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Current Affair 12 June 2021

CURRENT AFFAIRS – 12th JUNE 2021

जीएसटी परिषद की 44वीं बैठक

केन्द्रीय वित्त एवं कारपोरेट मामलों की मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण की अध्यक्षता में जीएसटी परिषद की 44वीं बैठक आज यहां वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से हुई। अपनी बैठक में परिषद ने कोविड-19 राहत और प्रबंधन में इस्तेमाल हो रहे विशेष सामानों पर जीएसटी दरों में 30 सितंबर, 2021 तक कटौती करने का ऐलान किया।

सिफारिशों का विवरण निम्नलिखित है :

क्र. सं. विवरण वर्तमान जीएसटी दर जीएसटी परिषद द्वारा सिफारिश की गई जीएसटी दर
·         दवाइयां
1. टोसिलिजुमैब 5% शून्य
2. एम्फोटेरिसिन बी 5% शून्य
3. हेपेरिन जैसी एंटी कोगुलैंट्स 12% 5%
4. रेमडेसिविर 12% 5%
5. कोविड के उपचार के लिए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय (एमओएचएफडब्ल्यू) और औषध विभाग (डीओपी) द्वारा सुझाई गई कोई अन्य दवा लागू दर 5%
·         ऑक्सीजन, ऑक्सीजन जनरेशन उपकरण और संबंधित मेडिकल डिवाइस
1. मेडिकल ग्रेड ऑक्सीजन 12% 5%
2. ऑक्सीजन कंसन्ट्रेटर/ जनरेटर, उनके व्यक्तिगत आयात सहित 12% 5%
3. वेंटिलेटर 12% 5%
4. वेंटिलेटर मास्क/ कैनुला/ हेलमेट 12% 5%
5. बाइपैप मशीन 12% 5%
6. हाई फ्लो कैनुरा (एचएफएनसी) डिवाइस 12% 5%
·         परीक्षण किट और मशीन
1. कोविड परीक्षण किट 12% 5%
2. निर्दिष्ट सूचन निदान किट, नाम- डी- डाइमर, आईएल-6, फेरिटीन और एलडीएच 12% 5%
·         कोविड-19 से संबंधित अन्य राहत सामग्री
1. पल्स ऑक्सिमीटर, उनके व्यक्तिगत आयात सहित 12% 5%
2. हैंड सैनिटाइजर 18% 5%
3. तापमान जांचने के उपकरण 18% 5%
4. श्मशान के लिए गैस/विद्युत/ अन्य से चालित भट्टियां, उनका इंस्टालेशन आदि सहित 18% 5%
5. एम्बुलैंस 28% 12%

दरों में ये कमी/ छूट 30 सितंबर, 2021 तक लागू रहेगी।

जीएसटी परिषद क्या है

गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स कानून जीएसटी काउंसिल द्वारा शासित है। संशोधित भारतीय संविधान के अनुच्छेद 279 (1) के अंतर्गत कहा गया है कि अनुच्छेद 279A के शुरू होने के 60 दिनों के अंतराल में राष्ट्रपति द्वारा जीएसटी परिषद का गठन किया जाना है। इस लेख के अनुसार, जीएसटी परिषद के तहत केंद्र और राज्यों के लिए एक संयुक्त मंच होता है। इसमें निम्नलिखित सदस्य होते हैं:-

केंद्रीय वित्त मंत्री, होंगे।

सदस्य के रूप में, केंद्रीय राज्य मंत्री राजस्व के प्रभारी होंगे।

वित्त या कराधान के प्रभारी मंत्री या सदस्य के रूप में प्रत्येक राज्य सरकार द्वारा नामित कोई अन्य मंत्री

जीएसटी परिषद की आवश्यकता क्यों पड़ती है?

