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Current Affair 11 April 2021

11 April Current Affairs

महात्मा ज्योतिबा फुले

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने महान समाज सुधारक, चिंतक, दार्शनिक एवं लेखक महात्मा ज्योतिबा फुले को उनकी जयंती पर श्रद्धांजलि दी है।

श्री मोदी  ने कहा कि महात्मा ज्योतिबा फुले जीवन भर महिलाओं की शिक्षा और उनके सशक्तिकरण के लिए कृतसंकल्प रहे।

प्रधानमन्त्री ने आगे कहा कि सामाजिक सुधारों के लिए उनका समर्पण और निष्ठा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगा।

महात्मा ज्योतिबा फुले का जन्म 11 अप्रैल 1827 को पुणे में हुआ था। उनकी माता का नाम चिमणाबाई तथा पिता का नाम गोविन्दराव था। उनका परिवार कई पीढ़ी पहले माली का काम करता था। वे सातारा से पुणे फूल लाकर फूलों के गजरे आदि बनाने का काम करते थे इसलिए उनकी पीढ़ी ‘फुले’ के नाम से जानी जाती थी।

ज्योतिबा बहुत बुद्धिमान थे। उन्होंने मराठी में अध्ययन किया। वे महान क्रांतिकारी, भारतीय विचारक, समाजसेवी, लेखक एवं दार्शनिक थे। 1840 में ज्योतिबा का विवाह सावित्रीबाई से हुआ था।

महाराष्ट्र में धार्मिक सुधार आंदोलन जोरों पर था। जाति-प्रथा का विरोध करने और एकेश्‍वरवाद को अमल में लाने के लिए ‘प्रार्थना समाज’ की स्थापना की गई थी जिसके प्रमुख गोविंद रानाडे और आरजी भंडारकर थे।

उस समय महाराष्ट्र में जाति-प्रथा बड़े ही वीभत्स रूप में फैली हुई थी। स्त्रियों की शिक्षा को लेकर लोग उदासीन थे, ऐसे में ज्योतिबा फुले ने समाज को इन कुरीतियों से मुक्त करने के लिए बड़े पैमाने पर आंदोलन चलाए। उन्होंने महाराष्ट्र में सर्वप्रथम महिला शिक्षा तथा अछूतोद्धार का काम आरंभ किया था। उन्होंने पुणे में लड़कियों के लिए भारत की पहला विद्यालय खोला।

इन प्रमुख सुधार आंदोलनों के अतिरिक्त हर क्षेत्र में छोटे-छोटे आंदोलन जारी थे जिसने सामाजिक और बौद्धिक स्तर पर लोगों को परतंत्रता से मुक्त किया था। लोगों में नए विचार, नए चिंतन की शुरुआत हुई, जो आजादी की लड़ाई में उनके संबल बने।

इस महान समाजसेवी ने अछूतोद्धार के लिए सत्यशोधक समाज स्थापित किया था। उनका यह भाव देखकर 1888 में उन्हें ‘महात्मा’ की उपाधि दी गई थी। ज्योतिराव गोविंदराव फुले की मृत्यु 28 नवंबर 1890 को पुणे में हुई।

Source –PIB

 

डॉल्फिन

भारत की सबसे बड़ी खारे पानी की झील चिल्का में डॉल्फिन की आबादी ओडिशा तट पर पिछले साल की तुलना में इस साल दोगुनी हो गई है। राज्य पर्यावरण विभाग ने इस वर्ष जनवरी और फरवरी में आयोजित डॉल्फिन की जनगणना पर अंतिम डेटा जारी किया, जो संख्या में शानदार वृद्धि का संकेत देता है।

जनगणना के दौरान तीन प्रजातियों को दर्ज किया गया था, पिछले साल 233 की तुलना में इस साल 544 इरावदी, बोतल-नोस और हम्प बैक डॉल्फिन देखी गईं। लुप्तप्राय इरवाडेरी डॉल्फ़िन ज्यादातर चिलिका झील में पाई जाती है। राजनगर मैंग्रोव डिवीजन में भी कुछ देखे गए।

281 की आबादी के साथ हम्पबैक डॉल्फ़िन के मामले में सबसे अधिक वृद्धि देखी गई है।

हम्पबैक डॉल्फिन किसी भी नदी प्रणालियों का हिस्सा नहीं थीं, इसलिए उन्हें आवासीय स्तनधारियों के रूप में पहचाना नहीं जा सकता है। उन्हें ओडिशा तट के साथ यात्रा करते हुए देखा गया और अगली जनगणना में संख्या में उतार-चढ़ाव की संभावना है।

