Home » Current Affairs - Hindi » Current Affair 26 May 2021

Current Affair 26 May 2021

CURRENTS AFFAIRS – 26th MAY 2021

निजता का अधिकार एक मौलिक अधिकार है

भारत सरकार स्वीकार करती है कि ‘निजता का अधिकार’ एक मौलिक अधिकार है और वह इसे नागरिकों के लिए सुनिश्चित करने को प्रतिबद्ध है।

इस मुद्दे पर, केन्द्रीय मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने कहा कि “भारत सरकार अपने सभी नागरिकों के लिए निजता का अधिकार सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन इसके साथ ही कानून व्यवस्था बनाए रखने और राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी सरकार की है।”

केंद्रीय मंत्री श्री रवि शंकर प्रसाद ने यह भी कहा कि “भारत द्वारा प्रस्तावित किसी भी कदम से किसी भी प्रकार से वाट्सऐप का सामान्य कामकाज प्रभावित नहीं होगा और आम उपयोगकर्ताओं पर कोई असर नहीं होगा।”

सभी स्थापित न्यायिक कथन के तहत, निजता का अधिकार सहित कोई भी मौलिक अधिकार पूर्ण नहीं है और यह तार्किक सीमाओं से संबंधित हैं। सूचना को सबसे पहले जारी करने वाले या लेखक से जुड़े मध्यवर्ती दिशानिर्देशों की आवश्यकता ऐसी ही तार्किक सीमा का उदाहरण है।

जब अनुपातिकता के परीक्षण के माध्यम से मध्यवर्ती दिशानिर्देशों के नियम 4 (2) का परीक्षण किया जाता है तो यह परीक्षण भी हो जाता है। इस परीक्षण का आधार यह है कि क्या कोई कम प्रभावी वैकल्पिक उपाय उपलब्ध है। मध्यवर्ती दिशानिर्देशों के तहत, सूचना के पहले लेखक की पहचान सिर्फ उसी परिदृश्य में हो सकती है, जहां अन्य उपाय निष्प्रभावी हो जाएं, तो उसी को आखिरी उपाय बना दिया जाए। इसके अलावा, ऐसी जानकारी सिर्फ कानून के तहत स्वीकृत प्रक्रिया के माध्यम से ही मांगी जा सकती है, जिससे पर्याप्त कानूनी सुरक्षा को शामिल किया जा सके।

जनहित में नियम पालन बाध्यकारी है

यह ध्यान रखना जरूरी है कि संबंधित दिशानिर्देशों के नियम 4 (2) के तहत भारत की सम्प्रभुता, अखंडता और सुरक्षा के साथ ही से संबंधित अपराध में सिर्फ रोकथाम, जांच, और सजा आदि के उद्देश्य से और बलात्कार, यौन सामग्री या बाल यौन उत्पीड़न सामग्री से संबंधित अपराध से जुड़े सार्वजनिक आदेश, जिनमें सार्वजनिक आदेश में सजा 5 साल से कम नहीं हो, के मामलों में ही सूचना के पहले लेखक की पहचान के लिए यह आदेश जारी किया जाएगा।

यह जनहित में है कि इस तरह के अपराध के लिए शरारत शुरू करने वाले की पहचान होनी चाहिए और उसको सजा मिलनी चाहिए। हम इस बात से इनकार नहीं कर सकते हैं कि किस तरह से मॉब लिंचिंग और दंगों आदि के मामलों से जुड़े वाट्सऐप संदेशों को प्रसारित और बार-बार प्रसारित किया जाता है, जो पहले से ही सार्वजनिक हों। इसलिए, पहली बार सूचना जारी करने वाले की भूमिका अहम है।

देश के कानून के तहत नियम

मध्यवर्ती दिशानिर्देशों के नियम 4(2) कोई नया उपाय नहीं है। विभिन्न हितधारकों और वाट्सऐप सहित कई सोशल मीडिया मध्यवर्तियों के साथ परामर्श के बाद इसे तैयार किया गया है।अक्टूबर, 2018 के बाद वाट्सऐप द्वारा गंभीर अपराधों के संबंध में पहले लेखक की निगरानी के संबंध में भारत सरकार को लिखित में कोई विशेष आपत्ति दर्ज नहीं कराई गई। उन्होंने सामान्य रूप से दिशानिर्देशों को लागू करने की समयसीमा बढ़ाने की मांग की थी, लेकिन औपचारिक रूप से ऐसा कुछ नहीं कहा कि निगरानी संभव नहीं है।

