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Current Affair 28 June 2021

Current Affairs – 28 June, 2021

श्री पी. वी. नरसिम्हा राव

भारत के उपराष्ट्रपति, श्री एम. वेंकैया नायडू ने आज पूर्व प्रधानमंत्री, श्री पी वी नरसिम्हा राव को उनकी जन्मशती पर श्रद्धांजलि अर्पित की और उन्हें एक ऐसे “महान व्यक्ति” के रूप में वर्णित किया, जिन्होंने आर्थिक सुधारों का बीड़ा उठाया था।

श्री नायडू ने कहा कि कि पूर्व प्रधानमंत्री एक बहुआयामी व्यक्तित्व थे – वे अभूतपूर्व विद्वान, चतुर प्रशासक, प्रसिद्ध साहित्यकार और बहु-भाषाविद् थेI उन्होंने कहा कि श्री राव ने अपनी सहमति से नेतृत्व और दूरदर्शी सोच के जरिए देश को आर्थिक संकट से उबारा था। इससे पहले उपराष्ट्रपति ने विशाखापत्तनम के सर्किट हाउस जंक्शन पर पूर्व प्रधानमंत्री की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धांजलि दीI

पामुलापति वेंकट नरसिंह राव (जन्म – 28 जून 1921, मृत्यु – 23 दिसम्बर 2004) भारत के राजनेता एवं देश के 10वें प्रधानमंत्री के रूप में जाने जाते हैं। ‘लाइसेंस राज’ की समाप्ति और भारतीय अर्थनीति में खुलेपन उनके प्रधानमंत्रित्व काल में ही आरम्भ हुआ।ये आन्ध्रा प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे।

पेशे से कृषि विशेषज्ञ एवं वकील श्री राव राजनीति में आए एवं कुछ महत्वपूर्ण विभागों का कार्यभार संभाला। वे आंध्र प्रदेश सरकार में 1962 से 64 तक कानून एवं सूचना मंत्री, 1964 से 67 तक कानून एवं विधि मंत्री, 1967 में स्वास्थ्य एवं चिकित्सा मंत्री एवं 1968 से 1971 तक शिक्षा मंत्री रहे। वे 1971 से 73 तक आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। वे 1975 से 76 तक अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के महासचिव, 1968 से 74 तक आंध्र प्रदेश के तेलुगू अकादमी के अध्यक्ष एवं 1972 से मद्रास के दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के उपाध्यक्ष रहे। वे 1957 से 1977 तक आंध्र प्रदेश विधान सभा के सदस्य, 1977 से 84 तक लोकसभा के सदस्य रहे और दिसंबर 1984 में रामटेक से आठवीं लोकसभा के लिए चुने गए। लोक लेखा समिति के अध्यक्ष के तौर पर 1978-79 में उन्होंने लंदन विश्वविद्यालय के एशियाई एवं अफ्रीकी अध्ययन स्कूल द्वारा आयोजित दक्षिण एशिया पर हुए एक सम्मेलन में भाग लिया। श्री राव भारतीय विद्या भवन के आंध्र केंद्र के भी अध्यक्ष रहे। वे 14 जनवरी 1980 से 18 जुलाई 1984 तक विदेश मंत्री, 19 जुलाई 1984 से 31 दिसंबर 1984 तक गृह मंत्री एवं 31 दिसंबर 1984 से 25 सितम्बर 1985 तक रक्षा मंत्री रहे। उन्होंने 5 नवंबर 1984 से योजना मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार भी संभाला था। 25 सितम्बर 1985 से उन्होंने मानव संसाधन विकास मंत्री के रूप में पदभार संभाला।

