Home » Current Affairs » Current Affairs in Hindi » Current Affair 7 November 2021

Current Affair 7 November 2021

Current Affairs – 7 November, 2021

दिवाली के बाद राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण का स्तर बढ़ गया है. इसके

लिए दिवाली पर जलाए जाने वाले पटाख़ों को ज़िम्मेदार बताया जा रहा है.

पटाख़ों से होने वाले प्रदूषण को लेकर सालों से चर्चा चल रही है. इस साल सुप्रीम कोर्ट ने ग्रीन और इको-फ्रैंडली पटाख़े जलाने की अनुमति दे दी है.

लेकिन, वायु प्रदूषण के लिए पटाख़े कितने ज़िम्मेदार हैं?

अध्ययन बताते हैं कि दिवाली के त्योहार के दौरान कुछ ख़तरनाक प्रदूषकों का स्तर काफ़ी बढ़ जाता है. लेकिन, हवा की गुणवत्ता बिगाड़ने के लिए कुछ और कारण भी ज़िम्मेदार हैं.

हाल के सालों में भारत के शहरों में वायु प्रदूषण गंभीर समस्या बना हुआ है.

पर्यावरण संबंधी मसलों पर काम करने वाली संस्था ग्रीनपीस के मुताबिक कोरोना लॉकडाउन के बावजूद साल 2020 में दिल्ली में 57 हज़ार लोगों की वायु प्रदूषण के कारण अकाल मृत्यु हो गई.

साल 2020 की विश्व वायु गुणवत्ता रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के 30 सबसे ज़्यादा प्रदूषित शहर भारत में हैं जहां पीएम 2.5 की सालाना सघनता सबसे ज़्यादा है.

पीएम 2.5 की सघनता का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशानिर्देशों से बहुत ऊपर हैं.

पीएम 2.5 प्रदूषण में शामिल वो सूक्ष्म संघटक है जिसे मानव शरीर के लिए सबसे ख़तरनाक माना जाता है.

पीएम 2.5 क्या होता है?

  • पीएम यानी पार्टिकुलेट मैटर प्रदूषण की एक किस्म है. इसके कण बेहद सूक्ष्म होते हैं जो हवा में बहते हैं.
  • पीएम 5 या पीएम 10 हवा में कण के साइज़ को बताता है.
  • आमतौर पर हमारे शरीर के बाल पीएम 50 के साइज़ के होते हैं. इससे आसानी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि पीएम 5 कितने बारीक कण होते होंगे.
  • 24 घंटे में हवा में पीएम 5 की मात्रा 60 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर होनी चाहिए.
  • इससे ज़्यादा होने पर स्थिति ख़तरनाक मानी जाती है. इन दिनों दोनों कणों की मात्रा हवा में कई गुना ज़्यादा है.
  • हवा में मौजूद यही कण हवा के साथ हमारे शरीर में प्रवेश कर ख़ून में घुल जाते है. इससे शरीर में कई तरह की बीमारी जैसे अस्थमा और साँसों की दिक्क़त हो सकती है.

प्रदूषण के कारण

साल के इन दिनों में दिल्ली समेत उत्तरी भारत के कई बड़े शहरों में वायु प्रदूषण बढ़ता है और ऐसा दिवाली के पटाख़ों के साथ-साथ कई अन्य कारणों से भी होता है.

इनमें शामिल हैं:

  • पंजाब और हरियाणा के किसानों का पराली जलाना
  • बड़े और भारी वाहनों से होने वाला उत्सर्जन
  • दिल्ली एनसीआर में चल रहा भारी निर्माण कार्य
  • और मौसम में बदलाव जो वायु में प्रदूषण के कणों को फंसा लेता है

दिवाली ने हवा को कितना प्रभावित किया?

