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Current Affair 14 June 2021

CURRENT AFFAIRS – 14th JUNE 2021

राजा पर्बा (रज पर्व)

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने राजा पर्बा के पावन अवसर पर ओडिशा वासियों को बधाई दी है।

एक ट्वीट में प्रधानमंत्री ने कहा है, “राजा पर्बा के पावन अवसर पर शुभकामनायें। मैं सबके स्वास्थ्य और आरोग्य के लिये प्रार्थना करता हूं।”

आज ओडिशा में रज पर्व मनाया जा रहा है। यह पर्व चार दिनों तक चलता है। हर साल मिथुन संक्रांति के दिन से ओडिशा में रज पर्व मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि जिस दिन सूर्य वृषभ राशि से निकलकर मिथुन राशि में प्रवेश करता है, उस दिन से वर्षा ऋतु का आगमन होता है। इस मौके पर ओडिशा में रज पर्व बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। रज पर्व 15 जून से 18 जून तक है। आइए, जानते हैं कि रज पर्व क्यों और कैसे मनाया जाता है

रज पर्व

इस दिन लोग साल की पहली बारिश का जश्न मनाकर स्वागत करते हैं। इन चार दिनों में अच्छी बारिश और खेती के लिए धरती मां की पूजा की जाती है। इस पर्व में औरत, बड़े और बच्चे सभी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं।

राजा पर्व चार दिन के नाम

पहले दिन को पहिली राजा कहते हैं

दूसरे दिन को मिथुना संक्रांति कहा जाता है

तीसरे दिन को दाहा कहा जाता है

जबकि चौथे दिन को वसुमती स्नान कहते हैं

रज पर्व कैसे मनाते हैं

इस पर्व के लिए घर की साफ-सफाई की जाती है। बाग-बगीचों में झूले लगाए जाते हैं। पहले तीन दिनों तक महिलाएं व्रत रखती हैं। इन दिनों में काट-छांट और जमीन की खुदाई नहीं की जाती है। इस मौके पर गीत-संगीत कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। राजा पर्व के पहले दिन महिलाएं हल्दी लगाकर नहाती हैं। जबकि अगले दो दिन नहीं नहाती है। चौथे दिन फिर से हल्दी लगाकर नहाती हैं।

इसके बाद सिलबट्टे को स्नान कराया जाता है। इस पर्व में सिलबट्टे को धरती मां माना जाता है। इसके बाद धरती मां की पूजा विधि-पूर्वक की जाती है। इस दिन जरूरतमंदों और गरीबों को दान दिया जाता है। इस पर्व को करने से विवाहित महिलाओं के जीवन में सुख और शांति आती है। जबकि अविवाहित लड़कियों को मनचाहा वर मिलता है।

SOURCE-DANIK JAGRAN

 

जीआई प्रमाणित जरदालू आमों

भागलपुर, बिहार से जिओग्राफिककल इंडिकेशन (जीआई) प्रमाणित जरदालू आमों की पहली वाणिज्यिक खेप को आज यूनाइटेड किंगडम के लिए निर्यात किया गया। बिहार सरकार, भारतीय उच्चायोग और इन्वेस्ट इंडिया के साथ भागीदारी में एपिडा ने रसदार और सुगंधित आमों का निर्यात किया, जिन्हें लखनऊ में एपिडा के पैकहाउस में पैक किया गया था। अनूठी सुगंध और स्वाद के साथ, बिहार के भागलपुर जिले के जरदालू आमों को 2018 में जीआई प्रमाणन हासिल हुआ था।

एपिडा गैर पारम्परिक क्षेत्रों से आम के निर्यात को प्रोत्साहन देने के लिए कदम उठा रहा है। हाल में, बहरीन में भारतीय आमों के प्रचार के लिए एक सप्ताह लंबे कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जहां तीन जीआई प्रमाणित खीरसपाती और लक्ष्मणभोग (पश्चिम बंगाल) और जलदालू (बिहार) सहित फल की 16 किस्मों का आयातक अल जजीरा समूह के सुपर स्टोरों में प्रदर्शन किया गया।

एपिडा आम के निर्यात को प्रोत्साहन देने के लिए वर्चुओल खरीदार-विक्रेता बैठक और महोत्सव का आयोजन करता रहा है। एपिडा ने हाल में भारतीय दूतावासों के साथ मिलकर बर्लिन, जर्मनी के साथ ही जापान में आम महोत्सव का आयोजन किया था।

एपिडा आम के निर्यात को प्रोत्साहन देने के लिए वर्चुओल खरीदार-विक्रेता बैठक और महोत्सव का आयोजन करता रहा है। एपिडा ने हाल में भारतीय दूतावासों के साथ मिलकर बर्लिन, जर्मनी के साथ ही जापान में आम महोत्सव का आयोजन किया था।