डॉल्फिन  को हम अक्सर मछली समझने की भूल कर देते हैं लेकिन वास्तव में डॉल्फिन एक मछली नहीं है। वह तो एक स्तनधारी प्राणी है। जिस तरह व्हेल एक स्तनधारी प्राणी है वैसे ही डॉल्फिन भी इसी वर्ग में आती है, डॉल्फिन का रहने का ठिकाना संसार के समुद्र और नदियां हैं।  डॉल्फिन को अकेले रहना पसंद नहीं है यह सामान्यत: समूह में रहना पसंद करती है। इनके एक समूह में 10 से 12 सदस्य होते हैं। हमारे भारत में डॉल्फिन गंगा नदी में पाई जाती है लेकिन गंगा नदी में मौजूद डॉल्फिन अब विलुप्ति की कगार पर है। डॉल्फिन की एक बड़ी खासियत यह है कि यह कंपन वाली आवाज निकालती है जो किसी भी चीज से टकराकर

वापस डॉल्फिन के पास आ जाती है। इससे डॉल्फिन को पता चल जाता है कि शिकार कितना बड़ा और कितने करीब है। डॉल्फिन आवाज और सीटियों के द्वारा एक दूसरे से बात करती हैं। यह 60 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से तैर सकती है। डॉल्फिन 10-15 मिनट तक पानी के अंदर रह सकती है, लेकिन वह पानी के अंदर सांस नहीं ले सकती। उसे सांस लेने के लिए पानी की सतह पर आना पड़ता है।

मीठे पानी की  डॉल्फिन भारत का राष्‍ट्रीय जलीय जीव है। पर्यावरण और वन मंत्रालय ने राष्ट्रीय एक्वाटिक पशु के रूप में 18 मई 2010 को गंगा नदी डॉल्फिन अधिसूचित किया।

यह स्‍तनधारी जंतु पवित्र गंगा की शुद्धता को भी प्रकट करती है, क्‍योंकि यह केवल शुद्ध और मीठे पानी में ही जीवित रह सकता है। प्‍लेटेनिस्‍टा गेंगेटिका नामक यह मछली लंबे नोकदार मुंह वाली होती है और इसके ऊपरी तथा निचले जबड़ों में दांत भी दिखाई देते हैं। इनकी आंखें लेंस रहित होती हैं और इसलिए ये केवल प्रकाश की दिशा का पता लगाने के साधन के रूप में कार्य करती हैं। डॉलफिन मछलियां सबस्‍ट्रेट की दिशा में एक पख के साथ तैरती हैं और श्रिम्‍प तथा छोटी मछलियों को निगलने के लिए गहराई में जाती हैं। डॉलफिन मछलियों का शरीर मोटी त्‍वचा और हल्‍के भूरे-स्‍लेटी त्‍वचा शल्‍कों से ढका होता है और कभी कभार इसमें गुलाबी रंग की आभा दिखाई देती है। इसके पख बड़े और पृष्‍ठ दिशा का पख तिकोना और कम विकसित होता है। इस स्‍तनधारी जंतु का माथा होता है जो सीधा खड़ा होता है और इसकी आंखें छोटी छोटी होती है। नदी में रहने वाली डॉल्फिन मछलियां एकल रचनाएं है और मादा मछली नर मछली से बड़ी होती है। इन्‍हें स्‍थानीय तौर पर सुसु कहा जाता है क्‍योंकि यह सांस लेते समय ऐसी ही आवाज निकालती है। इस प्रजाति को भारत, नेपाल, भूटान और बांग्लादेश की गंगा, मेघना और ब्रह्मपुत्र नदियों में तथा बांग्लादेश की कर्णफूली नदी में देखा जा सकता है।