  • कई राज्यों ने दिवाली पर पटाख़ों की बिक्री और इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया है लेकिन राज्यों में इसका ठीक से पालन नहीं हुआ है.
  • साल 2018 का अध्ययन बताता है कि दिवाली के पटाख़ों का वायु की गुणवत्ता पर ‘कम लेकिन महत्वपूर्ण’ प्रभाव पड़ता है.
  • इस अध्ययन में दिल्ली की पांच जगहों पर फोकस किया गया है और 2013 से 2016 के बीच का आंकड़ों का अध्ययन किया गया है.
  • दिवाली हर साल अक्टूबर के अंत या नवंबर की शुरुआत में आती है.
  • इसमें अलग-अलग तारीखें मायने रखती हैं क्योंकि इससे अध्ययन करने वाले पराली के प्रभाव का भी पता लगा पाते हैं जो साल के इस दौरान जलाई जाती है.
  • इस रिपोर्ट को तैयार करने वालों में से एक धनंजय घई ने बीबीसी को बताया, “पराली जलाने की घटनाओं को स्थापित करने के लिए हमने नासा से सैटेलाइट तस्वीरें लीं और उनका इस्तेमाल किया.”
  • चार में से दो सालों में पराली जलाने का सीधा संबंध दिवाली से नहीं रहा है.
  • वे यह भी बताते हैं कि एक स्थान पर औद्योगिक गतिविधि छुट्टियों के कारण बंद हो गई और उनके अध्ययन में ये भी मौसम को प्रभावित करने वाला एक कारण बना.
  • शोधकर्ताओं ने पाया कि दिवाली के अगले दिन हर साल पीएम 5 की मात्रा क़रीब 40 फ़ीसदी तक बढ़ी.
  • जब इस आंकड़े को घंटों के आधार पर देखा गया तो शोधकर्ताओं ने पाया कि दिवाली के दिन शाम 6 बजे से अगले पाँच घंटे बाद तक (यानी क़रीब 11 बजे तक) पीएम 5 में 100 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई.
  • दिल्ली के प्रदूषण को मापने वाले प्राधिकरण ने भी पाया है कि साल 2016 और 2017 में दिवाली के बाद प्रदूषण तेज़ी से बढ़ा

अन्य कारण

ये भी पाया गया है कि सभी पटाख़े अधिक मात्रा में पीएम 2.5 नहीं छोड़ते. बड़े पटाखों में ही पीएम 2.5 की सघनता ज़्यादा होती है.

दिवाली के दौरान लोग तोहफ़े बांटने के लिए निकलते हैं और इस कारण से लगने वाला ट्रैफ़िक जाम भी प्रदूषण बढ़ने का एक बड़ा कारण माना जाता है.

क्या दिवाली के दौरान गाड़ियों से होने वाला प्रदूषण शहर में वायु प्रदूषण बढ़ने का सबसे बड़ा कारण कहा जा सकता है?

इस सवाल पर शोधकर्ता कहते हैं कि आगामी शोध में उन्हें इस तथ्य पर भी ग़ौर करना होगा.

जमशेदपुर में हुई एक रिसर्च में भी पाया गया कि दिवाली के दौरान शहर की हवा में कुछ संघटक तेज़ी से बढ़े हैं जो इस प्रकार हैं-

  • पीएम 10
  • सल्फ़र डाइऑक्साइड
  • नाइट्रोजन डाइऑक्साइड
  • ओज़ोन
  • आयरन
  • मैगनीज़
  • बैरीलियम
  • निकेल

भारत का केंद्रीय पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड भी मानता है कि पटाख़ों से 15 ऐसे तत्व निकलते हैं जिन्हें मानव शरीर के लिए ख़तरनाक और ज़हरीला माना जाता है.

लेकिन ये भी मानना होगा कि इनमें बहुत सारे तत्व गाड़ियों से होने वाले प्रदूषण में भी पाये जाते हैं.

हालांकि, पटाख़ों के इस्तेमाल को रोकने के कुछ कारण मौजूद हैं. ये पृथ्वी पर सबसे अधिक प्रदूषित शहरों की प्रदूषण की समस्या में और योगदान करते हैं.

