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Current Affair 14 July 2021

Current Affairs – 14 July, 2021

स्वास्थ्य और औषधि के क्षेत्र में सहयोग पर भारत और डेनमार्क साम्राज्य के बीच समझौता ज्ञापन को मंजूरी

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने स्वास्थ्य और औषधि के क्षेत्र में सहयोग करने पर भारत गणराज्य के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय तथा डेनमार्क साम्राज्य के स्वास्थ्य मंत्रालय के बीच समझौता ज्ञापन (एमओयू) को अपनी मंजूरी दे दी है।

लाभः

यह द्विपक्षीय समझौता ज्ञापन संयुक्तपहलों और टेक्नोलॉजी विकास के माध्यम से भारत गणराज्य के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय तथा डेनमार्क साम्राज्य के स्वास्थ्य मंत्रालय के बीच सहयोग को प्रोत्साहित करेगा। यह समझौता ज्ञापन भारत और डेनमार्क के बीच द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत बनाएगा।

द्विपक्षीय समझौता ज्ञापन संयुक्त पहलों और स्वास्थ्य क्षेत्र में अनुसंधान के विकास के माध्यम से भारत गणराज्य के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय और डेनमार्क राज्य के स्वास्थ्य मंत्रालय के बीच सहयोग को प्रोत्साहित करेगा। इससे दोनों देशों के लोगों के सार्वजनिक स्वास्थ्य की स्थिति को बेहतरबनानेमें आसानी होगी।

डेनिश औपनिवेशिक साम्राज्य

डेनिश औपनिवेशिक साम्राज्य (डेनिश : डांसके कोलोनियर) और पूर्व डेनो-नॉर्वेजियन साम्राज्य (नार्वेजियन : डेनमार्क-नोर्गेस कोलोनियर) ये उन उपनिवेशों को दर्शाता है, जोकि डेनमार्क-नॉर्वे (1814 के बाद अकेले डेनमार्क) के पास 1536 से 1953 तक थी। इसका औपनिवेशिक साम्राज्य चार महाद्वीप (यूरोप, दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका और एशिया) पर फैला हुआ था।

कोपेनहेगन, वर्तमान डेनमार्क राजधानी, उस दौरान नॉर्वे और डेनमार्क को संयुक्त राजधानी थी। अधिकांश नॉर्वेजियाई आबादी जीविका के लिए, विश्वविद्यालय में पढ़ने, या शाही सेना में शामिल होने के लिए कोपेनहेगन में आ कर बस गये थे। अपने शीर्षकाल पर साम्राज्य का क्षेत्रफल 2,655,564.76 किमी2 था।

पतन

संसाधनों की कमी के कारण डेनिश औपनिवेशिक साम्राज्य का पतन हो गया। फ्रांस, ब्रिटेन और नीदरलैंड के साम्राज्यों ने जल्दी से इन उपनिवेशों का अधिग्रहण कर लिया। आखिरकार डेनमार्क ने भारत में अपने उपनिवेशों को ब्रिटेन को बेच दिया।

डेनमार्क का आधिकारिक नाम किंगडम ऑफ डेनमार्क यानी डेनमार्क साम्राज्य है। यहां पर संसदीय राजव्यवस्था है लेकिन ये एक गणराज्य ना होकर साम्राज्य है। महारानी मार्गरेथे 1972 से देश की शासक हैं। वही देश की मुखिया भी हैं। डेनमार्क में 1849 में संविधान लागू हुआ था। 1901 से यहां संसदीय व्यवस्था लागू हो गई। सरकार का प्रमुख प्रधानमंत्री होता है। वही संसद का नेता भी होता है।

डेनमार्क की जनसंख्या करीब 58 लाख है। डेनमार्क का क्षेत्रफल 42,933 वर्ग किलोमीटर है। लेकिन साथ में इसी साम्राज्य के ग्रीनलैंड और फैरो आइलैंड्स को शामिल कर लें तो ये 22,20,930 वर्ग किलोमीटर हो जाता है। साल 2014 में 13 सदस्य यूरोपीय संसद में भेजने वाला डेनमार्क इस बार 14 सदस्य भेजेगा।

