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Current Affair 4 April 2021

4 April Current Affairs

एज-केयर इंडिया

केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने आज इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, नई दिल्ली में एज-केयर इंडिया और वृद्धजन दिवस समारोह की 40वीं वर्षगांठ को संबोधित किया। उन्होंने पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित और सीताराम भारतीय इंस्टीट्यूट एवं प्रोफेसर एमेरिटस, राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी के वरिष्ठ सलाहकार प्रोफेसर (डॉ.) जे. एस. गुलेरिया और इंटरनल मेडिसिन के वरिष्ठ सलाहकार डॉ. जी. पी. सेठ को “सबसे प्रतिष्ठित वरिष्ठ नागरिक” पुरस्कार दिया।

उन्होंने देश के बुजुर्गों के लिए एज-केयर इंडिया के अच्छे काम की भी प्रशंसा की।

डॉ. हर्षवर्धन ने महामारी के दौरान स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के योगदान और बलिदान को भी याद किया। उन्होंने विशेषकर उन माताओं के योगदान का उल्लेख किया, जिन्होंने कोविड-19 महामारी के दौरान कष्टों को सहन किया और चिकित्सा पेशे में उनके बेटे एवं बेटियों के जोखिमों को जानने के बावजूद उन्होंने कभी भी कोविड मरीजों का इलाज करने से इनकार करने के लिए उन्हे नहीं कहा। उन्होंने आगे कहा, “ईश्वर सर्वव्यापी है और यह साबित करने के लिए कि वह सर्वव्यापी है, उन्होंने माताओं की रचना की।”

कोविड-19 के चलते सामने आने वाली चुनौतियों के सामने सफलता के बारे में विस्तार से बताते हुए केंद्रीय मंत्री ने इस बात को रेखांकित किया कि डब्ल्यूएचओ ने जैसे ही चीन में निमोनिया के संदिग्ध मामले को अधिसूचित किया, उसी वक्त स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने कार्रवाई शुरू कर दी और 48 घंटों के भीतर एक विशेषज्ञ समूह का गठन किया। उन्होंने समारोह में उपस्थित लोगों को यह भी बताया कि 10 लाख से अधिक लोगों की जांच नियमित रूप से की जा रही है और देश भर में महामारी की शुरुआत में इसकी जांच के लिए प्रयोगशाला की संख्या एक से बढ़कर अब 2000 से अधिक हो गई है।

मंत्री ने यह भी याद किया कि भारत ने महामारी की चरम स्थिति में 150 से अधिक देशों को हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन का निर्यात किया था। उन्होंने इस बात को भी रेखांकित किया कि भारत ने जहां देश में 7.5 करोड़ खुराकें दी हैं, वहीं 6.5 करोड़ से अधिक खुराक अन्य देशों को भेजी गई हैं।

वृद्धजनों की स्वास्थ्य संबंधी देखभाल को लेकर मौजूदा सरकार की प्रतिबद्धता पर केंद्रीय मंत्री ने कहा, “वृद्धजनों एवं सह-रुग्णता वाले लोगों को टीकाकरण के लिए प्राथमिकता दी जा रही है। सरकार सभी लोगों और विशेष रूप से देश के वृद्धजनों के कल्याण को लेकर प्रतिबद्ध है।” उन्होंने इस बात की भी जानकारी दी कि केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय पहले से ही वृद्धजनों की विभिन्न स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को दूर करने के लिए समर्पित एक कार्यक्रम “वृद्धजनों के लिए स्वास्थ्य देखभाल संबंधी राष्ट्रीय कार्यक्रम” (एनपीएचसीई) का संचालन कर रहा है।

प्रावधान

भारत के संविधान में वृद्धजनों के कल्याण का प्रावधान है। राज्य के नीति निर्देशित तत्त्व (अनूच्छेद 41) के अनुसार राज्य अपनी आर्थिक क्षमता एवं विकास को ध्यान में रखते हुए वृद्धजनों हेतु सरकारी सहायता का अधिकार सुनिश्चित करेंगे। इसके अतिरिक्त अन्य प्रावधान भी है जो राज्य को निर्देशित करते है कि वह अपने नागरिकों के जीवन में गुणात्मक सुधार लाएं। हमारे संविधान में समानता का अधिकार एक मौलिक अधिकार है। इसके प्रावधान वृद्धों के लिए भी प्रभावी है और सामाजिक सुरक्षा का दायित्व राज्य एवं केंद्र सरकारों पर सामान रूप से है।