वस्तु एवं सेवा कर प्रणाली के तहत जीएसटी परिषद एक मुख्य निर्णय लेने वाली संस्था है जो की जीएसटी कानून के अंतर्गत होने वाले कार्यो के संबंध में सभी महत्वपूर्ण निर्णय लेती है। जीएसटी काउंसिल कुछ राज्यों के लिए विशेष दरों और प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए कर की दर, कर छूट, रूपों के नियत तारीख अथवा कर कानून और कर समय सीमा तय करती है। जीएसटी परिषद (काउंसिल) की मुख्य जिम्मेदारी पूरे भारत देश में वस्तुओं और सेवाओं के लिए एक समान कर की दर सुनिश्चित करना है।

जीएसटी काउंसिल की सिफारिशें?

वस्तु एवं सेवा कर के तहत अनुच्छेद 279A (4) निर्दिष्ट करता है कि परिषद संघ और राज्यों को जीएसटी से संबंधित महत्वपूर्ण मुद्दों पर सिफारिशें प्रदान करेगी। जैसे की, माल और सेवाओं को वस्तु और सेवा कर से छूट दी जाएगी। ऐसी संस्था जीएसटी कानूनों अथवा सिद्धांत को लागू करते हैं, जो निम्नलिखित को नियंत्रित करते हैं :-

आपूर्ति का स्थान।

दहलीज की सीमा।

वस्तुओं और सेवाओं पर जीएसटी की दर।

प्राकृतिक आपदा या आपदा के दौरान अतिरिक्त संसाधन जुटाने की विशेष दरें।

कुछ राज्यों के लिए विशेष जीएसटी दरें।

जीएसटी परिषद कब बनाई गई थी?

गुड्स एंड सर्विस टैक्स प्रणाली को लागू करने के लिए जीएसटी परिषद के गठन की प्रक्रिया भारत में शुरू की गई थी जब संविधान 122 संशोधन के तहत विधेयक, 8 सितंबर 2016 को राष्ट्रपति द्वारा अनुमोदित किया गया था। संशोधित संविधान के अनुच्छेद 279A (1) के अनुसार, अनुच्छेद 279A के शुरू होने के 60 दिनों के भीतर राष्ट्रपति द्वारा जीएसटी काउंसिल का गठन किया जाना था। लेकिन उसके बाद, 12 सितंबर 2016 के प्रभाव से अनुच्छेद 279A को लागू करने की अधिसूचना 10 सितंबर 2016 को जारी की गई थी।

जीएसटी विधेयक की सहमति के बाद, 12 सितंबर 2016 को हुई बैठक में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने जीएसटी परिषद की स्थापना और इसके सचिवालय की स्थापना को मंजूरी दी। इसके अलावा, वित्त मंत्री श्री अरुण जेटली ने भी नई दिल्ली में 22 और 23 सितंबर 2016 को जीएसटी काउंसिल की पहली बैठक बुलाने का फैसला किया।

SOURCE-PIB

 

देविका नदी राष्ट्रीय परियोजना

जम्मू-कश्मीर में देविका नदी राष्ट्रीय परियोजना हमारे सामूहिक गौरव तथा विश्वास को दर्शाएगी और यह उत्तर भारत में अपनी तरह की यह पहली परियोजना होगी। उन्होंने इस बात को बहुत महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि, इस कार्य को अंजाम देने वाले संबंधित अधिकारी समाज के सभी वर्गों को विश्वास में लें, चाहे उनकी विचारधारा या राजनीतिक संबद्धता कुछ भी हो, ताकि जब यह परियोजना पूरी हो जाए, तो इसे न केवल देश के अन्य हिस्सों में इसी तरह की अन्य परियोजनाओं के लिए एक आदर्श के रूप में देखा जाए, बल्कि इसे सद्भाव एवं एकता की भावना का प्रतीक माना जाये, जिस तरह से देविका नदी सदियों से इसका प्रतीक रही है।

केंद्र सरकार की अग्रणी “नमामि गंगे” परियोजना के साथ इसकी तुलना करते हुए, डॉ. जितेंद्र सिंह ने देविका परियोजना को मंजूरी देने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को धन्यवाद दिया, इस परियोजना को श्री मोदी ने 2019 की शुरुआत में अपनी जम्मू यात्रा के दौरान औपचारिक रूप से लॉन्च किया था। उन्होंने कहा कि, अब यह हम सभी की जिम्मेदारी है कि हम इस परियोजना को उसी भावना एवं विश्वास के साथ पूरा करें, जिसके साथ मोदी सरकार ने इसे अनुमति और मंजूरी दी थी।