डेनमार्क की राजनीतिक व्यवस्था

डेनमार्क भले ही एक साम्राज्य है लेकिन यहां राजशाही की शक्तियां सीमित है। राजा या रानी यहां बिना संसद की अनुमति के कोई फैसला नहीं कर सकते। डेनमार्क में संसद की एक सदनीय व्यवस्था है। 1953 तक यहां पर दो सदन हुआ करते थे। लेकिन इनको एक सदन बना दिया गया जिसे अब फोल्केटिंग के नाम से जाना जाता है। इसमें 179 सदस्य होते हैं।

175 सदस्य डेनमार्क और दो-दो सदस्य फैरो आइलैंड्स और ग्रीनलैंड से होते हैं। सभी सदस्यों का कार्यकाल चार साल का होता है। संसद सदस्यों का चुनाव समानुपातिक प्रतिनिधित्व से होता है। जिस पार्टी को चुनाव में जितने प्रतिशत वोट मिलते हैं उसे उतनी सीट मिल जाती हैं। इसके लिए कम से कम दो फीसदी वोट पाना जरूरी होता है। 135 सीटों को संसदीय क्षेत्रों में बांट दिया जाता है जबकि 40 सीटें पूरे देश का प्रतिनिधित्व करती हैं।

डेनमार्क की व्यवस्था में किसी एक पार्टी को बहुमत नहीं मिल पाता है। ऐसे में यहां पर हमेशा गठबंधन सरकार ही बनती है। इसका फायदा यह है कि बड़ी पार्टियों के साथ छोटी पार्टियों को भी सत्ता में हिस्सेदारी मिल जाती है। इससे अल्प संख्या वाले वोटों की आवाज भी संसद और सरकार में होती है।

प्रमुख राजनीतिक पार्टियां

डेनमार्क में भारत की तरह दो से अधिक पार्टियों की राजनीतिक व्यवस्था है। इनमें सबसे ज्यादा पुरानी कजर्वेटिव पीपुल्स पार्टी, मध्यमार्गी सोशल डेमोक्रेट्स, उदार दक्षिणपंथी वेंस्टर, समाजवादी डेनिश सोशल लिबरल, धुर दक्षिणपंथी डेनिश पीपुल्स पार्टी और वामपंथी रेड-ग्रीन अलायंस पार्टियां प्रमुख हैं। फिलहाल वेंस्टर पार्टी के लार्स लूके रासमूसेन प्रधानमंत्री हैं।

SOURCE-PIB

 

अन्य पिछड़ा वर्ग के भीतर उप-वर्गीकरण से जुड़ेमुद्दों

माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने आज केन्द्रीय सूची में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के भीतर उप-वर्गीकरण से जुड़ेमुद्दों पर गौर करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 340 के तहत गठित आयोग के कार्यकाल में 31 जुलाई 2021 से आगे 6 महीने के लिए और 31 जनवरी 2022 तक प्रभावी रहने वाले ग्यारहवें विस्तार को मंजूरी दे दी है।

लाभ

इस “आयोग” के कार्यकाल और इसके संदर्भ की शर्तों में प्रस्तावित विस्तार इसे विभिन्न हितधारकों के साथ परामर्श के बाद अन्य पिछड़ा वर्ग के उप-वर्गीकरण से जुड़े मुद्दों पर एक व्यापक रिपोर्ट प्रस्तुत करने में सक्षम बनाएगा।

कार्यान्वयन संबंधी कार्यक्रम :

इस “आयोग” के कार्यकाल को 31 जुलाई 2021 से आगे और 31 जनवरी 2022 तक बढ़ाने संबंधी आदेश को राष्ट्रपति के अनुमोदन के बाद अधिसूचित किया जाएगा।

अन्य पिछड़ा वर्ग

अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) एक वर्ग है, यह सामान्य वर्ग यानी जनरल में ही सम्मिलित होता है पर इसमें आने वाली जातियाँ गरीबी और शिक्षा के रूप में पिछड़ी होती हैं यह भी सामान्य वर्ग का भाग है जो जातियाँ वर्गीकृत करने के लिए भारत सरकार द्वारा प्रयुक्त एक सामूहिक शब्द है। यह अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के साथ-साथ भारत की जनसंख्या के कई सरकारी वर्गीकरण में से एक है।

