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Current Affair 27 April 2021

CURRENTS AFFAIRS – 27th APRIL

लार्ज एरिया सर्टिफिकेशन

कृषि, सहकारिता और किसान कल्याण विभाग (डीएसीएंडएफडब्ल्यू) पारंपरिक जैविक क्षेत्रों की पहचान कर उन्हें प्रमाणित जैविक उत्पादन केन्द्र में बदलने पर काम कर रहा है। भारत सरकार ने केंद्र शासित प्रदेश अंडमान और निकोबार के कार निकोबार और द्वीपों के समूह नैनकोवरी के 14,491 हेक्टेयर क्षेत्र को जैविक प्रमाणपत्र दिया है। यह क्षेत्र पीजीएस-इंडिया (पार्टिसिपेटरी गारंटी सिस्टम) प्रमाणन कार्यक्रम के लार्ज एरिया सर्टिफिकेशन (एलएसी) योजना के तहत जैविक प्रमाणीकरण से प्रमाणित किए जाने वाला पहला बड़ा क्षेत्र बन गया है।

कार निकोबार और द्वीपों के समूह नैनकोवरी पारंपरिक रूप से जैविक क्षेत्र के रूप में जाने जाते हैं। प्रशासन ने इन द्वीपों में जीएमओ बीज के किसी भी रासायनिक बिक्री, खरीद और उपयोग पर भी प्रतिबंध लगा दिया है। केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासन ने स्थानीय समुदायों के सहयोग से भूमि स्वामित्व, काम करने के तरीके और बीते समय में अपनाई गई पद्धति को लेकर द्वीप के आधार पर और किसान के आधार पर डेटाबेस तैयार किया है। एक विशेषज्ञ समिति ने जैविक स्थिति का सत्यापन किया है और पीजीएस-इंडिया सर्टिफिकेट स्कीम के तहत क्षेत्र को जैविक प्रमाण देने की सिफारिश की है। इन रिपोर्टों के आधार पर, भारत सरकार ने केंद्र शासित प्रदेश अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के कार निकोबार और द्वीपों के समूह नैनकोवरी के 14,491 हेक्टेयर क्षेत्र को जैविक प्रमाण पत्र दिया है।

इन द्वीपों के अलावा, हिमाचल, उत्तराखंड, उत्तर पूर्वी राज्यों और झारखंड और छत्तीसगढ़ के आदिवासी बेल्ट, राजस्थान के रेगिस्तानी जिले जैसे कृषि क्षेत्र हैं जो रासायनिक वस्तुओं के उपयोग से मुक्त हैं। ये क्षेत्र जैविक खेती के लिए प्रमाणित हो सकते हैं। कृषि, सहकारिता और किसान कल्याण विभाग (डीएसीएंडएफडब्ल्यू) राज्यों के साथ मिलकर ऐसे क्षेत्रों की पहचान करने और उन्हें जैविक खेती के लिए उपयुक्त क्षेत्र के रूप में प्रमाणित करने का काम करा है। इसके साथ ही ब्रांडिंग और लेबलिंग के माध्यम से उस क्षेत्र की विशिष्ट उत्पाद को पहचान कर मार्केटिंग के जरिये बाजार दिलाने की कोशिश भी कर रहा है।

इसके अलावा, अलग-अलग किसानों को प्रमाणित जैविक श्रेणी में लाने के लिए, डीएसीएंडएफडब्ल्यू ने पीकेवीवाई (परम्परागत कृषि विकास योजना) के तहत एक जैविक प्रमाणीकरण सहायता योजना शुरू की है। इस योजना के तहत, व्यक्तिगत किसान एनपीओपी या पीजीएस-इंडिया के किसी भी प्रचलित प्रमाणन प्रणाली के तहत प्रमाणीकरण के लिए वित्तीय सहायता प्राप्त कर सकते हैं। राज्यों के माध्यम से प्रमाणन एजेंसियों को सीधे प्रमाणन लागत के भुगतान के रूप में सहायता उपलब्ध होगी।

