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Current Affair 29 July 2021

Current Affairs – 29 July, 2021

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र  मोदी ने ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020’ के तहत सुधारों का एक वर्ष पूरा होने के अवसर पर आज वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से शिक्षा एवं कौशल विकास के क्षेत्र से जुड़े नीति निर्माताओं, देश भर के विद्यार्थियों और शिक्षकों को संबोधित किया। उन्होंने शिक्षा क्षेत्र में कई पहलों का शुभारंभ भी किया।

नई शिक्षा नीति का एक साल पूरा होने पर देशवासियों और विद्यार्थियों को बधाई दी। साथ ही प्रधानमंत्री ने कोविड-19 के अत्यंत संकट काल में भी नई शिक्षा नीति के क्रियान्वयन के लिए शिक्षकों, प्रोफेसरों, नीति निर्माताओं की कड़ी मेहनत की सराहना की। प्रधानमंत्री ने इस वर्ष ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ के विशेष महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि नई शिक्षा नीति इस महत्वपूर्ण दौर में अहम भूमिका निभाएगी। प्रधानमंत्री ने कहा, ‘भविष्य में हम कितना आगे जाएंगे, कितनी ऊंचाई प्राप्त करेंगे, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि हम अपने युवाओं को वर्तमान में यानी आज कैसी शिक्षा दे रहे हैं, कैसी दिशा दे रहे हैं।’ प्रधानमंत्री ने कहा, ‘मेरा मानना है कि इसका राष्ट्र निर्माण के ‘महायज्ञ’ में अहम योगदान है।’

प्रधानमंत्री ने महामारी की वजह से आए बदलावों को रेखांकित करते हुए कहा कि छात्रों के लिए ऑनलाइन शिक्षण ही अब सामान्य शिक्षण का रूप ले चुका है। दीक्षा एवं स्वयं जैसे पोर्टल पर 2300 करोड़ से ज्यादा हिट्स इस तथ्य के स्पष्ट प्रमाण है।

प्रधानमंत्री ने छोटे शहरों के युवाओं की उपलब्धियों की सराहना की। उन्होंने इन शहरों के युवाओं का टोक्यो ओलंपिक में प्रदर्शन का उदाहरण दिया। उन्होंने रोबोटिक्स, एआई, स्टार्टअप और उद्योग 4.0 जैसे क्षेत्रों में उनके नेतृत्व की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि यदि युवा पीढ़ी को अपने सपने पूरे करने के लिए उचित वातावरण मिलता है, तो उनके आगे बढ़ने की कोई सीमा नहीं होगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि आज का युवा अपनी शर्तों पर, अपनी व्यवस्था व दुनिया बनाना चाहता है। वे बंधनों और प्रतिबंधों से स्वतंत्र होकर खुले वातावरण में जीना चाहते हैं। नई शिक्षा नीति हमारे युवाओं को आश्वस्त करती है कि देश पूरी तरह से उनके और उनके हौसलों के साथ हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिसियल इंटेलीजेंस) कार्यक्रम का आज शुभारंभ हुआ है जो छात्रों को भविष्य की जरूरतों के अनुरूप तैयार करेगा और एआई आधारित अर्थव्यवस्था के लिए मार्ग प्रशस्त करेगा। प्रधानमंत्री ने कहा कि इसी तरह पूरे देश की डिजिटल और तकनीकी रूपरेखा उपलब्ध कराने में राष्ट्रीय डिजिटल शिक्षण संरचना (एनडीईएआर) और राष्ट्रीय शैक्षिक प्रौद्योगिकी फोरम (एनईटीएफ) महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

प्रधानमंत्री ने नई शिक्षा नीति में मौजूद खुलेपन का और उसमें किसी तरह के दबाव की गैर-मौजूदगी का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि इसमें नीति के स्तर पर एक खुलापन है और छात्रों के लिए उपलब्ध विकल्पों में भी खुलापन दिखता है। एक से ज्यादा एंट्री और एग्ज़िट जैसे विकल्प छात्रों को एक कक्षा और एक पाठ्यक्रम में रहने के बंधन से आज़ाद करेंगे। इसी तरह आधुनिक तकनीक आधारित क्रेडिट सिस्टम का एकेडमिक बैंक एक क्रांतिकारी बदलाव लेकर आएगा। इससे छात्रों में अपने स्ट्रीम और विषयों का चुनाव करने को लेकर आत्मविश्वास आएगा। ‘सफल’ (लर्निंग लेवल के विश्लेषण के लिए स्ट्रक्चर्ड असेसमेंट) परीक्षा का डर दूर करेगा। प्रधानमंत्री ने दोहराया कि इन नए कार्यक्रमों में भारत का भाग्य बदलने की क्षमता है।

