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Current Affair 23 June 2021

23 June Current Affairs

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि अर्पित की है।

एक ट्वीट में प्रधानमंत्री ने कहा है, “मैं डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का उनकी पुण्यतिथि पर स्मरण कर रहा हूं। उनके उच्च आदर्श, विराट विचार और लोगों की सेवा करने की उनकी प्रतिबद्धता हमें लगातार प्रेरित करती रहेगी। राष्ट्रीय एकता के लिये उनके प्रयासों को कभी भुलाया नहीं जा सकता।”

डॉ॰ श्यामा प्रसाद मुखर्जी (जन्म : 6 जुलाई 1901 – मृत्यु : 23 जून 1953) शिक्षाविद्, चिन्तक और भारतीय जनसंघ के संस्थापक थे।

6 जुलाई 1901 को कलकत्ता के अत्यन्त प्रतिष्ठित परिवार में डॉ॰ श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी का जन्म हुआ। उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे एवं शिक्षाविद् के रूप में विख्यात थे। डॉ॰ मुखर्जी ने 1917 में मैट्रिक किया तथा 1921 में बी०ए० की उपाधि प्राप्त की। 1923 में लॉ की उपाधि अर्जित करने के पश्चात् वे विदेश चले गये और 1926 में इंग्लैण्ड से बैरिस्टर बनकर स्वदेश लौटे। अपने पिता का अनुसरण करते हुए उन्होंने भी अल्पायु में ही विद्याध्ययन के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलताएँ अर्जित कर ली थीं। 33 वर्ष की अल्पायु में वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति बने। इस पद पर नियुक्ति पाने वाले वे सबसे कम आयु के कुलपति थे। एक विचारक तथा प्रखर शिक्षाविद् के रूप में उनकी उपलब्धि तथा ख्याति निरन्तर आगे बढ़ती गयी।

राजनीतिक जीवन

डॉ॰ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने स्वेच्छा से अलख जगाने के उद्देश्य से राजनीति में प्रवेश किया। डॉ॰ मुखर्जी सच्चे अर्थों में मानवता के उपासक और सिद्धान्तवादी थे। उन्होने बहुत से गैर कांग्रेसी हिन्दुओं की मदद से कृषक प्रजा पार्टी से मिलकर प्रगतिशील गठबन्धन का निर्माण किया। इस सरकार में वे वित्तमन्त्री बने। इसी समय वे सावरकर के राष्ट्रवाद के प्रति आकर्षित हुए और हिन्दू महासभा में सम्मिलित हुए।

मुस्लिम लीग की राजनीति से बंगाल का वातावरण दूषित हो रहा था। वहाँ साम्प्रदायिक विभाजन की नौबत आ रही थी। साम्प्रदायिक लोगों को ब्रिटिश सरकार प्रोत्साहित कर रही थी। ऐसी विषम परिस्थितियों में उन्होंने यह सुनिश्चित करने का बीड़ा उठाया कि बंगाल के हिन्दुओं की उपेक्षा न हो। अपनी विशिष्ट रणनीति से उन्होंने बंगाल के विभाजन के मुस्लिम लीग के प्रयासों को पूरी तरह से नाकाम कर दिया। 1942 में ब्रिटिश सरकार ने विभिन्न राजनैतिक दलों के छोटे-बड़े सभी नेताओं को जेलों में डाल दिया।

डॉ॰ मुखर्जी इस धारणा के प्रबल समर्थक थे कि सांस्कृतिक दृष्टि से हम सब एक हैं। इसलिए धर्म के आधार पर वे विभाजन के कट्टर विरोधी थे। वे मानते थे कि विभाजन सम्बन्धी उत्पन्न हुई परिस्थिति ऐतिहासिक और सामाजिक कारणों से थी। वे मानते थे कि आधारभूत सत्य यह है कि हम सब एक हैं। हममें कोई अन्तर नहीं है। हम सब एक ही रक्त के हैं। एक ही भाषा, एक ही संस्कृति और एक ही हमारी विरासत है। परन्तु उनके इन विचारों को अन्य राजनैतिक दल के तत्कालीन नेताओं ने अन्यथा रूप से प्रचारित-प्रसारित किया। बावजूद इसके लोगों के दिलों में उनके प्रति अथाह प्यार और समर्थन बढ़ता गया। अगस्त, 1946 में मुस्लिम लीग ने जंग की राह पकड़ ली और कलकत्ता में भयंकर बर्बरतापूर्वक अमानवीय मारकाट हुई। उस समय कांग्रेस का नेतृत्व सामूहिक रूप से आतंकित था।