एएंडएन द्वीप समूह के बाद, लक्षद्वीप और लद्दाख अपने पारंपरिक जैविक क्षेत्रों को प्रमाणित जैविक क्षेत्र में बदलने के लिए लगातार कदम उठा रहे हैं। ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन प्राप्त कर चुके इन पर्वतीय क्षेत्रों में देश के उभरते जैविक खाद्य बाजार की सीधी पहुंच होगी।

लार्ज एरिया सर्टिफिकेशन के माध्यम से जैविक खती के लिए पारंपरिक कृषि क्षेत्र की पहचान:

आधुनिक कृषि पद्धतियों का विस्तार बड़े क्षेत्रों में होने के बावजूद, भारत में अभी भी पहाड़ियों, जनजातीय जिलों, रेगिस्तान और वर्षा वाले क्षेत्रों में बड़े क्षेत्र हैं जो रासायनिक खाद्य के उपयोग से मुक्त हैं। इनमें थोड़े प्रयासों से ऐसे पारंपरिक/कार्बनिक क्षेत्रों को बिना किसी मेहनत के तुरंत ही जैविक प्रमाणीकरण के तहत लाया जा सकता है। कृषि और किसान कल्याण विभाग ने अपनी प्रमुख योजना परम्परागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई) के तहत इन संभावित क्षेत्रों का इस्तेमाल करने के लिए एक अनूठा त्वरित प्रमाणन कार्यक्रम “लार्ज एरिया सर्टिफिकेशन” (एलएसी) शुरू किया है।

जैविक उत्पादन के मानक नियम के तहत, रासायनिक इस्तेमाल वाले क्षेत्रों को जैविक के रूप में अर्हता प्राप्त करने के लिए न्यूनतम 2-3 वर्षों के समय लगता है। इस अवधि के दौरान, किसानों को मानक जैविक कृषि मानकों को अपनाने और प्रमाणन प्रक्रिया के तहत अपने खेतों को रख-रखाव करना होता है। सफलता पूर्वक समापन होने पर, ऐसे खेतों को 2-3 वर्षों के बाद जैविक के रूप में प्रमाणित किया जा सकता है। प्रमाणन प्रक्रिया को प्रमाणीकरण अधिकारियों द्वारा विस्तृत डोक्यूमेंटेशन और समय-समय पर सत्यापन की भी आवश्यकता होती है जबकि एलएसी के तहत आवश्यकताएं सरल हैं और क्षेत्र को लगभग तुरंत प्रमाणित किया जा सकता है। एलएसी एक त्वरित प्रमाणन प्रक्रिया है जो कम लागत वाली है और किसानों को पीजीएस जैविक प्रमाणित उत्पादों के विपणन के लिए 2-3 साल तक इंतजार नहीं करना पड़ता है।

एलएसी के तहत, क्षेत्र के प्रत्येक गांव को एक क्लस्टर/ग्रुप के रूप में माना जाता है। गांव के अधार पर दस्तावेज सरल बनाए गए हैं। अपने खेत और पशुधन वाले सभी किसानों को मानक आवश्यकताओं का पालन करना होता है और प्रमाणित होने के बाद उन्हें संक्रमण अवधि तक इंतजार नहीं करना होता है। पीजीएस-इंडिया के अनुसार मूल्यांकन की एक प्रक्रिया द्वारा वार्षिक सत्यापन के माध्यम से वार्षिक आधार पर प्रमाणन का नवीनीकरण किया जाता है।