भारत में आम को ‘फलों का राजा’ भी कहा जाता है और प्राचीन शास्त्रों में इसे कल्पवृक्ष (इच्छित फल देने वाला पेड़) कहा जाता है। भले ही भारत के ज्यादातर राज्यों में आम के बागान होते हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक में इस फल की पैदावार में बड़ी हिस्सेदारी है।

जरदालू आम बिहार की एक प्रसिद्ध किस्म है ऐसा माना जाता है कि इसकी उत्पति बिहार के भागलपुर जिले में हुई है। भागलपुर एवं इसके आस-पास के क्षेत्रों में इसकी बागवानी बड़े पैमाने पर की जाती है। फल की उच्च गुणवत्ता के कारण यह किस्म भी पड़ोसी राज्यों में भी लोकप्रिय एवं विख्यात है।

जरदालू आम की विकसित किस्म

इसके वृक्ष बड़े एवं वृक्षों के छत्रक का फैलाव सामान्य थोड़ा अधिक होता है। यह एक अगेती किस्म है। वृक्षों में मंजर जनवरी के अंतिम सप्ताह में निकलना शुरू होता है एवं 20-25 फरवरी तक निकलते रहते हैं। जून के प्रथम सप्ताह में फल पकने लगते हैं। इसके फल काफी बड़े एवं स्वादिष्ट होते है। फल मध्यम आकार से थोड़े बड़े, लम्बाकार (साधारणतया 10.6 सें.मी. लम्बे एवं 6.6 सें.मी. चौड़े या मोटे) होते हैं। ओसतन एक फल 205-210 ग्राम वजन का होता है। फल का ऊपरी भाग चौड़ा तथा नीचला भाग पतला एवं गोलाकार होता है। फल की सतह चिकना तथा बराबर होता है। छिलका थोड़ा मोटा होता है। फलों का रंग पकने पर पीला-नांरगी होता है तथा गूदे में मनमोहक सुगंध होती है। फल में गूदा की मात्रा लगभग 67 प्रतिशत होती है। गूदा मुलायम, रेशारहित, लालीमा लिए पीला होता है। कुल घुलनशील तत्वों की मात्रा 21 प्रतिशत तथा अम्ल की मात्रा 0.23 प्रतिशत होती है। गुठली पतली होती है। छिलका एवं गुठली का वजन फल के वजन का क्रमश: 13.7 एवं 19.5 प्रतिशत होता है। गूदा हल्के लाल रंग का और मीठा होता है। गूदा में रेशा नहीं होता है।

फलन काफी अधिक होती है। एक वृक्ष से औसतन 1500-2000 फल मिलते हैं जो वजन में 2.5 से 3.0 क्विंटल तक हो सकते हैं। एक हेक्टेयर के बगीचे से 20-25 टन की उपज मिलती है। फलों की भण्डारण क्षमता अन्य किस्मों की तुलना में थोड़ी बेहतर होती है। पके फल कमरे के तापक्रम पर 3-4 दिनों तक भंडारित किए जा सकते हैं। इस किस्म में भी द्विवर्षीय फलन की समस्या है।

कृषि विभाग द्वारा आत्मा योजना के माध्यम से भागलपुर, दरभंगा, सीतामढ़ी, शिवहर और सहरसा जिले में जरदालू प्रभेद के साथ हल्दी की अंतरवर्ती खेती को बढ़ावा देने की योजना ली गई है।

जीआई यानी जियोग्राफ़िक इंडिकेशन टैग. ये टैग बताता है कि फ़लां चीज़ किस देश में या किस जगह पैदा होती है या बनाई जाती है.  – दार्जिलिंग चाय पहला भारतीय उत्पाद था जिसे 2004 में भौगोलिक संकेत टैग मिला था.

इसका विनियमन भौगोलिक पंजीयक रजिस्ट्रार (Registrar of Geographical Indications) द्वारा किया जाता है। भौगोलिक संकेत रजिस्ट्री का मुख्यालय चेन्नई (तमिलनाडु) में स्थित है।

टैग की शुरुआत कब हुई?

जीआई टैग उस उत्पाद की गुणवत्ता और उसकी विशेषता को दर्शाता है. दिसंबर, 1999 में संसद ने माल के भौगोलिक उपदर्शन (रजिस्ट्रीकरण और संरक्षण) अधिनियम, 1999 पारित किया. अंग्रेजी में कहें, तो Geographical Indications of Goods (Registration and Protection) Act, 1999. इसे 2003 में लागू किया गया.

भारत में जी आई टैग कौन जारी करता है?

इस टैग को लागू करने के लिए भारतीय संसद ने 1999 में प्रोटेक्शन एक्ट के तहत ज्योग्राफिकल इंडिकेशंस आफ गुड्स लागू किया गया था. जी आई टैग उस वस्तु को दिया जाता है, जिस की गुणवत्ता और पैदावार असाधारण हो और वह एक विशेष पहचान रखता हो, ऐसी वस्तु अथवा उत्पाद को जी आई टैग प्रदान किया जाता है.

