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Current Affair 5 April 2021

5 April Current Affairs

इंटरनेशनल वर्चुअल इलेक्शन विजिटर्स प्रोग्राम 2021

भारत निर्वाचन आयोग ने असम, केरल, पुदुचेरी, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में जारी विधानसभा चुनावों के दौरान आज 26 देशों की चुनाव प्रबंधन संस्थाओं (ईएमबी)/संगठनों और तीन अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के लिए इंटरनेशनल वर्चुअल इलेक्शन विजिटर्स प्रोग्राम 2021 की मेजबानी की।

मुख्य चुनाव आयुक्त श्री सुनील अरोड़ा ने अपने उद्घाटन संबोधन में कहा कि कोविड-19 के चलते दुनिया भर में चुनाव की प्रक्रिया में अप्रत्याशित रूप से बाधा आई है और भले ही चुनाव कराने में व्यापक चुनौतियां सामने आई हों, लेकिन इससे चुनाव प्रबंधन संस्थाओं को एक साथ आकर एक दूसरे की सर्वश्रेष्ठ प्रक्रियाओं को साझा करने व सीखने का अवसर भी मिला है। श्री अरोड़ा ने इस मुश्किल दौर में बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान ईसीआई के अनुभव को भी सामने रखा। श्री अरोड़ा ने जोर देकर कहा कि महामारी के बीच चुनाव आयोग का उद्देश्य मुक्त, निष्पक्ष, पारदर्शी, बेहतर और सुरक्षित चुनाव कराना है।

इंटरनेशनल वर्चुअल इलेक्शन विजिटर्स प्रोग्राम-2021 के मौके पर, मुख्य चुनाव आयुक्त ने आज ए- वेब जर्नल ऑफ़ इलेक्शन के पहले अंक का विमोचन भी किया। इस पत्रिका का विमोचन करते हुए, श्री सुनील अरोड़ा ने इस बात पर जोर दिया कि यह अकादमिक पत्रिका अकादमिक जगत से जुड़े बुद्धिजीवियों और चुनावी पटल पर चलने वाली परिपाटी के बीच की खाई को पाटेगी। उन्होंने आगे कहा कि यह बौद्धिक पत्रिका विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं और विशेषज्ञों को ध्यान में रखकर निकाली गई है।

निर्वाचन आयोग ने 2019 में इंडिया ए-वेब सेंटर (http://indiaawebcentre.org/) की स्थापना की थी, जिसकी पत्रिका में चुनाव और चुनावी लोकतंत्र विषय पर ए-वेब समुदाय के
तथा दुनिया के विभिन्न लोकतंत्रों के प्रख्यात लेखकों, विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं और चिकित्सकों के शोध पत्रों, लेखों, पुस्तक समीक्षाओं आदि को प्रकाशित किया जाता है। ‘ए-वेब इंडिया जर्नल ऑफ इलेक्शन’ की परिकल्पना उच्चतम अंतरराष्ट्रीय मानकों के आधार पर की गई है और इसमें
ए-वेब समुदाय के सदस्यों और अन्य विद्वानों के समीक्षात्मक लेख शामिल किये जायेंगे।

आईईवीपी 2021 में अफगानिस्तान, ऑस्ट्रेलिया, बांग्लादेश, भूटान, बोस्निया और हर्ज़ेगोविना, कंबोडिया, जॉर्जिया, कजाकिस्तान, केन्या, कोरिया गणराज्य, मेडागास्कर, मलावी, मलेशिया, मालदीव, मॉरीशस, मंगोलिया, नेपाल, पनामा, फिलीपींस, रोमानिया, रूस, दक्षिण अफ्रीका, सूरीनाम, यूक्रेन, उज्बेकिस्तान और जाम्बिया समेत 26 देशों तथा 3 अंतर्राष्ट्रीय संगठन (अंतर्राष्ट्रीय आईडीईए, इंटरनेशनल फाउंडेशन ऑफ़ इलेक्टोरल सिस्टम (आईएफईएस) और एसोसिएशन ऑफ़ वर्ल्ड इलेक्शन बॉडीज़ (ए-वेब) के 106 से अधिक प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं। जॉर्जिया और उज्बेकिस्तान के राजदूत, श्रीलंका के कार्यवाहक उच्चायुक्त और राजनयिक कोर के अन्य सदस्य भी आईईवीपी 2021 में भाग ले रहे हैं।