पृष्ठभूमि

जैविक खेती की पहचान एक बड़ी जीवन शक्ति विकल्प के रूप में की गई है जो सुरक्षित और रासायनिक अवशेष मुक्त भोजन और खाद्य उत्पादन प्रणालियों को लंबे समय तक स्थिरता प्रदान करती है।
कोविड -19 महामारी ने जैविक उत्पाद की आवश्यकता और मांग को और बढ़ा दिया है। विश्व में जैविक खाद्य की मांग बढ़ रही है और भारत इसका अपवाद नहीं है। 2014 के बाद से रासायन मुक्त खेती के पर्यावरण और मानव लाभ के महत्व को समझते हुए, कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय के माध्यम से भारत सरकार ने परंपरागत कृषि विकास योजना, उत्तर पूर्व में जैविक मिशन आदि की विभिन्न योजनाओं के माध्यम से जैविक / प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दे रही है। भारत में अब 30 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र जैविक प्रमाणीकरण के तहत पंजीकृत हैं और धीरे-धीरे अधिक से अधिक किसान इस मुहिम में शामिल हो रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय सर्वेक्षण रिपोर्ट (2021) के अनुसार, भारत क्षेत्रफल के मामले में 5वें स्थान पर है और कुल उत्पादकों की संख्या (आधार वर्ष 2019) के मामले में शीर्ष पर है।

SOURCE-PIB

 

कम्युनिटी सर्विस सेंटर की स्थापना

भारत के पहले सौर अंतरिक्ष मिशन से प्राप्त होने वाले आंकड़ों को एक वेब इंटरफेस पर इकट्ठा करने के लिए एक कम्युनिटी सर्विस सेंटर की स्थापना की गई है, ताकि उपयोगकर्ता इन आंकड़ों को तत्काल देख सकें और वैज्ञानिक आयाम से उसका विश्लेषण कर सकें।

आदित्य L1 सपोर्ट सेल (एएल1 एससी) के नाम सेतैयार किया गया यह सर्विस सेंटर, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन इसरो और भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत स्वायत्त संस्था आर्यभट्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जर्वेशनल साइंस (एआरआईईएस)का संयुक्त प्रयास है। इस केंद्र का उपयोग अतिथि पर्यवेक्षकों (गेस्ट ऑब्जर्वर) द्वारा वैज्ञानिक आंकड़ों के विश्लेषण और विज्ञान पर्यवेक्षण प्रस्ताव तैयार करने में किया जाएगा।

एएल1 एससी की स्थापना एआरआईईएस के उत्तराखंड स्थित हल्द्वानी परिसर में किया गया है, जो इसरो के साथ संयुक्त रूप काम करेगा ताकि भारत के पहले सौर अंतरिक्ष मिशन आदित्य L1 से मिलने वाले सभी वैज्ञानिक विवरणों और आंकड़ों का अधिकतम विश्लेषण (उपयोग) किया जा सके।

यह केंद्र छात्रों और विभिन्न अनुसंधान संस्थानों, विश्वविद्यालयों, विद्यालयों इत्यादि के शिक्षकों तथा आदित्य L1 पेलोड टीम एवं खगोल जगत के अनुसंधान से जुड़ी कम्युनिटी के बीच एक ज्ञान वाहक तंत्र के रूप में काम करेगा। इस केंद्र से यह अपेक्षा है कि यह आदित्य L1 पर्यवेक्षण के लिए पर्यवेक्षण प्रस्ताव तैयार करने में अतिथि पर्यवेक्षकों और शोधकर्ताओं के लिए विशेष प्रारूप विकसित करेगा और उनकी सहायता करेगा साथ ही वैज्ञानिक आंकड़ों के रखरखाव के लिए आवश्यक विश्लेषक सॉफ्टवेयर के प्रारूप तथा उसके विकास में इसरो की सहायता करेगा।

यह केंद्र दुनिया की अन्य वेधशाला से भी जुड़ेगा और सौर मिशन से जुड़े आंकड़े उपलब्ध कराएगा, जो आदित्य L1 से प्राप्त होने वाले विवरण में पूरक हो सकते हैं और उपयोगकर्ताओं को आदित्य L1 की अपनी क्षमताओं से आगे का वैज्ञानिक लक्ष्य प्राप्त करने योग्य बना सकते हैं।