भारत में भोगोलिक संकेत (GI Tag) से परीक्षा में पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न

भौगोलिक संकेत प्राप्त करने वाला पहला भारतीय उत्पाद कौन सा है- दार्जिलिंग चाय (2004)

भौगोलिक संकेत (जी टैग) किस भारतीय एक्ट के अनुसार दिया जाता है- भौगोलिक संकेत एक्ट 1999

भारत में भौगोलिक संकेत कौन जारी करता है- भौगोलिक संकेत रजिस्ट्री

जी आई टैग की समय सीमा क्या होती है- 10 वर्ष के लिए मान्य

जी आई टैग GI Tag प्राप्त करने वाला नवीनतम उस्ताद 2019-2020

  • तेलिया रुमाल ( नालगोंडा तेलंगाना) – तेलिया रुमाल हैदराबाद के निजाम के दरबार में अधिकारियों द्वारा बनाई जाती थी, जिसे मई 2020 में जीआई टैग प्रदान किया गया.
  • कश्मीरी केसर ( जम्मू कश्मीर) कश्मीरी केसर को मई 2020 में जीआई टैग प्रदान किया गया यह कश्मीर की कई क्षेत्र जैसे पुलवामा, किश्तवाड़, बड़गांव, श्रीनगर आदि क्षेत्रों में पाए जाते हैं
  • सोहराई खोबर पेंटिंग ( झारखंड) – यह पेंटिंग झारखंड में स्थानीय एवं प्राकृतिक रूप से विभिन्न प्रकार की मिट्टी का उपयोग कर शादी समारोह एवं फसल के मौसम में इस्तेमाल किया जाता है, जिसे मई 2020 में जीआई टैग प्रदान किया गया.
  • मणिपुर का काला चावल ( मणिपुर)- मनीपुर का काला चावल को चाकहाओ के नाम से भी जाना जाता है, यह एक सुगंधित एवं चिपचिपा चावल होता है, जिसे  अप्रैल 2020 में जी आई टैग प्रदान किया गया.
  • तिरुर सुपारी ( केरल) – यह सुपारी मुख्य रूप से मलपपुरम जिंग में पाई जाती है जिसे अगस्त 2019 में जी आई टैग प्रदान किया गया
  • पंचामृत ( तमिलनाडु) – इस पंचामृत में शहद, गुड, केला, घी एवं इलायची मिलाकर बनाई जाती है, जिसे अगस्त 2019 में जीआई टैग प्रदान किया गया
  • डिंडीगुल का ताला ( तमिलनाडु) – तमिलनाडु के डिंडीगुल जिले में निर्मित डिंडीगुल ताला अपनी बेहतरीन गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध है जिसे अगस्त 2019 में जीआई टैग प्रदान किया गया.
  • कांदगी साड़ी ( तमिलनाडु) – कांदगी साड़ी को वाइंडिंग मशीन,करघा एवं बॉबिन का उपयोग कर बनाया जाता है, इसे अगस्त 2019 में जीआई टैग प्रदान किया गया.
  • दार्जिलिंग का ग्रीन एवं वाइट चाय ( पश्चिम बंगाल)- यह दार्जिलिंग की बहुत ही महत्वपूर्ण एवं प्रसिद्ध चाय है, जिसे अक्टूबर 2019 में जीआई टैग प्रदान किया गया था. भौगोलिक संकेत जी आई टैग पानी वाला प्रथम भारतीय उत्पाद भी दार्जिलिंग चाय ही है.

SOURCE-PIB

 

जीवन वायु

रतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, रोपड़ ने एक उपकरण ‘जीवन वायु’ विकसित किया है जिसे सीपीएपी मशीन के विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। हालांकि, यह देश का पहला ऐसा उपकरण है जो बिना बिजली के भी काम करता है और अस्पतालों में ऑक्सीजन सिलेंडर व ऑक्सीजन पाइपलाइन जैसी दोनों प्रकार की ऑक्सीजन उत्पादन इकाइयों के लिए अनुकूलित है। ये प्रावधान अन्य मौजूदा सीपीएपी मशीनों में उपलब्ध नहीं हैं।

निरंतर सकारात्मक वायुमार्ग दबाव (सीपीएपी) नींद के दौरान सांस लेने में समस्या, जिसे नींद स्वास अवरोध (स्लीप एपनिया) कहा जाता है, वाले मरीजों के लिए एक उपचार पद्धति है। यह मशीन आसान सांस लेने को लेकर हवा के रास्ते को खुला रखने के लिए हल्के वायु दाब का उपयोग करती है। इसका उपयोग उन नवजातों के इलाज के लिए भी किया जाता है, जिनके फेफड़े पूरी तरह से विकसित नहीं हुए हैं। यह मशीन बच्चे के फेफड़ों को फुलाने में मदद करने के लिए उसके या उसकी नाक में हवा भरती है। कोविड-19 संक्रमण के शुरुआती चरणों के दौरान यह उपचार सबसे अधिक जरूरी है। यह फेफड़ों के नुकसान को कम करती है और मरीजों को दुष्प्रभाव से उबरने में सहायता करती है।