जनसंघ की स्थापना

ब्रिटिश सरकार की भारत विभाजन की गुप्त योजना और षड्यन्त्र को एक कांग्रेस के नेताओं ने अखण्ड भारत सम्बन्धी अपने वादों को ताक पर रखकर स्वीकार कर लिया। उस समय डॉ॰ मुखर्जी ने बंगाल और पंजाब के विभाजन की माँग उठाकर प्रस्तावित पाकिस्तान का विभाजन कराया और आधा बंगाल और आधा पंजाब खण्डित भारत के लिए बचा लिया। गान्धी जी और सरदार पटेल के अनुरोध पर वे भारत के पहले मन्त्रिमण्डल में शामिल हुए। उन्हें उद्योग जैसे महत्वपूर्ण विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गयी। संविधान सभा और प्रान्तीय संसद के सदस्य और केन्द्रीय मन्त्री के नाते उन्होंने शीघ्र ही अपना विशिष्ट स्थान बना लिया। किन्तु उनके राष्ट्रवादी चिन्तन के चलते अन्य नेताओं से मतभेद बराबर बने रहे। फलत: राष्ट्रीय हितों की प्रतिबद्धता को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता मानने के कारण उन्होंने मन्त्रिमण्डल से त्यागपत्र दे दिया। उन्होंने एक नई पार्टी बनायी जो उस समय विरोधी पक्ष के रूप में सबसे बड़ा दल था। अक्टूबर, 1951 में भारतीय जनसंघ का उद्भव हुआ।

संसद में

डॉ॰ मुखर्जी जम्मू कश्मीर को भारत का पूर्ण और अभिन्न अंग बनाना चाहते थे। उस समय जम्मू कश्मीर का अलग झण्डा और अलग संविधान था। वहाँ का मुख्यमन्त्री (वजीरे-आज़म) अर्थात् प्रधानमन्त्री कहलाता था। संसद में अपने भाषण में डॉ॰ मुखर्जी ने धारा-370 को समाप्त करने की भी जोरदार वकालत की। अगस्त 1952 में जम्मू की विशाल रैली में उन्होंने अपना संकल्प व्यक्त किया था कि या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊँगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये अपना जीवन बलिदान कर दूँगा। उन्होंने तात्कालिन नेहरू सरकार को चुनौती दी तथा अपने दृढ़ निश्चय पर अटल रहे। अपने संकल्प को पूरा करने के लिये वे 1953 में बिना परमिट लिये जम्मू कश्मीर की यात्रा पर निकल पड़े। वहाँ पहुँचते ही उन्हें गिरफ्तार कर नज़रबन्द कर लिया गया। 23 जून 1953 को रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गयी।

मृत्यु

डॉ॰ श्यामा प्रसाद मुखर्जी जम्मू कश्मीर को भारत का पूर्ण और अभिन्न अंग बनाना चाहते थे। संसद में अपने भाषण में डॉ॰ मुखर्जी ने धारा-370 को समाप्त करने की भी जोरदार वकालत की… अगस्त 1952 में जम्मू की विशाल रैली में उन्होंने तात्कालिन नेहरू सरकार को चुनौती दी तथा अपने दृढ़ निश्चय पर अटल रहे। अपने संकल्प को पूरा करने के लिये वो 1953 में बिना परमिट लिए जम्मू कश्मीर की यात्रा पर निकल पड़े… वहाँ पहुँचते ही उन्हें गिरफ्तार कर नज़रबन्द कर लिया गया। 23 जून 1953 को रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्य हो गयी।

SOURCE-PIB &https://hi.wikipedia.org/

  

भारत तथा सेंट विंसेंट और द ग्रेनेडाइंस

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्रt मोदी की अध्यटक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भारत गणराज्यत तथा सेंट विंसेंट और द ग्रेनेडाइंस के बीच करों के संबंध में सूचना के आदान-प्रदान और संग्रह में सहायता के लिएएक समझौते को मंजूरी दी है।

समझौते का विवरण :

(i)        यह भारत गणराज्य तथा सेंट विंसेंट और द ग्रेनेडाइंस के बीच एक नया समझौता है। अतीत में, दोनों देशों के बीच ऐसा कोई समझौता नहीं हुआ था।

(ii)       समझौते में मुख्य रूप से दोनों देशों के बीच सूचनाओं के आदान-प्रदान की सुविधा और कर-संग्रह में एक दूसरे को सहायता प्रदान करने का प्रस्ताव है।

(iii)      समझौते में विदेश में कर जांच के प्रावधान भी शामिल हैं, जिसके तहत एक देश, दूसरे देश के प्रतिनिधियों को व्यक्तियों का साक्षात्कार करने और कर उद्देश्यों के लिए रिकॉर्ड की जांच करने के लिएअपने क्षेत्र में प्रवेश करने की अनुमति दे सकता है। (अपने घरेलू कानूनों की स्वीकार्य सीमा तक)

प्रभाव :