SOURCE-PIB

 

सबसे ऊंचा रेलवे पुल

भारतीय रेल ने आज प्रतिष्ठित चिनाब पुल का मेहराब बंदी काम पूरा कर लिया है।

यह चेनाब पुल दुनिया का सबसे ऊंचा पुल है और यह उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लिंक परियोजना (यूएसबीआरएल) का हिस्सा है, रेलवे ने इस प्रतिष्ठित चिनाब पुल की इस्‍पात मेहराब को पूरा करके एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। चिनाब के ऊपर पुल बनाने का यह सबसे कठिन हिस्सा था। यह उपलब्धि कटरा से बनिहाल तक 111 किलोमीटर लंबे खंड को पूरा करने की दिशा में एक महत्‍वपूर्ण कदम है। यह निश्चित रूप से हाल के इतिहास में भारत में किसी रेल परियोजना के सामने आने वाली सबसे बड़ी सिविल-इंजीनियरिंग चुनौती है। 5.6 मीटर लंबा धातु का टुकड़ा आज सबसे ऊंचे बिंदु पर फिट किया गया है, जिसने वर्तमान में नदी के दोनों किनारों से एक-दूसरे की ओर खिंचाव वाली मेहराब की दो भुजाओं को आपस में जोड़ा है। इससे मेहराब का आकार पूरा को गया है, जो 359 मीटर नीचे बह रही जोखिम भरी चिनाब नदी पर लूम करेगी। मेहराब का काम पूरा होने के बाद, स्टे केबल्स को हटाने, मेहराब रिब में कंक्रीट भरने, स्टील ट्रेस्टल को खड़ा करने, वायडक्ट लॉन्च करने और ट्रैक बिछाने का काम शुरू किया जाएगा।

रेल, वाणिज्य एवं उद्योग तथा उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री श्री पीयूष गोयल, रेलवे बोर्ड के अध्‍यक्ष और सीईओ श्री सुनीत शर्मा, उत्तर रेलवे के महाप्रबंधक श्री आशुतोष गंगल ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्‍यम से ऐतिहासिक मेहराब का काम पूरा होते हुए देखा है।

प्रतिष्ठित चिनाब पुल की मेहराब की प्रमुख विशेषताएं:

भारतीय रेलवे कश्मीर घाटी को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने के लिए यूएसबीआरएल परियोजना के एक हिस्से के रूप में चिनाब नदी पर प्रतिष्ठित मेहराब पुल का निर्माण कर रही है।

यह पुल 1315 मीटर लंबा है।

यह दुनिया का सबसे ऊंचा रेलवे ब्रिज है जो नदी के तल के स्तर से 359 मीटर ऊपर है।

यह पेरिस (फ्रांस) की प्रतिष्ठित एफिल टॉवर से 35 मीटर ऊंचा है।

इस पुल के निर्माण में 28,660 मीट्रिक टन इस्‍पात का फैब्रिकेशन हुआ है। इसमें 10 लाख सीयूएम मिट्टी का कार्य हुआ है। 66,000 सीयूएम कंक्रीट का इस्‍तेमाल हुआ है और 26 किलोमीटर मोटर योग्य सड़कों का निर्माण शामिल है।

यह मेहराब में इस्‍पात के बक्सों से बनी है। टिकाऊपन में सुधार के लिए इस मेहराब के बक्‍सों में कंक्रीट भरी जाएगी।

इस मेहराब का कुल वजन 10,619 मीट्रिक टन होगा।

भारतीय रेलवे ने पहली बार ओवरहेड केबल क्रेन द्वारा मेहराब के मेम्‍बर्स का निर्माण किया है।

संरचनात्मक कार्य के लिए सबसे आधुनिक टेक्ला सॉफ्टवेयर का उपयोग किया गया है।

संरचनात्मक इस्‍पात -10 डिग्री सेल्सियस से 40 डिग्री सेल्सियस तापमान के लिए उपयुक्त है।