SOURCE-BBC NEWS

PAPER-G.S.3

 

रेनबो द्वीप

सुनहरी नहरें, सुर्ख साहिल समंदर और मोहक नमक की खदानों के साथ, ईरान का जज़ीरा होर्मुज़ जन्नत के नज़ारे पेश करता है.

इसे ‘भूवैज्ञानिकों का डिज़्नीलैंड’ भी कहा जाता है.

हम दक्षिणी ईरान में होर्मुज द्वीप के तट पर एक लाल पहाड़ की तलहटी में खड़े थे, जब मेरे टूर गाइड फरज़ाद ने कहा, “आपको इस मिट्टी का स्वाद लेना चाहिए.”

इस बुलंद पहाड़ की लाल छाया साहिल और पानी की लहरों को अपनी चपेट में ले रही थी.

फारस की खाड़ी

ईरान के तट से आठ किलोमीटर दूर फारस की खाड़ी के नीले पानी के बीच में होर्मुज़ जज़ीरा आसमान से आंसू जैसा दिखता है.

पहाड़ नमक के टीले हैं जिनमें विभिन्न पत्थर, मिट्टी और लोहे से भरपूर ज्वालामुखी की चट्टानें हैं जो लाल, पीले और नारंगी रंगों में चमकती हैं.

यहां 70 से अधिक तरह के खनिज पाए जाते हैं. 42 वर्ग किलोमीटर के इस द्वीप का हर इंच इसकी संरचना की कहानी कहता है.

डॉक्टर कैथरीन गोडाईनोव ने अतीत में ईरान में काम किया है और अब वो ब्रिटिश भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के प्रधान भूविज्ञानी हैं.

उनके मुताबिक लाखों साल पहले फारस की खाड़ी में उथले समुद्रों ने नमक की मोटी परतों का निर्माण किया था.

नमक की खदानें

ये परतें खनिजों से भरी ज्वालामुखीय चट्टानों से टकराईं और उनके संयोजन ने एक रंगीन भूभाग का निर्माण किया. डॉक्टर गोडाइनोव कहती हैं, “पिछले 50 करोड़ सालों के दौरान नमक की सतहें ज्वालामुखी की परतों में दब गईं. “चूंकि नमक पानी की सतह पर तैर सकता है इसलिए वक़्त के साथ ये नमक चट्टानों में मौजूद दरारों से बाहर निकलता रहा और इसने सतह पर पहुंच कर नमक के टीले बना लिए.उनका कहना है कि फारस की खाड़ी के ज्यादातर हिस्सों में जमीन के नीचे नमक की मोटी परतें मौजूद हैं.

इसी भौगोलिक प्रक्रिया ने सुनहरी धाराएँ, लाल समुद्र तट और मोहक नमक की खदानें बनाई हैं.

रेनबो आइलैंड

होर्मुज़ को वास्तव में रेनबो आइलैंड कहा जाता है और यही वजह है कि यह असामान्य रंगों का एक सुंदर संयोजन है.

और आप ये भी जान लीजिए कि ये दुनिया का एकमात्र पहाड़ है जिसे खाया जा सकता है और इसलिए ही टूर गाइड ने मुझे स्वाद चखने की सलाह दी थी.

इस पहाड़ की सुर्ख़ मिट्टी जिसे गेलिक कहते हैं, हेमेटाइट की वजह से ऐसी दिखती है.

ऐसा माना जाता है कि यह द्वीप की ज्वालामुखीय चट्टानों में पाए जाने वाले आयरन ऑक्साइड के कारण है.

यह न केवल औद्योगिक उद्देश्यों के लिए एक क़ीमती खनिज है बल्कि यह स्थानीय व्यंजनों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.सका इस्तेमाल खाने में मसाले के तौर पर किया जाता है. यह करी में मिट्टी जैसा लगता है और स्थानीय डबल ब्रेड तोमशी के साथ बहुत स्वादिष्ट होता है.