चिकित्सकीय रूप से जरूरी सभी मानकों को पूरा करते हुए, यह रिसाव-रहित व कम लागत वाली सीपीएपी वितरण प्रणाली, “जीवन वायु’ 22 मिलीमीटर सीपीएपी क्लोज सर्किट ट्यूब के लिए डिजाइन की गई है। इसे ट्यूब के आकार के अनुरूप भी अनुकूलित किया जा सकता है। चूंकि यह बिजली न होने पर भी चल सकती है, इसलिए इसका उपयोग मरीजों के सुरक्षित आवागमन के लिए किया जा सकता है।

मेटलर्जिकल एंड मटेरियल्स की सहायक प्रोफेसर डॉ. खुशबू राखा, जिन्होंने आईआईटी रोपड़ की एडवांस्ड मटेरियल्स एंड डिजाइन लैब में उपकरण विकसित किया है, ने कहा, “मौजूदा कोविड महामारी के दौरान यह मशीन समय की जरूरत थी जब वेंटिलेटर और ऑक्सीजन कंसंट्रेटर जैसे चिकित्सा उपकरणों के सहारे लोगों के जीवन को बचाने के लिए विद्युत की आपूर्ति प्रमुख चिंता का विषय है।”

“इसमें एयर एंटरटेनमेंट छोर पर एक इनबिल्ट वायरल फिल्टर है, जिसकी वायरल प्रभावशीलता 99.99 फीसदी है।” वायरल फिल्टर यह सुनिश्चित करता है कि हवा, वातावरण से बीमारी पैदा करने वाले जीवाणु को नहीं लाती है। इस उपकरण को 3डी प्रिंटिंग का उपयोग करके बनाया गया है और इसका यांत्रिक परीक्षण भी किया गया है।

‘जीवन वायु’ 20 सेंटीमीटर H2O तक के निरंतर सकारात्मक दबाव को बनाए रखते हुए उच्च प्रवाह ऑक्सीजन (20-60 एलपीएम) प्रदान कर सकता है। इस उपकरण को 5-20 सेमी H2O के पीईईपी (पॉजिटिव एन्ड-एक्सपायरटरी प्रेशर) के साथ 40 फीसदी से ऊपर के FiO2 को बनाए रखने के लिए डिजाइन किया गया है।

डॉ. खुशबू राखा और उनकी टीम ने चंडीगढ़ स्थित पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज की सीमेन्स सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में रैपिड प्रोटोटाइपिंग लैब के विभाग प्रभारी श्री सुरेश चंद के साथ उपकरण की 3डी प्रिंटिंग के लिए सहभागिता की है।

SOURCE-PIB

 

ऑपरेशन ओलिविया

हाल ही में, तटरक्षक बल ने कानून लागू किए हैं और ओडिशा में ओलिव रिडले कछुओं (Olive Ridley Turtles) की रक्षा के लिए ऑपरेशन ओलिविया (Operation Olivia) शुरू किया है।

ऑपरेशन ओलिविया (Operation Olivia) क्या है?

ऑपरेशन ओलिविया भारतीय तटरक्षक बल (ICG) द्वारा पहली बार 1980 के दशक की शुरुआत में शुरू किया गया था। यह ऑपरेशन हर साल ओलिव रिडले कछुओं की रक्षा करने में मदद करता है जब वे नवंबर से दिसंबर के महीनों में प्रजनन के लिए ओडिशा तट पर घोंसला बनाना शुरू करते हैं। इसके तहत तटरक्षक बल की संपत्ति जैसे फास्ट पेट्रोल वेसल, इंटरसेप्टर क्राफ्ट, एयर कुशन वेसल और डोर्नियर एयरक्राफ्ट के जरिए नवंबर से मई तक चौबीसों घंटे निगरानी की जाती है।

वर्तमान परिदृश्य

नवंबर 2020 से मई 2021 के बीच, तटरक्षक बल ने 225 जहाज दिवस और 388 विमान घंटे समर्पित किए हैं। उन्होंने 3.49 लाख कछुओं की रक्षा की है

ओलाइव रिडले

1974 में ब्राहमनी-बैतरनी (धमरा) के निकट गहिरमाथा रूकरी की खोज एवं वैश्विक पहचान के पश्चात् उड़ीसा में ओलाइव रिडले प्रजाति के कछुओं के संरक्षण के विषय में प्रयास शुरू किया गया । गहिरमाथा के दक्षिण लगभग 55 नाटिकल मील दूर देवी नदी के मुहाने पर 1981 में अंडों के प्रजनन के दूसरे समूह तथा गहिरमाथा के दक्षिण 162 नाटिकल मील दूर रूशीकुल्या नदी के मुहाने पर 1994 में प्रजनन के तीसरे स्थान की खोज हुई ।