विगत दो दशकों में वृद्धजनों की दशा पर जनांकिक सामाजिक एवं आर्थिक परिवर्तन के प्रभाव जैसे मुद्दें पर गहन विचार विमर्श एवं बाद-विवाद हुए है। संयुक्त राष्ट्र संघ विभिन्न देशों को समय–समय पर वृद्धजनों के लिए नीति बनाकर तदनुसार कार्यक्रम चलाने के लिए
उत्साहित करता रहा है। संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा सन 1991 में वृद्धजनों के लिए संयुक्त राष्ट्र की नीति अपनायी गई। 1992 में महासभा द्वारा वृधावस्था पर एक घोषणा पत्र एवं सन 2001 के लिए वृद्धावस्था पर वैश्विक लक्ष्य जैसे कार्यक्रम बनाए गए। इसके अलावा अन्य कार्यक्रम बनाए गए। इसके अलावा अन्य कार्यक्रम भी निर्धारित किए गए।

वरिष्ठ नागरिकों के संबंध में राज्य नीति का विवरण जैसी मांग कई वर्षों से उठायी जा रही है इसका उद्देश्य है ऐसे नागरिकों को उनकी पहचान बनाए रखने में मदद करना और राष्ट्रीय परिदृश्य में उनकी स्थिति बरकरार रखना। विभिन्न मंचो पर वृद्धावस्था के मुददे उठाए गए जहाँ संबंधित नीतियों के विवरण की आवश्यकता पर बल दिया गया। इस विविरण में नीतिगत बातों का आधारभूत सिद्धांत दिशा एवं आवश्यकता का खुलासा होगा। सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थानों की अपिक्षित भूमिका तय होगी। इस प्रकार मानवोचित ढंग से एकीकृत समाज के निर्माण में विभिन्न कार्यक्रम एवं उनका संचालन करने वाले संस्थानों का दायित्व निश्चित किया जाएगा।

Source –PIB

 

छत्तीसगढ़ में हुई नक्सलियों

केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह ने तीन अप्रैल को छत्तीसगढ़ में हुई नक्सलियों के साथ मुठभेड़ में शहीद जवानों को श्रद्धांजलि दी। श्री अमित शाह ने कहा कि शहीदों के परिवार जनों को और देश को विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि जवानों ने देश के लिए जो अपना बलिदान दिया है वो व्यर्थ नहीं जाएगा। श्री अमित शाह ने कहा कि नक्सलियों के खिलाफ हमारी लड़ाई और मजबूती, दृढ़ता तथा तीव्रता के साथ जारी रहेगी और हम इसको परिणाम तक ले जाएंगे।

इससे पहले नक्सल ऑपरेशन के डीजी अशोक जुनेजा ने बताया था कि “घटनास्थल पर पहुँची सुरक्षा बलों की टीम को आज (रविवार सुबह) 20 शव बरामद हुए। इसके अलावा ख़बर मिली है कि मुठभेड़ के बाद माओवादी अपने घायल साथियों को तीन ट्रैक्टर-ट्रालियों की मदद से ले गये थे। इस घटना की जाँच की जा रही है।” उन्होंने बताया कि एक किलोमीटर के दायरे में कई जगह जवानों के शव पड़े हुए थे, जिन्हें मौक़े पर पहुँची एसटीएफ़ की टीम ने बरामद किया। पिछले कुछ सालों में छत्तीसगढ़ में यह माओवादियों का सबसे बड़ा हमला माना जा रहा है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने माओवादियों से मुठभेड़ में जवानों की मौत पर दुख व्यक्त किया है।