महत्वपूर्ण तथ्य :

राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (एनआरसीपी) के तहत 190 करोड़ रुपये की परियोजना पर मार्च 2019 में काम शुरू हुआ।

परियोजना के तहत देविका नदी के किनारे स्नान घाटों (स्थल) को विकसित किया जाएगा, अतिक्रमण हटाया जाएगा, प्राकृतिक जल निकायों को बहाल किया जाएगा और श्मशान घाट के साथ जलग्रहण क्षेत्रों को विकसित किया जाएगा।

परियोजना में तीन वाहित माल उपचार संयंत्र, सुरक्षा बाड़ और छोटे जल विद्युत संयंत्र और तीन सौर ऊर्जा संयंत्र भी शामिल हैं।

परियोजना के पूरा होने के बाद, नदियों के प्रदूषण में कमी आएगी और पानी की गुणवत्ता में सुधार होगा

देविका नदी

देविका नदी का बहुत धार्मिक महत्व भी है क्योंकि इसे हिंदुओं द्वारा इसे गंगा नदी की बहन के रूप में संबोधित किया जाता है। देविका नदी जम्मू और कश्मीर के उधमपुर ज़िले में पहाड़ी सुध (शुद्ध) महादेव मंदिर से निकलती है और पश्चिमी पंजाब (अब पाकिस्तान में) की ओर बहती है जहाँ यह रावी नदी में मिल जाती है।

नदी का धार्मिक महत्त्व इसलिये है क्योंकि इसे हिंदुओं द्वारा गंगा नदी की बहन के रूप में मान्यता प्राप्त है।

जून 2020 में, उधमपुर में देविका पुल का उद्घाटन किया गया। इस पुल के निर्माण का उद्देश्य यातायात की भीड़ से निपटने के अलावा, सेना के काफिले और वाहनों को सुगम मार्ग प्रदान करना भी है।

राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (NRCP) : यह 1995 में शुरू की गई एक केंद्रीय वित्त पोषित योजना है, जिसका उद्देश्य नदियों के प्रदूषण को रोकना है।

SOURCE-PIB

 

विश्व बाल श्रम निषेध दिवस

केंद्रीय महिला एवं बाल विकास और वस्‍त्र मंत्री श्रीमती स्मृति जुबिन ईरानी ने देश के नागरिकों से अपील की है कि वे बाल श्रम के मामलों की जानकारी ‘पेंसिल पोर्टल’ पर या ‘चाइल्डलाइन-1098’ पर कॉल करके दें। आज ‘विश्व बाल श्रम निषेध दिवस’ के अवसर पर श्रीमती ईरानी ने एक ट्वीट संदेश में कहा, ‘शिक्षा और खुशहाल बचपन हर बच्चे का अधिकार है। विश्व बाल श्रम निषेध दिवस पर, आइए हम सभी बाल श्रम की समस्‍या से निपटने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराएं। लोगों की भागीदारी से ही हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि हमारे बच्चों को वह बचपन मिले जिसके वे हकदार हैं।’

उन्होंने कहा, ‘मैं प्रत्‍येक नागरिक से यह अपील करती हूं कि वे बाल श्रम के मामलों की जानकारी ‘पेंसिल पोर्टल https://pencil.gov.in’ पर /अथवा ‘चाइल्डलाइन-1098’ पर कॉल करके दें। क्योंकि… हम अपने बच्चों के ऋणी हैं जो हमारे राष्ट्र का भविष्य हैं।

विश्व बाल श्रम निषेध दिवस’ हर साल 12 जून को दुनिया भर में मनाया जाता है।

विश्व बाल श्रम निषेध दिवस’ की शुरुआत ILO ने 2002 में की थी। इस बार ‘वीक ऑफ ऐक्‍शन’ मनाया जा रहा है जो 10 जून से शुरू हुआ है। रिपोर्ट में बाल मजदूरी में 5 से 11 साल उम्र के बच्चों की संख्या में बढ़ोतरी की ओर इशारा किया गया है जो पूरी दुनिया में कुल बाल मजदूरों की संख्या की आधे से अधिक है।