भारतीय संविधान में ओबीसी सामाजिक एवं शैक्षणिक पिछड़ा वर्ग (SEBC) के रूप में वर्णित किया जाता है, और भारत सरकार उनके सामाजिक और शैक्षिक विकास को सुनिश्चित करने के लिए हैं – उदाहरण के लिए, ओबीसी सार्वजनिक क्षेत्र के रोजगार और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में 27% आरक्षण के हकदार हैं। जातियों और समुदायों के सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक कारकों के आधार पर जोड़ा या हटाया जा सकता है और इनको सामाजिक न्याय और अधिकारिता भारतीय मंत्रालय द्वारा बनाए रखा ओबीसी की सूची, गतिशील है। 1985 तक, पिछड़ा वर्ग के मामलों में गृह मंत्रालय में पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ के बाद देखा गया था। कल्याण की एक अलग मंत्रालय अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों से संबंधित मामलों के लिए भाग लेने के लिए (सामाजिक एवं अधिकारिता मंत्रालय को) 1985 में स्थापित किया गया था। अन्य पिछड़े वर्गों के सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण से संबंधित कार्यक्रमों के कार्यान्वयन, और अन्य पिछड़ा वर्ग, पिछड़ा वर्ग के लिए राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग वित्त एवं विकास निगम और राष्ट्रीय आयोग के कल्याण के लिए गठित दो संस्थानों से संबंधित मामले है ‘दिसंबर 2018 में ओबीसी उप-जातियों के उप-वर्गीकरण के लिए आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार, अन्य पिछड़ा वर्गों और ओबीसी के रूप में वर्गीकृत सभी उप-जातियों के 25 फीसदी जातियां ही ओबीसी आरक्षण का 97% फायदा उठा रही हैं, जबकि कुल ओबीसी जातियों में से 37% में शून्य प्रतिनिधित्व है।

मंडल आयोग

1 जनवरी 1979 को दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग स्थापित करने का निर्णय राष्ट्रपति द्वारा अधिकृत किया गया था। आयोग को लोकप्रिय मंडल आयोग के रूप में जाना जाता है, इसके अध्यक्ष बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल ने दिसंबर 1980 में एक रिपोर्ट पेश की, जिसमें कहा गया है कि ओबीसी की जनसंख्या, जिसमें हिंदुओं और गैर हिंदुओं दोनों शामिल हैं, मंडल आयोग के अनुसार कुल आबादी का लगभग 52% है। 1979 -80 में स्थापित मंडल आयोग की प्रारंभिक सूची में पिछड़ी जातियों और समुदायों की संख्या 3, 743 थी। पिछड़ा वर्ग के राष्ट्रीय आयोग के अनुसार 2006 में ओबीसी की पिछड़ी जातियों की संख्या अब 5,013 (अधिकांश संघ राज्य क्षेत्रों के आंकड़ों के बिना) बढ़ी है। मंडल आयोग ने ओबीसी की पहचान करने के लिए 11 संकेतक या मानदंड का विकास किया, जिनमें से चार आर्थिक थे।

ओबीसी का उप-वर्गीकरण

अक्टूबर 2017 में, भारत के राष्ट्रपति राम नाथ कोविन्द ने भारतीय उच्चतम न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जी रोहिणी की अगुवाई में,भारतीय संविधान के अनुच्छेद 340 के तहत पांच सदस्यीय आयोग को ओबीसी उप-वर्गीकरण के विचार को तलाशने के लिए अधिसूचित किया। राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग के आयोग ने 2011 में इसकी सिफारिश की थी और एक स्थायी समिति ने भी इसे दोहराया था। समिति के पास तीन बिंदु जनादेश है :

केन्द्रीय ओबीसी सूची के तहत आने वाले विभिन्न जातियों और समुदायों के बीच “आरक्षण के लाभों के असमान वितरण की सीमा” की जांच करना।

वास्तविक उप-वर्गीकरण के लिए तंत्र, मापदंड और मापदंडों को पूरा करने के लिए वास्तविक ओबीसी आरक्षण 27% रहेगा और इसके भीतर समिति को फिर से व्यवस्था करना होगा।

