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Current Affair 16 April 2021

16 April Current Affairs

डॉ. काकरला सुब्बा राव

उपराष्ट्रपति श्री एम वेंकैया नायडू में जाने माने रेडियोलॉजिस्ट डॉक्टर काकरला सुब्बा राव के आज निधन पर गहरा दुख प्रकट किया है। अपने एक फेसबुक पोस्ट में उपराष्ट्रपति ने डॉक्टर काकरला को एक उत्कृष्ट अस्पताल प्रशासक बताया, जो अपनी सत्य निष्ठा, व्यवसायिक कुशलता, कठिन परिश्रम और अनुशासन के लिए जाने जाते थे।

भारत के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्मश्री से सम्मानित डॉक्टर काकरला को औषधि के क्षेत्र में अपना योगदान देने के लिए जाना जाता है। उन्हें हैदराबाद के निजाम चिकित्सा विज्ञान संस्थान को विकसित करने के लिए श्रेय दिया जाता है। जब वह इस संस्थान के निदेशक थे तब उन्होंने इसे प्रतिष्ठित सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल में तब्दील किया।

डॉक्टर काकरला एक उत्कृष्ट अस्पताल प्रशासक थे और वह अपनी सत्य निष्ठा, व्यवसायिक कुशलता, कठिन परिश्रम तथा अनुशासन के लिए जाने जाते थे। वह अपने प्रोफेशन के लिए समर्पित रहे।

उनके बारे में सभी यह भी सब जानते हैं कि तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री एनटी रामा राव के अनुरोध पर वह अमेरिका से भारत वापस लौटे और समर्पण भाव से मातृभूमि की सेवा की।

न्यूयॉर्क स्थित अल्बर्ट आइंस्टीन कॉलेज ऑफ मेडिसिन, ब्रोंक्स में रेडियोलॉजी के प्रोफेसर के रूप में कार्य करने के अलावा उन्होंने अपने लंबे और शानदार व्यावसायिक जीवन में अनेक पदों को सुशोभित किया। इसके अलावा वह उत्तरी अमेरिका के तेलुगू संघ (टीएएनए) के संस्थापक अध्यक्ष भी रहे।

Source –PIB

 

ड्यूरोकिआ सीरीज

केंद्रीय शिक्षा मंत्री श्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने आईआईटी हैदराबाद के शोधकर्ताओं द्वारा विकसित “विश्व की पहली सस्ती और लंबे समय तक चलने वाली स्वच्छता उत्पाद ड्यूरोकिआ सीरीज” का वर्चुअल माध्यम से लोकार्पण किया। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान हैदराबाद के शोधकर्ता, बायोमेडिकल इंजीनियरिंग में सहायक प्रोफेसर एवं आईटीआईसी में इफ्फो केयर इनोवेशन प्राइवेट लिमिटेड इनक्यूबेटिंग के संस्थापक डॉ. ज्योत्सनेंदु गिरी, आईआईटी हैदराबाद ने कोविड-19 विषाणु के प्रसार से निपटने को लेकर लंबे समय तक चलने वाली अभिनव उत्पाद ड्यूरोकिआ को विकसित किया है।

आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के दृष्टिकोण के साथ ड्यूरोकिआ उत्पाद को शामिल गया है। उन्होंने आगे कहा कि यह अगली पीढ़ी की ड्यूरोकिआ सूक्ष्मजीव रोधी तकनीक 189 रुपये से शुरू होती है, 99.99 फीसदी कीटाणुओं को तत्काल मार देती है और अगले धोने की अवधि 35 दिनों तक लंबे समय तक चलने वाली सुरक्षात्मक नैनो स्केल कोटिंग के पीछे छोड़ देती है।

श्री पोखरियाल ने बताया कि ड्यूरोकिआ का अद्वितीय गुण कीटाणुओं को तत्काल मार देना (60 सेकेंड के भीतर) है और लंबे समय तक संरक्षण, जो इस मौजूदा महामारी की स्थिति के दौरान बहुत अधिक जरूरी है। उन्होंने आगे कहा कि ड्यूरोकिआ उत्पादों की इस क्रांतिकारी सूक्ष्मजीव रोधी गुण का भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला और आईआईटी हैदराबाद के परिसर में क्षेत्र-परीक्षण किया गया है।

