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Current Affair 13 November 2021

Current Affairs – 13 November, 2021

एमपी कप पोलो चैंपियनशिप- सर प्रताप सिंह कप 2021

आजादी का अमृत महोत्सव के माध्यम से आजादी के 75 साल और भारत के गौरवशाली सांस्कृतिक इतिहास का जश्न मनाने के लिए संस्कृति मंत्रालय एमपी कप पोलो चैम्पियनशिप – सर प्रताप सिंह कप 2021 के फाइनल मैच का आयोजन कर रहा है। संस्कृति और विदेश राज्य मंत्री श्रीमती मीनाक्षी लेखी 14 नवंबर, 2021 को प्रतिष्ठित जयपुर पोलो ग्राउंड में फाइनल 14 गोल मैच का शुभारंभ करेंगी। यह कार्यक्रम इंडियन पोलो एसोसिएशन के तत्वावधान में आयोजित किया जा रहा है और इस आयोजन में जस्ट इन टाइम स्पोर्ट्स फाउंडेशन सहयोग कर रहा है। सर प्रताप सिंह कप भारत के सबसे ऐतिहासिक और प्रमुख टूर्नामेंटों में से एक है, जिसे 1921 में शुरू किया गया था।

इस खेल का इतिहास उस समय से है जब भारत में पोलो का आधार 1892 में इंडियन पोलो एसोसिएशन (आईपीए) के रूप में स्थापित किया गया था। जोधपुर के महाराजा सर प्रताप सिंह ने एचआरएच द ड्यूक ऑफ कनॉट की भारत यात्रा की स्मृति में 1921 में यह कप शुरू किया। यह 14 गोल की ट्रॉफी है। यह पहली बार 1921 में दिल्ली में खेला गया था और पटियाला टीम ने जीता था।

यह आयोजन प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के फिट इंडिया और खेलो इंडिया के आह्वान के अनुरूप हो रहा है, जो “स्पोर्ट्स फॉर एक्सीलेंस” को आगे बढ़ाने का प्रयास करता है और फिटनेस को हमारे जीवन का अभिन्न अंग बनाने पर जोर देता है।

पोलो सहित कई खेल परंपराओं के साथ भारत के समृद्ध ऐतिहासिक संबंध हैं। भारत दुनिया के उन कुछ देशों में से एक है जहां यह खेल अभी भी संरक्षित और खेला जाता है। पोलो को भारत का “विरासत खेल” भी कहा जाता है। आजादी का अमृत महोत्सव भारत की विरासत का जश्न मनाने के लिए आयोजित किया जा रहा है और यह खेल आयोजन हमारे खेलों की सांस्कृतिक विरासत को समेटे हुए है।

SOURCE-PIB

PAPER-G.S.1 PRE

 

दो दिवसीय अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने आज वाराणसी में राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय द्वारा आयोजित अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन का शुभारंभ किया। इस अवसर पर अपने संबोधन में केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने कहा कि उनके लिए ये बेहद हर्ष का विषय है कि आज़ादी के अमृत महोत्सव के वर्ष में पहली बार राजभाषा सम्मेलन राजधानी के बाहर लाने में सफलता मिली है। उन्होंने कहा कि कोई भी सरकारी परिपत्र, अधिसूचना तब तक लोकभोग्य नहीं होती है जब तक वो जन आंदोलन में परिवर्तित नहीं होती है। राजभाषा को गति देने के लिए अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन को दिल्ली के गलियारों से बाहर ले जाने का निर्णय 2019 में ही कर लिया गया था और ये नई शुरूआत उस वर्ष में हो रही है जो हमारी आज़ादी का अमृत महोत्सव वर्ष है।