वाट्सऐप ने अंतिम समय में चुनौती दी है। परामर्श की प्रक्रिया के दौरान तथा नियम बनाए जाने के बाद पर्याप्त समय व अवसर होने के बावजूद अंतिम समय में मध्यवर्ती दिशानिर्देशों को चुनौती देना उनको लागू होने से रोकने का एक दुर्भाग्यपूर्ण प्रयास है।

भारत में परिचालन के कारण कोई भी कंपनी यहां के कानून पर निर्भर है। वाट्सऐप का दिशानिर्देशों को लागू करने से इनकार स्पष्ट रूप से एक उपाय की स्पष्ट अवज्ञा है, जिसके इरादे पर कोई संदेह नहीं कर सकता है।

एक तरफ, वाट्सऐप एक गोपनीयता की नीति को लागू करना चाहती है, जहां वह अपने सभी उपयोगकर्ताओं का डाटा विपणन और विज्ञापन के उद्देश्यों से अपनी मातृ कंपनी के साथ साझा करेगी।

दूसरी तरफ, वाट्सऐप मध्यवर्ती दिशानिर्देशों को लागू नहीं करने के लिए हर प्रयास करती है, जो कानून व्यवस्था को बनाए रखने और फर्जी समाचारों के खतरे पर लगाम कसने के लिए जरूरी है।

वाट्सऐप मध्यवर्ती दिशानिर्देशों को लागू करने से इनकार का बचाव करते हुए कहती है कि एक अपवाद को छोड़ दें तो इस प्लेटफॉर्म पर आने वाले संदेश एंड टू एंड इनक्रिप्ट हैं।

यह उल्लेख करना जरूरी है कि सूचना के पहले लेखक की निगरानी का नियम प्रत्येक और सभी प्रमुख सोशल मीडिया मध्यवर्ती के लिए अनिवार्य है, चाहे उनका परिचालन का तरीका कोई भी हो।

केन्द्रीय मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने कहा कि “क्या इनक्रिप्शन को बनाए रखा जाएगा या नहीं, यह पूरी बहस गलत है। निजता के अधिकार को चाहे इनक्रिप्शन तकनीक या किसी अन्य तकनीक के इस्तेमाल से सुनिश्चित किया जाए, यह पूरी तरह से सोशल मीडिया मध्यवर्ती के अधिकार में आता है। भारत सरकार अपने सभी नागरिकों का निजता का अधिकार सुनिश्चित करने के साथ ही सार्वजनिक व्यवस्था सुनिश्चित करने और राष्ट्रीय सुरक्षा बनाए रखने के लिए जरूरी साधनों और जानकारी देने के लिए प्रतिबद्ध है। एक तकनीक समाधान खोजना वाट्सऐप की जिम्मेदारी है, चाहे ऐसा इनक्रिप्शन या किसी अन्य माध्यम हो, जिसमें दोनों शामिल हों।”

एक महत्वपूर्ण सोशल मीडिया मध्यवर्ती के रूप में, वाट्सऐप सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के प्रावधानों के तहत विशेष (सेफ हार्बर) सुरक्षा चाहती है। हालांकि, अपने प्रभाव के दम पर वे जिम्मेदारी से बचना चाहते हैं और अहम कदम उठाने से इनकार करती है, जिससे उसको एक सुरक्षा प्रावधान का मौका मिलता है।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चलन

भारत सरकार द्वारा जनहित में अलग-थलग होकर नियम लागू नहीं किए गए हैं, बल्कि वैश्विक स्तर पर ये चलन में हैं। जुलाई 2019
(i) में, यूनाइटेड किंगडम, यूनाइटेड स्टेट्स, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और कनाडा की सरकारों एक संवाद जारी किया था, जिनका निष्कर्ष है कि : “प्रौद्योगिकी कंपनियों को अपने इनक्रिप्टेड उत्पादों और सेवाओं के डिजाइन में ऐसा मैकेनिज्म शामिल करना चाहिए, जिसमें सरकारें उपयुक्त कानूनी अधिकार के साथ पढ़ने और उपयोग योग्य प्रारूप में डाटा तक पहुंच हासिल कर सकें।” ब्राजील का कानून प्रवर्तन (ii) वाट्सऐप से संदिग्धों के आईपी पते, ग्राहक जानकारी, जियो-लोकेशन डाटा और भौतिक संदेशों की मांग कर रहा है।