ड्यूरोकिआ एस, ड्यूरोकिआ एम, ड्यूरोकिआ एच और ड्यूरोकिआ एच एक्वा अभिनव “ड्यूरोकिआ प्रौद्योगिकी” का उपयोग करते हुए एक चिपचिपा नैनो फॉर्मूलेशन है। कोविड-19 विषाणु सहित कीटाणुओं की एक विस्तृत श्रृंखला के खिलाफ लंबे समय के संरक्षण के साथ ड्यूरोकिआ सीरीज के उत्पाद कीटाणुओं को तत्काल मारने का काम करते हैं। वहीं इसके प्रत्येक उत्पाद को क्षेत्र जांच के माध्यम से विस्तृत परीक्षण किया गया है और भारत सरकार के मान्यता प्राप्त विभिन्न प्रयोगशालाओं में इनको मान्यता दी गई है।

SOURCE-PIB

 

जेंडर संवाद कार्यक्रम

ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा आज जेंडर संवाद कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया। यह कार्यक्रम साझे तौर पर दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (डीएवाई-एनआरएलएम) और ‘महिलाओं और लड़कियों को अर्थव्यवस्था में सशक्त बनाने के लिए जरूरी कदम’ (आईडब्ल्यूडब्ल्यूएजीई) के तहत की जा रही कोशिशों का हिस्सा है। यह प्रयास देश भर में डीएवाई-एनआरएलएम के तहत जेंडर आधारित प्रयासों से लैंगिक जागरूकता उत्पन्न करने, बेहतरीन प्रथाओं को जानने और राज्यों से जमीनी स्तर की आवाजों को सुनने के मकसद से किया जा रहा है।

जेंडर संवाद से राज्यों को निम्न अवसर प्रदान होंगे-

  • उन सर्वोत्तम प्रथाओं/पहलों को समझने का मौका जिनका उपयोग अन्य राज्य महिलाओं की एजेंसी को बेहतर बनाने के लिए कर रहे हैं (जैसे भूमि अधिकारों के लिए महिलाओं की पहुंच को आसान बनाना, किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) में उनका दखल, खाद्य, पोषण, स्वास्थ्य, पानी और स्वच्छता (एफएनएचडब्ल्यू) में सर्वोत्तम प्रथाएँ, सार्वजनिक सेवा वितरण के लिए मजबूत संस्थानों की स्थापना में और महिलाओं के भीतर कमजोर समूहों को समस्याओं के निवारण प्रदान करने के लिए इस्तेमाल की जा रही अच्छी प्रथाओं को जानने का मौका।
  • वैश्विक स्तर पर जेंडर आधारित उठाए जा रहे कदमों को समझना।
  • विशेषज्ञों और अन्य सहयोगियों से इस पर बातचीत और सलाह कि जेंडर संबंधी मुद्दों को कैसे सुलझाया जाए और इसे लागू करने में बाधाओं का कैसे दूर किया जाए।
  • देश-विदेश में जेंडर आधारित बेहतरीन संसाधन सामग्री को एक जगह पर लाने में सहयोग प्रदान करना।
  • जेंडर आधारित मुद्दों पर ध्यान देने की जरूरत को समझते हुए इसे राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन और राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन का हिस्सा बनाया जाए।

इस कार्यक्रम का शुभारंभ आज ग्रामीण विकास मंत्रालय के सचिव नागेंद्र नाथ सिन्हा ने ‘आजादी के अमृत महोत्सव’ के तहत किया। ऑनलाइन लॉन्च कार्यक्रम में ग्रामीण विकास मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों सहित विशेषज्ञों का एक प्रतिष्ठित पैनल शामिल हुआ। इसके अलावा जमीनी स्तर से महिलाओं की आवाज़ें भी इस कार्यक्रम का हिस्सा बनीं जिन्होंने अपने अनुभवों को साझा किया कि कैसे डीएवाई-एनआरएलएम के भीतर लैंगिक मुख्यधारा के प्रयासों ने उनकी एजेंसी को बढ़ाने में मदद की है। कार्यक्रम के दौरान एसएचजी सदस्यों की प्रेरक कहानियों को प्रस्तुत करने वाले केस स्टडीज का एक संग्रह भी जारी किया गया