SOURCE-PIB

 

कोटा के किसान ने आम की ऐसी किस्म विकसित की जिसमें बारहों महीने फल आता है

राजस्थान के कोटा निवासी किसान श्रीकृष्ण सुमन (55 वर्ष) ने आम की एक ऐसी नई किस्म विकसित की है जिसमें नियमित तौर पर पूरे साल सदाबहार नाम का आम पैदा होता है। आम की यह किस्म आम के फल में होने वाली ज्यादातर प्रमुख बीमारियों और आमतौर पर होने वाली गड़बड़ियों से मुक्त है।

इसका फल स्वाद में ज्यादा मीठा, लंगड़ा आम जैसा होता है और नाटा पेड़ होने के चलते किचन गार्डन में लगाने के लिए उपयुक्त है। इसका पेड़ काफी घना होता है और इसे कुछ साल तक गमले में भी लगाया जा सकता है। इसके अलावा इसका गूदा गहरे नारंगी रंग का और स्वाद में मीठा होता है। इसके गूदे में बहुत कम फाइबर होता है जो इसे अन्य किस्मों से अलग करता है। पोषक तत्वों से भरपूर आम स्वास्थ्य के लिए बहुत अच्छा माना जाता है।

आम की इस नई किस्म का विकास करने वाले गरीब किसान श्रीकृष्ण ने कक्षा दो तक पढ़ाई करने के बाद स्कूल छोड़ दिया था और अपना पारिवारिक पेशा माली का काम शुरू कर दिया था। उनकी दिलचस्पी फूलों और फलों के बागान के प्रबंधन करने में थी जबकि उनका परिवार सिर्फ गेहूं और धान की खेती करता था। उन्होंने यह जान लिया था कि गेहूं और धान की अच्छी फसल लेने के लिए कुछ बाहरी तत्वों जैसे बारिश, पशुओं के हमले से रोकथाम और इसी तरह की चीजों पर निर्भर रहना होगा और इससे सीमित लाभ ही मिलेगा।

उन्होंने परिवार की आमदनी बढ़ाने के लिए फूलों की खेती शुरू की। सबसे पहले उन्होंने विभिन्न किस्म के गुलाबों की खेती की और उन्हें बाजार में बेचा। इसके साथ ही उन्होंने आम के पेड़ लगाना भी शुरू किया।

सन् 2000 में उन्होंने अपने बागान में आम के एक ऐसे पेड़ को देखा जिसके बढ़ने की दर बहुत तेज थी, जिसकी पत्तियां गहरे हरे रंग की थी। उन्होंने देखा कि इस पेड़ में पूरे साल

बौर आते हैं। यह देखने के बाद उन्होंने आम के पेड़ की पांच कलमें तैयार की। इस किस्म को विकसित करने में उन्हें करीब 15 साल का समय लगा और इस बीच उन्होंने कलम से बने इस पौधों का संरक्षण और विकास किया। उन्होंने पाया कि कलम लगाने के बाद पेड़ में दूसरे ही साल से फल लगने शुरु हो गए।