भारत गणराज्य तथा सेंट विंसेंट और द ग्रेनेडाइंस के बीच समझौते से दोनों देशों के बीच सूचनाओं के आदान-प्रदान को सुविधाजनक बनाने में मदद मिलेगी। इन सूचनाओं में बैंकों एवं अन्य वित्तीय संस्थानों द्वारा दिए जाने वालेकानूनी और लाभकारी स्वामित्व के बारे में जानकारी भी शामिल होंगी। यह दोनों देशों के बीच कर-दावों के संग्रह मेंभी सुविधा प्रदान करेगा। इस प्रकार, यह विदेश में कर-चोरी और कर से बचने केतौर-तरीकों, जिससे काला धन जमा होता है, से लड़ने की भारत की प्रतिबद्धता को मजबूत करेगा।

पृष्ठभूमि :

सेंट विंसेंट और द ग्रेनेडाइंसके साथ अतीत में ऐसा कोई समझौता नहीं हुआ था और भारत लंबे समय से इस समझौते के लिए बातचीत कर रहा था। अंत में, सेंट विंसेंट और द ग्रेनेडाइंस ने भारत के साथ इस समझौते को अंतिम रूप देने पर सहमति व्यक्त की,जो दोनों देशों के बकाया कर दावों के संग्रह के लिए सूचनाओं के आदान-प्रदान व सहायता के माध्यम से दोनों देशों के बीच कर सहयोग को बढ़ावा देगा।

सेंट विंसेंट एंड ग्रेनाडाइन्स (/ˌɡrɛnəˈdiːnz/) दक्षिण पूर्व विंडवार्ड द्वीपसमूह में लेस्सर एंटिल्स द्वीप चाप में एक बहु द्वीपीय एंग्लो-कैरेबियन देश है, जो कैरिबियन सागर में पूर्वी सीमा के दक्षिणी छोर पर वेस्टइंडीज में स्थित है, जहाँ कैरिबियन सागर अटलांटिक महासागर से मिलता है। इस संप्रभु राज्य को अक्सर सेंट विंसेंट के नाम से भी जाना जाता है। देश के मुख्य द्वीप के होते हैं संत विंसेंट और उत्तरी दो तिहाई द ग्रेनेडाइंस, सेंट विंसेंट से दक्षिण तक फैले छोटे द्वीपों की श्रृंखला ग्रेनेडा। इसका कुल भूमि क्षेत्र 390 किमी² है, जिसमें से 342.7 किमी the सेंट विंसेंट का मुख्य द्वीप है। देश की राजधानी में है किंग्सटाउन सेंट विंसेंट पर।

किंग्सटाउन राजधानी और मुख्य बंदरगाह है। सेंट विंसेंट एक है ब्रिटिश औपनिवेशिक इतिहास, और अब का हिस्सा है पूर्वी कैरेबियाई राज्यों का संगठन, कैरीकॉम, को राष्ट्र के राष्ट्रमंडल, को अमेरिका के लिए द्विपक्षीय गठबंधन और यह लैटिन अमेरिकी और कैरेबियन राज्यों का समुदाय (सीईएलएसी)।

SOURCE-PIB

 

मूडीज

मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस (Moody’s Investors Service) ने 2021 के लिए भारत के विकास अनुमान को घटाकर 9.6% कर दिया है, जो पहले के 13.9% था। इसके अनुसार, 2022 में विकास दर 7% तक सीमित रहेगी।

रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष

  • इस रिपोर्ट के अनुसार, उच्च आवृत्ति वाले आर्थिक संकेतक (high-frequency economic indicators) दर्शाते हैं कि भारत में COVID-19 की दूसरी लहर ने अप्रैल और मई में अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया है।
  • यह रिपोर्ट हाइलाइट करती है कि अब प्रतिबंधों में अब ढील दी जा रही है।
  • आर्थिक नुकसान को जून 2021 तक सीमित रखने में तेजी से टीकाकरण की प्रगति महत्वपूर्ण होगी।
  • इसमें आगे कहा गया है, वायरस के पुनरुत्थान ने 2021 के लिए भारत के विकास के पूर्वानुमान में अनिश्चितता बढ़ा दी है। लेकिन यह संभावना है कि अप्रैल-जून तिमाही के लिए आर्थिक क्षति सीमित रहेगी।

कौन से राज्य सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं?