तोमशी का अर्थ है ‘किसी चीज का बहुत अधिक होना’. फरज़ाद की पत्नी मरियम कहती हैं, “लाल मिट्टी का इस्तेमाल चटनी के तौर पर किया जाता है. “इस चटनी को सुर्ख़ कहते हैं और डबल रोटी पकने के दौरान उस पर फैला दिया जाता है. भोजन में इस्तेमाल होने के अलावा, स्थानीय कलाकार इस लाल मिट्टी का पेंटिंग में भी इस्तेमाल करते हैं. लोग इससे अपने कपड़ों को रंगते हैं और सेरामिक और सौंदर्य प्रसाधन बनाने के लिए भी इसका इस्तेमाल करते हैं.

नमक का सकारात्मक प्रभाव

इस लाल पहाड़ के अलावा होर्मुज़ द्वीप में देखने लायक कई चीजें हैं. द्वीप के पश्चिम में एक शानदार नमक पर्वत है जिसे ‘नमक देवी’ कहा जाता है.

एक किलोमीटर में फैले पहाड़ की खड़ी दीवारें और गुफाएं नमक के चमचमाते क्रिस्टल से भरी हुई हैं, जो संगमरमर के महल के बड़े स्तंभों से मिलती जुलती हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि इस नमक में नकारात्मक प्रवृत्तियों और विचारों को जज़्ब और ख़त्म करने की ताक़त रखता है.

ताक़त की घाटी

इस घाटी में समय बिताने के बाद आप बहुत उत्साहित महसूस करते हैं और इसीलिए इस घाटी को ताक़त की घाटी भी कहा जाता है. इसी तरह, द्वीप के दक्षिण-पश्चिम में ‘इंद्रधनुष द्वीप’ है जहाँ बहुरंगी मिट्टी हैं और वहाँ लाल, पीले और नीले पहाड़ हैं. चलते-चलते मैंने देखा कि यहाँ विभिन्न ज्यामितीय आकृतियों के पत्थर धूप के संपर्क में आने पर चमकते हैं.

पास की ‘मूर्तियों की घाटी’ में चट्टानों का आकार हजारों सालों से हवाओं के कारण बेहतरीन शक़्ल में बदल चुके हैं. मैं पक्षियों, ड्रेगन और पौराणिक कथाओं के जीवों को देख सकता था. ऐसा लगता है कि मानों यह पृथ्वी की अपनी कला दीर्घा की प्रशंसा करने जैसा हो.

SOURCE-BBC NEWS

PAPER-G.S.1

 

भारत का विदेशी मुद्रा भंडार

29 अक्टूबर, 2021 को समाप्त हुए सप्ताह के दौरान भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 1.919 अरब डॉलर की वृद्धि के साथ 642.019 अरब डॉलर पर पहुँच गया है। विश्व में सर्वाधिक विदेशी मुद्रा भंडार वाले देशों की सूची में भारत चौथे स्थान पर है, इस सूची में चीन पहले स्थान पर है।

विदेशी मुद्रा भंडार

  • विदेशी मुद्रा भंडार का आशय केंद्रीय बैंक द्वारा विदेशी मुद्रा में आरक्षित संपत्ति से होता है, जिसमें बॉण्ड, ट्रेज़री बिल और अन्य सरकारी प्रतिभूतियाँ शामिल होती हैं।
    • गौरतलब है कि अधिकांश विदेशी मुद्रा भंडार अमेरिकी डॉलर में आरक्षित किये जाते हैं।
  • भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में शामिल हैं:
    • विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियाँ
    • स्वर्ण भंडार
    • विशेष आहरण अधिकार (SDR)
    • अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के साथ रिज़र्व ट्रेंच

विदेशी मुद्रा भंडार को बनाए रखने का उद्देश्य:

  • मौद्रिक और विनिमय दर प्रबंधन के लिये नीतियों का समर्थन तथा उनमें विश्वास बनाए रखना।
  • राष्ट्रीय मुद्रा के समर्थन में हस्तक्षेप करने की क्षमता प्रदान करता है।
  • यह संकट के समय या जब ऋण तक पहुँच में कटौती की स्थिति में नुकसान को कम करने के लिये विदेशी मुद्रा तरलता को बनाए रखते हुए बाह्य भेद्यता को सीमित करता है।