6 करोड़ से अधिक महिलाओं को भारत के सबसे बड़े आजीविका कार्यक्रम का हिस्सा बनाने के साथ दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (डीएवाई-एनआरएलएम) ने उन्हें स्वयं सहायता समूहों और ग्रामीण गरीबों के संघो के रूप में संगठित करके उनके सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्धता दिखाई है। यह मंच न केवल महिलाओं के लिए वित्तीय अवसरों और आजीविका सहायता सेवाओं की सुविधा प्रदान कर रहे हैं, बल्कि वे मुख्यधारा के संस्थानों के साथ संबंध बनाने और जवाबदेही की मांग करने के लिए शासन प्रणाली को भी विस्तार दे रहे हैं।

साल 2016 में डीएवाई-एनआरएलएम ने अपने कार्यक्षेत्र के भीतर जेंडर संबंधी मुद्दों को प्रमुखता से लेने के लिए कर्मचारियों, कैडर और संस्थाओं के बीच लैंगिक परिचालन रणनीति तैयार की थी। इसका मकसद स्टाफ का जेंडर संबंधी मुद्दों पर प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण करना था। जमीनी स्तर पर सामाजिक कार्रवाई समितियों और लिंग संसाधन केंद्रों की स्थापना से इसे और मजबूती मिली। इससे महिलाएं अपनी शिकायतों के निपटारे के लिए इन तक पहुंच सकीं। साथ ही अपने हकों और अधिकारों को प्राप्त करने में सशक्त बनीं।

SOURCE-PIB

 

जलवायु संबंधी खतरों की आकलन रिपोर्ट

देश के सभी राज्यों और जिलों की जलवायु संबंधी खतरों के विषय में राष्ट्रीय स्तर पर एक विस्तृत रिपोर्ट 17 अप्रैल, 2021 को जारी की जाएगी।

राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की सक्रिय भागीदारी और सहयोग से किए गए आकलन और प्रशिक्षण तथा क्षमता निर्माण अभ्यास के ज़रिए ऐसे संवेदनशील जिलों की पहचान की गई है, जो नीति-निर्माताओं को उचित जलवायु क्रियाओं को शुरू करने में मदद करेंगे। इससे बेहतर तरीके से जलवायु परिवर्तन अनुकूलन परियोजनाएं तैयार की जा सकेंगी और उनके ज़रिए जलवायु परिवर्तन का दंश झेल रहे देश के विभिन्न समुदायों को लाभ होगा।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) तथा स्विस एजेंसी फॉर डेवलपमेंट एंड कोऑपरेशन के समर्थन से किए गए इस देशव्यापी अभ्यास में 24 राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों के कुल 94 प्रतिनिधियों ने भागीदारी की।

रिपोर्ट का शीर्षक है-क्लाइमेट वल्नरेबिलिटी एसेसमेंट फॉर एडाप्टेशन प्लानिंग इन इंडिया यूसिंग ए कॉमन फ्रेमवर्क। इस रिपोर्ट में भारत के ऐसे सबसे संवेदनशील राज्यों और जिलों की पहचान की गई है जो मौजूदा जलवायु संबंधी खतरों और संवेदनशीलता के मुख्य कारकों से जूझ रहे हैं। रिपोर्ट को विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव प्रोफेसर आशुतोष शर्मा जारी करेंगे।

भारत जैसे विकासशील देश में संवेदनशीलता के आकलन को उपयुक्त अनुकूलन परियोजनाओं और कार्यक्रमों को लागू करने की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। हालांकि विभिन्न राज्यों और जिलों का संवेदनशीलता आकलन हमारे पास मौजूद है लेकिन, उनकी आपस में तुलना नहीं की जा सकती क्योंकि इन आकलनों के लिए जिन पैमानों का इस्तेमाल किया गया है, वे अलग-अलग हैं, इसलिए ये नीतिगत और प्रशासनिक स्तर पर निर्णय लेने की क्षमता को सीमित करते हैं।

इस ज़रूरत को ध्यान में रखते हुए डीएसटी और एसडीसी ने हिमालयी क्षेत्र के संवेदनशीलता आकलन के लिए एक समान प्रारूप बनाने का समर्थन किया। यह जलवायु परिवर्तन संबंधी अंतर सरकारी पैनल (आईपीसीसी) की पांचवीं मूल्यांकन रिपोर्ट (एआर 5) पर आधारित था। इस समान प्रारूप और इसे लागू करने के लिए ज़रूरी मैनुअल को आईआईटी मंडी, आईआईटी गुवाहाटी और भारतीय विज्ञान संस्थान बेंगलुरु ने तैयार किया। इस प्रारूप को भारतीय हिमालयी क्षेत्र के सभी 12 राज्यों (अविभाजित जम्मू-कश्मीर समेत) में क्षमता निर्माण प्रक्रिया के जरिए लागू किया गया।