प्रति वर्ष नवंबर-दिसंबर के बीच ओलाइव प्रजाति के कछुए ओडिशा के तटों पर अंडे देने के लिए आते हैं तथा अप्रैल-मई तक वहाँ ठहरते हैं । हाल में पता चला है कि अब ये जनवरी के आखिर व फरवरी के शुरुआत में आने लगे हैं । कछुए अंडे देने के लिए मुहानों एवं खाड़ी के निकट संकरे स्थान को चुनते है । एक प्रौढ़ मादा एक बार में लगभग सौ से एस सौ चालीस अंडे देती है ।

ओलाइव रिडले प्रजाति के प्रवासी कछुओं को मार्ग में, रहने के स्थान तथा तटीय स्थलों पर कछुओं के प्रतिकूल, मत्स्य शिकार, बंदरगाह के लिए तटीय विकास एवं उसके संदोहन तथा पर्यटन केंद्रों जैसी मानवीय गतिविधियों के कारण, गंभीर खतरों का सामना करना पड़ता है। यद्यपि कछुओं एवं इनके उत्पादों पर अंतर्राष्ट्रीय व्यापार करना प्रतिबंधित है फिर भी मांस, खोल एवं चमड़े के लिए इनका व्यापक रूप से शिकार किया जा रहा है । कछुए के अंडों को इकट्ठा करना गैर-कानूनी है फिर भी तटीय क्षेत्रों की बाजारों में ये बहुतायत रूप से उपलब्ध रहते हैं।

ओलाइव रिडले प्रजाति के कछुए अनियंत्रित मत्स्य शिकार के कारण प्रजनन ऋतु में जालों में फंसने के कारण गंभीर खतरे का सामना करते हैं। फलस्वरूप प्रौढ़ कछुए दुर्घटनाग्रस्त हो रहे हैं । ऐसा माना जाता है कि पिछले 13 वर्षों में मशीनी जाल में फंसकर 1.3 लाख से अधिक कछुए दुर्घटनाग्रस्त हो गये हैं ।

ओलाइव प्रजाति के कछुओं के संरक्षण के लिए कानून

ओलाइव रिडले सहित भारत में मौजूद सभी 5 प्रकार के समुद्री कछुओं को वन्य जीवन संरक्षण अधिनियम 1972 की अनुच्छेद I में कानूनी रूप से संरक्षित करने का प्रावधान है । तथा सी आई टी ई एस (CITES) समझौते की परिशिष्ट I में कछुओं के व्यापार पर निषेध है । वे Convention of International Trade in Endangered Species (CITES) of Wild Fauna and Flora के परिशिष्ट I में भी सूचीबद्ध हैं। उनके सामूहिक घोंसले को अरिबाडा (Arribada) कहा जाता है। गहिरमाथा, अस्टारंगा तट, देवी नदी का मुहाना और रुशिकुल्या भारत में ओडिशा तट से 4 अरिबाडा स्थल हैं।

ओलिविया 2014 का अभियान

अंडे देने की अवधि लगभग छः माह की होती है । भारतीय तटरक्षक ओलाइव प्रजाति के कछुओं का संरक्षण करने के लिए प्रति वर्ष ओलीवा अभियान के कार्यक्रम का संचालन करती है । कमांडर तटरक्षक क्षेत्र (उत्तर-पूर्व) के अधीन एवं समन्वय में तटरक्षक जिला संख्या-7 (ओडिशा) ने 08 नवंबर 2014 को ओलिवा अभियान की शुरूआत की ।

SOURCE-THE HINDU

 

Project O2 for India क्या है

सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार के कार्यालय ने जिओलाइट्स (zeolites) जैसे महत्वपूर्ण कच्चे माल की आपूर्ति, कम्प्रेसर के निर्माण और छोटे ऑक्सीजन संयंत्रों की स्थापना सुनिश्चित करने के उद्देश्य से “Project O2 for India” शुरू किया है।

पृष्ठभूमि

यह परियोजना COVID-19 की दूसरी लहर के बाद शुरू की गई थी, जिसमें देश भर में मेडिकल ऑक्सीजन की मांग में वृद्धि देखी गई थी। इस प्रकार, वर्तमान मांग को पूरा करने के साथ-साथ भविष्य की जरूरतों के लिए ऑक्सीजन की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए मेडिकल ऑक्सीजन का निर्माण करना महत्वपूर्ण है।

Project O2 for India

यह प्रोजेक्ट प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार के कार्यालय द्वारा शुरू किया गया है ताकि उन हितधारकों को सक्षम बनाया जा सके जो चिकित्सा ऑक्सीजन की मांग में वृद्धि को पूरा करने के लिए भारत की क्षमता को बढ़ाने के लिए काम कर रहे हैं। इस प्रोजेक्ट के तहत, ऑक्सीजन का एक राष्ट्रीय संघ (National Consortium of Oxygen) स्थापित किया जाएगा जो जिओलाइट्स जैसे महत्वपूर्ण कच्चे माल की पर्याप्त राष्ट्रीय स्तर की आपूर्ति को सक्षम करेगा। यह छोटे ऑक्सीजन संयंत्र भी स्थापित करेगा, कम्प्रेसर का निर्माण करेगा और ऑक्सीजन संयंत्र, कंसन्ट्रेटर और वेंटिलेटर जैसे अंतिम उत्पादों का निर्माण करेगा। यह कंसोर्टियम तत्काल अल्पकालिक राहत प्रदान करने के साथ-साथ लंबी अवधि में विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के लिए काम करेगा।