महात्मा गांधी को उद्धरित करते हुए प्रधानमंत्री ने निर्देश के माध्यम के रूप में स्थानीय भाषाओं के महत्व पर जोर दिया। प्रधानमंत्री ने बताया कि देश के 8 राज्यों के 14 इंजीनियरिंग कॉलेज हिंदी, तमिल, तेलुगू, मराठी और बांग्ला इन 5 भारतीय भाषाओं में शिक्षा देना शुरू कर रहे हैं। इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम का 11 भाषाओं में अनुवाद करने के लिए एक टूल विकसित किया गया है। शिक्षा के माध्यम के रूप में मातृभाषा पर जोर देने से गरीब, ग्रामीण और आदिवासी पृष्ठभूमि के छात्रों में आत्मविश्वास पैदा होगा। यहां तक कि प्राथमिक शिक्षा में भी मातृभाषा को बढ़ावा दिया जा रहा है और आज शुरू किया गया ‘विद्या प्रवेश कार्यक्रम’ उसमें बड़ी भूमिका निभाएगा। उन्होंने ये भी बताया कि भारतीय सांकेतिक भाषा को पहली बार भाषा विषय का दर्जा दिया गया है। छात्र इसे भाषा के रूप में भी पढ़ सकेंगे। 3 लाख से ज्यादा छात्र ऐसे हैं जिन्हें अपनी शिक्षा के लिए सांकेतिक भाषा की जरूरत है। प्रधानमंत्री ने कहा कि इससे भारतीय सांकेतिक भाषा को बढ़ावा मिलेगा और दिव्यांगजनों को मदद मिलेगी।

प्रधानमंत्री ने शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि नई शिक्षा नीति के निर्माण चरण से लेकर उसके क्रियान्वयन तक में शिक्षकों की सक्रिय भूमिका रही हैं। आज लॉन्च किया गया निष्ठा 2.0 शिक्षकों को उनकी जरूरत के अनुसार प्रशिक्षण देगा और साथ ही शिक्षक भी अपने सुझाव विभाग को दे सकेंगे।

प्रधानमंत्री ने अकादमिक बैंक ऑफ क्रेडिट का शुभारंभ किया। जिसके जरिए छात्रों को उच्च शिक्षा में प्रवेश लेने और उससे बाहर निकलने के कई सारे विकल्प मिलेंगे। साथ ही  इंजीनियरिंग की पढ़ाई को पहले साल क्षेत्रीय भाषाओं में कराए जाने और उच्च शिक्षा को अंतर्राष्ट्रीय स्तर का करने के लिए भी दिशानिर्देश जारी किए गए हैं। विद्या प्रवेश नाम से एक और पहल लॉन्च की गई है। इसके तहत ग्रेड-1 के बच्चों के लिए तीन महीने का प्ले स्कूल आधारित शैक्षणिक मॉड्यूल बनाया गया है। इसी तरह माध्यमिक स्तर पर एक विषय के रूप में भारतीय सांकेतिक भाषा की शिक्षा, और शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए एनसीईआरटी द्वारा डिजाइन किया गया एकीकृत प्रशिक्षण कार्यक्रम निष्ठा 2.0,  स्ट्रक्चर्ड एसेसमेंट फॉर एनलाइजिंग लर्निंग लेवल ‘सफल’ (बच्चों के सीखने की प्रक्रिया का सुव्यवस्थित तरीके से विश्लेषण और आंकलन), सीबीएसई स्कूल के ग्रेड-3, ग्रेड-5 और ग्रेड-8 के बच्चों के लिए योग्यता आधारित मूल्यांकन का फ्रेमवर्क है। इसके अलावा आर्टिफिसियल इंटेलीजेंस पर आधारित एक समर्पित वेबसाइट भी है। कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रीय डिजिटल शिक्षण संरचना (एनडीईएआर) और राष्ट्रीय शैक्षिक प्रौद्योगिकी फोरम (एनईटीएफ) का शुभारंभ भी हुआ।