इस नई किस्म को नेशनल इन्वोशन फाउंडेशन (एनआईएफ) इंडिया ने भी मान्यता दी। एनआईएफ भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के तहत एक स्वायत्तसाशी संस्थान है। एनआईएफ ने आईसीएआर- राष्ट्रीय बागबानी संस्थान इंडियन इंस्ट्रीट्यूट ऑफ हार्टिकल्चरल रिसर्च (आईआईएचआर), बैंगलौर को भी इस किस्म का स्थल पर जाकर मूल्यांकन करने की सुविधा दी। इसके अलावा राजस्थान के जयपुर के जोबनर स्थित एसकेएन एग्रीकल्चर्ल यूनिवर्सिटी ने इसकी फील्ड टेस्टिंग भी की। अब इस किस्म का, पौधा किस्म एवं कृषक अधिकार संरक्षण अधिनियम तथा आईसीएआर- नेशनल ब्यूरो ऑफ प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेज (एनवीपीजीआर) नई दिल्ली के तहत पंजीकरण कराने की प्रक्रिया चल रही है। एनआईएफ ने नई दिल्ली के राष्ट्रपति भवन स्थित मुगल गार्डेन में इस सदाबहार आम की किस्म का पौधा कराने में भी सहायता की है। इस सदाबहार किस्म के आम का विकास करने के लिए श्रीकृष्ण सुमन को एनआईएफ का नौवां राष्ट्रीय तृणमूल नवप्रवर्तन एवं विशिष्ट पारंपरिक ज्ञान पुरस्कार (नेशनल ग्रासरूट इनोवेशन एंड ट्रेडिशनल नॉलेज अवार्ड) दिया गया है और इसे कई अन्य मंचों पर भी मान्यता दी गई है। अलग-अलग चैनलों के माध्यमों से एनआईएफ किसानों, किसान नेटवर्कों, सरकारी संगठनों, राज्यों के कृषि विभागों और स्वयंसेवी संगठनों तक आम की इस नई किस्म के बारे में जानकारी पहुंचाने का प्रयास कर रहा है।

SOURCE-PIB

 

58वां राष्ट्रीय समुद्री दिवस-2021

पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय ने 5 अप्रैल 1919 को मुंबई से लंदन तक यात्रा करने वाले प्रथम भारतीय फ्लैग मर्चेंट पोत (एम/एस सिंधिया स्टीम नेविगेशन कंपनी के स्वामित्व वाली) ‘एस. एस. लॉयल्टी’ की पहली यात्रा की याद में 58वां राष्ट्रीय समुद्री दिवस मनाया। इस राष्ट्रीय समुद्री दिवस की थीम भारत सरकार की पहल ‘आत्म निर्भर’ भारत की तर्ज पर ‘कोविड-19 से आगे सतत नौपरिवहन’ थी।

राष्ट्रीय समुद्री दिवस के अवसर पर पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री मनसुख मांडविया ने समुद्री समुदाय को बधाई दी और कोविड महामारी के दौरान उनकी भूमिका एवं कड़ी मेहनत, उत्साह और साहस की प्रशंसा की। श्री मांडविया ने कहा कि हाल ही में भारत के प्रधानमंत्री द्वारा लॉन्च मैरिटाइम इंडिया विजन-2030 भारत के समुद्री क्षेत्र के लिए अगले दशक का व्यापक दृष्टिकोण है और फोकस अप्रोच के साथ भारत का समुद्री क्षेत्र जल्द ही मजबूत, तकनीकी रूप से उन्नत और आत्म निर्भर बन जाएगा।

श्री मांडविया ने सकारात्मक विचार के साथ अपनी बात खत्म की और कहा, ‘भारत बदल रहा है, भारत आगे बढ़ रहा है, नए भारत का निर्माण उसी प्रकार हो रहा है जैसे हम अतीत में समुद्री नेता थे, भारत एक बार फिर समुद्री क्षेत्र के जरिए दुनिया का नेतृत्व करेगा।’

श्री मांडविया ने 58वें राष्ट्रीय समुद्री दिवस की स्मारिका के रूप में ई-मैगजीन लॉन्च की और राष्ट्रीय समुद्री दिवस सेलिब्रेशन समिति द्वारा स्थापित पुरस्कार प्रदान किए। इस समिति की अध्यक्षता पोत परिवहन के महानिदेशक द्वारा की जाती है।

पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय के सचिव डॉ. संजीव रंजन ने कहा कि कोविड के समय में समुद्री समुदाय ने बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि मंत्रालय नीतियों में प्रगतिशील परिवर्तन लाने के लिए दिन रात काम कर रहा है ताकि भारत को समुद्री समुदाय में नेतृत्व का स्थान मिल सके।

SOURCE-PIB

 