भारत के 10 राज्य दूसरी लहर से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। वे भारत के सकल घरेलू उत्पाद के पूर्व-महामारी स्तर का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा हैं। महाराष्ट्र, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक चार राज्य हैं जिन्होंने वित्तीय वर्ष 2019-20 में सभी राज्यों में सबसे ज्यादा योगदान दिया।

मूडीज़ इन्वेस्टर्स सर्विस (Moody’s Investors Service)

मूडीज कॉरपोरेशन की बॉण्ड-क्रेडिट की रेटिंग करने वाली कम्पनी है। इसको संक्षेप में केवल ‘मूडीज़’ कहा जाता है। मूडीज़ की निवेशक सेवा वाणिज्यिक और सरकारी संस्थाओं के द्वारा जारी किए गए बॉण्डों पर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय अनुसंधान प्रदान करती है। मूडीज़ का नाम दुनिया की सबसे बड़ी तीन क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों में स्टैंडर्ड एंड पुअर्स और फिच समूह के साथ शामिल है। कंपनी एक मानकीकृत रेटिंग पैमाने का उपयोग करके उधारकर्ताओं की ऋणपात्रता को रैंक देती है। इस रेटिंग पैमाने में चूक की स्थिति में निवेशक के संभावित नुकसान की गणना की जाती है। मूडीज़ की निवेशक सेवा बॉण्ड बाज़ार के विभिन्न खंडों में ऋण प्रतिभूतियों को रेटिंग देती है। इनमें सरकारी, म्यूनिसिपल और कार्पोरेट बॉण्ड; मनी मार्केट फंडों तथा नियत-आय वाले फंडों जैसे प्रबंधित निवेश; बैंकों तथा गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों सहित वित्तीय संस्थाएं; और संरचनागत वित्त में आस्ति श्रेणियां शामिल हैं। मूडीज़ की निवेशक सेवा की रेटिंग में प्रतिभूतियों को एएए से सी तक की रेटिंग दी जाती है जिसमें एएए उच्चतम गुणवत्ता और सी निम्नतम गुणवत्ता को दर्शाता है।

मूडीज़ की स्थापना 1909 में जॉन मूडी ने स्टॉक और बॉण्ड तथा बॉण्ड और बॉण्ड रेटिंग से संबंधित सांख्यिकी का मैनुअल बनाने के लिए किया था। यू.एस. सेक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन के द्वारा वर्ष 1975 में कंपनी को राष्ट्रीय मान्यताप्राप्त सांख्यिकी रेटिंग संगठन (NRSRO) के रूप में चिह्नित किया गया था। कई दशकों तक डन एंड ब्राड्स्ट्रीट के स्वामित्व के बाद मूडीज़ निवेशक सेवा वर्ष 2000 में एक स्वतंत्र कंपनी बन गई। मूडीज़ की स्थापना एक होल्डिंग कंपनी के रूप में हुई।

SOURCE-GK TODAY

 

कृषि विविधीकरण योजना

गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपानी ने कृषि विविधीकरण योजना-2021 लॉन्च की, जिससे वनबंधु-आदिवासी क्षेत्रों के किसानों को लाभ होगा। यह आदिवासी क्षेत्रों में कृषि को सतत और लाभदायक बनाने का प्रयास करती है।

योजना के बारे में

  • इस योजना से राज्य के 14 आदिवासी जिलों के लगभग 26 लाख किसानों को लाभ होगा।
  • इस योजना के तहत आदिवासी किसानों को उर्वरक-बीज सहायता के रूप में31 करोड़ रुपये की सहायता दी जाएगी।
  • इन किसानों को करीब 45 किलो यूरिया, 50 किलो एनपीके और 50 किलो अमोनियम सल्फेट मुहैया कराया जाएगा।
  • इस योजना के तहत मक्का, बाजरा, टमाटर, करेला, दूधी आदि फसलों के बीज उपलब्ध कराए जाएंगे।

राज्य सरकार ने आदिवासी जिलों के पहाड़ी क्षेत्रों में कई लिफ्ट सिंचाई योजनाओं के माध्यम से ऊंचाई पर सिंचाई का पानी पहुंचाने का काम भी किया है। इन योजनाओं से आदिवासी किसान अपने दम पर खेती कर सकेंगे।

कृषि विविधीकरण क्या है?

फसल विविधीकरण से तात्पर्य नई फसलों या फसल प्रणालियों से कृषि उत्पादन को जोड़ने से है, जिसमें एक विशेष कृषि क्षेत्र पर कृषि उत्पादन के पूरक विपणन अवसरों के साथ मूल्यवर्द्धित फसलों से विभिन्न तरीकों से लाभ मिल रहा है।

कृषि विविधीकरण क्या है इसकी आवश्यकता क्यों है?

आजीविका को धारणीय बनाने के लिए कृषि का विविधीकरण आवश्यक है क्योंकि :
(1) पूरी तरह कृषि पर निर्भर रहने से अधिक जोखिम है। (2) विविधीकरण इसलिए भी आवश्यक है ताकि जोखिम को कम किया जा सके तथा धारणीय जीवन स्तर प्राप्त किया जा सके। … (4) ग्रामीण क्षेत्र से निर्धनता उन्मूलन के लिए विविधीकरण आवश्यक है।

खेती पद्धति क्या है?