अन्य वेधशालाओं से प्राप्त होने वाले आंकड़े सूर्य के स्वरूप संबंधी ज्ञान का आधार तैयार करने में मददगार हो सकते हैं,जिसमें सूरज की सतह से लेकर हेलियो स्फीयर तक के विवरण का सारांश शामिल हो सकता है। यह ज्ञान का आधार वैज्ञानिक समुदाय के लिए सूर्य की सतह और हेलियोस्फीयर की परस्परिक संरचना को आपस में जोड़कर उसका अध्ययन करने में काफी सहायक हो सकता है।

इस केंद्र एएल1एससीके अलावा डेटा विश्लेषण और पर्यवेक्षण प्रस्ताव तैयार करने के उद्देश्य से क्षमता निर्माण हेतु राष्ट्रीय उपयोगकर्ताओं के लिए पाक्षिक प्रशिक्षण भी उपलब्ध कराया जाएगा। इसी क्रम में भारत के विभिन्न स्थानों पर 2-3 दिवसीय छोटी-छोटी कार्यशाला का आयोजन किया जाएगा, जो विशेष रूप से ऐसे विश्वविद्यालयों में आयोजित किया जाएगा जहां आदित्य L1 से जुड़े आंकड़ों को डाउनलोड करने और उनका विश्लेषण करने की सुविधा उपलब्ध नहीं है। इसके अलावा एएल1एससी के माध्यम से ऑनलाइन माध्यम से निरंतर ई-कार्यशाला और ऑनलाइन मंच पर ज्ञान सामग्री उपलब्ध कराने की भी योजना है।

यह केंद्र आदित्य L1 से प्राप्त होने वाले आंकड़ों को न सिर्फ भारत में बल्कि दुनिया के अन्य देशों में भी सुलभ कराएगा ताकि इस मिशन तक अधिक से अधिक संख्या में लोग पहुंच सकें। यह प्रत्येक इच्छुक व्यक्ति को आंकड़ों का वैज्ञानिक विश्लेषण करने की छूट देगा।

SOURCE-PIB

 

भारतीय रिजर्व बैंक ने की अर्थव्यवस्था की स्थिति पर रिपोर्ट जारी की

भारतीय रिजर्व बैंक ने हाल ही में अप्रैल, 2021 के महीने के लिए अर्थव्यवस्था की स्थिति पर रिपोर्ट जारी की।

रिपोर्ट के मुख्य बिंदु

COVID-19 के पुनरुत्थान के कारण मुद्रास्फीति का दबाव वापस आ सकता है।

इसके अलावा, आपूर्ति श्रृंखला में प्रतिबंध और व्यवधान मुद्रास्फीति के दबाव को बढ़ा सकते हैं।

G-Sec Acquisition Programme के तहत , RBI का लक्ष्य जून तिमाही में द्वितीयक बाजार से 1 ट्रिलियन मूल्य के बॉन्ड खरीदना है।

समस्या को हल करने के लिए समाधान

भारतीय रिज़र्व बैंक ने देश में COVID-19 संकट से निपटने के लिए अपनी अर्थव्यवस्था की रिपोर्ट में निम्नलिखित समाधान प्रदान किए हैं :

  • महामारी प्रोटोकॉल
  • अस्पताल और सहायक क्षमता को बढ़ाना
  • शीघ्र टीकाकरण
  • वित्तीय स्थिरता के साथ मजबूत और सतत विकास
  • भारत में टीकाकरण की वर्तमान गति

इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने अगस्त 2021 तक 300 मिलियन का टीकाकरण लक्ष्य निर्धारित किया है। इसके लिए प्रति दिन 3.5 मिलियन टीके की आवश्यकता होगी। यह मौजूदा गति से 13% अधिक है।