विश्व का सबसे बड़ा ऑनलाइन रोग निगरानी मंच

केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने आज नई दिल्ली में वर्चुअल माध्यम से एकीकृत स्वास्थ्य सूचना मंच (आईएचआईपी) की शुरुआत की। इस अवसर पर स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री श्री अश्विनी कुमार चौबे भी उपस्थित थे। वहीं, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री श्री तीरथ सिंह रावत भी डिजिटल माध्यम के जरिए समारोह में मौजूद थे। एकीकृत स्वास्थ्य सूचना मंच वर्तमान में इस्तेमाल किए जा रहे एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम (आईडीएसपी) की अगली पीढ़ी का अत्यधिक परिष्कृत संस्करण है।

डॉ हर्षवर्धन ने स्वास्थ्य एवं प्रौद्योगिकी के वीर, भविष्यवादी और प्रासंगिक एकीकरण पर अपना उत्साह व्यक्त करते हुए कहा, “इस दिन को स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा, जो रोग निगरानी के इतिहास में एक मील का पत्थर है। हमने भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रक्षेपवक्र में एक नया अध्याय शुरू किया है। भारत इस तरह की उन्नत रोग निगरानी प्रणाली अपनाने वाला विश्व का पहला देश है।” उन्होंने सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म के लिए समय पर जरूरत को लेकर विस्तार से बताया। उन्होंने कहा, “आईएचआईपी के नए संस्करण में भारत के रोग निगरानी कार्यक्रम के लिए डाटा इंट्री और प्रबंधन होगा। पहले की 18 बीमारियों की तुलना में अब 33 रोगों पर नजर रखने के अलावा यह डिजिटल मोड में निकट वास्तविक समय के डाटा को सुनिश्चित करेगा, जिसे काम करने के तरीके पेपर-मोड के साथ पूरा किया जाएगा।”

इसे विश्व का सबसे बड़ा ऑनलाइन रोग निगरानी मंच करार देते हुए उन्होंने कहा कि यह राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन के साथ मेल खाता है और वर्तमान में भारत में उपयोग किए जा रहे अन्य डिजिटल सूचना प्रणालियों को लेकर पूरी तरह अनुकूल है। उन्होंने इसकी व्याख्या की कि ऑटोमेटेड-डाटा के साथ परिष्कृत आईएचआईपी वास्तविक समय डाटा संग्रह, एकत्रीकरण और डाटा को लेकर आगे के विश्लेषण में बड़े पैमाने पर मदद करेगा, जो साक्ष्य आधारित नीति बनाने में सहायता करेगा और सक्षम बनाएगा। उन्होंने एनसीडीसी, डब्ल्यूएचओ और उन सभी लोगों को सराहना की जो इस विकास से जुड़े हुए हैं।

डॉ. हर्षवर्धन ने कहा कि आईएचआईपी वास्तविक समय, केस आधारित जानकारी, एकीकृत विश्लेषणात्मक और उन्नत दृश्य क्षमता के लिए विकसित स्वास्थ्य सूचना प्रणाली प्रदान करेगा। यह मोबाइल या अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों पर विश्लेषण रिपोर्ट प्रदान करेगा। इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक रूप से प्रकोप जांच गतिविधियों की शुरुआत और निगरानी की जा सकती है। वहीं अतिरिक्त विशेष निगरानी मॉड्यूल की सुविधा होने पर इसे आसानी से संचालित अन्य निगरानी कार्यक्रमों के साथ एकीकृत किया जा सकता है।

डॉ. हर्षवर्धन ने आगे कहा कि देश के छोटे से छोटे गांवों एवं प्रखंडों में फैली बीमारी के शुरुआती लक्षणों के बारे में बताने के लिए इस तरह का एक उन्नत डिजीटल प्लेटफॉर्म किसी भी संभावित प्रकोप या महामारी को शुरुआत में ही निपटने में सहायता करेगा।  उन्होंने उन सभी जमीनी स्तर पर काम करने वालों एवं अग्रिम मोर्चे पर तैनात स्वास्थ्यकर्मियों की कड़ी मेहनत और प्रतिबद्धता की सराहना की, जिन्होंने पिछले साल कोविड महामारी के दौरान पूरे समय कठिन परिश्रम किया। उन्होंने आगे कहा, “भारत ने विश्व को दिखाया है कि एक महामारी के दौरान भी हम ऐसी उन्नत रोग निगरानी प्रणाली विकसित करने में सक्षम हैं।” मंत्री ने आगे बताया कि यह मंच ‘मेक इन इंडिया’ पहल की एक सफल कहानी है और प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर स्वस्थ भारत के सपने को पूरा करने की दिशा में एक कदम है।