विशेषज्ञों की समिति (Committee of Experts)

भारत बेस्ड स्टार्ट-अप, निर्माताओं और सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) से महत्वपूर्ण उपकरण जैसे कि कंसन्ट्रेटर, ऑक्सीजन संयंत्र और वेंटिलेटर का मूल्यांकन करने के लिए विशेषज्ञों की समिति का गठन किया गया है।

विनिर्माण और आपूर्ति संघ (Manufacturing and Supply Consortium)

इसमें भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL), टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स (TCE), आईआईटी कानपुर, आईआईटी दिल्ली, आईआईटी हैदराबाद, आईआईटी बॉम्बे और 40 से अधिक  MSME शामिल हैं।

SOURCE-GK TODAY

 

नफ्ताली बेनेट

नफ्ताली बेनेट (Naftali Bennett) ने हाल ही में इजराइल के नए प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ले ली है। नफ्ताली बेनेट ने सबसे कम अंतर 60-59 मतों के साथ विश्वास मत जीता। उनकी इस जीत ने देश के पूर्व प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के 12 साल के शासन को समाप्त कर दिया। बेंजामिन नेतन्याहू इजरायल के सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले नेता है।

मुख्य बिंदु

नफ्ताली बेनेट इजरायल पूर्व रक्षा मंत्री हैं। वे दक्षिणपंथी यामिना पार्टी (Yamina Party) के नेता हैं। उन्होंने इजरायल की संसद नेसेट में 60-59 वोटों से विश्व मत हासिल किया। वे अब इजरायल के 13वें प्रधानमंत्री बने गये हैं।

सत्ता-साझाकरण सौदे के हिस्से के रूप में नफ्ताली बेनेट सितंबर, 2023 तक प्रधान मंत्री रहेंगे। इसके बाद वह अगले दो साल के लिए यायर लैपिड (Yair Lapid) को सत्ता सौंपेंगे। बेंजामिन नेतन्याहू दक्षिणपंथी लिकुड पार्टी के प्रमुख बने रहेंगे और विपक्ष के नेता बनेंगे।

नफ्ताली बेनेट (Naftali Bennett)

नफ्ताली बेनेट (Naftali Bennett) एक इसरायली राजनेता हैं, वे वर्तमान में इजराइल के 13वें प्रधानमंत्री हैं। इसे पहले उन्होंने कई मंत्री पदों पर कार्य किया है। वे 2013-15 तक अर्थव्यवस्था मंत्री, 2013-19 तक प्रवासी मंत्री, 2015-19 तक शिक्षा मंत्री और 2019-20 के दौरान रक्षा मंत्री रहे। वे अपने करियर के दौरान अलग-अलग दलों से जुड़े हुए रहे हैं। 2013-18 तक वे ‘द ज्यूइश होम’, 2018-19 के दौरान ‘न्यू राईट’, 2019 में यामिना, 2019-20 के दौरान ‘न्यू राईट’ और 2020 में ‘यामिना’ के साथ जुड़े रहे।

इज़राइल

इज़राइल राष्ट्र (इब्रानी:מְדִינַת יִשְׂרָאֵל , मेदिनत यिसरा’एल; دَوْلَةْ إِسْرَائِيل, दौलत इसरा’ईल) दक्षिण पश्चिम एशिया में स्थित एक देश है। यह दक्षिणपूर्व भूमध्य सागर के पूर्वी छोर पर स्थित है। इसके उत्तर में लेबनॉन, पूर्व में सीरिया और जॉर्डन तथा दक्षिण-पश्चिम में मिस्र है।

मध्यपूर्व में स्थित यह देश विश्व राजनीति और इतिहास की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। इतिहास और प्राचीन ग्रन्थों के अनुसार यहूदियों का मूल निवास रहे इस क्षेत्र का नाम ईसाइयत, इस्लाम और यहूदी धर्मों में प्रमुखता से लिया जाता है। यहूदी, मध्यपूर्व और यूरोप के कई क्षेत्रों में फैल गए थे। उन्नीसवी सदी के अन्त में तथा फिर बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में यूरोप में यहूदियों के ऊपर किए गए अत्याचार के कारण यूरोपीय (तथा अन्य) यहूदी अपने क्षेत्रों से भाग कर यरुशलम और इसके आसपास के क्षेत्रों में आने लगे। सन् 1948 में आधुनिक इसरायल राष्ट्र की स्थापना हुई।