विश्व बाल श्रम निषेध 2021 का महत्व

वर्ष 2021 में विश्व में बाल श्रमिकों की संख्या 20 साल में पहली बार बढ़ी है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के हिसाब से बाल श्रम समाजिक असमानता और भेद-भाव को बढ़ावा देता है। बाल श्रम को रोकना काफ़ी आवश्यक है क्योंकि इससे पैदा होने वाले फैक्टर्स जैसे- गरीबी, ट्रांसफर के कारण एक बच्चे पर मानसिक और शारीरिक रूप से काफ़ी बुरा असर पड़ता है। इस बार का आयोजन कोरोना वायरस के कारण वर्चुअल होने वाला है। कोरोना वायरस के कारण कई बच्चों ने अपने माता-पिता को खो दिया है जिस कारण मज़बूरी में उन्हें बाल श्रम का सहारा लेना पड़ा है।

बाल-श्रम

बाल-श्रम का मतलब यह है कि जिसमे कार्य करने वाला व्यक्ति कानून द्वारा निर्धारित आयु सीमा से छोटा होता है। इस प्रथा को कई देशों और अंतर्राष्ट्रीय संघठनों ने शोषित करने वाली प्रथा माना है। अतीत में बाल श्रम का कई प्रकार से उपयोग किया जाता था, लेकिन सार्वभौमिक स्कूली शिक्षा के साथ औद्योगीकरण, काम करने की स्थिति में परिवर्तन तथा कामगारों श्रम अधिकार और बच्चों अधिकार की अवधारणाओं के चलते इसमे जनविवाद प्रवेश कर गया। बाल श्रम अभी भी कुछ देशों में आम है।

बाल श्रम के क्या कारण है?

बाल मजदूरी और शोषण के अनेक कारण हैं जिनमें गरीबी, सामाजिक मापदंड, वयस्‍कों तथा किशोरों के लिए अच्‍छे कार्य करने के अवसरों की कमी, प्रवास और इमरजेंसी शामिल हैं। ये सब वज़हें सिर्फ कारण नहीं बल्कि भेदभाव से पैदा होने वाली सामाजिक असमानताओं के परिणाम हैं। बच्‍चों का काम स्‍कूल जाना है न कि मजदूरी करना।

भारत में बाल श्रम के खिलाफ राष्ट्रीय कानून और नीतियां

कानून

भारत का संविधान (26 जनवरी 1950) मौलिक अधिकारों और राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांत की विभिन्न धाराओं के माध्यम से कहता है-

14 साल के कम उम्र का कोई भी बच्चा किसी फैक्टरी या खदान में काम करने के लिए नियुक्त नहीं किया जायेगा और न ही किसी अन्य खतरनाक नियोजन में नियुक्त किया जायेगा (धारा 24)।

राज्य अपनी नीतियां इस तरह निर्धारित करेंगे कि श्रमिकों, पुरुषों और महिलाओं का स्वास्थ्य तथा उनकी क्षमता सुरक्षित रह सके और बच्चों की कम उम्र का शोषण न हो तथा वे अपनी उम्र व शक्ति के प्रतिकूल काम में आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रवेश करें (धारा 39-ई)।

बच्चों को स्वस्थ तरीके से स्वतंत्र व सम्मानजनक स्थिति में विकास के अवसर तथा सुविधाएं दी जायेंगी और बचपन व जवानी को नैतिक व भौतिक दुरुपयोग से बचाया जायेगा (धारा 39-एफ)।

संविधान लागू होने के 10 साल के भीतर राज्य 14 वर्ष तक की उम्र के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देने का प्रयास करेंगे (धारा 45)।

बाल श्रम एक ऐसा विषय है, जिस पर संघीय व राज्य सरकारें, दोनों कानून बना सकती हैं। दोनों स्तरों पर कई कानून बनाये भी गये हैं।