इस दिशा में किए गए प्रयासों के नतीजे हिमालयी राज्यों के साथ बांटे गए जिसके कई सकारात्मक परिणाम सामने आए जैसे कि इनमें से कई राज्यों ने पहले से ही संवेदनशीलता मूल्यांकन आधारित जलवायु परिवर्तन अनुकूलन कार्यों को प्राथमिकता दी है और उन्हें लागू भी कर चुके हैं।

राज्यों से मिली सकारात्मक प्रतिक्रिया और हिमालयी राज्यों में इनके लागू होने की उपयोगिता को देखते हुए यह निर्णय किया गया कि राज्यों की क्षमता निर्माण के जरिए पूरे देश के लिए एक जलवायु संवेदनशीलता आकलन अभ्यास शुरू किया जाए।

यह कार्य उसी दल को सौंपा गया जिसने देश की राज्य सरकारों के लिए संवेदनशीलता आकलन क्षमता निर्माण के वास्ते प्रशिक्षण कार्यशालाओं की एक पूरी श्रृंखला चलाई थी।

जलवायु परिवर्तन संबंधी राष्ट्रीय कार्य योजना के हिस्से के तौर पर डीएसटी अब तक जलवायु परिवर्तन पर दो राष्ट्रीय मिशन लागू कर चुका है, ये हैं हिमालय क्षेत्र की पारिस्थितिकी को टिकाऊ बनाने का राष्ट्रीय मिशन (एनएमएसएचई) और जलवायु परिवर्तन संबंधी रणनीतिक जानकारी जुटाने का राष्ट्रीय मिशन (एनएमएसकेसीसी)। इन दोनों मिशन के तहत डीएसटी 25 राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में राज्य जलवायु परिवर्तन प्रकोष्ठों को समर्थन दे रहा है। राज्यों के इन जलवायु परिवर्तन प्रकोष्ठों पर अन्य कामों के अलावा प्रारंभिक रूप से जलवायु परिवर्तन के कारण जिला और उप-जिला स्तर पर आ रही संवेदनशीलता का आकलन करने की जिम्मेदारी है और राष्ट्रीय स्तर पर संवेदनशीलता के आकलन का काम इसी का विस्तार है।

SOURCE-PIB

 

विश्व हीमोफिलिया दिवस

World Federation of Haemophilia द्वारा हर साल 17 अप्रैल को विश्व हीमोफिलिया दिवस मनाया जाता है। इस वर्ष, विश्व हीमोफिलिया दिवस निम्नलिखित थीम के तहत मनाया जा रहा है : थीम : Adapting to Change

हीमोफिलिया क्या है?

हीमोफिलिया एक दुर्लभ विकार है जहां मानव रक्त में सामान्य रूप से थक्का (clot) नहीं जमता। ऐसा इसलिए है, क्योंकि रक्त में पर्याप्त रक्त के थक्के प्रोटीन की कमी होती है।

यह एक अनुवांशिक आनुवंशिक विकार है।

विश्व हीमोफिलिया दिवस (World Haemophilia Day)

World Federation of Haemophilia द्वारा 1989 से यह दिवस मनाया जा रहा है। जागरूकता बढ़ाने और विकार से प्रभावित लोगों की मदद के लिए हर साल दुनिया में कई प्रतिष्ठित भवनों को लाल रंग में रोशन किया जाता है।

17 अप्रैल को विश्व हीमोफिलिया दिवस क्यों मनाया जाता है?