SOURCE-PIB

 

फोरेस्ट फायर

उत्तराखंड में पिछले छह महीनों में फोरेस्ट फायर की 1,000 से अधिक घटनाएं हुई हैं, जिनमें अकेले पिछले 24 घंटों में 45 शामिल हैं, और राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (एनडीआरएफ) से हेलीकॉप्टर और कर्मियों के लिए केंद्र तक पहुंच गया है।

उन्होंने आग से निपटने और उसकी रोकथाम के लिए सोमवार को वन अग्नि रोकथाम की उचित तैयारियों और उपायों को लेकर विभिन्न वन वृत्तों के मुख्य अरण्यपालों, अरण्यपालों और वन मंडलाधिकारियों के साथ वर्चुअल माध्यम से समीक्षा बैठक की। बैठक के दौरान उन्होंने अधिकारियों को सतर्कता बरतने और हर छोटी सूचना को भी गंभीरता से लेते हुए कार्रवाई के लिए निर्देश दिए। त्वरित कार्रवाई के लिए वन मंडल व वन रेंज स्तर तक रैपिड फॉरेस्ट फायर फाइटिंग फोर्स का गठन किया गया है। उन्होंने कहा कि लोगों को टोल फ्री नंबर 1077 और जिला स्तर पर 1070 की जानकारी दी जाए, ताकि वह आग की सूचना विभाग को दे सकें।

भारत मे फोरेस्ट फायर लगने का खतरा कितना है?

फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI, देहरादून) द्वारा जारी इंडिया स्टेट ऑफ़ फॉरेस्ट रिपोर्ट 2019 (ISFR) के अनुसार, 2019 तक, देश के भौगोलिक क्षेत्र के लगभग67% (7,12,249 वर्ग किमी) की पहचान वन के रूप में की जाती है। ट्री कवर और 2.89% (95, 027 वर्ग किमी) बनाता है।

एफएसआई ने कहा है कि पूर्व की आग की घटनाओं और दर्ज की गई घटनाओं के आधार पर, पूर्वोत्तर और मध्य भारत के जंगलों में फोरेस्ट फायर होने का सबसे खतरा है।  असम, मिजोरम और त्रिपुरा के जंगलों की पहचान फोरेस्ट फायर मे ‘एक्स्टरिम्ली प्रोन’ के रूप में की गई है।

उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश दो ऐसे राज्य हैं जो हर साल सबसे अधिक फोरेस्ट फायर के गवाह बनते हैं।

SOURCE-DANIK JAGARAN

 

चेरी ब्लॉसम

जापान मौसम विज्ञान एजेंसी ने हाल ही में घोषणा की कि जापान का चेरी ब्लॉसम मौसम पूरी तरह से शुरू हो चुका है। आमतौर पर, जापान के चेरी के पेड़ अप्रैल में पूरी तरह खिल जाते हैं। इस बार चेरी ब्लॉसम दस दिन पहले हुआ है। यह पहली बार है जब चेरी के पेड़ जापान में इतने पहले खिले हैं। इससे पहले, जापान में इतने पहले चेरी ब्लॉसम 1,200 साल से पहले हुआ था।

चेरी ब्लॉसम

जापान के ओसाका विश्वविद्यालय के अनुसार, जापान में चेरी के पेड़ों में 812 ईस्वी में इतने पहले फूल खिले थे। यह मुख्य रूप से जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के कारण हुआ है। जापान का औसत तापमान 1953 में 47.5 डिग्री फ़ारेनहाइट से बढ़कर 2020 में 51.1 डिग्री फ़ारेनहाइट हो गया है।

जापान में चेरी ब्लॉसम (Cherry Blossom in Japan)