ओबीसी की केंद्रीय सूची के लिए किसी भी दोहराव को हटाकर आदेश लाना

समिति को अपने संविधान के 12 हफ्तों में रिपोर्ट देना होगा। उत्तर प्रदेश में निम्न ओबीसी लगभग 35% आबादी का निर्माण करते हैं। ओबीसी उप-वर्गीकरण राज्य स्तर पर 11 राज्यों : पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, झारखंड, बिहार, जम्मू क्षेत्र और हरियाणा, और पुडुचेरी के केंद्रशासित प्रदेशों से पहले ही लागू किए जा चुके हैं। केंद्रीय ओबीसी सूची के उप-वर्गीकरण एक ऐसा विचार है जो लंबे समय से अतिदेय रहा है।

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के उप-वर्गीकरण के मुद्दे की जांच के लिए संविधान के अनुच्छेद 340 के तहत एक आयोग की स्थापना के प्रस्ताव को मंजूरी दी। ओबीसी की क्रीमी लेयर 6 से बढ़ाकर 8 लाख रुपये की गई।आयोग की अवधि 31 मई 2019 तक बढ़ा दी गई है। इसकी रिपोर्ट में कहा गया है कि 97% ओबीसी आरक्षण के प्रमुख लाभार्थियों में कुर्मी, यादव, जाट (भरतपुर और ढोलपुर जिले के अलावा राजस्थान की जाट केंद्रीय ओबीसी सूची में हैं), सैनी, थेवर, एझावा और वोक्कलिगा जातियां है।

SOURCE-PIB

 

राष्ट्रीय आयुष मिशन

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने राष्ट्रीय आयुष मिशन (एनएएम) को केंद्र प्रायोजित योजना के रूप में 01 अप्रैल 2021 से 31 मार्च 2026 तक 4607.30 करोड़ रुपये (केंद्रीय हिस्से के रूप में 3,000 करोड़ रुपये और राज्य के हिस्से के रूप में 1607.30 करोड़ रुपये) के वित्तीय व्यय के साथ जारी रखने को मंजूरी दे दी है। आयुष मिशन 15 सितंबर 2014 को शुरू किया गया था।

भारत के पास आयुर्वेद, सिद्ध, सोवा-रिग्पा, यूनानी और साथ ही होम्योपैथी (एएसयू एंड एच) जैसी पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों का प्रतिनिधित्व करने वाली एक अद्वितीय विरासत है जो निवारक, प्रोत्साहक और उपचारात्मक स्वास्थ्य सेवा के लिए ज्ञान का खजाना है। भारतीय चिकित्सा पद्धतियों की विशेषताएं यानी उनकी विविधता एवं लचीलापन;  सुगम्यता;  वहन योग्य, आम जनता के एक बड़े वर्ग द्वारा व्यापक स्वीकृति; तुलनात्मक रूप से कम लागत और बढ़ते आर्थिक मूल्य, उन्हें वैसे स्वास्थ्य सेवा प्रदाता बनने की क्षमताओं से भरती हैं जिनकी हमारे एक बड़े वर्ग को जरूरत है।

केंद्र प्रायोजित योजना, राष्ट्रीय आयुष मिशन को आयुष मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा सस्ती आयुष सेवाएं प्रदान करने के उद्देश्य से लागू किया जा रहा है। इसका उद्देश्य आयुष अस्पतालों और औषधालयों के उन्नयन के माध्यम से व्यापक पहुंच के साथ, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी), सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) और जिला अस्पतालों (डीएच) में आयुष सुविधाओं को एक साथ मुहैया करना, आयुष शैक्षणिक संस्थानों के उन्नयन के माध्यम से राज्य स्तर पर संस्थागत क्षमता को मजबूत करना, 50 बिस्तरों वाले एकीकृत आयुष अस्पताल की स्थापना, आयुष सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम और 12,500 आयुष स्वास्थ्य एवं वेलनेस सेंटर का संचालन करना है। इनके पीछे मकसद आयुष सिद्धांतों और प्रथाओं के आधार पर एक समग्र वेलनेस मॉडल की सेवाएं प्रदान करना है ताकि रोग के बोझ को कम कर और जेब पर पड़ने वाले खर्च को कम करके “स्व-देखभाल” के लिए जनता को सशक्त बनाया जा सके।

मिशन देश में विशेष रूप से पिछड़े और दूर-दराज के क्षेत्रों में आयुष स्वास्थ्य सेवाएं/शिक्षा प्रदान करने के लिए राज्य/केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारों के प्रयासों का समर्थन करके स्वास्थ्य सेवाओं की खामियों को दूर कर रहा है। एनएएम के तहत ऐसे क्षेत्रों की विशिष्ट जरूरतों और उनकी वार्षिक योजनाओं में उच्च संसाधनों के आवंटन पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

