय दिया है। उन्होंने एक शक्तिशाली राजनीतिक राज्य स्थापित करने में भी कामयाबी हासिल की।

गजपति मुकुंददेव ओडिशा के अंतिम हिंदू राजा थे। वह 1576 में मुगलों द्वारा पराजित हुए थे। कुछ सौ साल बाद, अंग्रेजों ने राज्य का अधिग्रहण कर लिया और राज्य को अलग-अलग हिस्सों में विभाजित कर दिया। राज्य के उत्तरी और पश्चिमी जिले उस समय की बंगाल प्रेसीडेंसी का हिस्सा बन गए।

स्वतंत्रता के लिए राज्य का संघर्ष

ओडिशा के नए प्रांत का गठन लोगों के निरंतर संघर्ष के बाद किया गया था, जो अंततः 1 अप्रैल, 1936 को अस्तित्व में आया। सर जॉन हबबक राज्य के पहले गवर्नर थे। उस आंदोलन के उल्लेखनीय नेता उत्कल गौरव- मधुसूदन दास, उत्कल मणि- गोपबंधु दास, फकीर मोहन सेनापति, पंडित नीलकंठ दास, और कई अन्य हैं।

SOURCE-PIB

 

अभ्यास शांतिर ओग्रोशेना-2021

बांग्लादेश में वहां के ‘राष्ट्रपिता’ बंगबंधु शेख मुजीबुर्रहमान की जन्म शताब्दी के उपलक्ष्य में बहुराष्ट्रीय सैन्य अभ्यास शांतिर ओग्रोशेना 2021 (शांति का फ्रंट रनर) आयोजित किया जाएगा और यह बांग्लादेश की आज़ादी के शानदार 50 वर्ष पूरे होने का प्रतीक होगा। भारतीय सेना की टुकड़ी में डोगरा रेजिमेंट की एक बटालियन के अधिकारी, जेसीओ और जवान शामिल हैं, जो दिनांक 4 अप्रैल से 12 अप्रैल, 2021 तक रॉयल भूटान आर्मी, श्रीलंकाई सेना और बांग्लादेश सेना की टुकड़ी के साथ अभ्यास में भाग लेंगे। अभ्यास का विषय “मजबूत पीसकीपिंग ऑपरेशंस” है। पूरे अभ्यास के दौरान अमेरिका, ब्रिटेन, तुर्की, सऊदी अरब, कुवैत और सिंगापुर के सैन्य पर्यवेक्षक भी उपस्थित रहेंगे।

SOURCE-PIB

 

विदेश व्यापार नीति 2015-2020

वर्तमान नीति जो 1 अप्रैल, 2015 को लागू हुई, 5 साल के लिए थी और उसके बाद इसे 31 मार्च, 2021 तक बढ़ाया गया।

वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री निर्मला सीतारमण ने भारत सरकार की पांच साल (2015 से 2020) की पहली विदेश व्यापार नीति-2015-20 नई दिल्‍ली में 1 अप्रैल, 2015 को जारी किया।

इस पंचवर्षीय विदेश व्यापार नीति में वस्तुओं एवं सेवाओं का निर्यात बढ़ाने के साथ-साथ रोजगार सृजन करने और प्रधानमंत्री के ‘मेक इन इंडिया’ विजन को ध्यान में रखते हुए देश में मूल्य संवर्द्धन को नई गति प्रदान करने की रूपरेखा का जिक्र किया गया है। इस नीति में विनिर्माण एवं सेवा दोनों ही क्षेत्रों को समर्थन देने पर ध्यान केन्द्रित किया गया है। वहीं, विदेश व्यापार नीति-2015-20 में ‘कारोबार करने को और आसान बनाने’ पर विशेष जोर दिया गया है।

विदेश व्यापार नीति पेश करने के साथ-साथ एक एफटीपी वक्तव्य भी जारी किया गया है, जिसमें भारत की विदेश व्यापार नीति को रेखांकित करने वाले विजन, लक्ष्यों एवं उद्देश्यों को विस्तार से बताया गया है। एफटीपी (विदेश व्यापार नीति) वक्तव्य में आने वाले वर्षों के दौरान भारत के वैश्विक करार समझौते का खाका भी पेश किया गया है।

उद्देश्‍य

  • इसका उद्देश्‍य देश का निर्यात बढ़ाना और व्यापार विस्‍तार को आर्थिक वृद्धि और रोजगार के अवसर जुटाने का प्रभावी साधन बनाना है।
  • एफटीपी का एक प्रमुख उद्देश्य सप्ताह के सातों दिन 24 घंटे ‘कागज रहित कामकाज’ की तरफ कदम बढ़ाना है।
  • नीति में सरकार के मेक इन इंडिया अभियान के तहत सेवाओं के निर्यात को और विनिर्माण क्षेत्र को भी बढ़ावा दिया जायेगा।
  • मर्चेन्‍डाइज और सेवा क्षेत्र में अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर की प्रतिस्‍पर्धा का माहौल तैयार करने के लिए स्‍थायी और दीर्घकालीन नीतिगत ढांचे को प्रोत्‍साहन देना है।
  • विनिर्माण क्षेत्र और सेवा क्षेत्र दोनों को बढ़ावा देना।