बढ़ते विदेशी मुद्रा भंडार का महत्त्व:

  • सरकार के लिये आरामदायक स्थिति: बढ़ता विदेशी मुद्रा भंडार भारत के बाहरी और आंतरिक वित्तीय मुद्दों के प्रबंधन में सरकार तथा भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) को सुविधा प्रदान करता है।
  • संकट का प्रबंधन: यह आर्थिक मोर्चे पर भुगतान संतुलन (Balance of Payment) को लेकर संकट की स्थिति में मदद करता है।
  • रुपए के मूल्य में अभिवृद्धि (Appreciation): भारत के विदेशी मुद्रा के बढ़ते भंडार ने डॉलर के मुकाबले रुपए को मज़बूती प्रदान करने में मदद की है।
  • बाज़ार में विश्वास: यह भंडार बाज़ारों और निवेशकों को विश्वास का स्तर प्रदान करेगा जिससे एक देश अपने बाहरी दायित्वों को पूरा कर सकता है।

विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियाँ (FCA):

  • FCA ऐसी संपत्तियाँ हैं जिनका मूल्यांकन देश की स्वयं की मुद्रा के अलावा किसी अन्य मुद्रा के आधार पर किया जाता है।
  • FCA विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा घटक है। इसे डॉलर के रूप में व्यक्त किया जाता है।
  • FCA में विदेशी मुद्रा भंडार में रखे गए यूरो, पाउंड और येन जैसी गैर-अमेरिकी मुद्रा की कीमतों में उतार-चढ़ाव या मूल्यह्रास का प्रभाव शामिल है।

विशेष आहरण अधिकार (SDRs)

  • विशेष आहरण अधिकार को अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund-IMF) द्वारा 1969 में अपने सदस्य देशों के लिये अंतर्राष्ट्रीय आरक्षित संपत्ति के रूप में बनाया गया था।
  • SDR न तो एक मुद्रा है और न ही IMF पर इसका दावा किया जा सकता है। बल्कि यह IMF के सदस्यों का स्वतंत्र रूप से प्रयोग करने योग्य मुद्राओं पर एक संभावित दावा है। इन मुद्राओं के लिये SDR का आदान-प्रदान किया जा सकता है।
  • SDR के मूल्य की गणना ‘बास्केट ऑफ करेंसी’ में शामिल मुद्राओं के औसत भार के आधार पर की जाती है। इस बास्केट में पाँच देशों की मुद्राएँ शामिल हैं- अमेरिकी डॉलर, यूरोप का यूरो, चीन की मुद्रा रॅन्मिन्बी, जापानी येन और ब्रिटेन का पाउंड।
  • विशेष आहरण अधिकार ब्याज (SDRi) सदस्य देशों को उनके द्वारा धारण किये जाने वाले SDR पर मिलने वाला ब्याज है।

IMF के पास रिज़र्व ट्रेंच

  • रिज़र्व ट्रेंच वह मुद्रा होती है जिसे प्रत्येक सदस्य देश द्वारा अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) को प्रदान किया जाता है और जिसका उपयोग वे देश अपने स्वयं के प्रयोजनों के लिये कर सकते हैं।
  • रिज़र्व ट्रेंच मूलतः एक आपातकालीन कोष होता है जिसे अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के सदस्य देशों द्वारा बिना किसी शर्त पर सहमत हुए अथवा सेवा शुल्क का भुगतान किये किसी भी समय प्राप्त किया जा सकता है।