कृषि प्रणाली की परिभाषा – “खेती की प्रणाली से अभिप्राय उस पद्धति से है जिसमें एक कृषि जोत पर उत्पन्न की जाने वाली वस्तुओं का संयोग तथा उत्पादन की विधियों और रीतियों का

लाभ :

  • छोटी भूमि पर आय में वृद्धि :
  • वर्तमान में 70-80% किसानों के पास 2 हेक्टेयर से कम भूमि है। इसे दूर करने के लिये मौजूदा फसल के पैटर्न को उच्च मूल्य वाली फसलों जैसे कि मक्का, दाल, इत्यादि का विविधीकरण किया जाना चाहिये।
  • हरियाणा राज्य सरकार द्वारा जल संरक्षण के उद्देश्य से मेरा पानी मेरी विरासत (Mera Pani Meri Virasat) योजना की शुरुआत की गई है। इस योजना के माध्यम से राज्य सरकार पानी की अधिक खपत वाले धान के स्थान पर ऐसी फसलों को प्रोत्साहित करेगी जिनके लिये कम पानी की आवश्यकता होती है। योजना के तहत, आगामी खरीफ सीज़न के दौरान धान के अलावा अन्य वैकल्पिक फसलों की बुवाई करने वाले किसानों को प्रोत्साहन राशि के रूप में प्रति एकड़ 7,000 रुपए भी प्रदान किये जाएंगे।
  • आर्थिक स्थिरता :
  • फसल विविधीकरण विभिन्न कृषि उत्पादों की कीमत में उतार-चढ़ाव को बेहतर ढंग से वहन कर सकता है और यह कृषि उत्पादों की आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित कर सकता है।
  • प्राकृतिक आपदाओं को कम करना :
  • जैविक (रोग, कीट तथा निमेटोड) तथा अजैविक (सूखा, क्षारीयता, जलाक्रांति, गरमी, ठंड तथा पाला) पारिस्थितियों के कारण फसल उत्पादन कम हो सकता है। इस परिस्थिति में मिश्रित फसल के माध्यम से फसल विविधीकरण उपयोगी हो सकता है।
  • संतुलित भोजन की मांग :
  • अधिकांश भारतीय आबादी कुपोषण से पीड़ित है। ज़्यादातर महिलाओं में एनीमिया होता है। खाद्य टोकरी में (दलहन, तिलहन, बागवानी और सब्जी) गुणवत्ता बढ़ाकर सामाजिक आर्थिक स्थिति में सुधार कर सकते हैं और खाद्य सुरक्षा और पोषण सुरक्षा के उद्देश्य से मृदा स्वास्थ्य में सुधार कर सकते हैं।
  • भारत सरकार ने अब राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (NFSM) के माध्यम से दलहन और तिलहन के क्षेत्र में वृद्धि करने का लक्ष्य रखा है।
  • संरक्षण :
  • फसल विविधीकरण को अपनाने से प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में मदद मिलती है, जैसे कि चावल-गेहूँ की फसल प्रणाली में फलियाँ लगाना, जो मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखने में मदद करने के लिये वायुमंडलीय नाइट्रोजन को ठीक करने की क्षमता रखती है।
  • मृदा स्वास्थ्य कार्ड (SHC) की सहायता से किसान अपने खेतों की मृदा के बेहतर स्वास्थ्य और उर्वरता में सुधार के लिये पोषक तत्त्वों का उचित मात्रा में उपयोग करने के साथ ही मृदा की पोषक स्थिति की जानकारी प्राप्त कर रहे हैं।

चुनौतियाँ :

  • देश में बहुतायत फसल क्षेत्र पूरी तरह से वर्षा पर निर्भर है।
  • भूमि और जल संसाधनों जैसे संसाधनों का दोहन और अधिकतम उपयोग, पर्यावरण और कृषि की स्थिरता पर नकारात्मक प्रभाव डालता है।
  • जीवाश्म ईंधन के बाद मानव निर्मित ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन में पशु कृषि का दूसरा सबसे बड़ा योगदान है और यह वनों की कटाई, जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण और जैव विविधता के नुकसान का एक प्रमुख कारण है।
  • उन्नत खेती द्वारा बीज और पौधों की अपर्याप्त आपूर्ति में सुधार करना।
  • कृषि के आधुनिकीकरण और मशीनीकरण के पक्ष में भूमि का विखंडन।
  • ग्रामीण सड़क, बिजली, परिवहन, संचार आदि कमज़ोर बुनियादी ढाँचे।
  • फसल कटाई के पश्चात् अपर्याप्त प्रौद्योगिकियों और ख़राब होने वाले बागवानी उत्पादों के कटाई के पश्चात् उनका प्रबंधन करने के लिये अपर्याप्त बुनियादी ढाँचे।
  • कमज़ोर कृषि आधारित उद्योग।
  • कमज़ोर अनुसंधान – उनका विस्तार – किसान संबंध।
  • किसानों के बड़े पैमाने पर निरक्षरता के साथ अपर्याप्त प्रशिक्षित मानव संसाधन।
  • अधिकांश फसल और पौधों को प्रभावित करने वाले रोगों और कीटों की अधिकता।
  • बागवानी फसलों के लिये खराब डेटाबेस
  • कई वर्षों से कृषि के क्षेत्र में निवेश में कमी देखी गई है।