नदी में पाई जाने वाली डॉल्फिन भारत की एक महत्‍वपूर्ण संकटापन्‍न प्रजाति है और इसलिए इसे वन्‍य जीवन (संरक्षण) अधिनियम, 1972 में शामिल किया गया है। इस प्रजाति की संख्‍या में गिरावट के मुख्‍य कारण हैं अवैध शिकार और नदी के घटते प्रवाह, भारी तलछट, बेराज के निर्माण के कारण इनके अधिवास में गिरावट आती है और इस प्रजाति के लिए प्रवास में बाधा पैदा करते हैं। गंगा नदी डॉल्फिन (Platanista gangetica gangetica) और  सिंधु नदी डॉल्फिन (Platanista gangetica minor) मीठे पानी की डॉल्फिन की दो प्रजातियां हैं। ये भारत, बांग्लादेश, नेपाल तथा पाकिस्तान में पाई जाती हैं। गंगा नदी डॉल्फिन सभी देशों के नदियों के जल, मुख्यतः गंगा नदी में तथा सिंधु नदी, पाकिस्तान के सिंधु नदी के जल में डॉल्फिन पाई जाती है। केंद्र सरकार ने ०५ अक्टूबर २००९ को गंगा डॉल्फिन को भारत का राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया। गंगा नदी में पाई जाने वाली गंगा डॉल्फिन एक नेत्रहीन जलीय जीव है, जिसकी घ्राण शक्ति अत्यंत तीव्र होती है। विलुप्त प्राय इस जीव की वर्तमान में भारत में २००० से भी कम संख्या रह गयी है जिसका मुख्य कारण गंगा का बढता प्रदूषण, बांधों का निर्माण एवं शिकार है। इनका शिकार मुख्यतः तेल के लिए किया जाता है, जिसे अन्य मछलियों को पकडनें के लिए चारे के रूप में प्रयोग किया जाता है।

केंद्र सरकार ने १९७२ के भारतीय वन्य जीव संरक्षण कानून के दायरे में भी गंगा डोल्फिन को शामिल लौया था, लेकिन अंततः राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित करने से वन्य जी संरक्षण कानून के दायरे में स्वतः आ गया। १९९६ में ही इंटर्नेशनल यूनियन ऑफ़ कंजर्वेशन ऑफ़ नेचर भी इन डॉल्फिनों को तो विलुप्त प्राय जीव घोषित कर चुका था। गंगा में डॉल्फिनों की संख्या में वृद्धि ‘मिशन क्लीन गंगा’ के प्रमुख आधार स्तम्भ होगा, जिस तरह बाघ जंगल की सेहत का प्रतीक है उसी प्रकार डॉल्फिन गंगा नदी के स्वास्थ्य की निशानी है।

हाल ही में भारत में डॉल्फिन पार्क बनाए जाने की योजना बनी । इन्हें राजधानी नई दिल्ली, मुंबई और कोची में बनाया जाना था। लेकिन कोची में डॉल्फिन पार्क का निर्माण शुरू होते ही पर्यावरणविदों ने प्रदर्शन शुरू कर दिए। वे इन जानवरों को मनोरंजन का जरिया बनाने के खिलाफ थे। इन प्रदर्शनों को देखते हुए सरकार ने अब डॉल्फिन पार्क बनाने पर रोक लगा दी है। भारत सरकार ने डॉल्फिन को नॉन ह्यूमन पर्सन या गैर मानवीय जीव की श्रेणी में रखा है। यानी ऐसा जीव जो इंसान न होते हुए भी इंसानों की ही तरह जीना जानता है और वैसे ही जीने का हक रखता है। इसके साथ ही भारत दुनिया का चौथा ऐसा देश बन गया है जहां सिटेशियन जीवों को मनोरंजन के लिए पकड़ने और खरीदे जाने पर रोक लगा दी गयी है। भारत के अलावा कोस्टा रीका, हंगरी और चिली में भी ऐसा ही कानून है।

SOURCE-THE HINDU

 

मुस्लिम ब्रदरहुड

काहिरा की आपराधिक अदालत (मिस्र में) ने महमूद इज्जत को हत्या और आतंकवाद के आरोप में आजीवन कारावास की सजा सुनाई। इज्जत मुस्लिम ब्रदरहुड नामक अब आउटलाव घोषित संगठन के वरिष्ठ नेता हैं।

मुस्लिम ब्रदरहुड मिस्र का सबसे पुराना और सबसे बडा़ इस्लामी संगठन है। इसे इख्वान अल-मुस्लमीन के नाम से भी जाना जाता है। इसकी स्थापना 1928 में हसन अल-बन्ना ने की थी। स्थापना के बाद इस संगठन ने पूरे संसार में इस्लामी आंदोलनों को काफी प्रभावित किया और मध्य पूर्व के कई देशों में इसके सदस्य हैं। शुरुआती दौर में इस आंदोलन का मकसद इस्लाम के नैतिक मूल्यों और अच्छे कामों का प्रचार प्रसार करना था, लेकिन जल्द ही मुस्लिम ब्रदरहुड राजनीति में शामिल हो गया। विशेष रुप से मिस्र को ब्रिटेन के औपनिवेशिक निंयत्रण से मुक्ति के अलावा बढ़ते पश्चिमी प्रभाव से निजात दिलाने के लिए मुस्लिम ब्रदरहुड ने काम किया।