इसे फोरेक्स रिज़र्व या आरक्षित निधियों का भंडार भी कहा जाता है भुगतान संतुलन में विदेशी मुद्रा भंडारों को आरक्षित परिसंपत्तियाँ’ कहा जाता है तथा ये पूंजी खाते में होते हैं। ये किसी देश की अंतर्राष्ट्रीय निवेश स्थिति का एक महत्त्वपूर्ण भाग हैं। इसमें केवल विदेशी रुपये, विदेशी बैंकों की जमाओं, विदेशी ट्रेज़री बिल और अल्पकालिक अथवा दीर्घकालिक सरकारी परिसंपत्तियों को शामिल किया जाना चाहिये परन्तु इसमें विशेष आहरण अधिकारों, सोने के भंडारों और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की भंडार अवस्थितियों को शामिल किया जाता है। इसे आधिकारिक अंतर्राष्ट्रीय भंडार अथवा अंतर्राष्ट्रीय भंडार की संज्ञा देना अधिक उचित है।

29 अक्टूबर,  2021 को विदेशी मुद्रा भंडार

विदेशी मुद्रा संपत्ति (एफसीए): $578.462 बिलियन

गोल्ड रिजर्व: $39.012 बिलियन

आईएमएफ के साथ एसडीआर: $19.304 बिलियन

आईएमएफ के साथ रिजर्व की स्थिति: $5.242 बिलियन

SOURCE-GK TODAY

PAPER-G.S.3

 

COP26: भारत के लक्ष्यों के आर्थिक प्रभाव

1 नवंबर, 2021 को, COP26 जलवायु शिखर सम्मेलन में, प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) ने वर्ष 2070 तक शुद्ध शून्य कार्बन उत्सर्जन (net zero carbon emissions) तक पहुँचने के लिए भारत के लक्ष्य की घोषणा की।

मुख्य बिंदु

  • भारत की घोषणा ग्लासगो में प्रतिनिधियों के लिए एक आश्चर्य के रूप में आई, क्योंकि भारत ने हाल ही में इस तरह के लक्ष्य की घोषणा न करने की बात कही थी।
  • अमेरिका, ब्रिटेन और जापान ने 2050 तक; यूरोपीय संघ ने 2060 तक; सऊदी अरब, चीन और रूस ने 2070 तक शुद्ध शून्य लक्ष्य हासिल करने का प्रस्ताव रखा है।

नेट-जीरो टारगेट क्या है?

एक शुद्ध-शून्य लक्ष्य को उस तिथि के रूप में परिभाषित किया जाता है जब तक कोई देश केवल उतना ही कार्बन डाइऑक्साइड या अन्य ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करेगा, जिन्हें जंगलों, मिट्टी, फसलों और कार्बन कैप्चर तकनीक जैसी विकासशील तकनीकों द्वारा अवशोषित किया जा सकता है।

शीर्ष ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक कौन से हैं?

चीन, अमेरिका, भारत और रूस शीर्ष ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक हैं। भारत ग्रीनहाउस गैसों का तीसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक है और उन देशों में शामिल है जो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील हैं। वैश्विक जलवायु जोखिम सूचकांक 2021 के अनुसार, भारत चरम मौसम की घटनाओं से सातवां सबसे अधिक प्रभावित देश है।

शुद्ध-शून्य उत्सर्जन की दिशा में भारत का लक्ष्य

2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन हासिल करने का भारत का लक्ष्य दूर की कौड़ी है। इस प्रकार, इस लक्ष्य का समर्थन करने के लिए, चार अन्य आक्रामक प्रतिज्ञाएँ की गईं। ये लक्ष्य हैं:

  • 2030 तक 50% बिजली नवीकरणीय ऊर्जा से आएगी।
  • 2030 तक अक्षय ऊर्जा की स्थापित क्षमता 500 गीगावॉट तक पहुंच जाएगी।
  • 2030 तक कार्बन की तीव्रता में 45% की कमी।
  • 2030 तक अनुमानित कुल कार्बन उत्सर्जन में 1 बिलियन टन की कमी।
  • भारत दशक के अंत तक अपने अनुमानित कुल कार्बन उत्सर्जन को 1 बिलियन टन तक कम करने का इच्छुक है।

SOURCE-GK TODAY

PAPER-G.S.3