जापान में चेरी ब्लॉसम का खिलना वसंत का मौसम के शुरू होने का संकेत है।

जापान में चेरी ब्लॉसम को साकुरा कहा जाता है।

चेरी ब्लॉसम सीज़न के दौरान, जापान हनामी या फूल देखने का आयोजन करता है।जापान की भूमि में हनामी का लंबा इतिहास रहा है। हनामी की शुरुआत 710 ईस्वी में हुई थी।

चेरी ब्लॉसम

चेरी ब्लॉसम एक फूल है। चेरी ब्लॉसम के पेड़ सजावटी चेरी के पेड़ हैं। वे खाद्य चेरी के पेड़ों से अलग हैं।

जलवायु परिवर्तन चेरी ब्लॉसम के पेड़ों को कैसे प्रभावित कर रहा है?

चेरी के पेड़ों की पत्तियां एक हार्मोन का स्राव करती हैं जो फूलों को और अधिक फूलने से रोकता है। तापमान बढ़ने पर इस हार्मोन का स्राव रुक जाता है। मौसम गर्म होने के बाद, फूल पूरी तरह से खिलते हैं।

चेरी ब्लॉसम के पेड़ कहाँ पाए जाते हैं?

चेरी ब्लॉसम के पेड़ दुनिया भर में पाए जाते हैं। वे आम तौर पर उत्तरी गोलार्ध में आम हैं, खासकर समशीतोष्ण जलवायु वाले क्षेत्रों में। इसमें जापान, भारत, नेपाल, पाकिस्तान, चीन, कोरिया, अमेरिका, ब्रिटेन, इंडोनेशिया आदि शामिल हैं।

भारत में चेरी ब्लॉसम

भारत में, चेरी ब्लॉसम हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, सिक्किम, उत्तराखंड, उत्तर पूर्व में गारो हिल्स और खासी हिल्स में आम है। भारत में चेरी ब्लॉसम त्योहार शरद ऋतु के दौरान आयोजित किए जाते हैं, अर्थात् अक्टूबर और नवंबर में। शिलांग को चेरी ब्लॉसम के लिए जाना जाता है।

SOURCE-G.K.TODAY

 

NSO ने ‘Women and Men in India, 2020’ रिपोर्ट जारी की

सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के तहत कार्यरत राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (National Statistical Office) ने हाल ही में ‘Women and Men in India’ रिपोर्ट जारी की। यह रिपोर्ट महत्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक संकेतकों को समेकित करती है जो देश में लिंग-अनुपात की स्थिति को चित्रित करती है। यह रिपोर्ट सालाना MoSPI द्वारा प्रकाशित की जाती है।

जनसंख्या संबंधी आंकड़े

2021 में भारत की अनुमानित जनसंख्या 13 करोड़ है।

2001 में लिंगानुपात 933 से बढ़कर 2011 में 943 हो गया है।

दिल्ली ने लिंगानुपात में सबसे अधिक वृद्धि दर्ज की, इसके बाद चंडीगढ़, अरुणाचल प्रदेश का स्थान है।

दूसरी ओर, दमन और दीव में लिंगानुपात में सबसे अधिक गिरावट आई है।

स्वास्थ्य सम्बन्धी आंकडें

25-29 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं के लिए आयु विशिष्ट प्रजनन दर 4 थी।

शिशु मृत्यु दर 2014 में 39 से घटकर 2018 में 32 हो गई।

मातृ मृत्यु दर 2007-09 में 212 से घटकर 2016-18 में 113 हो गई।

2018 में ग्रामीण भारत की कुल प्रजनन दर 3 थी। 2018 में शहरी क्षेत्रों में यह 1.7 थी।

किशोर प्रजनन दर 2017 में 13 से घटकर 2018 में 2 हो गई।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (NFHS-5) के अनुसार, गोवा, केरल, लक्षद्वीप राज्यों में लगभग 100% संस्थागत प्रसव देखा गया।

प्रति 1000 लोगों पर एचआईवी की घटना 2017 में 07 से घटकर 2019 में 0.05 हो गई।

शिक्षा

भारत की साक्षरता दर 2011 में 73 से बढ़कर 2017 में 7 हो गई है।

साक्षरता दर में लिंग अंतर राजस्थान, बिहार, यूपी में सबसे अधिक था।

15 साल की उम्र की केवल 3% महिलाओं ने स्नातक की पढ़ाई पूरी की।दूसरी ओर, उसी उम्र के 12.8% पुरुषों ने  स्नातक की पढ़ाई की।