मिशन से निम्नलिखित परिणाम मिलने की उम्मीद है :

  1. आयुष सेवाओं एवं दवाओं की बेहतर उपलब्धता एवं प्रशिक्षित श्रमबल प्रदान कर बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के माध्यम से आयुष स्वास्थ्य सेवाओं तक बेहतर पहुंच।
  2. बेहतर सुविधाओं से लैस बहुत सारे आयुष शिक्षण संस्थानों के माध्यम से आयुष शिक्षा में सुधार।
  3. आयुष स्वास्थ्य सेवा प्रणालियों का इस्तेमाल करते हुए लक्षित सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों के माध्यम से संचारी/गैर-संचारी रोगों को कम करने पर ध्यान केंद्रित।

राष्ट्रीय आयुष मिशन क्या है?

एनएएम का मूल उद्देश्य लागत प्रभावी आयुष सेवाओं के माध्यम से आयुष चिकित्सा पद्धतियों को बढ़ावा देना, शिक्षण प्रणाली को सुदृढ करना, आयुर्वेद, सिद्ध, यूनानी और होम्योपैथी (एएसयू एवं एच) औषधों के गुणवत्ता नियंत्रण के प्रवर्तन को सुविधाजनक बनाना और एएसयू एवं एच की कच्ची सामग्री सतत रूप से उपलब्ध कराना है।

राष्ट्रीय आयुष मिशन की शुरुआत कब हुई?

राष्ट्रीय आयुष मिशन की शुरुआत 15 सितंबर, 2014 को हुई थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाले केंद्रीय मंत्रिमंडल ने राष्ट्रीय आयुष मिशन (National AYUSH Mission NAM) को प्रारम्भ करने की अनुमति 15 सितंबर, 2014 को प्रदान की।

आयुष मंत्रालय की स्थापना कब और किसके द्वारा हुई थी?

आयुष मंत्रालय को 9 नवम्बर 2014 को आयुष विभाग को विस्तृत कर बनाया गया था। आयुष मंत्रालय ने “आयुष आपके द्वार” नाम का एक योजना 2018 में बनाया, जिसके तहत आयुर्वेदिक तथा यूनानी अस्पताल के पांच किलोमीटर के दायरे में आने वाले गाँवो में निःशुल्क चिकित्सा कैंप लगाए जा रहे है। संस्कृत में आयुष का अर्थ जीवन होता है।

कौन सी चिकित्सा प्रणाली भारत में उत्पन्न हुई?

आयुर्वेद-मूल अवधारणाएं

आयुर्वेद भारतीय उपमहाद्वीप की एक प्राचीन चिकित्सा प्रणाली है। ऐसा माना जाता है कि यह प्रणाली भारत में 5000 साल पहले उत्पन्न हुई थी। शब्द आयुर्वेद दो संस्कृत शब्दों ‘आयुष’ जिसका अर्थ जीवन है तथा ‘वेद’ जिसका अर्थ ‘विज्ञान’ है, से मिलकर बना है’ अतः इसका शाब्दिक अर्थ है ‘जीवन का विज्ञान’।

SOURCE-PIB

 

जून, 2021 में भारत का थोक मूल्य सूचकांक

उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग के आर्थिक सलाहकार के कार्यालय ने जून, 2021 (अनंतिम) और मार्च, 2021 (अंतिम) के लिए भारत में थोक मूल्य सूचकांक संख्याएं जारी कर दी हैं। थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) के अनंतिम आंकड़े देश भर में चयनित विनिर्माण इकाइयों से प्राप्त आंकड़ों के साथ संकलित किए जाते हैं और हर महीने की 14 तारीख (या अगले कार्य दिवस) को जारी किए जाते हैं। 10 सप्ताह के बाद, सूचकांक को अंतिम रूप दिया गया और अंतिम आंकड़े जारी किए गए हैं।