श्री अमित शाह ने कहा कि देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने कहा कि अमृत महोत्सव हमारे पुरखों द्वारा आज़ादी के लिए दिए गए बलिदानों, संघर्षों को स्मृति में पुनर्जीवित करके युवा पीढ़ी को प्रेरणा देने का मौका तो है ही, ये हमारे लिए संकल्प का भी वर्ष है। इसी वर्ष में 130 करोड़ भारतीयों को ये तय करना है कि जब देश की आज़ादी के 100 साल होंगे तो भारत कैसा होगा और हर क्षेत्र में कहां खड़ा होगा। 75वें साल से 100 साल तक का काल अमृत काल होगा और ये अमृत काल हमारे सभी लक्ष्यों की सिद्धि का माध्यम होगा।1893 में आर्य समाज के अंदर एक आंदोलन चला और शाकाहार व पश्चिमी शिक्षा के मुद्दे पर एक बहुत बड़ा मतभेद हुआ। उस वक़्त शिक्षा का माध्यम क्या हो इस पर पहली बार चर्चा हुई। 1868 में पहली बार यहाँ पर कुछ ब्राह्मण विद्वानों ने माँग उठायी थी कि शिक्षा की भाषा हिंदी होनी चाहिए। माँग को तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर ने मान लिया था और नौकरियों में अभिजात्य तरीक़े से उर्दू भाषा को जो प्राथमिकता दी जाती थी उसे चुनौती मिली और हिन्दी को राजभाषा बनाने की दिशा में पहला कदम उसी वर्ष रखा गया। श्री अमित शाह ने कहा कि हिन्दी भाषा के उन्नयन और उसका व्याकरण बनाने की शुरुआत भी 1893 हुई में काशी नागरी प्रचारिणी सभा के साथ हुई। उन्होंने कहा कि हिंदी के उन्नयन, उसका शब्दकोष और व्याकरण का प्रारूप बनाने के उद्देश्य से ही  नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना हुई थी। श्री अमित शाह ने कहा कि हिंदी की पढ़ाई और पाठ्यक्रम तैयार करने की चिंता पंडित मदन मोहन मालवीय ने यहीं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में की थी।

श्री अमित शाह ने कहा कि हिंदी भाषा को लेकर विवाद खड़ा करने का प्रयास किया गया, लेकिन अब वह समय समाप्त हो गया है। उन्होंने कहा कि मैं बचपन से देखता था कि अगर अंग्रेजी बोलनी नहीं आती तो बच्चे के मन में एक हीनभावना पैदा हो जाती थी। आज मैं दावे से कहता हूं कि कुछ समय बाद अपनी भाषा में ना बोल सकने पर हीनभावना का अनुभव होगा क्योंकि देश के प्रधानमंत्री जी ने अपनी कृति से गौरव के साथ अपनी भाषाओं को दुनिया और देशभर के अंदर प्रस्थापित करने का काम किया है। उन्होने कहा कि शायद ही कोई प्रधानमंत्री होगा जिनको वैश्विक मंच पर इतना सम्मान मिला होगा जितना श्री नरेंद्र मोदी जी को मिला है। श्री नरेंद्र मोदी जी ने दुनियाभर में भारत की बात अपनी राजभाषा में रखकर राजभाषा के गौरव को बढ़ाया। उन्होंने कहा कि जो देश अपनी भाषा को खो देता है वह कालक्रम में अपनी सभ्यता, संस्कृति और अपने मौलिक चिंतन को भी खो देता है। जो देश अपने मौलिक चिंतन को खो देता है वे दुनिया को आगे बढ़ाने के लिए योगदान नहीं कर सकता। इसलिए हमारी भाषाओं को संभालकर रखना बहुत महत्वपूर्ण है।

श्री शाह ने कहा कि मैं चाहता हूं कि हमारी भाषा चिरंजीव बने और आगे बढ़े क्योंकि भाषा समाज और जीवन को आगे बढ़ाने, संस्कृति के धाराप्रवाह को आगे बढ़ाने और संस्कृति के धाराप्रवाह से उपजे  ज्ञान को दुनिया भर में फैलाने का एक बहुत महत्वपूर्ण स्रोत है। श्री अमित शाह ने कहा कि इसीलिए हमारे यहां भाषा में अक्षर शब्द का प्रयोग होता है, जिसका कभी क्षरण नहीं होता उसे अक्षर कहते हैं। महर्षि पाणिनि, महर्षि पतंजलि और महऋषि भर्तृहरि ने भाषाओं के लिए अनेक प्रकार की विधाओं को हमारे देश के अंदर जन्म दिया, आज भी कुछ लोग उन्हें संभाल कर आगे बढ़ा रहे हैं। उन्होंने कहा कि मुझे पूरा भरोसा है कि अगर एक बार देश की जनता आजादी के अमृत काल में मन बना ले कि हमारे देश का व्यवहार, बोलचाल, पत्रव्यवहार और शासन  स्वभाषा में चलना शुरू हो जाए तो महर्षि पतंजलि और पाणिनी हमें जो देकर गए हैं वह तुरंत पुनर्जीवित हो जाएगा।

केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि इस सम्मेलन के माध्यम से मैं देश भर के अभिभावकों से यह अपील और अनुरोध करता हूँ कि अपने बच्चों के साथ अपनी भाषा में बात करिए। बच्चे चाहे किसी भी माध्यम में पढ़ते हो, घर के अंदर उनसे अपनी भाषा में बात करिए और उनका आत्मविश्वास बढाइए। उसके मन से में अपनी भाषा बोलने के लिए जो झिझक है उसे निकाल दीजिए। उन्होंने कहा कि इससे भाषा का तो भला होगा मगर उससे ज्यादा भला बच्चों का होगा क्योंकि मौलिक चिंतन अपनी भाषा से ही आ सकता है। दूसरी भाषा रटा रटाया ज्ञान तो दे सकती है मगर ज्ञान को अर्जित करना और उसे आगे बढ़ाने की यात्रा मौलिक चिंतन से ही हो सकती है और मौलिक चिंतन स्वभाषा से ही प्राप्त हो सकता है।

केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा कि दुनिया में लगभग 6000 भाषाएं बोली जाती है लेकिन भाषाओं के बारे में हमारे देश पर ईश्वर और मां सरस्वती की कृपा है। उन्होंने कहा कि सबसे ज्यादा बोली जाने वाली और लिपिबद्ध भाषाएं अगर किसी एक देश में है तो वह भारत के अंदर है। हजारों साल का हमारा इतिहास और संस्कृति का धाराप्रवाह इनके अंदर समाहित है, हमें उसे आगे बढ़ाना है। श्री अमित शाह ने कहा कि भाषा जितनी सशक्त और समृद्ध होगी, संस्कृति और सभ्यता उतनी ही विस्तृत, सशक्त और चिरंजीव होगी। अगर हम अपनी संस्कृति को संभाल कर रखना चाहते हैं, इसे आगे ले जाना चाहते हैं तो हमें अपनी भाषाओं को मजबूत करना पड़ेगा। श्री अमित शाह ने कहा कि मैं युवाओं का आह्वान करना चाहता हूँ कि वे अपनी भाषा से जुड़ाव और लगाव तथा अपनी भाषा के उपयोग से कभी भी शर्म न रखें, क्योंकि अपनी भाषा गौरव का विषय है। उन्होंने कहा कि एक ज़माना था जब घबराहट होती थी, लेकिन अब एक ज़माना शुरू हो चुका है जब गौरव की अनुभूति होगी। घबराहट को गौरव में बदलना नरेन्द्र मोदी जी के शासनकाल की एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। स्वभाषा ही अभिव्यक्ति को सुनिश्चित करती है, चिंतन को गति देती है और नए परिमाणों की दिशा में सोचने को हमें प्रेरित करती है। स्वभाषा व्यक्ति के विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। अगर हमें आत्मसम्मान चाहिए तो हमें राजभाषा और स्वभाषा, दोनों को मज़बूत करना होगा।

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में बनी नई शिक्षा नीति का एक प्रमुख स्तंभ है राजभाषा और अन्य भारतीय भाषाओं का संरक्षण और संवर्धन। शिक्षा का मूल आधार सोचना और स्मरण करना है और ये स्वभाषा में सबसे अच्छे तरीक़े से होती हैं। अनुसंधान अपनी भाषा में सबसे अच्छा हो सकता है। हमारे देश के पिछड़ने का मूल कारण है कि हमारी पढ़ाई-लिखाई और अनुसंधान के विषय हमारी भाषाओं में नहीं होते थे। लेकिन मोदी जी द्वारा किया गया परिवर्तन आने वाले दिनों में भारत के भविष्य को बदलने वाला परिवर्तन होगा। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र तभी सफल हो सकता है जब प्रशासन की भाषा स्वभाषा और राजभाषा हो। आज गृह मंत्रालय में शत-प्रतिशत काम राजभाषा में होता है और बहुत सारे विभाग भी इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