भारत जिसकी मांग कर रहा है, वह दूसरे देशों की तुलना में काफी कम है। इसलिए, वाट्सऐप का भारत के मध्यवर्ती दिशानिर्देशों को निजता के अधिकार के विपरीत चित्रित करना पूरी तरह गलत है। इसके विपरीत भारत में, निजता तार्किक सीमाओं के साथ एक मौलिक अधिकार है। दिशानिर्देशों का नियम 4(2) ऐसी ही तार्किक सीमा का उदाहरण है।मध्यवर्ती दिशानिर्देशों के नियम 4(2) के पीछे के उद्देश्य पर संदेह करना गलत है, जिसका उद्देश्य कानून व्यवस्था की रक्षा करना है।सभी पर्याप्त सुरक्षा उपायों का ध्यान रखा गया है, इस क्रम में स्पष्ट कहा गया है कि यह कोई एक व्यक्ति नहीं है जो सूचना के पहले लेखक पर नजर रख सके। हालांकि, ऐसा सिर्फ कानून के तहत स्वीकृत प्रक्रिया के तहत किया जा सकता है। इसके अलावा, इसे एक अंतिम उपाय के रूप में, सिर्फ ऐसे परिदृश्यों के लिए विकसित किया गया है जहां अन्य उपाय निष्प्रभावी साबित हो गए हों।

SOURCE-PIB

 

गैरस्वशासी क्षेत्रों के लोगों के साथ एकजुटता का अंतर्राष्ट्रीय सप्ताह

संयुक्त राष्ट्र 25 से 31 मई, 2021 तक “गैर-स्वशासी क्षेत्रों के लोगों के साथ एकजुटता का अंतर्राष्ट्रीय सप्ताह” (International Week of Solidarity with the Peoples of Non-Self-Governing Territories) मना रहा है।

गैर-स्वशासी क्षेत्र (Non-Self-Governing Territories) क्या है?

संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुसार, एक गैर-स्वशासी क्षेत्र एक ऐसा क्षेत्र है जहां “लोगों ने पूर्ण स्वशासन प्राप्त नहीं किया है।”

इन क्षेत्रों की पहचान कौन करता है?

संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों ने अपने प्रशासन के तहत कई गैर-स्वशासी-क्षेत्रों की पहचान की थी और उन्हें 1946 में संयुक्त राष्ट्र की सूची में सूचीबद्ध किया था। गैर-स्वशासी क्षेत्रों का प्रशासन करने वाले देशों को प्रशासन शक्तियों के रूप में जाना जाता है। हालांकि, उपनिवेशवाद से मुक्ति की प्रक्रिया के कारण, कई क्षेत्रों को सूची से हटा दिया गया था।

पृष्ठभूमि

आठ संयुक्त राष्ट्र सदस्य राज्यों, बेल्जियम, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, डेनमार्क, न्यूजीलैंड, नीदरलैंड, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका ने 1946 में अपने प्रशासन के तहत 72 गैर-स्वशासी क्षेत्रों को सूचीबद्ध किया था। उनमें से आठ 1959 से पहले स्वतंत्र हो गए थे। 1963 में, संयुक्त राष्ट्र ने 64 क्षेत्रों की संशोधित सूची को मंजूरी दी, जिन पर 1960 में डीकोलोनाइजेशन पर घोषणा लागू थी। 1960 से 2002 के बीच 54 प्रदेशों ने स्वशासन हासिल कर लिया। वर्तमान में, 17 गैर-स्वशासी क्षेत्र बने हुए हैं।

रिकोशे इम्पैक्ट

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के अनुसार, उभरते-बाजार देशों के कोविड-19 महामारी से प्रेरित आर्थिक संकट से बाहर निकलने का संघर्ष विकसित देशों को नुकसान पहुंचा सकता है। इसने कहा, विकसित और उन्नत अर्थव्यवस्थाओं पर संकट का “रिकोशे प्रभाव” (Ricochet Impact) है।

मुख्य बिंदु

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का सुझाव है कि, विकसित देशों को टीकों की बेहतर और न्यायसंगत पहुंच और न्यायसंगत रिकवरी सुनिश्चित करने के लिए सभी प्रयास करने चाहिए। गरीब देशों को ब्याज दरों में वृद्धि के जोखिम का सामना करना पड़ रहा है, भले ही उनकी अर्थव्यवस्थाएं नहीं बढ़ रही हैं। रिकोशे का अर्थ है सतह से टकराकर दिशा बदलना। इसका अर्थ है कि इस आर्थिक संकट का प्रभाव सबसे ज्यादा देशों के साथ-साथ दूसरे देशों पर भी पड़ सकता है।