मुद्रास्फीति

जून, 2020 की 1.81 फीसदी की तुलना में जून, 2021 में मुद्रास्फीति की वार्षिक दर 12.07(अनंतिम) रही। जून2021 में मुद्रास्फीति की उच्च दर का कारण मुख्य रूप से कच्चे पेट्रोलियम, खनिज तेल, पेट्रोल, डीजल, नेफ्था, फर्नेस ऑयल आदि और विनिर्मित उत्पादों की कीमतों में पिछले वर्ष के इसी महीने की तुलना में वृद्धि होना रहा। पिछले तीन महीनों में डब्ल्यूपीआई सूचकांक और मुद्रास्फीति के घटकों में वार्षिक परिवर्तन नीचे दिया गया है।

सभी जिंस/प्रमुख समूह भारांक (%) अप्रैल- 21 (एफ) जून-21 (पी) जून-21 (पी)
सूचकांक मुद्रास्‍फीति सूचकांक मुद्रास्‍फीति सूचकांक मुद्रास्‍फीति
सभी जिंस 100.0 132.0 10.74 132.7 12.94 133.7 12.07
I. प्राथमिक वस्‍तुएं 22.6 151.5 9.94 150.5 9.61 151.8 7.74
II.ईंधन और बिजली 13.2 108.9 21.27 110.5 37.61 113.7 32.83
III. विनिर्मित उत्‍पाद 64.2 129.9 9.44 131.0 10.83 131.5 10.88
खाद्य सूचकांक 24.4 158.8 7.52 158.6 8.11 158.6 6.66

प्राथमिक वस्तुएं (भारांक 22.62 प्रतिशत)

इस प्रमुख समूह का सूचकांक जून, 2021 के दौरान घटकर 0.86 % से 150.8अंक (अनंतिम) रहा जो जून2021 में 150.5(अनंतिम) था। जून, 2021 (मई, 2021 की तुलना में) में गैर-खाद्य वस्तुओं की कीमतों में 2.55%, कच्चे पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस में 2.33% और खाद्य पदार्थों की कीमतों में 0.31% की गिरावट आई।

ईंधन और बिजली (भारित 13.15%)

इस प्रमुख समूह का सूचकांक जून, 2021 में 2.90% बढ़कर 113.7(अनंतिम) हो गया, जो अप्रैल, 2021 के महीने में 110.5(अनंतिम) था। मई, 2021 की तुलना में जून, 2021 में खनिज तेलों की कीमतों में 4.91% की वृद्धि हुई।

विनिर्मित उत्पाद (भारांक 64.23%)

जून, 2021 में इस प्रमुख समूह का सूचकांक 0.38 % बढ़कर 131.5 (अनंतिम) हो गया जो मई में 131.0 था। विनिर्मित उत्पादों के 22 एनआईसी दो-अंकीय समूहों में से, 11 समूहों की कीमतों में मई, 2021 की तुलना में जून, 2021 के दौरान बढ़ोत्तरी देखी गई जबकि इसी अवधि के दौरान 8 समूहों में गिरावट दर्ज की गई और तीन समूह की कीमत अपरिवर्तित रही। कीमतों में वृद्धि का योगदान मुख्य रूप से फार्मास्यूटिकल्स, औषधीय रसायन और वनस्पति उत्पादों का निर्माण; बुनियादी धातु; मशीनरी और उपकरण को छोड़कर गढ़े हुए धातु उत्पाद; लकड़ी और लकड़ी और कॉर्क और अन्य गैर-धातु खनिज उत्पादों ने दिया है। चार समूहों ने कीमतों में कमी देखी है, तंबाकू उत्पाद; मोटर वाहन, ट्रेलर और अर्ध-ट्रेलर; कागज और कागज उत्पाद; खाद्य उत्पाद; और रबर और प्लास्टिक उत्पादशामिल थे।

डब्ल्यूपीआई खाद्य सूचकांक (भारित 24.38%)

खाद्य सूचकांक, जिसमें प्राथमिक वस्तु% समूह की ‘खाद्य वस्तुएं और निर्मित उत्पाद समूह के ‘खाद्य उत्पाद’ शामिल हैं, इनका यह सचूकांक जो मई 2021 की तुलना में जून 2021 में 158.6 अपरिवर्तित रहा। डब्ल्यूपीआई खाद्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति की दर मई, 2021 में 8.11% से घटकर जून, 2021 में 6.66% हो गई।

अप्रैल, 2021 का अंतिम सूचकांक (आधार वर्ष: 2011-12=100)