यरूशलम इसरायल की राजधानी है पर अन्य महत्वपूर्ण शहरों में तेल अवीव का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। यहाँ की प्रमुख भाषा हिब्रू है, जो दाएँ से बाँए लिखी जाती है। यहाँ के निवासियों को इसरायली ‌ या इज़रायली कहा जाता है।

भूगोल

इज़रायल दक्षिण पश्चिम एशिया का एक स्वतंत्र यहूदी राज्य है, जो 14 मई 1948 ई. को पैलेस्टाइन से ब्रिटिश सत्ता के समाप्त होने पर बना। यह राज्य रूम सागर के पूर्वी तट पर स्थित है। इसके उत्तर तथा उत्तर पूर्व में लेबनान एवं सीरिया, पूर्व में जार्डन, दक्षिण में अकाबा की खाड़ी तथा दक्षिण पश्चिम में मिस्र है (क्षेत्रफल 20,700 वर्ग किलोमीटर)। इसकी राजधानी तेल अवीब एवं हैफा इसके अन्य मुख्य नगर हैं। राजभाषा इब्रानी है।

इज़रायल के तीन प्राकृतिक भाग हैं जो एक दूसरे के समान्तर दक्षिण से उत्तर तक फैले हैं :

(1)    रूमतटीय ‘शैरों’ तथा फिलिस्तिया का मैदान, जो अत्यधिक उर्वर है, तथा मक्का जो सब्जियों, सन्तरों, अंगूरों एवं केलों की उपज के लिए प्रसिद्ध है।

(2)    गैलिली, समारिया तथा जूडिया का पहाड़ी प्रदेश, जो तटीय मैदान के पूर्व में 25 से लेकर 40 मील तक चौड़ा है। इज़रायल का सर्वोच्च पर्वत अट्ज़मान (ऊँचाई 3,962 फुट) यहीं स्थित है। जज़रील घाटी गैलिली के पठार को समारिया तथा जूडिया से पृथक्‌ करती है और तटीय मैदान को जार्डन की घाटी से मिलाती है। गैलिली का पठार एवं जज़रील घाटी समृद्ध कृषिक्षेत्र हैं जहाँ गेहूँ, जौ, जैतून तथा तम्बाकू की खेती होती है। समारिया का क्षेत्र जैतून, अंगूर एवं अंजीर के लिए प्रसिद्ध है।

(3)    जार्डन रिफ्ट घाटी, जो केवल 10-15 मील चौड़ी तथा अत्यधिक शुष्क है। इसके जगत्‌ के स्थलखंड का सबसे नीचा भाग है। जार्डन नदी के मैदान में केले की खेती होती है।

इज़रायल के दक्षिणी भाग में नेजेव नामक मरुस्थल है जिसके उत्तरी भाग में सिंचाई द्वारा कृषि का विकास किया जा रहा है। यहाँ जौ, सोरघम, गेहूँ, सूर्यमुखी, सब्जियाँ एवं फल होते हैं। सन्‌ 1955 ई. में नेजेव के हेलेट्ज़ नामक स्थान पर इज़रायल में सर्वप्रथम खनिज तेल पाया गया। इस राज्य के अन्य खनिज पोटाश, नमक इत्यादि हैं।

प्राकृतिक साधनों के अभाव में इज़रायल की आर्थिक स्थिति विशेषत: कृषि तथा विशिष्ट एवं छोटे उद्योगों पर आश्रित है। सिंचाई के द्वारा सूखे क्षेत्रों को कृषियोग्य बनाया गया है। अत: कृषि का क्षेत्रफल, सन्‌ 1969-70 में 10,58,000 एकड़ था।

तेल अवीव इज़रायल का प्रमुख उद्योगकेंद्र है जहाँ कपड़ा, काष्ठ, औषधि, पेय तथा प्लास्टिक आदि उद्योगों का विकास हुआ है। हैफा क्षेत्र में सीमेंट, मिट्टी का तेल, मशीन, रसायन, काँच एवं विद्युत्‌ वस्तुओं के कारखाने हैं। जेरूसलम हस्तशिल्प एवं मुद्रण उद्योग के लिए विख्यात है। नथन्या जिले में हीरा तराशने का काम होता है।

हैफा तथा तेल अवीव रूम सागरतट के पत्तन (बन्दरगाह) हैं। इलाथ अकाबा की खाड़ी का पत्तन है। मुख्य निर्यात सूखे एवं ताजे फल, हीरा, मोटरगाड़ी, कपड़ा, टायर एवं ट्यूब हैं। मुख्य आयात मशीन, अन्न, गाड़ियाँ, काठ एवं रासायनिक पदार्थ हैं।

SOURCE-INDIAN EXPRESS

 

मेघा राजगोपालन

हाल ही में भारतीय मूल की पत्रकार मेघा राजगोपालन, एलिसन किलिंग और क्रिस ब्रुशेक ने पुलित्ज़र पुरस्कार 2021 जीता। उन्हें यह पुरस्कार चीन के शिन्झियांग प्रांत में उइगर मुसलमानों के लिए बनाये गये डिटेंशन कैम्पस की जानकारी दुनिया तक पहुंचाने के  लिए यह पुरस्कार दिया गया है।