प्रमुख राष्ट्रीय कानूनी विकास में निम्नलिखित शामिल हैं ……………………………………………
बाल श्रम (निषेध व नियमन) कानून 1986- यह कानून 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को 13 पेशा और 57 प्रक्रियाओं में, जिन्हें बच्चों के जीवन और स्वास्थ्य के लिए अहितकर माना गया है, नियोजन को निषिद्ध बनाता है। इन पेशाओं और प्रक्रियाओं का उल्लेख कानून की अनुसूची में है।

फैक्टरी कानून 1948 – यह कानून 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के नियोजन को निषिद्ध करता है। 15 से 18 वर्ष तक के किशोर किसी फैक्टरी में तभी नियुक्त किये जा सकते हैं, जब उनके पास किसी अधिकृत चिकित्सक का फिटनेस प्रमाण पत्र हो। इस कानून में 14 से 18 वर्ष तक के बच्चों के लिए हर दिन साढ़े चार घंटे की कार्यावधि तय की गयी है और रात में उनके काम करने पर प्रतिबंध लगाया गया है।

भारत में बाल श्रम के खिलाफ कार्रवाई में महत्वपूर्ण न्यायिक हस्तक्षेप 1996 में उच्चतम न्यायालय के उस फैसले से आया, जिसमें संघीय और राज्य सरकारों को खतरनाक प्रक्रियाओं और पेशों में काम करनेवाले बच्चों की पहचान करने, उन्हें काम से हटाने और उन्हें गुणवत्तायुक्त शिक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया गया था। न्यायालय ने यह आदेश भी दिया था कि एक बाल श्रम पुनर्वास सह कल्याण कोष की स्थापना की जाये, जिसमें बाल श्रम कानून का उल्लंघन करनेवाले नियोक्ताओं के अंशदान का उपयोग हो। भारत निम्नलिखित संधियों पर हस्ताक्षर कर चुका है अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन बलात श्रम सम्मेलन (संख्या 29)

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन बलात श्रम सम्मेलन का उन्मूलन (संख्या 105)

बच्चों के अधिकार पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (सीआरसी)

सरकारी नीतियां और कार्यक्रम

भारत के विकास लक्ष्यों और रणनीतियों को जारी रखते हुए 1987 में एक राष्ट्रीय बाल श्रम नीति को अंगीकार किया गया। राष्ट्रीय नीति भारत के संविधान में राज्य के नीति -निर्देशक नीतियों को दोहराती है। इसका संकल्प बच्चों के लाभ के लिए हरसंभव विकास कार्यक्रमों पर ध्यान केंद्रित करना और उन इलाकों में, जहां वेतन या अर्द्ध वेतन के लिए बाल श्रमिकों की संख्या अधिक हो, परियोजना आधारित कार्य योजना बनाने की है। राष्ट्रीय बाल श्रम नीति (एनसीएलपी) को बाल श्रम (निषेध व नियमन) कानून, 1986 के लागू होने के बाद अंगीकार किया गया।

श्रम एवं नियोजन मंत्रालय बाल श्रमिकों के पुनर्वास के लिए 1988 से ही राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजनाओं के माध्यम से ही एनसीएलपी को कार्यान्वित कर रहा है। आरंभ में ये परियोजनाएं उद्योग विशेष पर केंद्रित थीं और इनका उद्देश्य बाल श्रमिकों के नियोजन के लिए पारंपरिक रूप से ख्यात उद्योगों में काम करनेवाले बच्चों का पुनर्वास था।

संवैधानिक व्यवस्थाओं को लागू करने के लिए नवीकृत संकल्प का परिणाम यह हुआ कि बाल श्रम के लिए ख्यात जिलों में खतरनाक काम में लगे बच्चों का पुनर्वास करने के लिए 1994 में एनसीएलपी का दायरा बढ़ाया गया।

एनसीएलपी की रणनीति में अनौपचारिक शिक्षा तथा प्राक-व्यावसायिक प्रशिक्षण देने के लिए विशेष विद्यालय स्थापित करने, अतिरिक्त आमदनी और रोजगार सृजन के अवसर पैदा करने, लोगों में जागरूकता पैदा करने और बाल श्रम के बारे में सर्वेक्षण तथा मूल्यांकन करने का काम शामिल है।