मार्च, 2021 में सभी वस्तुओं का अंतिम डब्ल्यूपीआई और मुद्रास्फीति दर (आधार : 2011-12 = 100) क्रमशः 132.0 और 10.74% थी। जून, 2021 मे विभिन्न जिंस समूहों का अखिल भारतीय थोक मूल्य सूचकांक और मुद्रास्फीति की दरों का विवरण अनुलंग्नक I में दिया गया है। पिछले छह माह के दौरान विभिन्न कमोडिटी समूहों की डब्ल्यूपीआई पर आधारित मुद्रास्फीति की वार्षिक दर (वर्ष-दर-वर्ष) अनुलग्नंक II में दी गई है। पिछले छह माह के दौरान विभिन्न कमोडिटी समूहों का डब्ल्यूपीआई सूचकांक अनुलंग्नक III में दिया गया है।

होलसेल प्राइस इंडेक्स या थोक मूल्य सूचकांक का मतलब उन कीमतों से होता है, जो थोक बाजार में एक कारोबारी दूसरे कारोबारी से वसूलता है। ये कीमतें थोक में किए गए सौदों से जुड़ी होती हैं। इसकी तुलना में कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) या उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आम ग्राहकों द्वारा दी जाने वाली कीमतों पर आधारित होता है।

थोक मूल्य सूचकांक कौन जारी करता है?

उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग के आर्थिक सलाहकार के कार्यालय ने अप्रैल, 2020 के लिए थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) जारी किया है।

थोक मूल्य सूचकांक का आधार वर्ष कौन सा है?

डब्ल्यूपीआई की गणना के लिए आधार वर्ष 2004-05 से पहले था, लेकिन इसे अन्य आर्थिक संकेतकों के साथ संरेखित करने के लिए, आधार वर्ष को 2011-12 में नवीनीकरण किया गया था।

WPI कौन जारी करता है?

थोकमूल्य सूचकांक (Wholesale Price Index-WPI)

यह भारत में सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाने वाला मुद्रास्फीति संकेतक (Inflation Indicator) है। इसे वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय (Ministry of Commerce and Industry) के आर्थिक सलाहकार (Office of Economic Adviser) के कार्यालय द्वारा प्रकाशित किया जाता है।

SOURCE-PIB

 

RBI Retail Direct योजना

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने 12 जुलाई, 2021 को “RBI Retail Direct Facility” योजना शुरू की।

खुदरा प्रत्यक्ष योजना (Retail Direct Scheme) क्या है?

  • RBI की खुदरा प्रत्यक्ष योजना (Retail Direct Scheme)व्यक्तिगत निवेशकों द्वारा सरकारी प्रतिभूतियों (G-Sec) में निवेश की सुविधा के लिए एक-स्टॉप समाधान है।
  • इस योजना के तहत, खुदरा निवेशकों को RBI के साथ Retail Direct Gilt Account (RDG Account) खोलने और बनाए रखने की सुविधा प्रदान की जाएगी।
  • यह सुविधा सरकारी प्रतिभूतियों में खुदरा भागीदारी बढ़ाने की दिशा में जारी प्रयासों के हिस्से के रूप में शुरू की गई थी।
  • इस योजना को शुरू करने की घोषणा RBI द्वारा 5 फरवरी, 2021 के विकास और नियामक नीतियों के वक्तव्य (Statement of Developmental and Regulatory Policies) में की गई थी।
  • इसे प्राथमिक और द्वितीयक सरकारी प्रतिभूति बाजार में ऑनलाइन पहुंच द्वारा खुदरा निवेशकों की पहुंच में आसानी में सुधार लाने के लिए शुरू किया गया था।
  • इस योजना के क्रियान्वयन की तिथि अभी घोषित नहीं की गई है।

योजना की विशेषताएं

  • इस योजना के तहत, खुदरा निवेशकों (व्यक्तियों) के पास आरबीआई के साथ ‘खुदरा प्रत्यक्ष गिल्ट खाता’ (RDG खाता) खोलने और बनाए रखने का विकल्प होगा।
  • इस योजना के लिए उपलब्ध कराए गए ‘ऑनलाइन पोर्टल’ का उपयोग करके आरडीजी खाता खोला जा सकता है।
  • ऑनलाइन पोर्टल पंजीकृत यूजर्स को सरकारी प्रतिभूतियों के प्राथमिक निर्गमन और NDS-OM तक पहुंच जैसी सुविधाएं भी प्रदान करेगा।
  • आरबीआई के साथ खाता खोलने और बनाए रखने पर कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा।

जी-सेक (G-sec) क्या है?