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF)

इस अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थान का मुख्यालय वाशिंगटन, डीसी में है, इसमें 190 देश शामिल हैं। वे वैश्विक मौद्रिक सहयोग को बढ़ावा देने, वित्तीय स्थिरता को सुरक्षित करने, उच्च रोजगार को बढ़ावा देने, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की सुविधा और सतत आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए मिलकर काम करते हैं। यह दुनिया भर में गरीबी को कम करने के उपाय भी करता है। यह 1944 में स्थापित किया गया था लेकिन ब्रेटन वुड्स सम्मेलन में 1945 में काम करना शुरू कर दिया। IMF भुगतान संतुलन के मुद्दों और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संकटों के प्रबंधन में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।

SOURCE-GK TODAY

 

पशु रोग जोखिम पर सलाह देने के लिए ‘One Health’ पैनल का गठन किया गया

विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization) ने तीन अन्य अंतरराष्ट्रीय निकायों के साथ विशेषज्ञों की एक टीम बनाई है जो जानवरों से मनुष्यों में बीमारियों के प्रसार को रोकने के लिए एक वैश्विक योजना विकसित करने में मदद करेगी।

One Health

यह पहल 2020 में फ्रांस और जर्मनी द्वारा शुरू की गई थी, लेकिन मई 2021 में इसकी पहली बैठक हुई। यह पैनल डब्ल्यूएचओ, विश्व पशु स्वास्थ्य, खाद्य और कृषि संगठन और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम को “जोखिम मूल्यांकन और निगरानी ढांचे” विकसित करने की सलाह देगा। और कोविड-19 जैसे जूनोटिक प्रकोपों ​​​​को रोकने और तैयार करने के लिए बेहतर प्रथाओं की स्थापना में मदद करेगा।

पैनल के कार्य

यह पैनल खाद्य उत्पादन और वितरण, शहरीकरण और बुनियादी ढांचे के निर्माण, अंतर्राष्ट्रीय यात्रा और व्यापार और जैव विविधता हानि और जलवायु परिवर्तन के लिए अग्रणी गतिविधियों में संभावित संचरण जोखिमों की निगरानी करेगा।

यह पैनल क्यों स्थापित किया गया था?

इस पैनल का गठन COVID-19 महामारी के प्रकोप की पृष्ठभूमि में किया गया था। ऐसा माना जाता है कि, कोरोनावायरस या SARS-CoV-2 वायरस की उत्पत्ति चीन और दक्षिण पूर्व एशिया में वन्यजीव व्यापार नेटवर्क में हुई थी। चमगादड़ में कोरोना वायरस का सबसे नजदीकी जेनेटिक मैच पाया गया है।

जूनोटिक प्रकोप (Zoonotic Outbreaks) क्या हैं?

जूनोटिक रोग या प्रकोप एक संक्रामक रोग है, जो प्रजातियों के बीच जानवरों से मनुष्यों में या मनुष्यों से जानवरों में फैलता है।

मेकेदातु बांध

कर्नाटक के मेकेदातु में कावेरी नदी पर एक जलाशय के निर्माण में मानदंडों के कथित उल्लंघन पर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए राष्ट्रीय हरित अधिकरण (National Green Tribunal – NGT) द्वारा एक समिति का गठन किया गया है।

मुख्य बिंदु

न्यायमूर्ति के. रामकृष्णन (K. Ramakrishnan) की एनजीटी पीठ ने बांध के संबंध में अखबार की रिपोर्ट का स्वत: संज्ञान लिया। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि कर्नाटक कावेरी नदी पर एक बांध बनाने का प्रस्ताव कर रहा है, जबकि कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (Cauvery Water Management Authority) द्वारा इस प्रस्ताव को तमिलनाडु सरकार के विरोध के कारण दो बार टाल दिया गया था।

समिति के बारे में

कावेरी नीरावरी निगम लिमिटेड; MoEF, बैंगलोर के एकीकृत क्षेत्रीय कार्यालय और कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण के सदस्य इस समिति के सदस्य हैं। एनजीटी ने समिति को यह पूछने का निर्देश दिया है कि क्या वन विभाग और MoEF से वन संरक्षण अधिनियम और EIA अधिसूचना, 2006 के तहत आवश्यक मंजूरी प्राप्त करने से पहले यह  कथित निर्माण गतिविधि शुरू की गई है।