आगे का रास्ता

हाल के बैंक विलय में ग्राहकों की संतुष्टि के बारे में जानने के लिए RBI 21 राज्यों में एक सर्वेक्षण करना है। हाल के बैंक विलय इस प्रकार हैं :

देना बैंक और विजया बैंक को बैंक ऑफ बड़ौदा में मिला दिया गया था।

ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स और यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया का पंजाब नेशनल बैंक में विलय कर दिया गया था।

केनरा बैंक के साथ सिंडिकेट बैंक विलय किया गया था।

भारतीय बैंक के साथ इलाहाबाद बैंक का विलय किया गया था।

यूनियन बैंक ऑफ इंडिया के साथ आंध्रा बैंक और कॉर्पोरेशन बैंक का विलय किया गया था।

E-2025 पहल

विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organisation) ने हाल ही में 2025 तक मलेरिया उन्मूलन की क्षमता वाले 25 देशों की पहचान की है। इसे E-2025 पहल (E-2025 Initiative) कहा जाता है।

मुख्य बिंदु

पहचाने गए 25 देश मलेरिया और COVID-19 के दोहरे खतरे का जवाब देकर काम करेंगे। डब्ल्यूएचओ इस पहल के तहत इन देशों को तकनीकी मार्गदर्शन और विशेष सहायता प्रदान करेगा। चिन्हित किये गये देशों में से तीन अफ्रीकी देश ई-स्वातिनी, बोत्सवाना और दक्षिण अफ्रीका हैं।

अफ्रीका में मलेरिया

वैश्विक मलेरिया से होने वाली कुल मौतों में 94% अफ्रीका में होती हैं।हाल के साक्ष्य ने अफ्रीका में दवा प्रतिरोधी उत्परिवर्तन (drug resistant mutations) दिखाया है।

दक्षिण अफ्रीका, अफ्रीका में COVID-19 का हॉटस्पॉट है।COVID-19 के कारण 2019 से 2020 के बीच देश में मलेरिया में 44% की वृद्धि हुई है।  क्योंकि लॉकडाउन के कारण टीकाकरण अभियान नहीं चलाया गया।

बोत्सवाना में, मलेरिया में पाँच गुना वृद्धि हुई है।यह मुख्य रूप से रिवर्स माइग्रेशन की वजह से था जो लॉक डाउन के कारण शहरी से ग्रामीण क्षेत्र में हुआ था।

पृष्ठभूमि

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2017 में E-2020 पहल शुरू की थी। E-2020 का उद्देश्य 2020 तक मलेरिया के शून्य स्वदेशी मामलों को प्राप्त करने के लिए देशों के एक समूह का समर्थन करना है। हालांकि, कुछ देशों को इस लक्ष्य को प्राप्त करना बाकी है। इस प्रकार, उन्हें E-2025 पहल के तहत पहचाना गया और एक नई योजना शुरू की जाएगी।

देशों का चयन कैसे किया गया?

देशों को चार मानदंडों के आधार पर चुना गया था। वे इस प्रकार हैं :

  • सरकार-समर्थित उन्मूलन योजना की स्थापना
  • देश को हाल के वर्षों में मलेरिया के मामले में कमी की सीमा को पूरा करना चाहिए
  • देश में मलेरिया निगरानी की क्षमता होनी चाहिए
  • इसे डब्ल्यूएचओ मलेरिया उन्मूलन ओवरसाइट समिति द्वारा चुना जाना चाहिए

SOURCE-GK TODAY

 

विश्व प्रतिरक्षण सप्ताह (World Immunisation Week)

विश्व प्रतिरक्षण सप्ताह (World Immunisation Week) हर साल अप्रैल के अंतिम सप्ताह में मनाया जाता है। इसका उद्देश्य टीकों के उपयोग को बढ़ावा देना है। इस वर्ष, 2021 में, निम्नलिखित थीम के तहत विश्व प्रतिरक्षण सप्ताह मनाया जा रहा है :

थीम: Vaccines bring us closer

विश्व प्रतिरक्षण सप्ताह की आवश्यकता

दुनिया में 20 मिलियन से अधिक बच्चे हैं जो टीकाकरण से छूट रहे हैं।

COVID-19 के दौरान, कई बच्चों को खसरे और पोलियो के टीके नहीं लगाये गये।

टीके कैसे काम करते हैं?