जी-सेक सरकार द्वारा पैसा उधार लेने के लिए जारी किए गए ऋण साधन हैं। ये उपकरण कर-मुक्त नहीं हैं। वे निवेश का सबसे सुरक्षित रूप हैं क्योंकि उन्हें सरकार का समर्थन प्राप्त है। सरकारी प्रतिभूतियों से जुड़े डिफ़ॉल्ट का जोखिम लगभग शून्य है। हालांकि, वे ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव के अधीन हैं। इसे निम्नलिखित अवधियों के लिए जारी किया जा सकता है :

  1. अल्पावधि – 91-दिन, 182-दिन और 364 दिनों के लिए ट्रेजरी बिल
  2. लंबी अवधि – एक वर्ष या उससे अधिक की परिपक्वता अवधि के साथ बांड।

SOURCE-GK TODAY

 

मरम्मत का अधिकारआंदोलन

अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाईडेन ने संघीय व्यापार आयोग के लिए एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए हैं जो निर्माताओं द्वारा उपभोक्ताओं की अपनी शर्तों पर अपने गैजेट की मरम्मत करने की क्षमता को सीमित करने वाले प्रतिबंधों को रोकता है। अमेरिका से पहले, यूनाइटेड किंगडम ने भी टीवी और वाशिंग मशीन जैसे दैनिक उपयोग के गैजेट्स को खरीदना और मरम्मत करना आसान बनाने के लिए राइट-टू-रिपेयर नियम पेश किए थे।

मरम्मत का अधिकार आन्दोलन (right to repair movement) क्या है?

मरम्मत का अधिकार आन्दोलन 1950 के दशक में कंप्यूटर युग की शुरुआत में ही शुरू हुआ था है। तब से, दुनिया भर के कार्यकर्ता और संगठन ‘मरम्मत के अधिकार के आंदोलन’ के तहत उपभोक्ताओं के अपने इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य उत्पादों की मरम्मत करने में सक्षम होने के अधिकार की मांग कर रहे हैं। यह आंदोलन कंपनियों को स्पेयर पार्ट्स, टूल्स और ग्राहकों के लिए उपलब्ध उपकरणों की मरम्मत करने के तरीके के बारे में जानकारी प्राप्त करने का प्रयास करता है।

पृष्ठभूमि

कार्यकर्ताओं ने यह तर्क देकर इस आंदोलन की शुरुआत की कि ये इलेक्ट्रॉनिक निर्माता ‘नियोजित अप्रचलन’ (planned obsolescence) की संस्कृति को प्रोत्साहित कर रहे हैं। इसका मतलब है, उपकरणों को सीमित समय तक चलने और बदलने के लिए डिज़ाइन किया गया है। इससे पर्यावरण पर अत्यधिक दबाव पड़ता और प्राकृतिक संसाधनों का अपव्यय होता है।

विनिर्माण चिंता का कारण क्यों है?

इलेक्ट्रॉनिक उपकरण का निर्माण एक अत्यधिक प्रदूषणकारी प्रक्रिया है। यह जीवाश्म ईंधन जैसे ऊर्जा के प्रदूषणकारी स्रोतों का उपयोग करता है, जो पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, एक आईफोन बनाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली खनन और निर्माण सामग्री अपने पूरे जीवन चक्र में वातावरण में हीट-ट्रैपिंग उत्सर्जन में लगभग 83% योगदान देती है। औसत वाशिंग मशीन के लिए ऐसा उत्सर्जन लगभग 57% है।

इलेक्ट्रॉनिक निर्माताओं की प्रतिक्रिया

एप्पल, माइक्रोसॉफ्ट, अमेज़न और टेस्ला जैसी कंपनियां, मरम्मत के अधिकार के आन्दोलन खिलाफ पैरवी कर रही हैं, यह तर्क देते हुए कि “अपनी बौद्धिक संपदा को तीसरे पक्ष की मरम्मत सेवाओं के लिए खोलना” या “शौकिया मरम्मत करने वालों” से शोषण होगा। यह उनके उपकरणों की सुरक्षा और सुरक्षा को भी प्रभावित करेगा।

SOURCE-GK TODAY

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