फ्रैंक श्नेबल (Frank Schnabel) के जन्मदिन को मनाने के लिए 17 अप्रैल को दिन मनाया जाता है। फ्रैंक ने World Federation of Haemophilia की स्थापना की थी।

World Federation of Haemophilia

इसकी स्थापना 1963 में हुई थी। World Federation of Haemophilia का मुख्यालय मॉन्ट्रियल, कनाडा में स्थित है।

महत्व

75% रक्तस्राव विकार से प्रभावित लोग इसे नहीं जानते हैं। कई अन्य को उचित देखभाल नहीं मिलती है। इसलिए, इस दिन को मनाने और बीमारी के बारे में जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है।

2021 में भारत में मानसून सामान्य रहेगा

भारतीय मौसम विभाग (Indian Meteorological Department –  IMD) ने हाल ही में घोषणा की थी कि लंबी अवधि के औसत के 98% पर दक्षिण-पश्चिम मानसून (southwest monsoon) के सामान्य रहने की उम्मीद है। क्योंकि भारत में मानसून वर्षा को प्रभावित करने वाले ला नीना (La Nina) या अल नीनो (El Nino) के अनुपस्थित होने की संभावना है। इसके अलावा, भारतीय मानसून पर सीधा असर डालने वाले Indian Ocean Dipole के भी इस साल तटस्थ रहने की उम्मीद है।

लंबी अवधि औसत (Long Period Average)

मानसून की लंबी अवधि का औसत 88 सेंटीमीटर है। 96% और 104% LPA के बीच की बारिश को सामान्य बारिश माना जाता है।

2020 में, भारत में वर्षा लंबी अवधि के औसत का 109% थी।

2019 में, भारत में वर्षा लंबी अवधि के औसत का 110% थी।

Indian Ocean Dipole

Indian Ocean Dipole हिंद महासागर में समुद्री सतह तापमान में अनियमित उतार-चढ़ाव है। Indian Ocean Dipole के दौरान, पश्चिमी हिंद महासागर समुद्र के पूर्वी हिस्से की तुलना में वैकल्पिक रूप से अधिक ठंडा और गर्म हो जाता है।

भारत में मानसून की भविष्यवाणी कैसे की जाती है?

IMD भारत में मानसून की भविष्यवाणी करने के लिए तीन तरीकों का उपयोग करता है। वे सांख्यिकीय विधि (statistical method), गतिशील विधि (dynamical method) और गतिशील सह सांख्यिकीय विधि (dynamical cum statistical method) हैं।

सांख्यिकीय पद्धति के तहत, मानसून को प्रभावित करने वाले कारकों की पहचान की जाती है। वे अतीत में मानसून की ऐतिहासिक घटना से संबंधित होते हैं।

गतिशील विधि के तहत, वायुमंडलीय और महासागरीय परिस्थितियों को सिमुलेट किया जाता है।

गतिशील सह सांख्यिकीय विधि प्रकृति में अनुभवजन्य (empirical) है। अनुभवजन्य विधियों का उपयोग अमेरिका, ब्रिटेन, दक्षिण अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील जैसे देशों में किया जाता है।

Source –GK TODAY

 

समावेशी इंटरनेट सूचकांक

फेसबुक के साथ इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट (Economist Intelligence Unit) ने हाल ही में समावेशी इंटरनेट सूचकांक जारी किया है। इस सूचकांक के अनुसार, इंटरनेट को शामिल करने और इंटरनेट तक पहुँच में लैंगिक समानता के मामले में भारत 49वें स्थान पर है है।

फेसबुक समावेशी इंटरनेट सूचकांक (Facebook Inclusive Internet Index) में 120 देशों को शामिल किया गया है। ये देश 96% वैश्विक जनसंख्या और 98% वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का प्रतिनिधित्व करते हैं।

मुख्य बिंदु

भारत के साथ, थाईलैंड भी 49वें स्थान पर है।

2020 तक, भारत में 6 मिलियन इंटरनेट उपयोगकर्ता थे। भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या 2025 तक एक अरब तक पहुंचने की उम्मीद है।

120 में से लगभग 77 देशों ने इंटरनेट समावेशन में सुधार दिखाया।

कम आय वाले और निम्न-मध्यम-आय वाले देशों के लोग महामारी के दौरान उच्च-आय वाले देशों से अधिक ऑनलाइन शिक्षा पर निर्भर थे।

इस रैंकिंग में स्वीडन पहले स्थान पर रहा, इसके बाद अमेरिका और स्पेन का स्थान था।

रैंकिंग के बारे में

यह रैंकिंग इंटरनेट की उपलब्धता, सामर्थ्य, प्रासंगिकता और तत्परता के आधार पर की गई है। इंटरनेट की उपलब्धता के आधार पर भारत 77वें स्थान पर था। इंटरनेट की वहन क्षमता के आधार पर, भारत को 20वें स्थान पर रखा गया था। प्रासंगिकता के आधार पर, भारत को 49वें स्थान पर रखा गया था। इंटरनेट का उपयोग करने की तत्परता के आधार पर, भारत को 29वें स्थान पर रखा गया था। समावेशी इंटरनेट सूचकांक, 2020 में भारत 52वें स्थान पर था।