मिस्र में यह संगठन अवैध करार दिया जा चुका है लेकिन इस संगठन ने कई दशक तक सत्ता पर काबिज रहे राष्ट्रपति होस्नी मुबारक को बेदखल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जनांदोलनों की वजह से फरवरी 2011 में होस्नी मुबारक को सत्ता से हटना पड़ा था।

ब्रदरहुड का कहना है कि वो लोकतांत्रिक सिद्धांतो का समर्थन करता है और उसका एक मु्ख्य मकसद है कि देश का शासन इस्लामी कानून यानि शरिया के आधार पर चलाया जाए।

मुस्लिम ब्रदरहुड का सबसे चर्चित नारा है, “इस्लाम ही समाधान है”।

जॉर्डन, इराक, कुवैत, बहरीन, मोरक्को, तुर्की और ट्यूनीशिया ऐसे देशों में से हैं, जिनमें बड़े दल हैं जोब्रदरहुड से अपनी उत्पत्ति पाते हैं।  हालाँकि आज के सभी आंदोलनों और संगठनों ने खुद को मुस्लिम ब्रदरहुड नहीं कहा है।

SOURCE-BBC NEWS

 

विश्व पार्किंसंस दिवस

आज विश्व भर में ‘विश्व पार्किंसंस दिवस’ मनाया जा रहा है। पार्किंसंस के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए प्रतिवर्ष 11 अप्रैल को ‘विश्व पार्किंसंस दिवस’ मनाया जाता है। पार्किंसंस रोग शरीर के गतिविधि में धीमापन, अकड़न और अस्थिरता पैदा कर सकता  है।

वर्तमान में दुनिया भर में पार्किंसंस से एक करोड़ से अधिक लोग प्रभावित हैं। इसके इलाज के लिए कई दवाएं उपलब्ध हैं।  संतुलित आहार और व्यायाम भी बीमारी को रोकने में मदद कर सकते हैं।

पार्किंसंस रोग (Parkinson’s Disease)

पार्किंसंस रोग एक अपक्षयी विकार के केंद्रीय तंत्रिका तंत्र कि मुख्य रूप से प्रभावित करता है। इसके लक्षण आमतौर पर धीरे-धीरे उभरते हैं और जैसे-जैसे बीमारी बिगड़ती है, गैर-मोटर लक्षण अधिक आम हो जाते हैं। इसके सबसे स्पष्ट शुरुआती लक्षण में शामिल हैं – कंपकंपी, अकड़न, गति का धीमा होना और चलने में कठिनाई इत्यादि। इससे पीड़ित व्यक्ति को अवसाद के साथ संज्ञानात्मक और व्यवहार संबंधी समस्याएं भी हो सकती हैं। पार्किंसंस रोग के साथ कई लोगों में चिंता, उदासीनता का सामना भी करना पड़ता है। पार्किंसंस रोग मनोभ्रंश उन्नत चरणों में आम हो जाता है। पार्किंसंस से पीड़ित लोगों को उनकी नींद और संवेदी प्रणालियों की समस्या भी हो सकती है।

SOURCE-G.K.TODAY

 

मास्क अभियान

ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने हाल ही में COVID-19 के प्रसार को रोकने के लिए 14 दिनों का “मास्क अभियान” लांच किया है।

मास्क अभियान

इस पहल का मुख्य उद्देश्य मास्क के उपयोग को एक आदत में बदलना है। यह COVID-19 की वर्तमान वृद्धि को नियंत्रित करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाएगा। साथ ही, ओडिशा राज्य सरकार ने उल्लंघनकर्ताओं के लिए जुर्माना 1000 रुपये से बढ़ाकर 2000 रुपये कर दिया है।

ओडिशा सरकार ने महामारी रोग अधिनियम, 1897 के तहत COVID -19 नियमों में संशोधन भी किया था। तदनुसार, सार्वजनिक स्थानों पर मास्क नहीं पहनने वाले लोगों पर पहली बार उल्लंघन के लिए 2,000 रुपये तक का जुर्माना लगाया जाएगा। जब दूसरी बार उल्लंघन किया जाता है, तो लोगों पर 5,000 रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा।

ओडिशा सरकार ने किन कानूनी आधारों पर जुर्माना लगाया है?