मेकेदातु परियोजना (Mekedatu Project)

इस परियोजना को 2017 में कर्नाटक द्वारा मंज़ूरी दी गयी थी। 9,000 करोड़ रुपये की इस परियोजना का उद्देश्य बेंगलुरु शहर के लिए पीने के पानी का भंडारण और आपूर्ति करना था। इससे 400 मेगावाट बिजली भी पैदा होगी। यह परियोजना कावेरी नदी और उसकी सहायक अर्कावती (Arkavathi) नदी के संगम पर स्थित गहरी घाटी में क्रियान्वित की जा रही है।

तमिलनाडु इस परियोजना का विरोध क्यों कर रहा है?

तमिलनाडु ऊपरी तट पर किसी भी प्रस्तावित परियोजना का विरोध करता है जब तक कि इसे सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मंज़ूर नहीं किया जाता है। इसके अलावा, कर्नाटक ने बिना सहमति और मंजूरी के परियोजना शुरू की जो कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (Cauvery Water Disputes Tribunal – CWDT) के अंतिम आदेश के खिलाफ है।

SOURCE-GK TODAY

 

ब्लैक, व्हाइट, यलो फ़ंगस

भारत में कोरोना वायरस के मामले कुछ कम होने शुरू ही हुए थे कि अब लोगों पर कई तरह के फ़ंगल इंफ़ेक्शन का ख़तरा मंडराने लगा है। पहले तो ब्लैक फ़ंगस और व्हाइट फ़ंगस के मामले ही सामने आए थे लेकिन सोमवार को यलो फ़ंगस का एक मामला आने के बाद लोगों में डर और बढ़ गया है।

उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ियाबाद में हर्ष ईएनटी अस्पताल में एक ऐसा मामला सामने आया जिसमें तीन तरह के फ़ंगल इंफ़ेक्शन पाए गए, ब्लैक फ़ंगस, व्हाइट फ़ंगस और यलो फ़ंगस।

हर्ष ईएनटी के प्रमुख डॉ. बीपीएस त्यागी बताते हैं कि ये अपनी तरह का बहुत दुर्लभ मामला है। उनके पास आए 59 साल के मरीज़ की जब जाँच की गई तो उसमें यलो फ़ंगस मिला जिसे मेडिकल भाषा में म्यूकर सेप्टिकस कहते हैं।

डॉक्टर बीपीएस त्यागी बताते हैं, “ये फ़ंगस अमूमन रेप्टाइल्स यानि रेंगने वाले जानवरों में पाया जाता है। जितना मैंने पढ़ा और दूसरे डॉक्टर्स से बात की तो ये अपनी तरह का पहला मामला है। इस मरीज़ में ब्लैक और व्हाइट फ़ंगस भी पाये गए हैं।

डॉक्टर त्यागी ने बताया, “मरीज़ को 8-10 दिनों से कमज़ोरी थी। हल्का बुख़ार था, भूख कम लग रही थी, नाक से काला-लाल रिसाव हो रहा था और नाक के आसपास सेंसेशन कम थी। उनकी एंडोस्पॉकी में ये फ़ंगल इंफ़ेक्शन पकड़ में आए. इसके बाद उनका तुरंत ऑपरेशन किया गया।”

‘’इस फ़ंगल इंफ़ेक्शन को म्यूकरमाइकोसिस की श्रेणी का कह सकते हैं। म्यूकरमाइकोसिस में जो म्यूकोरेल्स (फ़ंगस) होते हैं वो कई बार इस तरह का रंग ले लेते हैं।”

इससे पहले ब्लैक फ़ंगस और व्हाइट फ़ंगस के मामले सामने आ चुके हैं।

कुछ राज्यों में कोरोना के मामले कम होने ही लगे थे कि ब्लैक फ़ंगस ने ज़ोर पकड़ लिया. इसे म्यूकरमायकोसिस भी कहते हैं। कोरोना के कई मरीज़ों में इसकी शिकायत आने लगी। पहले गुजरात, महाराष्ट्र और फिर कर्नाटक, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में भी ब्लैक फ़ंगस ज़ोर दिखाने लगा। अस्पतालों में अलग से म्यूकरमायकोसिस वॉर्ड बनाने पड़े.इसके बाद बिहार में चार व्हाइट फ़ंगस के मामले सामने आ गए। फिर कुछ मामले उत्तर प्रदेश से भी आए.इन तीनों फ़ंगल इंफ़ेक्शन को लेकर लोगों में डर बना हुआ है। लेकिन डरने से बेहतर है कि आप इन फ़ंगल इंफ़ेक्शन के बारे में जाने और ख़ुद को उनसे बचाएं।