SOURCE –THE HINDU

 

ग्रीन टैरिफ नीति

केंद्र सरकार भारत की हरित ऊर्जा क्षमता को मजबूत करने के उद्देश्य से ‘हरित टैरिफ नीति’ (Green Tariff Policy) पर काम कर रही है।

ग्रीन टैरिफ नीति (Green Tariff Policy)

  • ग्रीन टैरिफ पॉलिसी बिजली वितरण कंपनियों (DISCOMs) को कोयले जैसे पारंपरिक ईंधन स्रोतों से बिजली की तुलना में सस्ती दर पर स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं से उत्पन्न बिजली की आपूर्ति करने में मदद करेगी।
  • बड़े कॉरपोरेट जो केवल हरित ऊर्जा खरीदना चाहते हैं, वे एक स्वच्छ ऊर्जा डेवलपर से ऐसी उर्जा प्राप्त करने के लिए अनुबंध (contract) कर सकते हैं।
  • एक बार नीति को अंतिम रूप देने के बाद, DISCOMs विशेष रूप से हरित बिजली खरीद सकते हैं और इसे ‘ग्रीन टैरिफ’ पर आपूर्ति कर सकते हैं।
  • ग्रीन टैरिफ हरित ऊर्जा का भारित औसत टैरिफ (weighted average tariff) होगा जो उपभोक्ता को चुकाना होगा।
  • यह टैरिफ पारंपरिक ईंधन स्रोतों से टैरिफ से थोड़ा कम होगा और एक नया विनियमन यह सुनिश्चित करने में मदद करेगा, यदि कोई उद्योग डेवलपर से केवल हरित ऊर्जा चाहता है, तो एक पखवाड़े के भीतर ओपन एक्सेस एप्लिकेशन को मंजूरी दी जाएगी।

ओपन एक्सेस

ओपन एक्सेस ऊर्जा के बड़े उपयोगकर्ताओं को 1 मेगावाट से अधिक बिजली की खपत करने के लिए, महंगे ग्रिड पर निर्भर होने के बजाय, खुले बाजार से ऊर्जा खरीदने की अनुमति देता है। हालांकि, राज्य के डिस्कॉम स्वच्छ ऊर्जा डेवलपर्स को तीसरे पक्ष को बिजली की आपूर्ति के लिए बिजली पारेषण (power transmission) और वितरण नेटवर्क (distribution networks) का उपयोग करने की अनुमति नहीं दे रहे हैं।

पृष्ठभूमि

भारत के सौर और पवन ऊर्जा शुल्कों की पृष्ठभूमि में ग्रीन टैरिफ नीति को अंतिम रूप दिया जा रहा है, जो क्रमशः ₹ 1.99 प्रति यूनिट और ₹ 2.43 प्रति यूनिट है।

SOURCE-GK TODAY

 

दुनिया के पहले जीएम (जेनेटिकली मॉडिफाइड)

रबर बोर्ड ने असम राज्य में दुनिया के पहले जीएम (जेनेटिकली मॉडिफाइड) रबड़ का फील्ड ट्रायल शुरू कर दिया है।

मुख्य बिंदु

  • इस जीएम रबड़ को पुथुपल्ली, कोट्टायम में भारतीय रबड़ अनुसंधान संस्थान (Rubber Research Institute of India) में जैव प्रौद्योगिकी प्रयोगशाला में विकसित किया गया था।
  • इसे गुवाहाटी में रबड़ बोर्ड के सरुतारी अनुसंधान फार्म में लगाया गया था।
  • केरल सरकार द्वारा पर्यावरण पर इसके प्रतिकूल प्रभाव के कारण इसकी अनुमति देने से इनकार करने के एक दशक बाद रबर बोर्ड ने असम में जीएम रबड़ का फील्ड परीक्षण शुरू किया।

पृष्ठभूमि

जीएम रबड़ दूसरी आनुवंशिक रूप से संशोधित फसल है जिसके लिए बीटी कपास (Bt. Cotton) के बाद फील्ड ट्रायल शुरू हो गया है। Genetic Engineering Appraisal Committee (GEAC) ने 2010 में कोट्टायम के चेचक्कल, थोम्बिकंडोम में जीएम रबड़ के फील्ड परीक्षण शुरू करने की अनुमति दी थी।