प्रधानमंत्री मोदी ने इस घटना के बाद एक ट्वीट में लिखा, “छत्तीसगढ़ में माओवादियों से लड़ते हुए शहीद हुए जवानों के परिवारों के साथ मेरी संवेदनाएं हैं। वीर शहीदों की कुर्बानियों को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। घायलों के जल्द से जल्द स्वस्थ होने की कामना करता हूँ।”

पहले भी बड़े माओवादी हमले होते रहे हैं छत्तीसगढ़ नक्सलवाद से प्रभावित रहा है और

पहले भी इस तरह के बड़े माओवादी हमले होते रहे हैं।

श्यामगिरी : 9 अप्रैल 2019

दंतेवाड़ा के लोकसभा चुनाव में मतदान से ठीक पहले नक्सलियों ने चुनाव प्रचार के लिए जा रहे भाजपा विधायक भीमा मंडावी की कार पर हमला किया था। माओवादियों के इस हमले में भीमा मंडावी के अलावा उनके चार सुरक्षाकर्मी भी मारे गये थे।

दुर्गपाल : 24 अप्रैल 2017

सुकमा ज़िले के दुर्रपाल के पास नक्सलियों द्वारा घात लगाकर किए गए हमले में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के 25 जवान उस समय मारे गये, जब वे सड़क निर्माण में सुरक्षा के बीच खाना खा रहे थे।

दरभा : 25 मई 2013

बस्तर के दरभा घाटी में हुए इस माओवादी हमले में आदिवासी नेता महेंद्र कर्मा, कांग्रेस पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष नंद कुमार पटेल, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल समेत 30 लोग मारे गए थे।

धोड़ाई : 29 जून 2010

नारायणपुर जिले के धोड़ाई में सीआरपीएफ के जवानों पर माओवादियों ने हमला किया. इस हमले में पुलिस के 27 जवान मारे गए।

दंतेवाड़ा : 17 मई 2010

एक यात्री बस में सवार हो कर दंतेवाड़ा से सुकमा जा रहे सुरक्षा बल के जवानों पर माओवादियों ने बारूदी सुरंग लगा कर हमला किया था, जिसमें 12 विशेष पुलिस अधिकारी समेत 36 लोग मारे गए थे।

ताड़मेटला : 6 अप्रैल 2010

बस्तर के ताड़मेटला में सीआरपीएफ के जवान सर्चिंग के लिए निकले थे, जहां संदिग्ध माओवादियों ने बारुदी सुरंग लगा कर 76 जवानों को मार डाला था।

मदनवाड़ा : 12 जुलाई 2009

राजनांदगांव के मानपुर इलाके में माओवादियों के हमले की सूचना पा कर पहुंचे पुलिस अधीक्षक विनोद कुमार चौबे समेत 29 पुलिसकर्मियों पर माओवादियों ने हमला बोला और उनकी हत्या कर दी।

उरपलमेटा : 9 जुलाई 2007

एर्राबोर के उरपलमेटा में सीआरपीएफ और ज़िला पुलिस का बल माओवादियों की तलाश कर के वापस बेस कैंप लौट रहा था। इस दल पर माओवादियों ने हमला बोला, जिसमें 23 पुलिसकर्मी मारे गए।

रानीबोदली : 15 मार्च 2007

बीजापुर के रानीबोदली में पुलिस के एक कैंप पर आधी रात को माओवादियों ने हमला किया और भारी गोलीबारी की। इसके बाद कैंप को बाहर से आग लगा दिया। इस हमले में पुलिस के 55 जवान मारे गए।

नक्सलवाद

नक्सलवाद कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों के उस आंदोलन का अनौपचारिक नाम है जो भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के फलस्वरूप उत्पन्न हुआ। नक्सल शब्द की उत्पत्ति पश्चिम बंगाल के छोटे से गाँव नक्सलबाड़ी से हुई है जहाँ भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता चारू मजूमदार और कानू सान्याल ने 1967 में सत्ता के खिलाफ़ एक सशस्त्र आंदोलन की शुरुआत की।