इस संबंध में दिल्ली एम्स के निदेशक रणदीप गुलेरिया ने भी स्वास्थ्य मंत्रालय की प्रेस कांफ्रेंस में जानकारी दी। उन्होंने सबसे पहले इस बात पर ज़ोर दिया कि फ़ंगल इंफ़ेक्शन को रंग के नाम से नहीं बल्कि उसके मेडिकल नाम से पुकारना चाहिए वरना इससे भ्रम फैल सकता है।

उन्होंने कहा, “फ़ंगल इंफ़ेक्शन के लिए कई शब्द इस्तेमाल किए जाते हैं ब्लैक फ़ंगस, व्हाइट फ़ंगस, येलो फ़ंगस। ये समझना ज़रूरी है कि कई शब्द भ्रामक हैं जिनसे उलझन हो जाती है। फ़ंगस अलग-अलग अंगों पर अलग रंग का हो सकता है लेकिन हम एक ही फ़ंगस को अलग-अलग नाम दे देते हैं।”

जिनकी इम्यूनिटी कम होती है उनमें हम ज़्यादातर ये तीन इंफ़ेक्शन दिखते हैं- म्यूकरमायकोसिस, कैनडीडा या एसपरजिलस फ़ंगल इंफ़ेक्शन है। म्यूकरमाइकोसिस के सबसे ज़्यादा मामले हैं। ये वातावरण में पाया जाता है। ये संक्रामक नहीं है। ये 92-95 प्रतिशत उन मरीज़ों में मिला है जिन्हें डायबिटीज़ है या जिनके इलाज में स्टेरॉइड का इस्तेमाल हुआ है।’’

डॉक्टर राहुल ने बताया, “फ़ंगस का अंदरूनी कोई रंग नहीं होता। म्यूकर ग्रुप की फ़ंगस राइज़ोपस जब शरीर में सेल्स को मारती है तो उन पर अपने काले रंग की कैप छोड़ जाती है क्योंकि वो मरे हुए सेल होते हैं।”

“इस फ़ंगस को जब मुंह, नाक से निकालकर माइक्रोस्कोप में देखा गया तो उसके किनारों पर फ़ंगस दिखी और बीच में मरे हुए सेल दिखे। राइज़ोपस फ़ंगस का तब से नाम ब्लैक फ़ंगस पड़ गया। ये म्यूकरमायकोसिस का ही एक प्रकार है।”

व्हाइट फ़ंगस को लेकर डॉक्टर राहुल बताते हैं, “कैंडिडा शरीर पर सफ़ेद दही की तरह दिखती है। इसलिए उसका नाम व्हाइट फ़ंगस पड़ गया। एक तीसरी फ़ंगस होती है एसपरजिलस। ये कई तरह की होती है। ये शरीर पर काली, नीली हरी, पीली हरी और भूरे रंग की पाई जाती है। मीडिया में जो नाम चल रहे हैं वो फ़ंगस के शरीर पर दिख रहे रंग के हिसाब से रखे गए हैं। लेकिन, इसका इलाज तभी हो सकता है जब उस फ़ंगस की सही प्रजाति का पता चलता है।”

म्यूकरमायकोसिस यानी ब्लैक फ़ंगस

म्यूकरमायकोसिस म्यूकर या रेसजोपस फ़ंगस के कारण होता है जो आमतौर पर मिट्टी, पौधों, खाद, सड़े हुए फल और सब्ज़ियों में पनपता है। ये फ़ंगस साइनस, दिमाग़ और फेफड़ों को प्रभावित करती है और बहुत कम मामलों में गेस्ट्रोइंटेस्टाइनल ट्रैक (इसमें पाचन तंत्र के सभी अंग शामिल होते हैं) में भी पाई जा सकती है।