कई वर्षों तक एनसीएलपी को चालू रखने से सरकार को मिले अनुभवों का परिणाम यह हुआ कि नौवीं पंचवर्षीय योजना (1997-2002) में परियोजनाओं को जारी रखते हुए उनका विस्तारीकरण किया गया। कांच, चूड़ी, पीतल, ताला, कालीन, स्लेट टाइल, माचिस, आतिशबाजी और रत्न उद्योग जैसे खतरनाक उद्योगों में काम करने वाले बच्चों के पुनर्वास के लिए पूरे देश में करीब एक सौ एनसीएलपी शुरू किये गये। केंद्र सरकार ने नौवीं पंचवर्षीय योजना में इन परियोजनाओं के लिए करीब 25 करोड़ रुपये का बजटीय उपबंध किया। भारत सरकार ने 10वीं पंचवर्षीय योजना (2003-07) में एनसीएलपी का विस्तार अतिरिक्त 150 जिलों में करने तथा 60 करोड़ रुपये का बजटीय उपबंध करने का संकल्प व्यक्त किया है।

SOURCE-PIB

 

रेबेका ग्रिनस्पैन

संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) ने व्यापार और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (UNCTAD) के अध्यक्ष पद के लिए रेबेका ग्रिनस्पैन (Rebeca Grynspan) के नामांकन को मंजूरी दे दी है। वह कोस्टा रिका की अर्थशास्त्री हैं।

मुख्य बिंदु

  • वह जिनेवा स्थित संगठन, UNCTAD का नेतृत्व करने वाली पहली महिला और मध्य अमेरिकी होंगी ।
  • महासचिवएंटोनियो गुटेरेस द्वारा उन्हें UNCTAD के महासचिव के रूप में नामित किया गया था ।

पृष्ठभूमि

रेबेका ग्रिनस्पैन (Rebecca Grynspan) 2014 से इबेरो-अमेरिकन जनरल सेक्रेटेरिएट (Ibero-American General Secretariat) की महासचिव रही हैं। यह सचिवालय इबेरो-अमेरिकन शिखर सम्मेलन (Ibero-American Summits) की तैयारियों का समर्थन करता है।उन्होंने 2010 से 2014 तक संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) की उप-प्रशासक के रूप में भी काम किया है। उन्होंने लैटिन अमेरिका और कैरिबियन के लिए UNDP के क्षेत्रीय निदेशक के रूप में भी काम किया है।

व्यापार और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (United Nations Conference on Trade and Development – UNCTAD)

UNCTAD को 1964 में स्थायी अंतर सरकारी निकाय के रूप में स्थापित किया गया था। यह संयुक्त राष्ट्र सचिवालय का एक हिस्सा है जो व्यापार, निवेश और विकास संबंधी मुद्दों से संबंधित है। यह विकासशील देशों में व्यापार, निवेश और विकास के अवसरों को अधिकतम करने का प्रयास करता है और उन्हें समान आधार पर विश्व अर्थव्यवस्था में एकीकृत करने में सहायता करता है। यह संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा स्थापित किया गया था और यह संयुक्त राष्ट्र महासभा (United Nations General Assembly) और संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक परिषद (United Nations Economic & Social Council – ECOSOC) को रिपोर्ट करता है।

SOURCE-DANIK JAGRAN

 

न्यू अटलांटिक चार्टर

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन (Joe Biden) और ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन (Boris Johnson) ने हाल ही में कॉर्नवाल में बैठक की और अटलांटिक चार्टर से संबंधित दस्तावेजों का निरीक्षण किया और “न्यू अटलांटिक चार्टर” (New Atlantic Charter) नामक एक दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए।

न्यू अटलांटिक चार्टर (New Atlantic Charter) क्या है?