इनके प्रधानमंत्री बनने में भाग्य का बहुत बड़ा हाथ रहा है। 21 मई 1991 को राजीव गांधी की हत्या हो गई थी। ऐसे में सहानुभूति की लहर के कारण कांग्रेस को निश्चय ही लाभ प्राप्त हुआ। 1991 के आम चुनाव दो चरणों में हुए थे। प्रथम चरण के चुनाव राजीव गांधी की हत्या से पूर्व हुए थे और द्वितीय चरण के चुनाव उनकी हत्या के बाद में। प्रथम चरण की तुलना में द्वितीय चरण के चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहतर रहा। इसका प्रमुख कारण राजीव गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति की लहर थी। इस चुनाव में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत नहीं प्राप्त हुआ लेकिन वह सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। कांग्रेस ने 232 सीटों पर विजय प्राप्त की थी। फिर नरसिम्हा राव को कांग्रेस संसदीय दल का नेतृत्व प्रदान किया गया। ऐसे में उन्होंने सरकार बनाने का दावा पेश किया। सरकार अल्पमत में थी, लेकिन कांग्रेस ने बहुमत साबित करने के लायक़ सांसद जुटा लिए और कांग्रेस सरकार ने पाँच वर्ष का अपना कार्यकाल सफलतापूर्वक पूर्ण किया। पीवी नरसिंह राव ने देश की कमान काफी मुश्किल समय में संभाली थी। उस समय भारत का विदेशी मुद्रा भंडार चिंताजनक स्तर तक कम हो गया था और देश का सोना तक गिरवी रखना पड़ा था। उन्होंने रिजर्व बैंक के अनुभवी गवर्नर डॉ. मनमोहन सिंह को वित्तमंत्री बनाकर देश को आर्थिक भंवर से बाहर निकाला।

श्री राव संगीत, सिनेमा एवं नाटकशाला में रुचि रखते थे। भारतीय दर्शन एवं संस्कृति, कथा साहित्य एवं राजनीतिक टिप्पणी लिखने, भाषाएँ सीखने, तेलुगू एवं हिंदी में कविताएं लिखने एवं साहित्य में उनकी विशेष रुचि थी। उन्होंने स्वर्गीय श्री विश्वनाथ सत्यनारायण के प्रसिद्ध तेलुगु उपन्यास ‘वेई पदागालू’ के हिंदी अनुवाद ‘सहस्रफन’ एवं केन्द्रीय साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित स्वर्गीय श्री हरि नारायण आप्टे के प्रसिद्ध मराठी उपन्यास “पान लक्षत कोन घेटो” के तेलुगू अनुवाद ‘अंबाला जीवितम’ को सफलतापूर्वक प्रकाशित किया। उन्होंने कई प्रमुख पुस्तकों का मराठी से तेलुगू एवं तेलुगु से हिंदी में अनुवाद किया एवं विभिन्न पत्रिकाओं में कई लेख एक उपनाम के अन्दर प्रकाशित किया। उन्होंने राजनीतिक मामलों एवं संबद्ध विषयों पर संयुक्त राज्य अमेरिका और पश्चिम जर्मनी के विश्वविद्यालयों में व्याख्यान दिया। विदेश मंत्री के रूप में उन्होंने 1974 में ब्रिटेन, पश्चिम जर्मनी, स्विट्जरलैंड, इटली और मिस्र इत्यादि देशों की यात्रा की।

SOURCE-PIB &https://www.pmindia.gov.in/

 

बर्मी अंगूर लैटिको

पूर्वोत्तर राज्यों से कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की निर्यात क्षमता में सुधार के प्रयासों को बढ़ावा देने के लिए, ताजा बर्मी अंगूर की एक खेप, जिसे असमिया भाषा में ‘लैटिको’ के रूप में जाना जाता है, का एक शिपमेंट गुवाहाटी से हवाई मार्ग से दुबई में निर्यात किया गया है।

लेटिको जो विटामिन सी और आयरन से भरपूर होती है, की एक खेप असम के दरंग जिले के एक संग्रह केंद्र में पैक की गई। एपीडा पंजीकृत किगा एक्जिम प्राइवेट लिमिटेड के माध्यम से खेप को गुवाहाटी हवाई अड्डे से दिल्ली होते हुए दुबई ले जाया गया।

एपीडा पूर्वोत्तर राज्यों को भारत के कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों के निर्यात मानचित्र पर लाने के लिए प्रचार गतिविधियों को अंजाम दे रहा है। हाल ही में, एपीडा ने असम से संयुक्त राज्य अमेरिका को ‘लाल चावल’ की पहली खेप का निर्यात करने में मदद की। आयरन से भरपूर ‘लाल चावल’ असम की ब्रह्मपुत्र घाटी में बिना किसी रासायनिक खाद के उगाए जाते हैं। चावल की किस्म को ‘बाओ-धान’ कहा जाता है, जो असमिया भोजन का एक अभिन्न अंग है।

एपीडा ने लंदन को भौगोलिक संकेतक (जीआई) प्रमाणित गेजी निमो (असम नींबू) के निर्यात में सहायता की है। अब तक लगभग 40 मीट्रिक टन असम नींबू का निर्यात किया जा चुका है।

त्रिपुरा स्थित कृषि संयोग एग्रो प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड से प्राप्त कटहल को लंदन में निर्यात किया गया था। कनसाइनमेंट को सॉल्ट रेंज सप्लाई चेन सॉल्यूशन लिमिटेड की एपीडा सहायता प्राप्त पैक-हाउस सुविधा में पैक किया गया था और कीगा एक्जिम प्राइवेट लिमिटेड द्वारा निर्यात किया गया था।

एपीडा ने गुवाहाटी में एक पैक हाउस स्थापित करने के लिए निजी क्षेत्र को वित्तीय सहायता प्रदान की है जिसने यूरोप को ताजे फल और सब्जियों के निर्यात के लिए जरूरी या जरूरी बुनियादी सुविधाओं को विकसित किया है।

एपीडा खाद्य उत्पादों के निर्यात के लिए जरूरी मार्केटिंग रणनीतियों को विकसित करने, उसके बारे में जानकारी के साथ फैसले लेने के लिए बाजार की जानकारी, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कारोबार का प्रदर्शन, कौशल विकास, क्षमता निर्माण और उच्च गुणवत्ता वाली पैकेजिंग के लिए बाजार में विकास की गतिविधियां चलाता है।

एपीडा क्षमता निर्माण, गुणवत्ता नवीनीकरण और बुनियादी ढांचे के विकास के मामले में पूर्वोत्तर क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित करेगा। इस तरह से किसानों को खरीदारों से जोड़ना और पूर्वोत्तर से कृषि उत्पादों की पूरी आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करना लाभदायक होगा।

SOURCE-PIB

 

राष्ट्रीय सांख्यिकी दिवस

National Statistics Day : भारत सरकार द्वारा हर साल देश भर में 29 जून को प्रो. पी. सी. महालनोबिस की जयंती के उपलक्ष्य में राष्ट्रीय सांख्यिकी दिवस मनाया जाता है। राष्ट्रीय सांख्यिकी दिवस सामाजिक-आर्थिक योजना और नीति निर्माण में सांख्यिकी की भूमिका के बारे में युवाओं में जागरूकता बढ़ाने के लिए मनाया जाता है। सांख्यिकी दिवस हर किसी जिंदगी में रोजमर्रा सांख्यिकी के उपयोग को लोकप्रचलित करने और लोगों को इस बात से अवगत कराना है कि सांख्यिकी नीतियों को आकार देने और इन्हें तैयार करने में किस प्रकार मददगार होता है।

सांख्यिकी दिवस 2020 का विषय सतत् विकास लक्ष्य 3 – उत्तम स्वास्थ्य और खुशहाली (Ensure healthy lives and promote well-being for all at all ages) और सतत विकास लक्ष्य 5 – लैंगिक समानता (Achieve gender equality and empower all women and girls) को चुना गया है।

राष्ट्रीय सांख्यिकी दिवस : इतिहास

राष्ट्रीय सांख्यिकी दिवस पहली बार 29 जून 2007 को मनाया गया था। भारत सरकार ने आर्थिक नीति और सांख्यिकीय विकास के क्षेत्र में स्वर्गीय प्रोफेसर प्रशांत चंद्र महालनोबिस द्वारा किए गए उत्कृष्ट योगदान को सम्मानित करने के लिए उनकी जयंती को राष्ट्रीय सांख्यिकी दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया था।

कौन हैं प्रोफेसर प्रशांत चंद्र महालनोबिस?

प्रोफेसर प्रशांत चंद्र महालनोबिस को भारतीय सांख्यिकी का जनक माना जाता है। उनका जन्म 29 जून 1893 में हुआ था, वह एक भारतीय सांख्यिकीविद् और वैज्ञानिक थे। उन्होंने दो डेटा सेटों के बीच तुलना का एक माप तैयार किया जिसे अब महालनोबिस दूरी (Mahalanobis distance) के रूप में जाना जाता है। बड़े पैमाने पर सर्वेक्षण में उनका बहुत बड़ा योगदान रहा है। वे एंथ्रोपोमेट्री अध्ययन और पायलट सर्वेक्षण में अग्रणी थे। वह योजना आयोग (1956-61) के सदस्य थे और उन्होंने द्वितीय पंचवर्षीय योजना के लिए दो-सेक्टर इनपुट-आउटपुट मॉडल दिया, जिसे बाद में नेहरू-महालनोबिस मॉडल के रूप में जाना जाने लगा। उन्होंने दिसंबर 1931 में कोलकाता में भारतीय सांख्यिकी संस्थान (ISI) की स्थापना की। उन्हें भारत के साथ-साथ विदेशों के कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। उन्हें मिले प्रमुख पुरस्कार है : पद्म विभूषण (1968), ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से वेल्डन मेमोरियल (1944), फैलो ऑफ द रॉयल सोसाइटी, लंदन (1945)

SOURCE-PIB

 

बैलिस्टिक मिसाइल अग्नि पी

रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) ने 28 जून, 2021 को नई पीढ़ी की परमाणु-सक्षम बैलिस्टिक मिसाइल अग्नि पी (Agni P) का सफलतापूर्वक परीक्षण किया।

मुख्य बिंदु

  • इस मिसाइल को ‘अग्नि प्राइम’ के नाम से भी जाना जाता है।
  • इसे ओडिशा के डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से लांच किया गया था।
  • अग्नि-प्राइम अग्नि-1 मिसाइल का उन्नत संस्करण है।
  • पूर्वी तट पर स्थित विभिन्न टेलीमेट्री और रडार स्टेशनों द्वारा इस परीक्षण की निगरानी की गई।
  • इसने उच्च स्तर की सटीकता के साथ मिशन के उद्देश्यों को पूरा किया।

अग्नि पी मिसाइल (Agni P Missile)

यह अग्नि श्रेणी की मिसाइलों का एक नई पीढ़ी का उन्नत संस्करण है। यह एक कनस्तर वाली मिसाइल है जिसकी मारक क्षमता 1,000 और 2,000 किलोमीटर है। यह मिसाइल 2000 किलोमीटर तक के लक्ष्य को भेद सकती है। यह इस वर्ग की अन्य मिसाइलों की तुलना में बहुत छोटी और हल्की है। यह नई परमाणु सक्षम मिसाइल पूरी तरह से मिश्रित सामग्री से बनी है।

अग्नि-1 मिसाइल

अग्नि-1 मिसाइल स्वदेशी तकनीक से विकसित सतह से सतह पर मार करने वाली परमाणु सक्षम मिसाइल है। इसकी मारक क्षमता सात सौ किलोमीटर है। मिसाइल का परीक्षण ओड़िशा के बालासोर से करीब 100 किलोमीटर दूर व्हीलर द्वीप स्थित इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज [आइटीआर] से किया गया। 15 मीटर लंबी व 12 टन वजन की यह मिसाइल एक क्विंटल भार के पारंपरिक तथा परमाणु आयुध ले जाने में समक्ष है। मिसाइल को रेल व सड़क दोनों प्रकार के मोबाइल लांचरों से छोड़ा जा सकता है। अग्नि-1 में विशेष नौवहन प्रणाली लगी है जो सुनिश्चत करती है कि मिसाइल अत्यंत सटीक निशाने के साथ अपने लक्ष्य पर पहुंचे। इस मिसाइल का पहला परीक्षण 25 जनवरी 2002 को किया गया था। अग्नि-1 को डीआरडीओ की प्रमुख मिसाइल विकास प्रयोगशाला “एडवास्ड सिस्टम्स लैबोरैटरी” (एएसएल) द्वारा रक्षा अनुसंधान विकास प्रयोगशाला और अनुसंधान केंद्र इमारत (आरसीआई) के सहयोग से विकसित और भारत डायनामिक्स लिमिटेड (बीडीएल) हैदराबाद द्वारा एकीकृत किया गया था।

SOURCE-GK TODAY

 

FAME योजना 2024 तक बढ़ाई गई

सरकार ने ‘Faster Adoption and Manufacturing of Electric Vehicles in India Phase II (FAME Phase II)’ को 2 साल तक बढ़ाने का फैसला किया है।

मुख्य बिंदु

  • शुरुआत में FAME योजना 1 अप्रैल, 2019 से तीन साल की अवधि के लिए लागू की जानी थी।
  • अब, यह 31 मार्च, 2024 तक लागू रहेगी।
  • भारी उद्योग विभाग द्वारा इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर्स (e2W) के लिए मांग प्रोत्साहन को 10,000 रुपये/KWh से बढ़ाकर 15,000/KWh करने के बाद यह तिथि बढ़ा दी गई है।

पृष्ठभूमि

इस योजना में ये संशोधन इसलिए किए गए क्योंकि इसे भारतीय बाजार में इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी बढ़ाने में अप्रभावी होने के लिए आलोचना का सामना करना पड़ा। आंकड़ों के अनुसार, ग्रीन मोबिलिटी को किफायती बनाने के लिए आवंटित 10,000 करोड़ रुपये में से केवल 5 प्रतिशत या लगभग 500 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। मार्च, 2022 तक 10 लाख इकाइयों के लक्ष्य के मुकाबले राज्यों में योजना के तहत केवल 58,613 e2W बेचे गए थे। नवीनतम संशोधन के साथ, EV उद्योग को ग्राहकों को लाभ देने और योजना के तहत लक्ष्य हासिल करने के लिए अधिक समय मिलेगा।

फेम इंडिया योजना

दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन से निपटने के विभिन्न प्रयास किये जा रहे हैं इसी क्रम में भारत सरकार ने मैन्युफैक्चरिंग, इलेक्ट्रिक वाहनों के विकास को बढ़ावा देने के लिए फेम इंडिया योजना शुरू की है। इस योजना का एक चरण संपन्न होने के बाद अब दूसरे चरण को लागू कर दिया गया है। फेम इंडिया योजना के दोनों चरणों की पूर्ण जानकारी आप इस पेज से प्राप्त कर सकते हैं।

प्रथम चरण : देश में पर्यावरण के अनुकूल को बढ़ावा देने के उद्देश्य से वर्ष 2015 में भारी उद्योग मंत्रालय द्वारा फेम इंडिया योजना शुरू की गयी थी। यह योजना राष्ट्रीय मोबिलिटी मिशन योजना (MEMMP) के तहत शुरू की गयी थी। इस योजना को 2017 तक पूर्ण होना था जिसके बाद इसको 31 मार्च 2019 तक विस्तार दिया गया था। प्रथम चरण में सरकार की ओर से 5500 करोड़ रूपए खर्च किये जाने का लक्ष्य रखा गया था।

द्वितीय चरण : यह योजना राष्ट्रीय विद्युत गतिशीलता मिशन योजना (NEMMP) के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए शुरू की गई। इस योजना का दूसरा चरण 2019 में लॉन्च किया गया था जिसकी अवधि वर्ष 2022 तक रहेगी। दूसरे चरण में सरकार की ओर से 10000 करोड़ रूपए का बजट निर्धारित की गया है। इसमें हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक व्हीकल्स का फास्टर एडॉप्शन एंड मैन्युफैक्चरिंग, इलेक्ट्रिक वाहनों के विकास को बढ़ावा देने एवं जलवायु परिवर्तन से निपटने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

फेम इंडिया योजना के उद्देश्य

फेम इंडिया स्कीम के तहत विभिन्न उद्देश्य निर्धारित किये गए हैं –

  • इस योजना के तहत भारत सरकार की ओर से वर्ष 2030 तक भारत को 100 प्रतिशत इलेक्ट्रिसिटी से चलने वाले वाहनों वाले देश बनाना।
  • वर्ष 2022 तक भारत को प्रदूषण से मुक्ति दिलाना है।
  • पेट्रोल एवं डीजल के आयात पर निर्भरता कम करना।
  • इलेक्ट्रिक वाहनों के इस्तेमाल को बढ़ावा देना।
  • देश में प्रदूषण काम करना।

फेम इंडिया स्कीम के मुख्य घटक

इस योजना को निम्नलिखित 4 भागों में बांटा गया है –

  • मांग का निर्माण।
  • वाहनों की चार्जिंग के लिए आधारभूत संरचना का विकास करना।
  • मांग का निर्माण।
  • प्रौद्योगिकी विकास।

फेम इंडिया योजना के लाभ

फेम इंडिया स्कीम के तहत विभिन्न लाभ होंगे जिनकी जानकारी निम्नलिखित है –

  • इलेक्ट्रिक एवं आधुनिक वाहनों के विनिर्माण से सम्बंधित उद्योगों को सब्सिडी प्रदान की जाएगी।
  • इस योजना के तहत सरकार की ओर से ऑटोमेटिक रास्ते के तहत 100 प्रतिशत एफडीआई को मंजूरी मिलेगी।
  • इस योजना के तहत अगले 5 वर्षों में सभी दोपहिया, तिपहिया एवं चार पहिया के इलेक्ट्रॉनिक वाहनों की खरीद पर सब्सिडी मिलेगी।
  • इलेक्ट्रिक वाहनों के विकास में शामिल निर्माताओं को प्रोत्साहन का लाभ मिलेगा।
  • लिथियम आयन बैटरी और इलेक्ट्रिक मोटर्स के विकास में शामिल निर्माताओं को प्रोत्साहन का लाभ मिलेगा।

फेम इंडिया योजना के मुख्य लक्ष्य

फेम इंडिया स्कीम के मुख्य लक्ष्य निम्नलिखित –

  • वर्ष 2015 से वर्ष 2022 तक देशभर की सड़को पर 60 से 70 लाख हाइब्रिड एवं इलेक्ट्रॉनिक वाहनों को उतारना।
  • ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाना।
  • डीजल और पेट्रोल की जगह हाइब्रिड और इलेकिट्रकल दोपहिया वाहन, कार, तिपहिया वाहन और हल्के व भारी कमर्शियल वाहनों के लिये देशभर में अवसंरचना तैयार करना।
  • वर्ष 2030 तक भारत के वाहनों को पूर्ण रूप से इलेक्ट्रॉनिक वाहनों में बदलना।
  • लगभग 7,000 ई-बसों, 5 लाख ई-तिपहिया वाहनों, 55,000 ई -यात्री कारों और 10 लाख ई-दोपहिया वाहनों को सब्सिडी के जरिये समर्थन करने का लक्ष्य रखा गया है।

SOURCE-THE HINDU

 

गोवा बना पहला रेबीज मुक्त राज्य

गोवा भारत का पहला रेबीज मुक्त राज्य बन गया है। मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत (Pramod Sawant) के अनुसार, राज्य में पिछले तीन वर्षों में एक भी रेबीज का मामला सामने नहीं आया है।

मुख्य बिंदु

  • मुख्यमंत्री ने प्रकाश डाला कि गोवा ने कुत्तों में रेबीज के खिलाफ 5,40,593 टीकाकरण हासिल किया है।
  • राज्य ने लगभग एक लाख लोगों को कुत्ते के काटने की रोकथाम के बारे में शिक्षित किया है और 24 घंटे रेबीज निगरानी स्थापित की है जिसमें कुत्ते के काटने वाले पीड़ितों के लिए एक आपातकालीन हॉटलाइन और त्वरित प्रतिक्रिया टीम शामिल है।
  • रेबीज को नियंत्रित करने का कार्य मिशन रेबीज (Mission Rabies) परियोजना द्वारा किया जा रहा था।

मिशन रेबीज (Mission Rabies)

यह एक चैरिटी है, जिसे शुरू में वर्ल्डवाइड वेटरनरी सर्विस (WVS) द्वारा एक पहल के रूप में स्थापित किया गया था। यह यूनाइटेड किंगडम स्थित एक चैरिटी समूह है जो जानवरों की सहायता करता है। मिशन रेबीज ‘वन हेल्थ अप्रोच’ के साथ काम करता है जो कुत्ते के काटने से होने वाली रेबीज बीमारी को खत्म करने के लिए अनुसंधान द्वारा संचालित है। इसे सितंबर 2013 में भारत में रेबीज के खिलाफ 50,000 कुत्तों का टीकाकरण करने के उद्देश्य से शुरू किया गया था। रेबीज के कारणसालाना 59,000 लोगों की मौत हो जाती है। मिशन रेबीज टीमों ने 2013 से 9,68,287 कुत्तों का टीकाकरण किया है। इस संगठन ने तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, गोवा, झारखंड, राजस्थान और असम राज्यों में काम किया है।

रेबीज़

रेबीज़ (अलर्क, जलांतक) एक विषाणु जनित बीमारी है जिस के कारण अत्यंत तेज इन्सेफेलाइटिस (मस्तिष्क का सूजन) इंसानों एवं अन्य गर्म रक्तयुक्त जानवरों में हो जाता है। प्रारंभिक लक्षणों में बुखार और एक्सपोजर के स्थल पर झुनझुनी शामिल हो सकते हैं।इन लक्षणों के बाद निम्नलिखित एक या कई लक्षण होते हैं : हिंसक गतिविधि, अनियंत्रित उत्तेजना, पानी से डर, शरीर के अंगों को हिलाने में असमर्थता, भ्रम, और होश खो देना लक्षण प्रकट होने के बाद, रेबीज़ का परिणाम लगभग हमेशा मौत है। रोग संक्रमण और लक्षणों की शुरुआत के बीच की अवधि आमतौर पर एक से तीन महीने होती है। तथापि, यह समय अवधि एक सप्ताह से कम से लेकर एक वर्ष से अधिक तक में बदल सकती है। यह समय अवधि उस दूरी पर निर्भर करता है जिसे विषाणु के लिए केंद्रीय स्नायुतंत्र तक पहुँचने के लिए तय करना आवश्यक है।