मजूमदार चीन के कम्यूनिस्ट नेता माओत्से तुंग के बहुत बड़े प्रशंसकों में से थे और उनका मानना था कि भारतीय मज़दूरों और किसानों की दुर्दशा के लिये सरकारी नीतियाँ जिम्मेदार हैं जिसकी वजह से उच्च वर्गों का शासन तंत्र और फलस्वरुप कृषितंत्र पर वर्चस्व स्थापित हो गया है। इस न्यायहीन दमनकारी वर्चस्व को केवल सशस्त्र क्रांति से ही समाप्त किया जा सकता है। 1967 में “नक्सलवादियों” ने कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों की एक अखिल भारतीय समन्वय समिति बनाई। इन विद्रोहियों ने औपचारिक तौर पर स्वयं को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से अलग कर लिया और सरकार के खिलाफ़ भूमिगत होकर सशस्त्र लड़ाई छेड़ दी। 1971 के आंतरिक विद्रोह (जिसके अगुआ सत्यनारायण सिंह थे) और मजूमदार की मृत्यु के बाद यह आंदोलन एकाधिक शाखाओं में विभक्त होकर कदाचित अपने लक्ष्य और विचारधारा से विचलित हो गया।

आज कई नक्सली संगठन वैधानिक रूप से स्वीकृत राजनीतिक पार्टी बन गये हैं और संसदीय चुनावों में भाग भी लेते है। लेकिन बहुत से संगठन अब भी छद्म लड़ाई में लगे हुए हैं। नक्सलवाद के विचारधारात्मक विचलन की सबसे बड़ी मार आँध्र प्रदेश, छत्तीसगढ, उड़ीसा, झारखंड और बिहार को झेलनी पड़ रही है।

SOURCE-PIB

 

संकल्प से सिद्धि

04 अप्रैल, 2021 गांव एवं डिजिटल कनेक्ट पहल की सफलता के बाद, जिस दौरान 2021 के आरम्भ में ट्राइफेड के देश भर के क्षेत्रीय अधिकारियों ने उल्लेखनीय जनजातीय आबादी वाले चिन्हित गांव का दौरा किया तथा विभिन्न कार्यक्रमों तथा पहलों के कार्यान्वयन का पर्यवेक्षण किया, जनजातीय मामले मंत्रालय के तहत ट्राइफेड ने अब “संकल्प से सिद्धि”- गांव एवं डिजिटल कनेक्ट मुहिम लॉन्च की है। 01 अप्रैल, 2021 से आरम्भ 100 दिनों की इस मुहिम से 150 टीमें (ट्राइफेड एवं राज्य कार्यन्वयनकारी एजेंसियों/मेंटरिंग एजेंसियों/पाटनर्स से प्रत्येक क्षेत्र में 10) जुड़ेंगी जिनमें से प्रत्येक 10 गांवों का दौरा करेंगी। प्रत्येक क्षेत्र में 100 गांव तथा देश में 1500 गांवों को अगले 100 दिनों में कवर किया जाएगा। इस मुहिम का मुख्य उद्देश्य इन गांवों में वन धन विकास केन्द्रों को सक्रिय बनाना है।

ट्राइफेड ने समाज के वंचित जनजातीय वर्गों की सहायता के लिए कई पहलों को लागू किया है उनमें न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के जरिए गौण वन ऊपज (एमएफपी) की मार्केटिंग के लिए तंत्र तथा एमएफपी के लिए मूल्य श्रंखला के विकास जो वन उपज के संग्रहकर्ताओं को एमएसपी उपलब्ध कराता है तथा मूल्यवर्धन करता है और जनजातीय समूहों और क्लस्टरों तथा वन विकास केन्द्रों के जरिए विपणन करता है, की स्कीम को देशभर में व्यापक स्वीकार्यता प्राप्त हुई है। विशेष रुप से, 2020 में महामारी के दौरान यह स्कीम जनजातीयों के लिए रामबाण साबित हुई है।