चीन में उइगरों की स्थिति

चीन ने शिनजियांग प्रांत में उइगर और अन्य तुर्क मुसलमानों को नियंत्रित करने के लिए अपने प्रयासों को तेज कर दिया है। इसके लिए चीन ने कई प्रकार के कार्यक्रम शुरू किये हैं, इसमें महिलाओं की नसबंदी, शिविरों में बड़े पैमाने पर इंटर्नशिप, ज़बरन श्रम कार्यक्रम, व्यापक तकनीकी और मानव निगरानी इत्यादि शामिल हैं। हालांकि, चीन इन सभी आरोपों को खारिज करता है। चीन का तर्क है कि ये शिविर व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र हैं जो धार्मिक अतिवाद का मुकाबला करने के लिए आवश्यक हैं।

पुलित्ज़र पुरस्कार (Pulitzer Prize)

पुलित्ज़र पुरस्कार अमेरिका में अख़बार, मैगज़ीन, ऑनलाइन पत्रकारिता, साहित्य और संगीत के लिए दिया जाता है। इसकी स्थपाना 1917 में की गयी थी। यह पुरस्कार 21 श्रेणियों में दिया जाता है। प्रत्येक विजेता को एक प्रमाण पत्र और 15,000 डॉलर इनामस्वरुप दिए जाते हैं। इस पुरस्कार का नाम जोसफ पुलित्ज़र के नाम पर रखा गया है, वे एक अमेरिकी समाचार प्रकाशक थे।

SOURCE-GK TODAY

 

विश्व रक्तदाता दिवस

विश्व रक्तदाता दिवस (World Blood Donor Day) 14 जून  को दुनिया भर में मनाया जाता है।

थीम : Give blood and keep the world beating

पृष्ठभूमि

मई 2005 में, 58वीं विश्व स्वास्थ्य सभा (WHA) के दौरान, दुनिया भर के स्वास्थ्य मंत्रियों ने सर्वसम्मति से स्वैच्छिक रक्तदान के प्रति अपनी प्रतिबद्धता और समर्थन की घोषणा की और WHA58.13 के संकल्प के  साथ, उन्होंने विश्व रक्तदाता दिवस को एक वार्षिक कार्यक्रम के रूप में नामित किया।

मेलबर्न घोषणा

बाद में 2009 में, ट्रांसफ्यूज़न चिकित्सा के क्षेत्र में विशेषज्ञों, नीति-निर्माताओं और 40 से अधिक देशों के गैर-सरकारी प्रतिनिधियों ने मेलबर्न घोषणा तैयार की, जिसने सभी देशों के लिए 2020 तक स्वैच्छिक (अवैतनिक) रक्त दाताओं से अपनी सभी रक्त आपूर्ति प्राप्त करने का लक्ष्य स्थापित किया।

यह तिथि क्यों

यह दिवस 14 जून, 1868 को कार्ल लैंडस्टीनर (एक ऑस्ट्रियाई जीवविज्ञानी, चिकित्सक और प्रतिरक्षाविज्ञानी) की जन्मदिन की सालगिरह मनाने के लिए इस दिन मनाया जाता है। उन्हें रक्त समूह प्रणाली के विकास और वर्गीकरण, रीसस (Rh) फैक्टर की खोज के लिए जाना जाता है। उन्हें ट्रांसफ्यूज़न चिकित्सा के जनक के रूप में भी जाना जाता है।

उद्देश्य

यह नियमित रूप से सुरक्षित रक्तदान की आवश्यकता के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए कार्य करता है ताकि कि सभी व्यक्तियों/समुदायों को सुरक्षित और गुणवत्ता-सुनिश्चित रक्त और सभी रक्त उत्पादों की सस्ती और समय पर आपूर्ति हो। यह स्वैच्छिक रक्तदाताओं को उनके जीवन रक्षक उपहारों के लिए धन्यवाद देने के लिए भी मनाया जाता है।

महत्व

यह दिन सभी सरकारों, राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरणों और राष्ट्रीय रक्त सेवाओं के लिए दुनिया भर में एक महत्वपूर्ण अवसर के रूप में कार्य करता है ताकि नियमित रूप से अवैतनिक रक्त दाताओं से रक्त का संग्रह बढ़ाने के लिए पर्याप्त बुनियादी ढांचा प्रदान किया जा सके।

प्राकृतिक आपदाओं, दुर्घटनाओं और सशस्त्र संघर्षों जैसी आपात स्थितियों के दौरान घायलों के उपचार में रक्त महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मातृ देखभाल में इसकी एक आवश्यक, जीवन रक्षक भूमिका भी है। किसी देश के लिए एक प्रभावी स्वास्थ्य प्रणाली के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पर्याप्त मात्रा में सुरक्षित रक्त और रक्त उत्पादों तक पहुंच आवश्यक है।