नई शिक्षा नीति, 2020

राष्ट्रीय शिक्षा नीति के प्रमुख बिंदु

स्कूली शिक्षा संबंधी प्रावधान

  • नई शिक्षा नीति में 5 + 3 + 3 + 4 डिज़ाइन वाले शैक्षणिक संरचना का प्रस्ताव किया गया है जो 3 से 18 वर्ष की आयु वाले बच्चों को शामिल करता है।
    • पाँच वर्ष की फाउंडेशनल स्टेज (Foundational Stage) – 3 साल का प्री-प्राइमरी स्कूल और ग्रेड 1, 2
    • तीन वर्ष का प्रीपेट्रेरी स्टेज (Prepatratory Stage)
    • तीन वर्ष का मध्य (या उच्च प्राथमिक) चरण – ग्रेड 6, 7, 8 और
    • 4 वर्ष का उच (या माध्यमिक) चरण – ग्रेड 9, 10, 11, 12
  • NEP 2020 के तहत HHRO द्वारा ‘बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक ज्ञान पर एक राष्ट्रीय मिशन’ (National Mission on Foundational Literacy and Numeracy) की स्थापना का प्रस्ताव किया गया है। इसके द्वारा वर्ष 2025 तक कक्षा-3 स्तर तक के बच्चों के लिये आधारभूत कौशल सुनिश्चित किया जाएगा।

भाषायी विविधता का संरक्षण

  • NEP-2020 में कक्षा-5 तक की शिक्षा में मातृभाषा/स्थानीय या क्षेत्रीय भाषा को अध्ययन के माध्यम के रूप में अपनाने पर बल दिया गया है। साथ ही इस नीति में मातृभाषा को कक्षा-8 और आगे की शिक्षा के लिये प्राथमिकता देने का सुझाव दिया गया है।
  • स्कूली और उच्च शिक्षा में छात्रों के लिये संस्कृत और अन्य प्राचीन भारतीय भाषाओं का विकल्प उपलब्ध होगा परंतु किसी भी छात्र पर भाषा के चुनाव की कोई बाध्यता नहीं होगी।

शारीरिक शिक्षा

  • विद्यालयों में सभी स्तरों पर छात्रों को बागवानी, नियमित रूप से खेल-कूद, योग, नृत्य, मार्शल आर्ट को स्थानीय उपलब्धता के अनुसार प्रदान करने की कोशिश की जाएगी ताकि बच्चे शारीरिक गतिविधियों एवं व्यायाम वगैरह में भाग ले सकें।

पाठ्यक्रम और मूल्यांकन संबंधी सुधार

  • इस नीति में प्रस्तावित सुधारों के अनुसार, कला और विज्ञान, व्यावसायिक तथा शैक्षणिक विषयों एवं पाठ्यक्रम व पाठ्येतर गतिविधियों के बीच बहुत अधिक अंतर नहीं होगा।
  • कक्षा-6 से ही शैक्षिक पाठ्यक्रम में व्यावसायिक शिक्षा को शामिल कर दिया जाएगा और इसमें इंटर्नशिप (Internship) की व्यवस्था भी की जाएगी।
  • ‘राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद’ (National Council of Educational Research and Training- NCERT) द्वारा ‘स्कूली शिक्षा के लिये राष्ट्रीय पाठ्यक्रम रूपरेखा’ (National Curricular Framework for School Education) तैयार की जाएगी।
  • छात्रों के समग्र विकास के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए कक्षा-10 और कक्षा-12 की परीक्षाओं में बदलाव किया जाएगा। इसमें भविष्य में समेस्टर या बहुविकल्पीय प्रश्न आदि जैसे सुधारों को शामिल किया जा सकता है।
  • छात्रों की प्रगति के मूल्यांकन के लिये मानक-निर्धारक निकाय के रूप में ‘परख’ (PARAKH) नामक एक नए ‘राष्ट्रीय आकलन केंद्र’ (National Assessment Centre) की स्थापना की जाएगी।
  • छात्रों की प्रगति के मूल्यांकन तथा छात्रों को अपने भविष्य से जुड़े निर्णय लेने में सहायता प्रदान करने के लिये ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ (Artificial Intelligence- AI) आधारित सॉफ्टवेयर का प्रयोग।

शिक्षण व्यवस्था से संबंधित सुधार

  • शिक्षकों की नियुक्ति में प्रभावी और पारदर्शी प्रक्रिया का पालन तथा समय-समय पर किये गए कार्य-प्रदर्शन आकलन के आधार पर पदोन्नति।
  • राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद द्वारा वर्ष 2022 तक ‘शिक्षकों के लिये राष्ट्रीय व्यावसायिक मानक’ (National Professional Standards for Teachers- NPST) का विकास किया जाएगा।
  • राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद द्वारा NCERT के परामर्श के आधार पर ‘अध्यापक शिक्षा हेतु राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा’ [National Curriculum Framework for Teacher Education-NCFTE) का विकास किया जाएगा।
  • वर्ष 2030 तक अध्यापन के लिये न्यूनतम डिग्री योग्यता 4-वर्षीय एकीकृत बी.एड. डिग्री का होना अनिवार्य किया जाएगा।

उच्च शिक्षा से संबंधित प्रावधान

  • NEP-2020 के तहत उच्च शिक्षण संस्थानों में ‘सकल नामांकन अनुपात’ (Gross Enrolment Ratio) को 3% (वर्ष 2018) से बढ़ाकर 50% तक करने का लक्ष्य रखा गया है, इसके साथ ही देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में 3.5 करोड़ नई सीटों को जोड़ा जाएगा।
  • NEP-2020 के तहत स्नातक पाठ्यक्रम में मल्टीपल एंट्री एंड एक्ज़िट व्यवस्था को अपनाया गया है, इसके तहत 3 या 4 वर्ष के स्नातक कार्यक्रम में छात्र कई स्तरों पर पाठ्यक्रम को छोड़ सकेंगे और उन्हें उसी के अनुरूप डिग्री या प्रमाण-पत्र प्रदान किया जाएगा (1 वर्ष के बाद प्रमाण-पत्र, 2 वर्षों के बाद एडवांस डिप्लोमा, 3 वर्षों के बाद स्नातक की डिग्री तथा 4 वर्षों के बाद शोध के साथ स्नातक)।
  • विभिन्न उच्च शिक्षण संस्थानों से प्राप्त अंकों या क्रेडिट को डिजिटल रूप से सुरक्षित रखने के लिये एक ‘एकेडमिक बैंक ऑफ क्रेडिट’ (Academic Bank of Credit) दिया जाएगा, ताकि अलग-अलग संस्थानों में छात्रों के प्रदर्शन के आधार पर उन्हें डिग्री प्रदान की जा सके।
  • नई शिक्षा नीति के तहत एम.फिल. (Phil) कार्यक्रम को समाप्त कर दिया गया।

भारतीय उच्च शिक्षा आयोग

नई शिक्षा नीति (NEP) में देश भर के उच्च शिक्षा संस्थानों के लिये एक एकल नियामक अर्थात् भारतीय उच्च शिक्षा परिषद (Higher Education Commision of India-HECI) की परिकल्पना की गई है जिसमें विभिन्न भूमिकाओं को पूरा करने हेतु कई कार्यक्षेत्र होंगे। भारतीय उच्च शिक्षा आयोग चिकित्सा एवं कानूनी शिक्षा को छोड़कर पूरे उच्च शिक्षा क्षेत्र के लिये एक एकल निकाय (Single Umbrella Body) के रूप में कार्य करेगा।

HECI के कार्यों के प्रभावी निष्पादन हेतु चार निकाय-

  • राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा नियामकीय परिषद (National Higher Education Regulatroy Council-NHERC) : यह शिक्षक शिक्षा सहित उच्च शिक्षा क्षेत्र के लिये एक नियामक का कार्य करेगा।
  • सामान्य शिक्षा परिषद (General Education Council – GEC) : यह उच्च शिक्षा कार्यक्रमों के लिये अपेक्षित सीखने के परिणामों का ढाँचा तैयार करेगा अर्थात् उनके मानक निर्धारण का कार्य करेगा।
  • राष्ट्रीय प्रत्यायन परिषद (National Accreditation Council – NAC) : यह संस्थानों के प्रत्यायन का कार्य करेगा जो मुख्य रूप से बुनियादी मानदंडों, सार्वजनिक स्व-प्रकटीकरण, सुशासन और परिणामों पर आधारित होगा।
  • उच्चतर शिक्षा अनुदान परिषद (Higher Education Grants Council – HGFC) : यह निकाय कॉलेजों एवं विश्वविद्यालयों के लिये वित्तपोषण का कार्य करेगा।

नोट: गौरतलब है कि वर्तमान में उच्च शिक्षा निकायों का विनियमन विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी), अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) और राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) जैसे निकायों के माध्यम से किया जाता है।

  • देश में आईआईटी (IIT) और आईआईएम (IIM) के समकक्ष वैश्विक मानकों के ‘बहुविषयक शिक्षा एवं अनुसंधान विश्वविद्यालय’ (Multidisciplinary Education and Reserach Universities – MERU) की स्थापना की जाएगी।

विकलांग बच्चों हेतु प्रावधान

  • इस नई नीति में विकलांग बच्चों के लिये क्रास विकलांगता प्रशिक्षण, संसाधन केंद्र, आवास, सहायक उपकरण, उपर्युक्त प्रौद्योगिकी आधारित उपकरण, शिक्षकों का पूर्ण समर्थन एवं प्रारंभिक से लेकर उच्च शिक्षा तक नियमित रूप से स्कूली शिक्षा प्रक्रिया में भागीदारी सुनिश्चित करना आदि प्रक्रियाओं को सक्षम बनाया जाएगा।

डिजिटल शिक्षा से संबंधित प्रावधान

  • एक स्वायत्त निकाय के रूप में ‘‘राष्ट्रीय शैक्षिक प्रौद्योगिकी मंच’’ (National Educational Technol Foruem) का गठन किया जाएगा जिसके द्वारा शिक्षण, मूल्यांकन योजना एवं प्रशासन में अभिवृद्धि हेतु विचारों का आदान-प्रदान किया जा सकेगा।
  • डिजिटल शिक्षा संसाधनों को विकसित करने के लिये अलग प्रौद्योगिकी इकाई का विकास किया जाएगा जो डिजिटल बुनियादी ढाँचे, सामग्री और क्षमता निर्माण हेतु समन्वयन का कार्य करेगी।

पारंपरिक ज्ञान-संबंधी प्रावधान

भारतीय ज्ञान प्रणालियाँ, जिनमें जनजातीय एवं स्वदेशी ज्ञान शामिल होंगे, को पाठ्यक्रम में सटीक एवं वैज्ञानिक तरीके से शामिल किया जाएगा।

विशेष बिंदु

  • आकांक्षी जिले (Aspirational districts) जैसे क्षेत्र जहाँ बड़ी संख्या में आर्थिक, सामाजिक या जातिगत बाधाओं का सामना करने वाले छात्र पाए जाते हैं, उन्हें ‘विशेष शैक्षिक क्षेत्र’ (Special Educational Zones) के रूप में नामित किया जाएगा।
  • देश में क्षमता निर्माण हेतु केंद्र सभी लड़कियों और ट्रांसजेंडर छात्रों को समान गुणवत्ता प्रदान करने की दिशा में एक ‘जेंडर इंक्लूजन फंड’ (Gender Inclusion Fund) की स्थापना करेगा।
  • गौरतलब है कि 8 वर्ष की आयु के बच्चों के लिये प्रारंभिक बचपन देखभाल और शिक्षा हेतु एक राष्ट्रीय पाठ्य चर्या और शैक्षणिक ढाँचे का निर्माण एनसीआरटीई द्वारा किया जाएगा।

वित्तीय सहायता

  • एससी, एसटी, ओबीसी और अन्य सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित समूहों से संबंधित मेधावी छात्रों को प्रोत्साहन के रूप में वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986

  • इस नीति का उद्देश्य असमानताओं को दूर करने विशेष रूप से भारतीय महिलाओं, अनुसूचित जनजातियों और अनुसूचित जाति समुदायों के लिये शैक्षिक अवसर की बराबरी करने पर विशेष ज़ोर देना था।
  • इस नीति ने प्राथमिक स्कूलों को बेहतर बनाने के लिये “ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड” लॉन्च किया।
  • इस नीति ने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय के साथ ओपन यूनिवर्सिटी प्रणाली का विस्तार किया।
  • ग्रामीण भारत में जमीनी स्तर पर आर्थिक और सामाजिक विकास को बढ़ावा देने के लिये महात्मा गांधी के दर्शन पर आधारित “ग्रामीण विश्वविद्यालय” मॉडल के निर्माण के लिये नीति का आह्वान किया गया।

पूर्ववर्ती शिक्षा नीति में परिवर्तन की आवश्यकता क्यों?

  • बदलते वैश्विक परिदृश्य में ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिये मौजूदा शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन की आवश्यकता थी।
  • शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने, नवाचार और अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिये नई शिक्षा नीति की आवश्यकता थी।
  • भारतीय शिक्षण व्यवस्था की वैश्विक स्तर पर पहुँच सुनिश्चित करने के लिये शिक्षा के वैश्विक मानकों को अपनाने के लिये शिक्षा नीति में परिवर्तन की आवश्यकता थी।

नई शिक्षा नीति से संबंधित चुनौतियाँ

  • राज्यों का सहयोगः शिक्षा एक समवर्ती विषय होने के कारण अधिकांश राज्यों के अपने स्कूल बोर्ड हैं इसलिये इस फैसले के वास्तविक कार्यान्वयन हेतु राज्य सरकारों को सामने आना होगा। साथ ही शीर्ष नियंत्रण संगठन के तौर पर एक राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा नियामक परिषद को लाने संबंधी विचार का राज्यों द्वारा विरोध हो सकता है।
  • महँगी शिक्षाः नई शिक्षा नीति में विदेशी विश्वविद्यालयों में प्रवेश का मार्ग प्रशस्त किया गया है। विभिन्न शिक्षाविदों का मानना है कि विदेशी विश्वविद्यालयों में प्रवेश से भारतीय शिक्षण व्यवस्था के महँगी होने की आशंका है। इसके फलस्वरूप निम्न वर्ग के छात्रों के लिये उच्च शिक्षा प्राप्त करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
  • शिक्षा का संस्कृतिकरणः दक्षिण भारतीय राज्यों का यह आरोप है कि ‘त्रि-भाषा’ सूत्र से सरकार शिक्षा का संस्कृतिकरण करने का प्रयास कर रही है।
  • फंडिंग संबंधी जाँच का अपर्याप्त होनाः कुछ राज्यों में अभी भी शुल्क संबंधी विनियमन मौजूद है, लेकिन ये नियामक प्रक्रियाएँ असीमित दान के रूप में मुनाफाखोरी पर अंकुश लगाने में असमर्थ हैं।
  • वित्तपोषणः वित्तपोषण का सुनिश्चित होना इस बात पर निर्भर करेगा कि शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय के रूप में जीडीपी के प्रस्तावित 6%खर्च करने की इच्छाशक्ति कितनी सशक्त है।
  • मानव संसाधन का अभावः वर्तमान में प्रारंभिक शिक्षा के क्षेत्र में कुशल शिक्षकों का अभाव है, ऐसे में राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 के तहत प्रारंभिक शिक्षा हेतु की गई व्यवस्था के क्रियान्वयन में व्यावहारिक समस्याएँ भी हैं।

SOURCE-PIB

 

भारत का पहला ग्रीन हाइड्रोजन फ्यूलिंग स्टेशन

एनटीपीसी की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन रिन्यूएबल एनर्जी लिमिटेड (एनटीपीसी आरईएल) ने लद्दाख के लेह में भारत का पहला ग्रीन हाइड्रोजन फ्यूलिंग स्टेशन स्थापित करने के लिए एक घरेलू निविदा आमंत्रित की है। बोली से संबंधित दस्तावेजों की बिक्री 31 जुलाई 2021 से आरंभ होगी।

यह निविदा एनटीपीसी विद्युत व्यापार निगम लिमिटेड (एनवीवीएन) द्वारा लद्दाख के लिए फ्यूल सेल बसों की खरीद के लिए हाल ही में जारी निविदा के बाद जारी की गई है। एनटीपीसी आरईएल और एनवीवीएन संयुक्त रूप से केन्द्र शासित प्रदेश लद्दाख में ग्रीन मोबिलिटी प्रोजेक्ट को क्रियान्वित करेंगी। हाइड्रोजन फ्यूलिंग स्टेशन को पूरी तरह से ग्रीन बनाने के लिए एनटीपीसी आरईएल द्वारा लेह में 1.25 मेगावाट का एक समर्पित सौर संयंत्र भी स्थापित किया जा रहा है। सोलर प्लांट का अनुबंध एक महीने के भीतर दिए जाने की उम्मीद है।

एनटीपीसी आरईएल इससे पहले ऊंचाई वाले क्षेत्र में ग्रीन हाइड्रोजन टेक्नोलॉजी के विकास के लिए केन्द्र शासित प्रदेश लद्दाख के साथ एक ऐतिहासिक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर कर चुकी है। इस परियोजना के सफल समापन से लेह और उसके आसपास के क्षेत्रों में उत्सर्जन मुक्त परिवहन के एक नए युग की शुरुआत होगी और भारत इस प्रतिष्ठित क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाने वाले कुछ देशों में शामिल हो जाएगा।

यह परियोजना इस क्षेत्र में एक स्वच्छ और हरित इको-सिस्टम के निर्माण की दिशा में एक निर्णायक कदम होगा। परियोजना के सफल निष्पादन से केन्द्र शासित प्रदेश लद्दाख की परिवहन समस्याओं में भी कमी आएगी और यह क्षेत्र में पर्यटन को बढ़ावा देने वाला एकबड़ा कदम साबित होगा।

SOURCE-PIB

 

दिवाला और दिवालियापन संहिता (संशोधन)
विधेयक
2021

28 जुलाई, 2021, लोकसभा ने दिवाला और दिवालियापन संहिता (संशोधन) विधेयक 2021 (Insolvency and Bankruptcy Code (Amendment) Bill 2021) पारित किया। इस विधेयक द्वारा दिवाला और दिवालियापन संहिता (संशोधन) अध्यादेश 2021 की जगह ली जाएगी।

मुख्य बिंदु

  • दिवाला (Insolvency) एक ऐसी स्थिति है जहां कोई कंपनी या व्यक्ति अपने कर्ज का भुगतान करने में असमर्थ होते हैं।
  • सरकार ने अधिसूचित किया है कि एक पूर्व-पैक समाधान प्रक्रिया (pre-packaged resolution process) की शुरुआत के लिए एक डिफ़ॉल्ट की सीमा जो 1 करोड़ रुपये से अधिक नहीं है, अपरिवर्तित बनी हुई है।
  • 4 अप्रैल, 2021 को सरकार एक अध्यादेश पेश किया था जिसके तहत सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) के लिए पूर्व-पैक समाधान प्रक्रिया (pre-packaged resolution process) की व्यवस्था की गयी थी।
  • इस अध्यादेश के तहत, एक प्री-पैकेज्ड इन्सॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन प्रोसेस (PIRP) स्थापित किया गया था जो एक वैकल्पिक MSME इनसॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन प्रोसेस प्रदान करता है।

प्री-पैक्ड दिवाला समाधान तंत्र (pre-packed insolvency resolution mechanism) क्या है?

प्री-पैक्ड इनसॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन मैकेनिज्म एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें NCLT से मंजूरी लेने से पहले ऋणदाता और देनदार के बीच एक समाधान व्यवस्था तय की जाती है। इस प्री-पैक फ्रेमवर्क के तहत, एक देनदार ऋणदाता के साथ मिलकर समाधान की कार्यवाही शुरू करेगा और उसमें भाग लेगा। यह एक अनौपचारिक प्रक्रिया के माध्यम से किया जाता है जो महंगी और लंबी अदालती प्रक्रियाओं से बचने में मदद करता है।

कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (Corporate Insolvency Resolution Process – CIRP)

जैसा कि दिवाला और दिवालियापन संहिता (Insolvency and Bankruptcy Code – IBC) में कहा गया है, मौजूदा कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) के तहत, समाधान प्रक्रिया को पूरा करने के लिए अधिकतम 270 दिन प्रदान किए जाते हैं। प्रशासन का नियंत्रण लेने के लिए एक समाधान पेशेवर (resolution professional) की नियुक्ति की जाती है और प्रवर्तकों को पद छोड़ना पड़ता है। नियुक्त किया गया समाधान पेशेवर तब समाधान और बोली प्रक्रिया का प्रबंधन करता है, जिसमें आमतौर पर कई महीने लगते हैं। नई प्री-पैक योजना के तहत, समाधान के लिए समय सीमा कम हो जाएगी और प्रतिभागियों को समाधान योजना प्रस्तुत करने के लिए 90 दिन का समय मिलेगा और NCLT उन्हें अगले 30 दिनों में स्वीकृत करेगा।

MSME के लिए नियम

एक MSME, जिसने अपने 10 लाख रुपये के भुगतान दायित्व को पूरा नहीं किया है, वह या तो उधारदाताओं की मंजूरी के साथ एक प्री-पैक दिवालियापन समाधान योजना शुरू कर सकता है या ऋणदाता जो व्यवसाय के 66% ऋण का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, वे स्वयं प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं।

SOURCE-GK TODAY

 

जमा बीमा ऋण गारंटी निगम विधेयक 2021

28 जुलाई, 2021 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने देश के जमा बीमा कानूनों (deposit insurance laws) में परिवर्तन को मंजूरी दे दी। इन परिवर्तनों के अनुसार, किसी बैंक को RBI द्वारा स्थगन (moratorium) के तहत रखे जाने की स्थिति में 90 दिनों के भीतर खाताधारक को 5 लाख रुपये तक की धनराशि प्रदान की जाएगी।