कारण और रोग की पहचान

रेबीज़ इंसानों में अन्य जानवरों से संचारित होता है। जब कोई संक्रमित जानवर किसी अन्य जानवर या इंसान को खरोंचता या काटता है तब रेबीज़ संचारित हो सकता है। किसी संक्रमित जानवर के लार से भी रेबीज़ संचारित हो सकता है यदि लार किसी अन्य जानवर या मनुष्य के श्लेष्मा झिल्ली (Mucous Membrane) के संपर्क में आता है। मनुष्यों में रेबीज़ के अधिकतर मामले कुत्तों के काटने से होते हैं। उन देशों में जहाँ कुत्तों में आम तौर पर रेबीज़ होते हैं, रेबीज़ के 99% से अधिक मामले कुत्तों के काटने से होते हैं। अमेरिका में, मनुष्यों में रेबीज़ संक्रमण का सबसे आम स्रोत चमगादड़ का काटना है, और 5% से कम मामले कुत्तों से होते हैं। कृन्तक (Rodents) बहुत कम ही रेबीज़ से संक्रमित होते हैं। रेबीज़ वायरस परिधीय तंत्रिकाओं (peripheral nerves) के माध्यम से मस्तिष्क तक पहुँचता है। रोग की पहचान केवल लक्षणों की शुरुआत के बाद ही की जा सकती है।

रोकथाम और उपचार

पशु नियंत्रण और टीकाकरण कार्यक्रम से दुनिया के कई क्षेत्रों में कुत्तों से रेबीज़ होने का खतरा कम हुआ है। जो लोग उच्च जोखिम में हैं, उन्हें रोग के संपर्क में आने से पहले प्रतिरक्षित (Immunize) करने की अनुसंशा की जाती है। उच्च जोखिम समूह में वह लोग शामिल हैं जो चमगादड़ों पर काम करते हैं या जो दुनिया के उन क्षेत्रों में लंबी अवधि गुजारते हैं जहाँ रेबीज़ आम है।] उन लोगों में जो रेबीज़ के संपर्क में आते हैं, रेबीज़ के टीके और कभी कभी रेबीज़ इम्युनोग्लोबुलिन रोग से बचाने में प्रभावी रहे हैं यदि रेबीज़ के लक्षणों के आरंभ से पहले व्यक्ति का उपचार होता है। काटने के स्थान और खरोंचों को 15 मिनटों तक साबुन और पानी, पोवीडोन आयोडीन, या डिटर्जेंट से धोना, क्यों कि यह विषाणु को मार सकते हैं, भी कुछ हद तक रेबीज़ के रोक थाम में प्रभावी प्रतीत होता है। लक्षणों के प्रकटन के बाद, केवल कुछ ही व्यक्ति रेबीज़ संक्रमण से बचे हैं। इन का व्यापक उपचार हुआ था जिसे मिल्वौकी प्रोटोकॉल के नाम से जाना जाता है।

रेबीज़ का टीका एक टीका है जो रेबीज़ की रोक थाम में उपयोग किया जाता है। यह बड़ी संख्या में उपलब्ध हैं जो सुरक्षित और प्रभावी दोनों हैं। विषाणु के संपर्क में आने के पहले और संपर्क, जैसे कुत्ते या चमगादड़ का काटना, के बाद एक अवधि के लिए रेबीज़ की रोक थाम में इन का उपयोग किया जा सकता है। तीन खुराक के बाद जो प्रतिरोधक क्षमता विकसित होती है वह लंबे समय तक रहती है। इन्हें आम तौर पर त्वचा या मांसपेशी में इंजेक्शन के द्वारा दिया जाता हैं। संपर्क में आने के बाद टीका आम तौर पर रेबीज़ इम्युनोग्लोबुलिन के साथ प्रयोग किया जाता है। यह अनुसंशा की जाती है कि जो संपर्क में आने के उच्च जोखीम पर हैं वह संपर्क में आने से पहले टीका लगवा लें। मनुष्यों और अन्य जानवरों में टीकाकऱण प्रभावी है। कुत्तों को प्रतिरक्षित करना रोग को मनुष्यों में रोकने में बहुत प्रभावी हैं।

SOURCE-GK TODAY

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