न्यू अटलांटिक चार्टर नामक एक समझौते पर 10 जून, 2021 को बोरिस जॉनसन और जो बाईडेन के बीच हस्ताक्षर किए गए। यह 1941 के अटलांटिक चार्टर का एक नया संस्करण है। पश्चिमी गठबंधन को फिर से परिभाषित करने के लिए समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे।

न्यू अटलांटिक चार्टर के उद्देश्य

लोकतंत्र के सिद्धांतों और संस्थानों की रक्षा करने और संस्थानों को मजबूत और अनुकूलित करने के उद्देश्य से न्यू अटलांटिक चार्टर पर हस्ताक्षर किए गए थे। यह चार्टर संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के सिद्धांतों पर एकजुट करने का प्रयास करता है। यह साइबर खतरों के खिलाफ भी सामूहिक सुरक्षा और अंतर्राष्ट्रीय स्थिरता बनाए रखने का प्रयास करेगा। यह सभी अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई में जलवायु परिवर्तन को प्राथमिकता देता है।

अटलांटिक चार्टर (Atlantic Charter) क्या है?

अटलांटिक चार्टर ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल (Winston Churchill) और अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट (Franklin D. Roosevelt) द्वारा अगस्त, 1941 में हस्ताक्षरित एक घोषणा है। यह चार्टर मुक्त व्यापार, निरस्त्रीकरण और सभी लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार जैसे सामान्य लक्ष्य निर्धारित करता है। इसे अक्सर ट्रांस-अटलांटिक विशेष संबंधों की आधारशिला (cornerstone of trans-Atlantic special relationship) कहा जाता है। इस चार्टर ने ब्रिटिश साम्राज्य को समाप्त कर दिया और नाटो और टैरिफ एंड ट्रेड पर सामान्य समझौता (General Agreement on Tariffs and Trade – GATT) का गठन किया

SOURCE-GK TODAY

 

Heritage Tree

मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) की अध्यक्षता में महाराष्ट्र मंत्रिमंडल ने शहरी क्षेत्रों में 50 वर्ष और उससे अधिक उम्र के पुराने पेड़ों की रक्षा के लिए एक कार्य योजना को मंजूरी दी।

Heritage Tree

कैबिनेट ने महाराष्ट्र में ‘Heritage Tree’ कांसेप्ट को लागू करने की कार्य योजना को मंजूरी दी।

यह कार्य योजना आदित्य ठाकरे (Aaditya Thackeray) की अध्यक्षता में पर्यावरण विभाग द्वारा प्रस्तावित की गई थी।

यह कार्य योजना महाराष्ट्र (शहरी क्षेत्र) वृक्ष संरक्षण और संरक्षण अधिनियम, 1975 में संशोधन करती है।

यह संशोधन शहरी परिदृश्य में हरित आवरण (green cover) की सुरक्षा में मदद करेगा और विरासत पेड़ों की रक्षा के लिए एक मजबूत तंत्र भी प्रदान करेगा।

संशोधन

संशोधन के तहत, सरकार “Heritage Trees” कांसेप्ट शुरू करेगी और पेड़ों के संरक्षण के लिए कार्य करेगी।

यह प्रतिपूरक वृक्षारोपण (compensatory plantation) सुनिश्चित करेगा, जिसका शुद्ध सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

यह वृक्षारोपण के लिए सामान्य भूमि को आरक्षित करने का प्रस्ताव करता है और मियावाकी वृक्षारोपण (Miyawaki plantation ) जैसे वैज्ञानिक तरीकों की अनुशंसा करता।

इसके तहत जुर्माने को संशोधित किया जा रहा है और अधिकतम सीमा 1 लाख रुपये प्रति पेड़ तक रखी गई है।

वृक्ष प्राधिकरण (Tree Authority)

बड़ी संख्या में पेड़ों की सुरक्षा के उद्देश्य से, महाराष्ट्र सरकार “महाराष्ट्र राज्य वृक्ष प्राधिकरण” (Maharashtra State Tree Authority) की स्थापना करेगी। यहप्राधिकरण वृक्ष उपकर (tree cess) के उपयोग को परिभाषित करेगा।

विशेषज्ञ राय देने के लिए एक वृक्ष विशेषज्ञ स्थानीय वृक्ष प्राधिकरण का हिस्सा होगा।

नगर परिषद के मुख्य अधिकारी वृक्ष प्राधिकरण के अध्यक्ष होंगे।

SOURCE-INDIAN EXPRESS