इसमें ऑपरेशन की भी ज़रूरत पड़ सकती है। कई मामलों में देर हो जाने पर इंफ़ेक्शन रोकने के लिए आंख या जबड़ा भी निकालना पड़ता है। डॉक्टर्स के मुताबिक़, अगर ये इंफ़ेक्शन फेफड़ों या गेस्ट्रोइंटेस्टाइनल ट्रैक में होता है तो ज़्यादा ख़तरनाक है क्योंकि इसके लक्षण देर से सामने आते हैं। म्यूकरमायकोसिस में मृत्यु दर 50 प्रतिशत तक होती है। इसके लक्षण हैं- नाक बंद हो जाना, नाक से ख़ून या काला तरल पदार्थ निकलना, सिरदर्द, आंखों में सूजन और दर्द, पलकों का गिरना, धुंधला दिखना और आख़िर में अंधापन होना। नाक के आसपास काले धब्बे हो सकते हैं और सेंसशन कम हो सकता है। जब फेफड़ों में इसका इंफ़ेक्शन होता है तो सीने में दर्द और सांस लेने में परेशानी जैसे लक्षण होते हैं।

म्यूकर सेप्टिकस

ब्लैक फ़ंगस कोरोना की तरह नहीं फैलता : डॉ. रणदीप गुलेरिया

ये म्यूकरमायकोसिस का ही एक प्रकार है। म्यूकरमायकोसिस कई तरह के होते हैं। इसमें बुख़ार, नाक से लाल या काले रंग का रिसाव, कमज़ोरी और नाक के आसपास सेंसेशन कम होना जैसे लक्षण आते हैं।

कैनडिडा यानी व्हाइट फ़ंगस

कमज़ोर इम्यूनिटी वाले, डायबिटिक या बिना डायबिटिक और आईसीयू में लंबे समय तक रहे मरीज़ों में इसका ख़तरा होता है।

इसमें सफ़ेद पैच आ जाते हैं। जीभ पर सफ़ेद दाग दिखने लगते हैं। किडनी और फेफड़ों में ये इंफ़ेक्शन हो सकता है। ये म्यूकरमायकोसिस जितना ख़तरनाक नहीं होता। इसमें मृत्युदर 10 प्रतिशत के क़रीब है। ये तभी ख़तरनाक होता है अगर इंफ़ेक्शन ख़ून में आ जाए।

एसपरजिलस फ़ंगल इंफ़ेक्शन

ये भी कोरोना के मरीज़ों में देखा गया है। हालांकि, मामले बहुत ही कम हैं। ये भी फेफड़ों को प्रभावित कर सकता है। इसमें फेफड़ों में कैविटी बन जाती है।

ये ज़्यादातर उनमें होता है जिन्हें पहले से कोई एलर्जी हो। इसमें भी अगर निमोनिया हो जाए या फ़ंगल बॉल बन जाए तो ये ख़तरनाक हो सकता है।

कैसे हो बचाव

इन सभी फ़ंगल इंफ़ेक्शन से बचने के लिए ज़रूरी है कि साफ़-सफ़ाई का ध्यान रखा जाए। कोरोना से ठीक होने के बाद मरीज़ धूल-मिट्टी वाली जगहों पर जाने से बचें।

एम्स के निदेशक डॉक्टर रणदीप गुलेरिया ने बताया कि साफ़-सफ़ाई का ध्यान रखना बेहद ज़रूरी है। जैसे हाथ धोना, ऑक्सीजन की ट्यूब साफ़ रखना, ऑक्सीजन सपोर्ट के लिए इस्तेमाल होने वाला पानी स्टेरलाइज्ड हो तो बेहतर है।

डॉक्टर राहुल भार्गव कहते हैं कि आगे इलाज में ध्यान रखा जाएगा कि कोरोना का इलाज करा रहे मरीज़ों में शुगर लेवल को नियंत्रित रखा जाए और स्टेरॉइड का इस्तेमाल संभलकर हो। जो लोग कोरोना का इलाज करा रहे हैं, जिनमें कोरोना ठीक हो चुका है या जिनकी इम्युनिटी किसी अन्य बीमारी के कारण कमज़ोर है, वो फ़ंगल इंफ़ेक्शन के लक्षण दिखते ही अपने डॉक्टर से संपर्क करें।

फ़िलहाल देश में म्यूकरमायकोसिस के नौ हज़ार से ज़्यादा मामले सामने आ चुके हैं लेकिन कैडिडा और एसपरजिलस के मामले बहुत कम हैं।

SOURCE-BBC NEWS

%d bloggers like this: