Current Affair 27 August 2021

Current Affairs – 27 August, 2021

ब्रिक्स-कृषि अनुसंधान मंच की शुरूआत

केंद्रीय कृषि तथा किसान कल्याण मंत्री श्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने आज ब्रिक्स सदस्य देशों के बीच कृषि अनुसंधान एवं नवोन्मेषणों के क्षेत्र में सहयोग को सुदृढ़ बनाने के लिए भारत में तैयार एवं गठित ब्रिक्स कृषि अनुसंधान मंच के प्रचालन की घोषणा की। मंत्री खाद्य सुरक्षा एवं पोषण के लिए कृषि जैवविविधता को सुदृढ़ बनाने के लिए ब्रिक्स साझीदारी थीम के तहत ब्रिक्स कृषि मंत्रियों की 11वीं बैठक को संबोधित कर रहे थे।

विज्ञान केंद्रित कृषि के लिए एक वैश्विक मंच के रूप में ब्रिक्स-कृषि अनुसंधान मंच कृषि तथा संबद्ध क्षेत्र में कार्यनीतिक सहयोग के जरिये टिकाऊ कृषि विकास को बढ़ावा देने के द्वारा दुनिया में भूख, कुपोषण, गरीबी तथा असमानता के मुद्वों के समाधान में सहायता करेगा।

ब्रिक्स-एआरपी का प्रचालन ब्रिक्स सदस्य देशों में छोटे खेतिहर किसानों के लिए तथा सतत रूप से ऊपज बढ़ाने और किसानों की आय में वृद्धि करने के लिए प्रौद्योगिकियों सहित कृषि अनुसंधान, प्रौद्योगिकी, नीति, नवोन्मेषणों और क्षमता निर्माण के क्षेत्रों में सहयोग में तेजी लाने के लिए किया गया है। यह मंच संबंधित ब्रिक्स देशों के बीच अनुसंधान निष्कर्षों, नवोन्मेषण तथा सर्वश्रेष्ठ प्रचलनों के आदान प्रदान को और अधिक बढ़ायेगा।

ब्रिक्स कृषि अनुसंधान मंच का समन्वय केंद्र कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग/आईसीएआर के शासन के तहत पूसा के एनएएससी परिसर में स्थित है। ब्रिक्स कृषि अनुसंधान मंच का डोमेन नाम http://barp.org. है। 12-13 अगस्त, 2021 को आयोजित कार्य समूह बैठक में ब्रिक्स के सभी सदस्य देशों ने इस डोमेन नाम पर सहमति जताई। ब्रिक्स देशों ने मंच के जरिये परस्पर बातचीत करने तथा समान प्रकार की समस्याओं की पहचान करने और उनका समाधान ढूंढने के लिए संयुक्त परियोजनाओं का विकास करने के लिए अपने फोकस बिन्दु भी नियुक्त किए हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद भारत का फोकस संगठन है।

केंद्रीय कृषि तथा किसान कल्याण मंत्री श्री नरेन्द्र सिंह तोमर तथा ब्राजील, रूस, चीन और दक्षिण अफ्रीका के कृषि मंत्रियों ने ब्रिक्स कृषि मंत्रियों की 11वीं बैठक में आज वर्चुअल तरीके से भाग लिया।

केंद्रीय मंत्री ने ब्रिक्स कृषि मंत्रियों को संबोधित करते हुए अपने भाषण में कहा कि खाद्य सुरक्षा और पोषण तथा लचीली कृषि-खाद्य प्रणालियों के विकास पर ध्यान देने में कृषि जैवविविधता की मुख्य भूमिका है। उन्होंने कोविड-19 महामारी के दौरान कृषि जैवविविधता के संवर्धन तथा संरक्षण और खाद्य सुरक्षा पर ध्यान देने के लिए ब्रिक्स के सभी देशों के प्रयासों की सराहना की।

ब्रिक्स

ब्रिक्स (BRICS) उभरती राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं के एक संघ का शीर्षक है। इसके घटक राष्ट्र ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका हैं। इन्हीं देशों के अंग्रेज़ी में नाम के प्रथमाक्षरों B, R, I, C व S से मिलकर इस समूह का यह नामकरण हुआ है। इसकी स्थापना २००९ में हुई,और इसके ५ सदस्य देश है। मूलतः, 2010 में दक्षिण अफ्रीका के शामिल किए जाने से पहले इसे “ब्रिक” के नाम से जाना जाता था। रूस को छोडकर, ब्रिक्स के सभी सदस्य विकासशील या नव औद्योगीकृत देश हैं जिनकी अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है। ये राष्ट्र क्षेत्रीय और वैश्विक मामलों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालते हैं। वर्ष २०१९ तक, पाँचों ब्रिक्स राष्ट्र दुनिया की लगभग ४२% आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं और एक अनुमान के अनुसार ये राष्ट्र संयुक्त विदेशी मुद्रा भंडार में ४ खरब अमेरिकी डॉलर का योगदान करते हैं। इन राष्ट्रों का संयुक्त सकल घरेलू उत्पाद १५ खरब अमेरिकी डॉलर का है। ब्रिक्स देशों का वैश्विक जीडीपी में 23% का योगदान करता है तथा विश्व व्यापार के लगभग 18% हिस्से में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसे R-5 के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि इन पांचों देशों की मुद्रा का नाम ‘R’ से शुरू होता है।] वर्तमान में, दक्षिण अफ्रीका ब्रिक्स समूह की अध्यक्षता करता है। ब्रिक्स का १०वाँ शिखर सम्मेलन द अफ्रीका मे हुआ।

SOURCE-PIB

PAPER-G.S.3

 

रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारतको बढ़ावा

मुख्य बिंदु

करोड़ रुपए की लागत से 14 एकीकृत पनडुब्बी रोधी युद्धक रक्षा सूट की खरीद का अनुबंध

‘खरीदें और बनाएं (भारतीय)’ श्रेणी के तहत अनुबंध ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान को बढ़ावा देगा

यह प्रणाली नौसेना की पनडुब्बी रोधी युद्धक क्षमता को मज़बूत करेगी

रक्षा मंत्रालय (एमओडी) ने 27 अगस्त, 2021 को नई दिल्ली में 1,349.95 करोड़ रुपये की लागत से 14 एकीकृत पनडुब्बी रोधी युद्धक (ASW) रक्षा सूट (आईएडीएस) की खरीद के लिए महिंद्रा डिफेंस सिस्टम्स लिमिटेड के साथ एक अनुबंध किया है। एक भारतीय फर्म के साथ अनुबंध रक्षा खरीद की ‘खरीदें और बनाएं (भारतीय)’ श्रेणी के तहत भारत के ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान को एक महत्वपूर्ण बढ़ावा है और प्रौद्योगिकी विकास और उत्पादन में स्वदेशी रक्षा उद्योग को एक बड़ा प्रोत्साहन प्रदान करता है। यह प्रणाली भारतीय नौसेना की पनडुब्बी रोधी युद्धक क्षमता को बढ़ाएगी।

आईएडीएस में दुश्मन की पनडुब्बियों और टॉरपीडो को विस्तारित रेंज में पता लगाने के साथ-साथ दुश्मन पनडुब्बियों द्वारा दागे गए टॉरपीडो की दिशा को परिवर्तित करने के लिए एक एकीकृत क्षमता होती है।

रक्षा मंत्रालय ने सरकार की ‘मेक इन इंडिया’ पहल को बढ़ाने के अपने संकल्प और घरेलू रक्षा उद्योग के माध्यम से कई उपकरणों को शामिल करने के साथ उन्नत प्रौद्योगिकियों में ‘आत्मनिर्भर’ बनने के देश के संकल्प को प्रदर्शित करना जारी रखा।

मेक इन इंडिया

मेक इन इंडिया भारत सरकार द्वारा 25 सितम्बर 2014को देशी और विदेशी कंपनियों द्वारा भारत में ही वस्तुओं के निर्माण पर बल देने के लिए बनाया गया है। अर्थव्यस्था के विकास की रफ्तार बढ़ाने, औद्योगीकरण और उद्यमिता को बढ़ावा देने और रोजगार सृजन। भारत का निर्यात उसके आयात से कम होता है। बस इसी ट्रेंड को बदलने के लिए सरकार ने वस्तुओं और सेवाओं को देश में ही बनाने की मुहीम को शुरू करने के लिए Make in India यानी “भारत में बनाओ” नीति का प्रारम्भ (प्रारंभ) की थी।

इसके माध्यम से सरकार भारत में अधिक पूँजी और तकनीकी निवेश पाना चाहती है। इस परियोजना के शुरू होने के बाद सरकार ने कई क्षेत्रों में लगी FDI (Foreign Direct Investment) की सीमा को बढ़ा दिया है लेकिन सामरिक महत्व के क्षेत्रों जैसे अंतरिक्ष में 74%, रक्षा-49% और न्यूज मीडिया 26% को अभी भी पूरी तरह से विदेशी निवेश के लिए नही खोला है। वर्तमान में, चाय बागान में एफडीआई के लिए कोई प्रतिबन्ध (प्रतिबंध) नहीं है।

योजना से लाभ

  1. भारत को एक विनिर्माण हब के रूप में विकसित करना:- ‘मेक इन इंडिया’के माध्यम से सरकार विभिन्न देशों की कंपनियों को भारत में कर छूट देकर अपना उद्योग भारत में ही लगाने के लिए प्रोत्साहित करेंगी जिससे की भारत का आयात बिल कम हो सके और देश में रोजगार का सृजन हो सके।
  2. भारत के आर्थिक विकास को बढ़ावा देना:- इसके बढ़ोतरी होने से निर्यात और विनिर्माण में वृद्धि होगी। फलस्वरूप अर्थव्यवस्था में सुधार होगा और भारत को मौजूदा प्रौद्योगिकी का उपयोग करके वैश्विक निवेश के माध्यम से विनिर्माण के वैश्विक हब में बदल दिया जाएगा। विनिर्माण क्षेत्र अभी भारत के सकल घरेलू उत्पाद में सिर्फ 16% का योगदान देता है और सरकार का लक्ष्य इसे 2020 तक 25% करना है।
  3. रोजगार के अधिक अवसर:- इसके माध्यम से सरकार नवाचार और उद्यमिता कौशल में निपुण युवाओं को मुद्रा योजना जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से वित्तीय सहायता देगी जिससे कि देश में नयी स्टार्ट उप कंपनियों का विकास हो सके जो कि आगे चलकर रोजगार सृजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकेंगे। इसके तहत कुल 25 क्षेत्रों के विकास पर ध्यान दिया जायेगा जिससे लगभग दस मिलियन लोगों को रोजगार मिलने की उम्मीद है। इतने लोगों के रोजगार मिलने से वस्तुओं और सेवाओं की मांग बढ़ेगी जिससे अर्थव्यवस्था का चहुमुखी विकास हो सकेगा।
  4. अधिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आकर्षित करने का मौका:- सरकार द्वारा 13 फरवरी 2016 को मुंबई में बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स में एमएमआरडीए ग्राउंड में आयोजित”मेक इन इंडिया वीक” के लंबे बहु क्षेत्रीय औद्योगिक में 68 देशों के 2500 अंतरराष्ट्रीय और 8000 घरेलू प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया था। DIPP के सचिव अमिताभ कांत ने कहा कि उन्हें 2 लाख करोड़ रुपये की निवेश प्रतिबद्धताओं (investment commitments ) और 1.5 लाख करोड़ रुपये के निवेश पूछताछ (investment inquiries) प्राप्त हुई थी। महाराष्ट्र को 8 लाख करोड़ रुपये (120 बिलियन अमेरिकी डॉलर) का निवेश मिला।
  5. भारत में रक्षा निवेश को बढ़ावा:- ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम के तहत अगस्त 2015 में, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) सुखोई Su-30MKI लड़ाकू विमान के 332 पार्ट्स की तकनीक को भारत को स्थानांतरित करने के लिए रूस के इरकुट कॉर्प (Irkut Corp) कम्पनी से वार्ता शुरू की। [2]

मेक इन इंडिया की शुरुआत होने के बाद निवेश के लिए भारत बहुराष्ट्रीय कंपनियों की पहली पसंद बन गया और वर्ष 2015 में भारत ने अमेरिका और चीन को पछाड़कर 63 बिलियन अमेरिकी डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्राप्त किया। इसके बाद साल 2016 में पुरे विश्व में आर्थिक मंदी के बावजूद भारत ने करीबन 60 बिलियन डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्राप्त किया, जो विश्व के कई बड़े विकसित देशों से कहीं अधिक था। [3]

इलेक्ट्रॉनिक 2020 तक अमेरिका $ 400 अरब के लिए तेजी से वृद्धि की उम्मीद हार्डवेयर के लिए मांग के साथ, भारत संभावित एक इलेक्ट्रॉनिक विनिर्माण हब बनने की क्षमता है। सरकार ने एक स्तर के खेल मैदान बनाने और एक अनुकूल माहौल प्रदान करके 2020 तक इलेक्ट्रॉनिक्स का शुद्ध शून्य आयात को प्राप्त करने का लक्ष्य रखा है।

SOURCE-PIB

PAPER-G.S.3

 

ब्रह्मांड में आपस में विलीन हो रहे तीन महाविशाल ब्लैकहोल्स का पता लगाया

भारतीय शोधकर्ताओं ने तीन आकाशगंगाओं से ऐसे तीन महा विशाल ब्लैक होल्स की खोज की है जो एक साथ मिलकर एक ट्रिपल सक्रिय गैलेक्टिक न्यूक्लियस बनाते हैं। यह एक नई खोजी गई आकाशगंगा के केंद्र में एक ऐसा ठोस क्षेत्र है जिसमें सामान्य से बहुत अधिक चमक है। हमारे निकटवर्ती ब्रह्मांडों में हुई यह दुर्लभ घटना बताती है कि विलय करने वाले छोटे समूह बहुसंख्यक महाविशाल ब्लैक होल का पता लगाने के लिए आदर्श प्रयोगशालाएं हैं और ये ऐसी दुर्लभ घटनाओं का पता लगाने की संभावना को बढ़ाते हैं।

किसी प्रकार का प्रकाश उत्सर्जित नहीं करने के कारण महाविशाल ब्लैक होल का पता लगाना कठिन ही होता है, लेकिन वे अपने परिवेश के साथ समाहित होकर अपनी उपस्थिति प्रकट कर सकते हैं। जब आसपास से धूल और गैस ऐसे किसी सुपरमैसिव ब्लैक होल पर गिरती है तो उसका कुछ द्रव्यमान ब्लैक होल द्वारा निगल लिया जाता है। लेकिन इसमें से कुछ द्रव्यमान ऊर्जा में परिवर्तित हो जाता है और विद्युत चुम्बकीय विकिरण के रूप में उत्सर्जित होता है जिससे वह ब्लैक होल बहुत चमकदार दिखाई देता है। इन्हें एक्टिव गैलेक्टिक न्यूक्लियस-एजीएन कहा जाता है और ऐसे नाभिक आकाशगंगा और उसके वातावरण में भारी मात्रा में आयनित कण और ऊर्जा छोड़ते हैं। तदुपरांत ये दोनों आकाशगंगा के चारों ओर का माध्यम विकसित करने और अंततः उस आकाशगंगा के विकास और उसके आकार में वृद्धि में अपना योगदान देते हैं।

भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान (इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स) के शोधकर्ताओं की एक टीम जिसमें ज्योति यादव, मौसमी दास और सुधांशु बर्वे शामिल हैं ने कॉलेज डी फ्रांस कॉम्ब्स, चेयर गैलेक्सीज एट कॉस्मोलोजी, पेरिस, के फ्रैंकोइस कॉम्ब्सइ साथ एनजीसी 7733 और एनजीसी 7734 की जोड़ी का संयुक्त रूप से अध्ययन करते हुए एक ज्ञात इंटर-एक्टिव आकाशगंगा एनजीसी 7734 के केंद्र से असामान्य उत्सर्जन और एनजीसी 7733 की उत्तरी भुजा के साथ एक बड़े चमकीले झुरमुट (क्लम्प) का पता लगाया। उनकी जांच से पता चला है कि यह झुरमुट आकाशगंगा एनजीसी 7733 की तुलना में एक अलग ही गति से आगे बढ़ रहा है। वैज्ञानिकों का यहाँ आशय यह भी था कि यह झुरमुट एनजीसी 7733 का हिस्सा नहीं होकर उत्तरी भुजा के पीछे की एक छोटी किन्तु अलग आकाशगंगा थी। उन्होंने इस आकाशगंगा का नाम एनजीसी 7733 एन रखा है।

जर्नल एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स में एक पत्र के रूप में प्रकाशित इस अध्ययन में पहली भारतीय अंतरिक्ष वेधशाला पर लगे एस्ट्रोसैट अल्ट्रा-वायलेट इमेजिंग टेलीस्कोप (यूवीआईटी), यूरोपियन इंटीग्रल फील्ड ऑप्टिकल टेलीस्कोप जिसे एमयूएसई भी कहा जाता है, और जो चिली में बहुत बड़े आकार के दूरदर्शी (वेरी लार्ज टेलीस्कोप – वीएलटी) पर स्थापित किया किया गया है, से मिले आंकड़ों के साथ ही दक्षिण अफ्रीका में ऑप्टिकल टेलीस्कोप से प्राप्त (आईआरएसएफ) से प्राप्त इन्फ्रारेड चित्रों का उपयोग किया गया है।

अल्ट्रावायलेट-यूवी और एच-अल्फा छवियों ने निकल रही तरंगों के अतिम सिरे (टाइडल टेल्स) के साथ एक नए तारे के निर्माण का प्रकटीकरण करके वहां तीसरी आकाशगंगा की उपस्थिति का भी समर्थन किया जो एक बड़ी आकाशगंगा के साथ एनजीसी 7733 एन के विलय से बन सकती थी। इन दोनों आकाशगंगाओं के केंद्र (नाभिक) में एक सक्रिय महाविशाल ब्लैक होल बना हुआ है और इसलिए इनसे एक बहुत ही दुर्लभ एजीएन सिस्टम बन जाती है।

शोधकर्ताओं के अनुसार, आकाशगंगा के विकास को प्रभावित करने वाला एक प्रमुख कारक आकाशगंगाओं की परस्पर क्रिया है जो तब होती है जब विभिन्न आकाशगंगाएं एक-दूसरे के निकट आती हैं और एक-दूसरे पर अपना जबरदस्त गुरुत्वाकर्षण बल लगाती हैं। इस तरह आकाशगंगाओं के आपस में मिलते समय उनमे विद्यमान महाविशाल ब्लैकहोल्स के भी एक-दूसरे के एक दूसरे के पास आने की सम्भावना प्रबल हो जाती हैं। अब द्विगुणित हो चुके ब्लैक होल्स अपने परिवेश से गैस का उपभोग करना शुरू कर देते हैं और  दोहरी सक्रिय मंदाकिनीय नाभिक प्रणाली (एजीएन) में परिवर्तित हो जाते हैं।

भारतीय खगोलभौतिकी संस्थान (आईआईए) की टीम इसका घटना क्रम की व्याख्या करते हुए बताती है कि अगर दो आकाशगंगाएं आपस में टकराती हैं तो उनके ब्लैक होल भी अपनी गतिज ऊर्जा को आसपास की गैस में स्थानांतरित करके पास आ जाएंगे। ब्लैकहोल्स के बीच की दूरी समय के साथ तब तक घटती जाती है जब तक कि उनके बीच का अंतर एक पारसेक (3.26 प्रकाश-वर्ष) के आसपास न हो जाए। इसके बाद दोनों ब्लैक होल तब अपनी और अधिक गतिज ऊर्जा का व्यय नहीं कर पाते हैं ताकि वे और भी करीब आ सकें और एक-दूसरे में विलीन हो सकें। इसे अंतिम पारसेक समस्या के रूप में जाना जाता है। तीसरे ब्लैक होल की उपस्थिति इस समस्या को हल कर सकती है। आपस में विलीन हो रहे दोनों ब्लैकहोल ऐसे में अपनी ऊर्जा को तीसरे ब्लैकहोल में स्थानांतरित कर सकते हैं और तब एक दूसरे के साथ विलय कर सकते हैं।

इससे पहले अतीत में कई सक्रिय एजीएन के जोड़ों का पता चला है। लेकिन तिहरी सक्रिय मंदाकिनीय नाभिक प्रणाली (ट्रिपल एजीएन) अत्यंत दुर्लभ हैं और एक्स-रे अवलोकनों का उपयोग शुरू किए जाने से पहले गिनती की ही ऐसी प्रणालियों के बारे में जानकारी थी। तथापि भारतीय खगोलभौतिकी संस्थान (आईआईए) की टीम को उम्मीद है कि आकाशगंगाओं के छोटे विलय वाले समूहों में ऐसी ट्रिपल एजीएन प्रणाली और अधिक सामान्य होगी। हालांकि यह अध्ययन केवल एक ही प्रणाली पर केंद्रित है। परिणाम बताते हैं कि इस प्रकार विलीन  होने वाले छोटे समूह कई महाविशाल ब्लैक होल्स का पता लगाने के लिए अपने आप में आदर्श प्रयोगशालाएं हैं।

ब्लैक होल, सामान्य सापेक्षता (जनरल रिलेटिविटि) में, इतने शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र वाली कोई ऐसी खगोलीय वस्तु है, जिसके खिंचाव से प्रकाश-सहित कुछ भी नहीं बच सकता। कृष्ण विवर के चारों ओर घटना क्षितिज नामक एक सीमा होती है जिसमें वस्तुएँ गिर तो सकती हैं परन्तु बाहर नहीं आ सकती। इसे “काला” (कृष्ण) इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह अपने ऊपर पड़ने वाले सारे प्रकाश को भी अवशोषित कर लेता है और कुछ भी परावर्तित नहीं करता। यह ऊष्मागतिकी में ठीक एक आदर्श कृष्णिका की तरह है। कृष्ण विवर का क्वांटम विश्लेषण यह दर्शाता है कि उनमें तापमान और हॉकिंग विकिरण होता है।