टीके प्रतिरक्षा प्रणाली को सिखाते हैं कि नई बीमारियों के खिलाफ कैसे कार्य किया जाए। वर्तमान में, मानव शरीर COVID-19 से लड़ने में असमर्थ है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि मानव प्रतिरक्षा प्रणाली यह पहचानने में सक्षम नहीं है कि COVID-19 खतरनाक है। COVID-19 टीके जैसे COVAXIN और COVISHIELD वायरस की पहचान करने और उन्हें मारने के लिए प्रतिरक्षा प्रणाली को प्रशिक्षित करते हैं।

वैक्सीन के दो भाग होते हैं जिनके नाम एंटीजन (antigen) और एडजुवेंट (adjuvant) होते हैं। एंटीजन बीमारी पैदा करने वाले परजीवी का एक टुकड़ा है। दूसरी ओर, adjuvant शरीर को खतरे के संकेत भेजता है और प्रतिरक्षा प्रणाली को एंटीजन के लिए दृढ़ता से प्रतिक्रिया करने में मदद करता है।

वैक्सीन में सामग्री

एंटीजन और एडजुवेंट के अलावा टीके में संरक्षक (preservatives), स्टेबलाइजर्स, सर्फेक्टेंट, मंदक शामिल हैं। टीके को दूषित होने से बचाने के लिए परिरक्षकों (preservatives) को जोड़ा जाता है। वैक्सीन के भीतर होने वाली रासायनिक प्रतिक्रियाओं को रोकने के लिए स्टेबलाइजर्स को जोड़ा जाता है। सर्फेक्टेंट वैक्सीन में अवयवों को एक साथ मिश्रित रखते हैं। Diluent एक तरल है जिसका उपयोग वैक्सीन को पतला करने के लिए किया जाता है।

ऑक्सीजन कॉन्सेंट्रेटर

भारत सरकार 10,000 ऑक्सीजन कॉन्सेंट्रेटर का आयात करेगी।

ऑक्सीजन कॉन्सेंट्रेटर क्या है?

एक ऑक्सीजन कॉन्सेंट्रेटर वातावरण से ऑक्सीजन का सांद्रण करता है।

ऑक्सीजन कॉन्सेंट्रेटर का कार्य

वायुमंडलीय हवा में 78% नाइट्रोजन और 21% ऑक्सीजन होती है। ऑक्सीजन कॉन्सेंट्रेटर हवा को जमा करता है, एक छलनी के माध्यम से नाइट्रोजन को वापस हवा में भेजता है और केवल ऑक्सीजन एकत्र करता है।

ऑक्सीजन कॉन्सेंट्रेटर में ऑक्सीजन एक प्रवेशनी के माध्यम से संकुचित होती है।

यह ऑक्सीजन 90% से 95% शुद्ध होती है।

कॉन्सेंट्रेटर में एक दबाव वाल्व 1 से 10 लीटर प्रति मिनट से ऑक्सीजन की आपूर्ति को विनियमित करने में मदद करता है।

ऑक्सीजन कॉन्सेंट्रेटर से ऑक्सीजन और मेडिकल ऑक्सीजन कैसे अलग है?