विदेश व्यापार नीति 2015-2020 में वस्तुओं और सेवाओं का व्यापार बढ़ाने के लिए ‘भारत वस्तु निर्यात योजना (एमईआईएस) और ‘भारत सेवा निर्यात योजना (एसईआईएस)’ शुरू करने की घोषणा की गई।

  • ईपीसीजी योजना के तहत स्वदेशी निर्माताओं से ही पूंजीगत सामान खरीदने के उपाय किए गए हैं। इसके तहत विशेष निर्यात प्रतिबद्धता को घटाकर सामान्य निर्यात प्रतिबद्धता के 75 फीसदी के स्तर पर ला दिया गया है। इससे घरेलू पूंजीगत सामान निर्माण उद्योग को बढ़ावा मिलेगा। इस तरह के लचीलेपन से निर्यातकों को स्थानीय एवं वैश्विक दोनों ही तरह की खपत के लिए अपनी उत्पादक क्षमताओं को विकसित करने में मदद मिलेगी।

SOURCE-DANIK JAGARAN

 

संविधान का अनुच्छेद 244 (ए)

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने असम के आदिवासी बहुल जिलों में लोगों के हितों की रक्षा के लिए संविधान के अनुच्छेद 244 (ए) को लागू करने का वादा किया।

अनुच्छेद 244 (ए) असम के भीतर कुछ विशेष आदिवासी क्षेत्रों में एक ‘स्वायत्त राज्य’ बनाने की अनुमति देता है।

इसे 1969 में संविधान में डाला गया, इसमें एक विधानमंडल और एक मंत्रिपरिषद का भी प्रावधान है।

यह संविधान की छठी अनुसूची से कैसे भिन्न है?

संविधान की छठी अनुसूची – अनुच्छेद 244 (2) और 275 (1) – एक विशेष प्रावधान है जो निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा प्रशासित स्वायत्त परिषदों के माध्यम से पूर्वोत्तर के कुछ आदिवासी क्षेत्रों में अधिक से अधिक राजनीतिक स्वायत्तता और विकेन्द्रीकृत शासन की अनुमति देता है।

असम में, डिमा हसाओ, कार्बी आंग्लोंग और पश्चिम कार्बी और बोडो प्रादेशिक क्षेत्र के पहाड़ी जिले इस प्रावधान के तहत हैं।

अनुच्छेद 244 (ए) आदिवासी क्षेत्रों में अधिक स्वायत्त शक्तियां प्रदान करता है। छठी अनुसूची के तहत स्वायत्त परिषद में, कानून और व्यवस्था का अधिकार क्षेत्र नहीं है।

SOURCE-INDIAN EXPRESS

 

सैन्य फार्म

भारतीय सेना ने 132 साल की सेवा के बाद 31 मार्च को अपने सैन्य फार्म (Military Farm) को बंद कर दिया है। सैन्य फार्म की स्थापना ब्रिटिश भारत में सैनिकों को गाय के दूध की आपूर्ति के उद्देश्य से की गयी थी।

मुख्य बिंदु

अब, सैन्य फार्म को बंद कर दिया गया है और संगठन के लिए सेवा प्रदान करना जारी रखने के लिए मंत्रालय के भीतर फार्म के सभी अधिकारियों और श्रमिकों को फिर से नियुक्त किया गया है।

फार्म को बंद करने के लिए कई सिफारिशें दी गई थीं।

वर्ष 2012 में, क्वार्टर मास्टर जनरल शाखा ने बंद करने की सिफारिश की थी।

इसके बाद दिसंबर 2016 में फिर से लेफ्टिनेंट जनरल डी.बी. शेकातकर समिति ने भी फार्म को बंद करने का सुझाव दिया।

पहला सैन्य फार्म 1 फरवरी, 1889 को इलाहाबाद में बनाया गया था।

आजादी के बाद, पूरे भारत में 130 फार्म में 30,000 मवेशियों की संख्या में वृद्धि हुई।

1990 के दशक में, लेह और कारगिल में भी सैन्य फार्म की स्थापना की गई थी।

एक सदी से भी अधिक समय से इन फार्म से 5 करोड़ लीटर दूध और 25,000 मीट्रिक टन घास की आपूर्ति की गयी।

यह फार्म इसलिए आवश्यकता थे क्योंकि छावनी शहरी क्षेत्रों से दूरी पर स्थित होती थीं।

अब शहरी विस्तार के साथ, कस्बों और शहरों के भीतर छावनियां भी आ गई हैं और दूध की खरीद खुले बाजार से की जा रही है।

कई बार फार्म में भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे। फार्म को बंद करने में इन आरोपों का योगदान भी था।