8% महिला छात्र दसवीं कक्षा तक की शिक्षा प्राप्त कर रही थीं।

अर्थव्यवस्था में भागीदारी

आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण, 2018-19 के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्र में श्रमिक आबादी का अनुपात पुरुषों के लिए 1 और महिलाओं के लिए 19 था। शहरी क्षेत्रों में, यह पुरुषों के लिए 52.7 और महिलाओं के लिए 14.5 था।

15 वर्ष की आयु में महिला आबादी द्वारा अर्जित प्रति घंटे औसत वेतन अंडमान और निकोबार द्वीप समूह (147 रुपये प्रति घंटे) में उच्चतम था। इसके बाद लक्षद्वीप और नागालैंड का स्थान है। सबसे कम दमन और दीव, ओडिशा के राज्यों / केंद्र शासित प्रदेशों में था।

15 वर्ष से अधिक आयु वर्ग में पुरुष आबादी द्वारा अर्जित औसत वेतन लक्षद्वीप में उच्चतम (121 रुपये प्रति घंटा) था।

निर्णय लेने में भागीदारी

केंद्रीय मंत्रिपरिषद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 2020 में 26% है।

2019 के लोकसभा चुनाव में, 437.8 मिलियन महिला मतदाता थीं।

पंचायती राज संस्थाओं में सबसे अधिक महिलाओं की भागीदारी राजस्थान, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ राज्यों में देखी गई।

SOURCE-G.K.TODAY

 

नेत्रहीनों के लिए टच सेंसिटिव घड़ी विकसित की

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) कानपुर के एक प्रोफेसर और एक शोध सहयोगी ने दृष्टिबाधित लोगों के उपयोग के लिए एक सेंसिटिव घड़ी विकसित की है। इस घड़ी में विभिन्न आकृतियों के स्पर्श करने योग्य घंटे के संकेतक हैं। ये संकेतक नेत्रहीनों को समय आसानी से पहचानने में मदद करते हैं।

टच सेंसिटिव वॉच (Touch Sensitive Watch)

यूजर को समय जानने के लिए घड़ी के घंटे संकेतक को छूना और स्कैन करना है। घड़ी फिर अलग कंपन पैटर्न की मदद से यूजर से कम्यूनिकेट करती है। घड़ी यूजर को गोपनीयता प्रदान करती है क्योंकि इसमें ऑडियो फीडबैक की आवश्यकता नहीं होती है।

वर्तमान में, नेत्रहीनों के लिए यांत्रिक घड़ियाँ उपलब्ध हैं। यहां उपयोगकर्ता को समय जानने के लिए घंटे और मिनट की सुइयों को महसूस करना पड़ता है।

दृष्टिहीनता नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम (National Programme for Control of Blindness)

यह कार्यक्रम 1976 में शुरू किया गया था।

इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य देश में दृष्टिहीनता की व्यापकता को 4% से घटाकर 0.3% करना था।

2016 में, नेशनल प्रोग्राम फॉर कंट्रोल ऑफ ब्लाइंडनेस के तहत, 6.5 मिलियन लोगों पर मोतियाबिंद सर्जरी की गई थी।

भारत में दृष्टिहीनता के मुख्य कारण

भारत में अंधेपन के मुख्य कारण अपवर्तक त्रुटि, मोतियाबिंद, कॉर्नियल ब्लाइंडनेस, ग्लूकोमा, पोस्टीरियर कैप्सुलर ओपेसिफिकेशन, सर्जिकल कॉम्प्लीकेशन, पोस्टीरियर कैप्सुलर ओपेसिफिकेशन हैं।

भारत में दृष्टिहीनता

विश्व स्वास्थ्य संगठन की वर्ल्ड विजन रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 1981 से 2012 के बीच मोतियाबिंद सर्जरी की दर में नौ गुना वृद्धि हुई है।

SOURCE-G.K.TODAY