केंद्रीय सहकारिता मंत्री ने कहा कि अमृत काल में हमने कुछ लक्ष्य तय किए हैं कि देश की शिक्षा, प्रशासन, न्याय व्यवस्था, तकनीक की भाषा स्थानीय और राजभाषा हो, जनसंचार और मनोरंजन की भाषा भी स्थानीय और राजभाषा हो। यह लक्ष्य इतने बड़े हैं कि हम आत्मविश्वास के साथ लोगों के सामने रखें तो जनमानस उसको तुरंत स्वीकार कर लेगा। राजभाषा और स्वभाषा के प्रचार के लिए किसी के साथ संघर्ष की जरूरत नहीं है, इसका बढ़ना अब नियति है। हमें उसमें उद्दीपक का काम करना है और इसे आगे ले जाने के लिए वाहक का काम करना है। यह पांच क्षेत्र हैं जहां भाषा को हमें मजबूत करना है उसके लिए मेरा आप सब से आग्रह है कि देश में इस प्रकार के वातावरण का निर्माण करने की दिशा में हम आगे बढ़ें।

SOURCE-PIB

PAPER-GS.2

 

साहेल संकट

2 नवंबर, 2021 को संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना प्रमुख ने चेतावनी दी कि अफ्रीका का साहेल क्षेत्र अस्थिर है क्योंकि असुरक्षा और अस्थिरता विकास की संभावनाओं को कम कर रही है और आतंकवादी हमलों के कारण हर दिन कई लोगों की जान जा रही है।

मुख्य बिंदु

  • संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना प्रमुख के अनुसार, लाखों लोग विस्थापित हैं, बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं और कोविड-19 महामारी के बीच कई लोगों के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल दुर्गम है।
  • उन्होंने G5 साहेल बल (G5 Sahel Force) पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक में बोलते हुए चिंताओं को रेखांकित किया।

G5 साहेल बल (G5 Sahel Force)

G5 साहेल फोर्स की स्थापना पांच अफ्रीकी देशों चाड, बुर्किना फासो, माली, नाइजर और मॉरिटानिया द्वारा की गई थी। विशाल साहेल क्षेत्र में बढ़ते आतंकवादी खतरे से लड़ने के लिए 2017 में इस बल का गठन किया गया था।

अफ्रीका आतंकवाद से सबसे ज्यादा प्रभावित क्यों है?

संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों के अनुसार, इस्लामिक स्टेट और अल-कायदा चरमपंथी समूहों के बढ़ते प्रभाव के बाद 2021 की पहली छमाही में अफ्रीका आतंकवाद से सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्र बन गया है।

साहेल (Sahel)

अफ्रीका का साहेल क्षेत्र उत्तर में सहारा और दक्षिण में सूडानी सवाना के बीच स्थित है। यह एक अर्ध-शुष्क जलवायु वाला क्षेत्र है और अटलांटिक महासागर और लाल सागर के बीच उत्तरी अफ्रीका के दक्षिण-मध्य अक्षांशों में फैला है। इस क्षेत्र में उत्तरी सेनेगल, दक्षिणी मॉरिटानिया, उत्तरी बुर्किना फासो, मध्य माली, अल्जीरिया के चरम दक्षिण, नाइजीरिया के चरम उत्तर, नाइजर, कैमरून के चरम उत्तर और मध्य अफ्रीकी गणराज्य, मध्य और दक्षिणी सूडान, चाड, दक्षिण सूडान के चरम उत्तर, इथियोपिया और इरिट्रिया के चरम उत्तर के क्षेत्र में शामिल हैं।

SOURCE-THE HINDU

PAPER-G.S.1PRE

 

संसद मैत्री संघ

भारत और श्रीलंका ने अपने “संसदीय मैत्री संघ” (Parliament Friendship Association) को पुनर्जीवित किया है जिसके लिए मंत्री चमल राजपक्षे को इसके अध्यक्ष के रूप में चुना गया है।