प्रोजेक्ट फ्रिसवाल (Project Freiswal)

उन्होंने कृषि मंत्रालय के सहयोग से “प्रोजेक्ट फ्रिसवाल” की स्थापना की थी। प्रोजेक्ट फ्रिसवाल को दुनिया के सबसे बड़े मवेशी क्रॉस-ब्रीडिंग प्रोग्राम में से एक माना जाता है। इन फार्म ने जैव ईंधन के विकास में रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) के साथ भी मिलकर काम किया।

SOURCE-PIB

 

Grant Assistance for Grassroots Projects (GGP)

Grant Assistance for Grassroots Projects (GGP) जापान की एक वित्तीय सहायता योजना है। भारत सहित 100 से अधिक देशों में लोगों की विविध बुनियादी मानवीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए डिज़ाइन की गई विकास परियोजनाओं के लिए जापान द्वारा अनुदान प्रदान किया जाता है।

मुख्य बिंदु

जापान द्वारा ग्रासरूट प्रोजेक्ट्स के लिए अनुदान सहायता 1989 में शुरू की गई थी। ग्रासरूट परियोजनाओं के लिए अनुदान सहायता भारत सहित 100 से अधिक देश देशों को दी जा रही है।

GGP योजना गैर-लाभकारी संगठनों, चिकित्सा और शैक्षणिक संस्थानों द्वारा कार्यान्वित परियोजनाओं का समर्थन करती है, जो भारत सरकार के संबंधित कानून के तहत विदेशी धन प्राप्त करने के लिए पात्र हैं।

GGP योजना के लिए पात्रता

संगठन को अंतर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय या स्थानीय गैर सरकारी संगठन / चिकित्सा संस्थान / शैक्षिक संस्थान / सामुदायिक-आधारित संगठन (CBO) होना चाहिए। संगठन को विदेशी योगदान (विनियमन) अधिनियम, 1976 के तहत पंजीकृत होना चाहिए। इसके साथ ही, संगठन को राष्ट्रीय और राज्य के प्रासंगिक कानूनों के तहत पंजीकृत होना चाहिए।

GGP योजना के तहत प्रति प्रोजेक्ट अधिकतम राशि 10 मिलियन जापानी येन राशि प्रदान की जाती है। इस योजना में बुनियादी मानव आवश्यकताओं और मानव सुरक्षा, प्राथमिक शिक्षा और वयस्क निरक्षरता, सुरक्षित पेयजल और स्वच्छता, महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण संरक्षण, सीएसआर परियोजनाएं, गरीबी उन्मूलन आदि शामिल हैं।

SOURCE-G.K.TODAY

 

विश्व बैंक ने वित्त वर्ष 2021-22 के लिए भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि 7.5 से 12.5 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया

विश्व बैंक (World Bank) ने जनवरी में अनुमानित 5.4 प्रतिशत की तुलना में 2021-22 के लिए भारतीय जीडीपी वृद्धि के 10.1% रहने का अनुमान लगाया है। विश्व बैंक ने कहा, कोविड-19 के अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभाव के बीच महत्वपूर्ण अनिश्चितता को देखते हुए, भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि 7.5 प्रतिशत से 12.5 प्रतिशत तक हो सकती है।

मुख्य बिंदु

विश्व बैंक ने अपनी ‘South Asia Economic Focus Spring’ अपडेट रिपोर्ट में कहा कि इसने निजी उपभोग और निवेश वृद्धि में मजबूत सुधार के बीच अनुमान को संशोधित किया है। विश्व बैंक ने कहा कि वित्त वर्ष के दौरान सरकारी खपत में लगभग 16.7 प्रतिशत की वृद्धि होने की उम्मीद है।

हालांकि, विश्व बैंक ने चेतावनी दी है कि आर्थिक गतिविधि पूर्व-कोविड अनुमान से काफी कम है। इसने कहा कि व्यवसायों को खोए हुए राजस्व को प्राप्त करने के लिए काफी प्रयास करने पड़ेंगे। इसके अलावा लाखों लोगों ने अनौपचारिक क्षेत्र में अपनी नौकरी भी गंवाई है, जिसके कारण उनकी आय में गिरावट आई है।

विश्व बैंक

विश्व बैंक का मुख्यालय वाशिंगटन डी. सी. में है। इसकी स्थापना जुलाई 1945 को हुई थी। विश्व बैंक ऋण देने वाली एक ऐसी संस्था है जिसका उद्देश्य विभिन्न देशों की अर्थ व्यवस्थाओं को एक व्यापक विश्व अर्थव्यवस्था में शामिल करना और विकासशील देशों में ग़रीबी उन्मूलन के प्रयास करना है। इसके कुल 189 सदस्य देश हैं। इसका आदर्श वाक्य “निर्धनता मुक्त विश्व के लिए कार्य करना” है।

SOURCE-G.K.TODAY