मुख्य बिंदु

  • पहले, खाताधारकों को अपनी बीमित जमा राशि प्राप्त करने के लिए संकटग्रस्त ऋणदाता के पुनर्गठन (restructuring) या परिसमापन (liquidation) तक वर्षों तक इंतजार करना पड़ता था।
  • जमा बीमा प्रीमियम में भी तत्काल प्रभाव से 20% और अधिकतम प्रीमियम सीमा 50% की वृद्धि की गई है।
  • इस प्रीमियम का भुगतान विभिन्न बैंकों द्वारा DICGC को किया जाता है।
  • केंद्र ने संसद के चालू सत्र में जमा बीमा और ऋण गारंटी निगम (संशोधन) विधेयक 2021 (Deposit Insurance Credit Guarantee Corporation Bill 2021) पेश करने की योजना बनाई है।
  • वर्ष 2020 में जमा बीमा कवर को 1 लाख रुपये से बढ़ा कर 5 लाख रुपये दिया गया था।
  • जमाकर्ताओं को आम तौर पर अपनी जमा राशि प्राप्त करने से पहले किसी संकटग्रस्त बैंक के परिसमापन के लिए 8 से 10 साल तक इंतजार करना पड़ता है। नियम में इस बदलाव के साथ, 90 दिनों के भीतर जमाकर्ताओं को संकटग्रस्त बैंकों के परिसमापन की प्रतीक्षा किए बिना बीमा राशि मिल जाएगी।
  • बैंक को स्थगन के तहत रखने के साथ, पहले 45 दिनों में, DICGC सभी जमा खातों से संबंधित जानकारी एकत्र करेगा। फिर अगले 45 दिनों में जानकारी की समीक्षा की जाएगी और जमाकर्ताओं को 90 दिनों के भीतर भुगतान किया जाएगा।
  • वर्तमान में, बीमा कवर के प्रीमियम के रूप में, बैंक प्रत्येक 100 रुपये की जमा राशि पर DICGC को 10 पैसे का भुगतान करते हैं। इसे हर 100 रुपये पर बढ़ाकर 12 पैसे किया जा रहा है।

DICGC द्वारा किसका बीमा किया जाता है?

DICGC निजी और सार्वजनिक बैंकों, छोटे वित्त बैंकों, स्थानीय क्षेत्र के बैंकों, सहकारी बैंकों, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों, भुगतान बैंकों के साथ-साथ विदेशी बैंकों की भारतीय शाखाओं में जमा राशि का बीमा करता है।

DICGC

DICGC भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी है और इसकी स्थापना वर्ष 1978 में हुई थी। DICGC भारत में कार्यरत सभी बैंकों का बीमा करता है। वर्तमान में RBI के डिप्टी गवर्नर माइकल पात्रा में इसके अध्यक्ष हैं।

SOURCE-THE HINDU

 

IMF World Economic Outlook

27 जुलाई को अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund – IMF) ने वित्तीय वर्ष 2021-22 के लिए भारत की जीडीपी विकास दर के पूर्वानुमान को घटाकर 9.5% किया है। इससे पहले, IMF  ने 12.5% जीडीपी वृद्धि का अनुमान लगाया था।

भारत से संबंधित मुख्य बिंदु

  • COVID-19 महामारी की दूसरी लहर के कारण आर्थिक गतिविधियों पर असर का हवाला देते हुए जीडीपी पूर्वानुमान में कटौती की गई है।
  • मार्च से मई के महीनों के दौरान दूसरी लहर के कारण भारत की विकास संभावना कम हो गई है और उम्मीद है कि रिकवरी धीमी होगी।
  • इस रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर के किसी भी देश में तब तक स्थिर रिकवरी का आश्वासन नहीं दिया जाता है जब तक कि आबादी COVID-19 वायरस और इसके विभिन्न उत्परिवर्तन के प्रति संवेदनशील रहती है।
  • वित्तीय वर्ष 2022-23 के लिए, आईएमएफ को 5% की आर्थिक वृद्धि की उम्मीद है, जो कि अप्रैल में उनके द्वारा अनुमानित 6.9% से अधिक है।
  • S&P ग्लोबल रेटिंग्स ने वित्त वर्ष 2021-22 में जीडीपी में 5% और वित्तीय वर्ष 2022-23 में 7.8% की वृद्धि का अनुमान लगाया है।
  • RBI ने भी 5% की वृद्धि का अनुमान लगाया है।
  • विश्व बैंक ने वित्त वर्ष 22 के लिए भारत की जीडीपी वृद्धि 3% रहने का अनुमान लगाया है।
  • एशियाई विकास बैंक (ADB) ने भारत के आर्थिक विकास के अनुमान को 11% से घटाकर 10% कर दिया है।

विश्व अर्थव्यवस्था

IMF द्वारा प्रकाशित नवीनतम वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक रिपोर्ट में, वैश्विक अर्थव्यवस्था की वृद्धि वर्ष 2021 में 6% और वर्ष 2022 के लिए 4.9% रहने का अनुमान लगाया गया है। IMF की मुख्य अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ ने कहा है कि वैश्विक स्तर पर आर्थिक सुधार जारी है, लेकिन यह अंतर विकासशील, उभरती और उन्नत अर्थव्यवस्थाओं के बीच की खाई को चौड़ा कर रहा है। IMF ने अनुमान लगाया है कि इस COVID-19 महामारी ने दुनिया की सभी उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में प्रति व्यक्ति आय में 2.8% की कमी की है।

SOURCE-DANIK JAGRAN

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