एडेनोवायरस

अमेरिकी स्वास्थ्य अधिकारियों ने हाल ही में सिंगल-शॉट जॉनसन एंड जॉनसन COVID-19 वैक्सीन के रोलआउट को रोक दिया है। यह वैक्सीन एस्ट्राज़ेनेका के वैक्सीन की तरह की तकनीक का उपयोग करता है। दोनों टीकों को एडेनोवायरल वैक्टर (adenoviral vectors) से विकसित किया गया है।

अमेरिका ने एडेनोवायरस आधारित टीकों को क्यों रोका?

अमेरिका में लगभग सात मिलियन प्रशासित खुराक में से 6 महिलाओं ने रक्त के थक्कों की शिकायत की। इस वैक्सीन में एक बहुत ही दुर्लभ वैक्सीन प्रेरित प्रतिरक्षा थ्रोम्बोटिक थ्रोम्बोसाइटोपेनिया (thrombotic thrombocytopenia) के साथ लिंक पाया गया है।

एस्ट्राज़ेनेका वैक्सीन चिंपैंजी के एडेनोवायरस का उपयोग करती है। अन्य कंपनियां COVID-19 वैक्सीन विकसित करने के लिए मनुष्यों से एडेनोवायरस का उपयोग करती हैं।

एडेनोवायरस क्या है? (What is Adenovirus?)

एडेनोवायरस मनुष्यों में व्यापक बीमारी का कारण बनता है। इसमें गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल संक्रमण (gastrointestinal infections) से लेकर आम सर्दी-जुकाम शामिल है।

वैक्सीन बनाने में वैज्ञानिक इन विषाणुओं को “वायरल वैक्टर” के रूप में उपयोग करते हैं। वायरल वैक्टर जेनेटिक सामग्री को कोशिकाओं में पहुंचाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले उपकरण हैं।

एडेनोवायरल वेक्टर कैसे बनाया जाता है?

एडेनोवायरल वेक्टर आनुवंशिक सामग्री को हटाकर बनाया गया है जो वायरस को बीमारी को दोहराने या फैलाने की अनुमति दे सकता है। इस एडेनोवायरल शेल को फिर आनुवंशिक निर्देशों के साथ डाला जाता है कि कैसे दूसरे वायरस को लक्षित किया जाए (जैसे कि COVID-19 वायरस)।

एक एडेनोवायरस मानव शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली के लिए एक गंभीर वेक्टर जैसा दिखता है। इस प्रकार, प्रतिरक्षा प्रणाली गंभीरता से प्रतिक्रिया करती है। यही कारण है कि वैक्सीन की खुराक प्राप्त करने के बाद लोग थकान, बुखार या गले में दर्द की शिकायत कर रहे हैं।

SOURCE-GK TODAY

 

एज़र्डाकिड टेरोसोरस

लगभग 65 मिलियन साल पहले आकाश में उड़ने वाले विशाल सरीसृपों वाले एज़र्डाकिड टेरोसोरस की गर्दन जिराफ की तुलना में लंबी होती थी (औसतन जिराफ की गर्दन लगभग 6 फीट लंबी होती है)।

अब, शोधकर्ताओं ने इसकी लंबी गर्दन के बारे में एक नई खोज की सूचना दी है – कि पतली गर्दन की कशेरुक को एक जटिल आंतरिक संरचना द्वारा समर्थित किया गया था जो पहले देखी गई किसी भी चीज के विपरीत है।

टेरोसॉरस सरीसृप हैं जो कि डायनासोर के करीबी रिशते में हैं, कीटों के बाद पहली उड़ान संचालित करने वाले जानवरों मे से।

टेरोसॉरस लगभग 65-66 मिलियन साल पहले (क्रेटेशियस अवधि के अंत) मे विलुप्त हो गए।

एज़र्डाकिड टेरोसोरस एक प्रकार के टेरोसोरस हैं और उनके बारे में विशिष्ट विशेषताओं में से एक है कि वे कितने बड़े थे, विशेष रूप से उनकी लंबी गर्दन।

SOURCE-INDIAN EXPRESS

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