जीएम रबड़ का महत्व

जीएमर रबड़ प्रतिकूल जलवायु परिस्थितियों को झेलने की क्षमता रखता है। इससे भारत में रबर उत्पादन को बड़ा बढ़ावा मिलेगा। ट्रायल खत्म होने के बाद इससे किसानों को काफी फायदा होगा। यह फसल कम नमी या सूखे, कम और उच्च तापमान के साथ-साथ उच्च प्रकाश तीव्रता के लिए प्रतिरोधी है। यह रबड़ की परिपक्वता अवधि को भी कम कर देगा।

रबड़ के विकास के साथ समस्या

उत्तर पूर्व में सर्दियों के मौसम में नए रबड़ की वृद्धि धीमी हो जाती है क्योंकि मानसून के दौरान पौधों को पर्याप्त प्रकाश नहीं मिलता है। गर्मी के मौसम में पर्याप्त पानी की कमी भी पौधों को तनाव पैदा करती है। इस प्रकार, जीएम रबड़ इन मुद्दों को दूर कर सकता है और तेजी से विकास कर सकता है।

आनुवंशिक रूप से परिवर्तित जीव

आनुवंशिक रूप से परिवर्तित जीव या जनुकीय परावर्तित जीव (अंग्रेज़ी : Genetically modified organism, GMO) एक ऐसे जीव को कहते हैं जिसके जीन जैनेटिक अभियांत्रिकी की मदद से बदल दिए गए हों।

जेनेटिक इंजीनियरिंग को यदि आसान भाषा में समझा जाए तो इसका मतलब है कि किसी पेड़-पौधे या जीव के आनुवांशिक या प्राकृतिक गुण को बदलना। इसके तहत डीएनए या जीनोम कोड को बदला जाता है। बायोटेक्नोलॉजी के अंतर्गत जेनेटिक इंजीनियरिंग एक महत्वपूर्ण शाखा मानी जाती है। जेनेटिक इंजीनियरिंग या जेनेटिकली मॉडिफाइड (जीएम) फूड का मुख्य मकसद आनुवांशिक गुणों को बदलकर ऐसे गुण लाना है जिससे मानव सभ्यता को फायदा हो। क्या यह वाकई फायदा पहुंचा रहा है ? क्या आने वाले वक्त में इसकी जरूरत बढ़ती जाएगी ? ऐसे कई सवालों के जवाब दुनियाभर के वैज्ञानिक ढूंढ रहे हैं। भारत में इसके प्रयोग हो रहे हैं, लेकिन सार्वजनिक रूप से इसके फायदों व नुकसान की चर्चा कम होती है। इसके लिए सबसे पहले ये जानना होगा कि आखिर यह जीएम फूड क्या होता है।

जेनेटिक इंजीनियरिंग या जेनेटिकली मॉडिफाइड (जीएम) फूड के जरिए फसलों के गुणों में बदलाव किया जाता है। मसलन, अगर राजस्थान में धान की खेती करनी है और पानी कम है तो ऐसे बीज तैयार किए जाए जो कम पानी में ही लहलहाती फसल उगा सकें। अगर सब्जियों को कीड़ों से बचाना है तो उनमें रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाई जाएं। पहली नजर में यह इंजीनियरिंग किसानों के लिए वरदान साबित होती लगती है और है भी। वर्षों पहले जब देश में खाद्यान की कमी पड़ी तो इसी इंजीनियरिंग के जरिए बंपर पैदावार को संभव बनाया गया, लेकिन बहुत जल्द इसके दुष्प्रभाव सामने आ गए, जो चौंकाने वाले थे।

फसल के नुकसान का खतरा भी

एक कृषि विशेषज्ञ ने बीटी कॉटन और बीटी बैंगन के बारे में बताया कि इन फसलों के बीजों को जेनेटिक इंजीनियरिंग के जरिए तैयार किया गया था। इनमें रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक थी और कीड़े लगने का खतरा नहीं था। बंपर फसल हुई और किसानों की चांदी हो गई, लेकिन कुछ ही हफ्तों में देखा गया कि बीटी कॉटन की फसलों के पत्ते खाकर करीब 1600 भेड़ें मर गईं और कई दूसरे जानवर दृष्टिहीन हो गए। अगर जानवरों पर ऐसा बुरा प्रभाव पड़ा तो क्या इसमें शक है कि इंसानों पर इसका गलत असर नहीं पड़ेगा? सन् 2002 में 55 हजार किसानों ने देश के चार मध्य और दक्षिणी राज्यों में कपास फसल उगाई थी। फसल रोपने के चार माह बाद कपास के ऊपर उगने वाली रुई ने बढ़ना बंद कर दिया था। इसके बाद पत्तियां गिरने लगीं। बॉलवर्म भी फसलों को नुकसान पहुंचाने लगा था। अकेले आंध्र प्रदेश में ही कपास की 79 प्रतिशत फसल को नुकसान पहुंचा। नतीजा यह हुआ कि कई राज्यों के किसानों ने नुकसान की वजह से आत्महत्या कर ली।

क्या वाकई भारत में पैदावार बढ़ाने की जरूरत है?