मुख्य बिंदु

  • इसे वर्तमान संसद के लिए पुनर्जीवित किया जा रहा है जो अगस्त 2020 में चुनी गई थी।
  • पुनरुद्धार कार्यक्रम में, श्रीलंका के विदेश मंत्री जी.एल. पेइरिस ने भारत और श्रीलंका के बीच “करीबी सभ्यतागत संबंधों” का उल्लेख किया।
  • यह सहयोग संसदीय आदान-प्रदान को “पुनर्जीवित” करने और दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने में मदद करेगा।

पृष्ठभूमि

11 नवंबर, 2021 को भारत से उर्वरक खरीदने का निर्णय लेने के बाद श्रीलंका ने भारत-श्रीलंका संसदीय मैत्री समूह का गठन किया। भारतीय संसद ने द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने के लिए मित्र राष्ट्रों के साथ संसदीय मित्रता समूह बनाने का प्रस्ताव रखा था।

भारत-श्रीलंका संसदीय मैत्री समूह

  • इस संघ में चीन के साथ घनिष्ठ संबंधों के बावजूद संबंधों को फिर से जीवंत करने के लिए श्रीलंकाई संसद के वरिष्ठ सदस्य शामिल हैं।
  • इस संघ की स्थापना श्रीलंका की 9वीं संसद के लिए की गई थी।

SOURCE-GK TODAY

PAPER-G.S.1 PRE

 

शक्ति 2021

भारतीय सेना मित्र राष्ट्रों के साथ संयुक्त प्रशिक्षण अभ्यासों की श्रृंखला में 15 नवंबर, 2021 से फ्रांसीसी सेना के साथ द्विवार्षिक प्रशिक्षण अभ्यास के छठे संस्करण का संचालन करेगी।

मुख्य बिंदु

  • भारत पहले ही 2021 में फ्रांस के साथ संयुक्त नौसेना अभ्यास और वायु सेना अभ्यास आयोजित कर चुका है।
  • शक्ति 2021 का आयोजन फ्रांस के फ्रीजस में 15 नवंबर से 26 नवंबर के बीच किया जाएगा।

अभ्यास का महत्व

‘शक्ति 2021’ अभ्यास संयुक्त राष्ट्र के जनादेश के तहत अर्ध-शहरी इलाके के आलोक में आतंकवाद विरोधी अभियानों पर ध्यान केंद्रित करेगा। यह दोनों देश की सेनाओं के बीच सैन्य सहयोग और अंतर-संचालन को बढ़ाने के उद्देश्य से आयोजित किया जाएगा।

शक्ति अभ्यास का अंतिम संस्करण

शक्ति अभ्यास का अंतिम संस्करण वर्ष 2019 में राजस्थान के महाजन फील्ड फायरिंग रेंज में विदेशी प्रशिक्षण नोड में आयोजित किया गया था।

गोरखा राइफल्स की टुकड़ी

इस अभ्यास में भारतीय सेना का प्रतिनिधित्व गोरखा राइफल्स की टुकड़ी कर रही है। इसकी एक समृद्ध विरासत है जो इसकी सैन्य वीरता और सर्वोच्च बलिदान से चिह्नित है। इसका 68 साल का गौरवशाली इतिहास है। 1971 के युद्ध में दल के योगदान को जम्मू और कश्मीर के थिएटर ऑनर और बैटल ऑनर शिंगो रिवर वैली द्वारा मान्यता दी गई थी।

फ्रांसीसी सेना की टुकड़ी

21st Marine Infantry Regiment इस अभ्यास में फ़्रांस की ओर से भाग लेगी। फ्रांसीसी सेना की टुकड़ी की स्थापना 1831 में ‘2nd Marine Regiment’ के नाम से की गई थी। बाद में 1901 में इसका नाम बदलकर 21st Marine Infantry Regiment कर दिया गया। इसका 120 वर्षों का एक शानदार इतिहास है। इस दल ने फ्रांसीसी सेना के सभी प्रमुख युद्धों में भाग लिया है।

SOURCE-GK TODAY

PAPER-G.S.2