अपने अदृश्य भीतरी भाग के बावजूद, एक ब्लैक होल अन्य पदार्थों के साथ अन्तः- क्रिया के माध्यम से अपनी उपस्थिति प्रकट कर सकता है। मसलन ब्लैक होल का पता तारों के किसी समूह की गति से लगाया जा सकता है जो अन्तरिक्ष के खाली दिखाई देने वाले एक हिस्से की परिक्रमा कर रहे हों। वैकल्पिक रूप से, एक साथी तारे द्वारा आप अपेक्षाकृत छोटे ब्लैक होल में गैस गिराते हुए देख सकते हैं। यह गैस सर्पिल आकार में अन्दर की तरफ आती है, बहुत उच्च तापमान तक गर्म हो कर बड़ी मात्रा में विकिरण छोड़ती है जिसका पता पृथ्वी पर स्थित या पृथ्वी की कक्षा में घूमती दूरबीनों से लगाया जा सकता है। इस तरह के अवलोकनों के परिणाम स्वरूप यह वैज्ञानिक सर्व-सम्मति उभर कर सामने आई है कि, उनके स्वयं न दिखने के बावजूद, हमारे ब्रह्मांड में कृष्ण विवर अस्तित्व रखते है। इन्हीं विधियों से वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि हमारी गैलेक्सी, क्षीरमार्ग, के केन्द्र में स्थित धनु ए* नामक रेडियो स्रोत में एक विशालकाय कालाछिद्र स्थित है जिसका द्रव्यमान हमारे सूरज के द्रव्यमान से 43 लाख गुना है।

सैद्धांतिक रूप से, किसी भी मात्रा का पदार्थ (matter) एक ब्लैक होल बन सकता है, यदि वह इतनी जगह के भीतर संकुचित हो जाय जिसकी त्रिज्या अपनी समतुल्य स्च्वार्ज्स्चिल्ड त्रिज्या के बराबर हो। इसके अनुसार हमारे सूर्य का द्रव्यमान 3 कि.मी. की त्रिज्या तथा पृथ्वी का 9 मि.मी. के अन्दर होने पर यह कृष्ण विवर में परिवर्तित हो सकते हैं। व्यावहारिक रूप में इलेक्ट्रॉन और न्यूट्रॉन आपजात्य दबाव के विपरीत न तो पृथ्वी और न ही सूरज में आवश्यक द्रव्यमान है और इसलिए न ही आवश्यक गुरुत्वाकर्षण बल है। इन दबावों से उबरकर और अधिक संकुचित होने में सक्षम होने के लिए एक तारे के लिए आवश्यक न्यूनतम द्रव्यमान तोलमन – ओप्पेन्हेइमेर – वोल्कोफ्फ़ द्वारा प्रस्तावित हद है, जो लगभग तीन सौर द्रव्यमान है।वैज्ञानिकों का मानना है कि लगभग प्रत्येक आकाशगंगा के मध्य एक ब्लैक होल हो सकता है। हमारी आकाशगंगा के मामले में यह ब्लैक होल धनु A*En की स्थिति के अनुरूप माना गया है।

SOURCE-PIB

PAPER-G.S.3

 

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति

मध्य प्रदेश सरकार ने 26 अगस्त, 2021 को राज्य में राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 (NEP-2020) लागू की।

मुख्य बिंदु

  • कर्नाटक के बाद मध्य प्रदेश NEP-2020 को लागू करने वाला भारत का दूसरा राज्य बन गया है।
  • यह नई शिक्षा नीति छात्रों को उनकी सीमाओं के बाहर खोज करने में मदद करेगी।
  • पहले, छात्रों को एक पाठ्यक्रम में निर्धारित विषयों का अध्ययन करना आवश्यक था। लेकिन अब उनके पास अपनी रुचि के अनुसार विषय चुनने का विकल्प होगा।
  • NEP 2020 राष्ट्रीय सेवा योजना (National Service Scheme – NSS, राष्ट्रीय कैडेट कोर (National Cadet Corps – NCC) और कौशल आधारित विषयों पर भी ध्यान केंद्रित करती है।
  • इसे लगभग चार वर्षों में 16 सरकारी विश्वविद्यालयों और 40 निजी विश्वविद्यालयों सहित राज्य के सभी क्षेत्रों में लागू किया जाएगा।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भारतीय शिक्षा प्रणाली में स्कूल से लेकर कॉलेज स्तर तक कई बदलाव लाने के उद्देश्य से नए NEP 2020 को मंजूरी दी है। यह नीति “भारत को एक वैश्विक ज्ञान महाशक्ति” बनाने के उद्देश्य से शुरू की गई थी।