मई 2020 में, केंद्र सरकार ने राज्यों को महामारी रोग अधिनियम लागू करने का निर्देश दिया। यह अधिनियम राज्य सरकारों को एक महामारी के दौरान विशेष उपाय करने का अधिकार देता है। इन प्रावधानों के तहत, ओडिशा सरकार ने जुर्माना पेश किया है।

महामारी अधिनियम, 1897 के प्रावधान

स्वास्थ्य एक राज्य का विषय है। हालाँकि, महामारी अधिनियम की धारा 2A केंद्र सरकार को महामारी के प्रसार को रोकने के लिए कदम उठाने का अधिकार देती है।

अधिनियम की धारा 3 अवज्ञा के लिए दंड का प्रावधान करती है।

अधिनियम की धारा 4 अधिनियम के तहत कार्रवाई करने वाले अधिकारियों को कानूनी सुरक्षा प्रदान करती है।

हाल ही में महामारी अधिनियम, 1897 में संशोधन

केंद्र सरकार ने हाल ही में इस अधिनियम में संशोधन करते हुए कहा कि स्वास्थ्य सेवा कर्मियों के खिलाफ हिंसा के कार्यों को दंडित किया जाएगा। आरोपी को तीन महीने से पांच साल तक की कैद होगी और 2 लाख रुपये तक जुर्माना लगेगा।

La Sourfriere

पूर्वी कैरिबियाई द्वीप पर स्थित ला सोरियरेरे (La Sourfriere Volcano) ज्वालामुखी में दशकों की निष्क्रियता के बाद हाल ही में विस्फोट हो गया है।

La Sourfriere

यह ज्वालामुखी 1979 से निष्क्रिय था।

इसने दिसंबर 2020 में गतिविधि के संकेत दिखाना शुरू कर दिया था।

जब 1979 में ज्वालामुखी फटा, तो इसने 100 मिलियन अमरीकी डॉलर का नुकसान किया था।

1902 में इस ज्वालामुखी में विस्फोट हुआ था और इसमें हजार से अधिक लोग मारे गए।

फ़्रांसिसी भाषा में ला सॉरिएरेरे का अर्थ है “सल्फर आउटलेट”।

इसमें 1718 के बाद से पांच बार विस्फोट हो चुका है।

ला सॉरिएरेरे ज्वालामुखी एक स्ट्रैटोवोलकानो है।

यह द्वीप का सबसे छोटा और सबसे उत्तरी ज्वालामुखी है।

ला सॉरिएरेरे ज्वालामुखी कैरेबियन टेक्टॉनिक प्लेट में है।

कैरेबियन

कैरेबियन अमेरिका महाद्वीपों का एक क्षेत्र है जिसमें कैरेबियन सागर शामिल है। इस क्षेत्र में 700 से अधिक द्वीप हैं। जलवायु परिवर्तन कैरिबियाई क्षेत्र के द्वीपों के लिए बड़ा जोखिम पैदा कर रहा है।

कैरेबियन नाम कैरिब्स (Caribs) से आया है। कैरिब इस क्षेत्र के प्रमुख देशी अमेरिकी समूहों में से एक है।

कैरेबियन टेक्टोनिक प्लेट (Caribbean Tectonic Plate)

कैरेबियन टेक्टोनिक प्लेट ज्यादातर एक समुद्री टेक्टोनिक प्लेट है। कैरिबियन प्लेट नाज़का प्लेट, कोकोस प्लेट, उत्तरी अमेरिकी प्लेट और दक्षिण अमेरिकी प्लेट की सीमा बनाती है। यह सीमाएं तीव्र भूकंपीय गतिविधि के क्षेत्र हैं।

कैरिबियन सागर (Caribbean Sea)

कैरेबियन सागर पश्चिम में मैक्सिको और दक्षिण पश्चिम में मध्य अमेरिका से घिरा है। कैरिबियन सागर के उत्तर में ग्रेटर एंटिल्स (Greater Antilles) है और पूर्व में लेसर एंटिल्स (Lesser Antilles) है।

मेसोअमेरिकन बैरियर रीफ (Mesoamerican Barrier Reef) नामक दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बैरियर रीफ कैरेबियन सागर में है। यह चट्टान होंडुरास, गौतमला, बेलीज और मैक्सिको के तट के साथ स्थित है।

SOURCE-G.K.TODAY 

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