कॉन्सेंट्रेटर से प्राप्त ऑक्सीजन, तरल मेडिकल ऑक्सीजन के जितनी शुद्ध नहीं होती है। हालांकि, यह हल्के और मध्यम COVID-19 रोगियों के लिए पर्याप्त शुद्ध है। यह उन रोगियों के लिए उपयुक्त है जिन्हें 85% या उससे अधिक ऑक्सीजन संतृप्ति स्तर की आवश्यकता होती है। ऑक्सीजन कॉन्सेंट्रेटर ICU रोगियों के लिए उचित नहीं हैं।

ऑक्सीजन कॉन्सेंट्रेटर प्रति मिनट केवल पांच से दस लीटर प्रदान करेंगे।गंभीर रोगियों को प्रति मिनट 40 से 50 लीटर ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है।

ऑक्सीजन कॉन्सेंट्रेटर पोर्टेबल हैं। दूसरी ओर, लिक्विड मेडिकल ऑक्सीजन को क्रायोजेनिक टैंकरों में संग्रहीत और परिवहन करने की आवश्यकता होती है।

ऑक्सीजन कॉन्सेंट्रेटर को केवल परिवेशी वायु में खींचने के लिए एक शक्ति स्रोत की आवश्यकता होती है। दूसरी ओर, लिक्विड मेडियल ऑक्सीजन को रिफिलिंग की जरूरत होती है।

ऑक्सीजन कॉन्सेंट्रेटर मोटे तौर पर एक बार के निवेश हैं। उन्हें 40,000 से 90,000 रुपये की आवश्यकता होती है। जबकि सिलेंडर की कीमत 8,000 रुपये से 20,000 रुपये है।

कॉन्सेंट्रेटर को न्यूनतम परिचालन लागत की आवश्यकता होती है जिसमें बिजली और नियमित रखरखाव शामिल होता है।दूसरी ओर, सिलेंडर में रिफिलिंग लागत और परिवहन लागत शामिल होती है।

SOURCE-GK TODAY

 

झुरोंग (Zhurong)

चीन ने अपने पहले मंगल रोवर को पारंपरिक अग्नि देवता के नाम पर झुरोंग (Zhurong) रखा गया है।

झुरोंग (Zhurong)

झुरोंग तियानवेन-1 (Tianwen-1) स्पेस प्रोब पर है।

यह फरवरी, 2021 में मंगल की कक्षा में पहुंचा और मई, 2021 में मंगल ग्रह पर लैंडिंग करेगा।

झुरोंग के साथ, मंगल पर सॉफ्ट लैंडिंग हासिल करने के लिए चीन सोवियत संघ और अमेरिका के बाद तीसरा देश बन जाएगा। साथ ही, यह अमेरिका के बाद मंगल पर रोवर लैंड करवाने वाला दूसरा देश बन जाएगा।

झुरोंग का वजन 240 किलोग्राम है और यह सौर ऊर्जा द्वारा संचालित है।

झुरोंग में चट्टानों की संरचना का विश्लेषण करने के लिए मल्टीस्पेक्ट्रल कैमरों और उपकरण हैं।

तियानवेन-1 (Tianwen-1)

तियानवेन-1 का मुख्य उद्देश्य मंगल ग्रह की सतह का विश्लेषण, मानचित्रण, बर्फ और पानी की खोज और जलवायु व सतह के वातावरण का अध्ययन करना है।

इसे जुलाई, 2020 में लॉन्च किया गया था।

तियानवेन-1 को एक ऑर्बिटर, कैमरा, लैंडर और झुरोंग रोवर के साथ लॉन्च किया गया था।

इसका वजन पांच टन है और यह मंगल पर प्रक्षेपित सबसे भारी जांच में से एक है।

इसे लॉन्ग मार्च 5 हैवी लिफ्ट लॉन्च वाहन में लॉन्च किया गया था।

यह 2020 में मंगल पर भेजे गए तीन अंतरिक्ष अभियानों में से दूसरा था। लॉन्च किए गए अन्य मिशन इस प्रकार थे:

  • संयुक्त अरब अमीरात द्वारा “होप ऑर्बिटर”
  • अमेरिका द्वारा मंगल 2020 पर परसेवरांस रोवर
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