विद्यालय शिक्षा

NEP प्री-स्कूल से माध्यमिक स्तर तक शिक्षा के सार्वभौमिकरण का प्रस्ताव करती है और वर्ष 2030 तक स्कूली शिक्षा में 100% सकल नामांकन अनुपात (Gross Enrolment Ratio – GER) प्राप्त करने का प्रयास करती है। यह स्कूली बच्चों को ओपन स्कूलिंग के माध्यम से 2 करोड़ ड्रापआउट बच्चों को मुख्यधारा में वापस लाएगा। नई नीति के तहत 10+2 प्रणाली को एक नई 5+3+3+4 पाठ्यचर्या संरचना से बदल दिया गया है।

NEP 2020 की अन्य विशेषताएं

NEP मूलभूत साक्षरता और संख्यात्मकता पर जोर देती है और स्कूलों में शैक्षणिक धाराओं, व्यावसायिक धाराओं और पाठ्येतर धाराओं के बीच कोई कठोर अलगाव प्रदान नहीं करता है। इस नीति के अनुसार व्यावसायिक शिक्षा कक्षा 6 से इंटर्नशिप के साथ शुरू होगी। यह मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा में कम से कम ग्रेड 5 तक पढ़ाने का भी प्रावधान करती है। छात्र पर कोई भाषा थोपी नहीं जाएगी।

SOURCE-DANIK JAGARAN

PAPER-G.S.1

 

“Shared Destiny-2021”

चीन, मंगोलिया, थाईलैंड और पाकिस्तान की सेनाएं “Shared Destiny-2021” नामक एक बहुराष्ट्रीय शांति रक्षा अभ्यास में भाग लेंगी।

प्रमुख बिंदु

  • इसका आयोजन पीपल्स लिबरेशन आर्मी द्वारा 6 से 15 सितंबर, 2021 तक चीन के मध्य हेनान प्रांत में संयुक्त हथियारों के सामरिक प्रशिक्षण बेस पर किया जाएगा।
  • यह पहला बहुराष्ट्रीय शांति रक्षा अभ्यास है, जिसमें चार राष्ट्र शामिल हैं।
  • सभी भाग लेने वाले देश अभ्यास का हिस्सा बनने के लिए लगभग 1,000 सैनिकों को भेजेंगे। 1000 सैनिकों में पैदल सेना, सुरक्षा, तेज प्रतिक्रिया, इंजीनियरिंग, हेलीकॉप्टर, परिवहन और चिकित्सा सेवा की इकाइयां शामिल होंगी।
  • यह अभ्यास निकट-से-वास्तविक युद्धक्षेत्र के माहौल में आयोजित किया जाएगा जो अंतरराष्ट्रीय, पेशेवर और यथार्थवादी युद्ध मानकों के अनुसार निर्धारित किया जाएगा।

इस शांति स्थापना अभ्यास में युद्धक्षेत्र टोही, सुरक्षा गार्ड और गश्त, नागरिकों की सुरक्षा, हिंसक और आतंकवादी हमलों की प्रतिक्रिया, अस्थायी ऑपरेशन बेस और युद्धक्षेत्र प्राथमिक चिकित्सा और महामारी नियंत्रण का निर्माण करके युद्ध के मैदान का वातावरण बनाया जाएगा।

हेनान प्रांत (Henan Province)

हेनान चीन का एक लैंडलॉक्ड प्रांत है और इसे अक्सर झोंगयुआन या झोंगझोउ (Zhongzhou) कहा जाता है। हेनान प्रांत चीनी सभ्यता का जन्मस्थान है, जिसमें 3,000 से अधिक वर्षों का रिकॉर्ड इतिहास शामिल है। यह लगभग 1,000 साल पहले तक चीन का सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक केंद्र बना रहा।

SOURCE-GK TODAY

PAPER-G.S.2