साल 2002 में विश्व खाद्य सम्मेलन में गरीबी-भुखमरी पर चर्चा हुई। विकसित देशों ने कहा कि भूमंडलीकरण से ही भुखमरी मिट सकती है और बायोटेक्नोलॉजी के जरिए ही संकट को हल किया जा सकता है। बहुराष्ट्रीय बीज निर्माता कम्पनी मॉनसेंटो पर फर्जी अध्ययन करने का आरोप लगा, जिसमें उसने दावा किया था कि कीटों और बीमारियों के कारण हर वर्ष 22.1 करोड़ डॉलर का बैंगन उत्पादन बेकार हो जाता है। बाद में मालूम चला कि इतनी राशि का तो कुल बैंगन उत्पादन ही नहीं होता है। फसलों की पैदावार और उपभोग के अनुपात पर दिए गए आंकड़ों पर बहस जारी है।

कीटनाशकों के चलते भूखे मरते परिंदे

विशेषज्ञों के मुताबिक भारत या दुनियाभर में फसलों की पर्याप्त पैदावार हो रही है। दिक्कत फसलों के प्रबंधन की है। मसलन, भारत में जिस तरह बंदरगाहों पर फसलें बर्बाद हो जाती हैं, उसके रखरखाव का कोई सिस्टम नहीं है। भारत में भुखमरी मिटी नहीं है, लेकिन इसका हल जीएम फूड की बंपर पैदावार नहीं बल्कि फसलों का मैनेजमेंट है। यूरोपियन कोर्ट ऑफ जस्टिस की ओर से गैर जरूरी जेनेटिक इंजीनियरिंग पर लगाम लगाने को विशेषज्ञ आधा अधूरा न्याय मानते हैं। वह कहते हैं कि अगर डिब्बे पर लिखा रहे कि फूड प्रोडक्ट जीएम फूड से बना है तो आम लोगों को आप कब तक जागरूक करेंगे कि वे इसे न खाएं। फूड प्रोडक्ट सस्ता मिल रहा है तो लोग खाएंगे ही। जरूरत प्राकृतिक फूड चेन को बचाने की है। ऐसे बीच-बचाव के रास्ते बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रॉफिट को बरकरार रखने के लिए हैं।

जीएम फूड के सस्ता होने का तर्क कितना सही?

जीएम फूड बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों का तर्क है कि वे सस्ता और गुणकारी प्रोडक्ट आम लोगों तक पहुंचा रही हैं। अगर कम समय में ज्यादा पैदावार वाला खाद्यान्न 12 महीने बाजार में मिल रहा है तो दिक्कत क्या है? इस पर विशेषज्ञों का कहना है कि आज हमारा खाना किलर बन चुका है। भारत में जीएम फूड और खाद को इस्तेमाल करने के कोई नियम नहीं हैं। हम प्राकृतिक गुण वाले अनाज के बजाए मशीन जैसा सटीक अनाज खाना चाह रहे हैं। फसलों के गुणों में बदलाव ने प्रकृति के फूड चेन सिस्टम को बदला है। मिट्टी को उपजाऊ बनाने वाला केंचुआ मर चुका है। खाने का गलत प्रभाव हमारे शरीर पर दिखना शुरू हो चुका है।

हो सकता है कैंसर

विशेषज्ञ इसे कैंसर जैसी बीमारियों के फैलने की वजह मानते हैं। वे कहते हैं कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपना सामान बेचने के लिए उसे सस्ता करने पर तुली हैं, लेकिन वह यह नहीं देख रही कि यह मानव सभ्यता के साथ खिलवाड़ है। प्रयोगशालाओं में आर्टिफिशियल मांस तैयार किया जा रहा है जिसे लोग खा सकें। इसकी क्या वाकई हमें जरूरत है ? औसतन हर साल 420 अरब डॉलर की सब्सिडी कृषि क्षेत्र को दी जाती है जिसका 80 फीसदी हिस्सा बड़े कॉरपोरेट घरानों को जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी सब्सिडी मिलने के बाद भी हमें जहरीला खाद्यान्न दिया जा रहा है, जो शर्मनाक है।

SOURCE-NAVBHARAT TIMES

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