एमएफपी के लिए एमएसपी स्कीम का उद्देश्य जनजातीय संग्रहकर्ताओं के लिए उचित मूल्य, प्राथमिक प्रसंस्करण, भंडारण, परिवहन आदि सुनिश्चित करने के लिए एक संरचना की स्थापना करना है, साथ ही उपज की शीघ्र नष्ट होने वाले प्रकृति, धारण क्षमता की कमी, विपणन अवसंरचना का अभाव, बिचौलियों द्वारा शोषण एवं सरकार द्वारा समय पर कदम उठाए जाने जैसी जनजातीयों के सामने आने वाली समस्याओं का समाधान करते हुए संसाधन आधार की निरंतरता सुनिश्चित करना भी है। इन 1500 गांवों में वीडीवीके के सक्रिय हो जाने के बाद इस पहल के परिणामस्वरूप अगले 12 महीनों के दौरान 200 करोड़ रुपए की बिक्री का लक्ष्य रखा गया है। दौरा करने वाली टीमें स्थानों की भी पहचान करेंगी तथा वृहद उद्यमों के रुप में ट्राइफेड एवं स्फूर्ति इकाइयों के रूप में क्लस्टरिंग के लिए संभावित वीडीवीके का चयन करेंगी। वे जनजातीय कारीगरों तथा अन्य समूहों की भी पहचान करेंगी और उन्हें आपूर्तिकर्ता के रूप में पैनल में शामिल करेंगी जिससे कि ट्राइब्स इंडिया नेटवर्क- भौतिक विक्रय केन्द्रों तथा tribesIndia.com दोनों के जरिए उनकी बड़े बाजारों तक पहुंच सुलभ हो सकेगी।

ऐसी उम्मीद की जाती है कि संकल्प से सिद्धि देश भर में जनजातीय परितंत्र के पूर्ण परिवर्तन को प्रभावी बनाने में सहायता करेगी।

SOURCE-PIB

 

एच-1 बी वीजा नियम

यूएसए के राष्ट्रपति जो बिडेन ने ट्रम्प-युग एच-1 बी वीजा नियम को समाप्त करने की अनुमति दी है।

एच-1 बी वीजा के तहत देश में काम करने वाले पेशेवर भी शामिल हैं। भारतीय पेशेवरों में यह वीजा काफी लोकप्रिय है। एच-1 बी वीजा गैर-आव्रजक वीजा है इसके तहत अमेरिकी कंपनियों को विशेषज्ञता वाले कार्यों के लिये विदेशी पेशेवरों को नियुक्त करने की अनुमति मिलती है। अमेरिकी कंपनियां हर साल इस वीजा के जरिए भारत और चीन से हजारों लोगों की नियुक्ति करती हैं।

पिछले साल, पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प, एक रिपब्लिकन के प्रशासन ने कुशल श्रमिक वीजा या एच-1 बी सहित कई प्रकार के गैर-आप्रवासी काम वीजा जारी करने को रोक दिया था।

उस समय, व्हाइट हाउस ने कहा था कि नीति का उद्देश्य आर्थिक संकट और चल रहे कोविड-19 महामारी द्वारा लाए गए आर्थिक अवसरों की कमी के कारण विदेशी कर्मचारियों को अमेरिकी नौकरियाँ लेने से रोकना था।

जबकि मूल आदेश 31 दिसंबर, 2020 तक वैध था, इसे ट्रम्प प्रशासन द्वारा 31 मार्च, 2021 तक मान्य किया गया था।

अब, 46वें और वर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति, डेमोक्रेट जो बिडेन, ने एच-1 बी वीजा जारी करने पर प्रतिबंध को समाप्त करने की अनुमति दी है, संभवतः बड़ी संख्या में भारतीय नागरिकों, विशेष रूप से आईटी श्रमिकों जो वीजा के लिए संभावित आवेदक हैं।

SOURCE-HINDUSTAN TIMES

 

दिग्विजय सिंह जाला

हाल ही में पूर्व केंद्रीय मंत्री दिग्विजय सिंह जाला (Digvijaysinh Zala) का निधन हो गया, वे 88 वर्ष के थे। प्रधानमंत्री मोदी (PM Modi) ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि उन्हें उनकी सामुदायिक सेवा और पर्यावरण के प्रति रुचि के लिए याद किया जाएगा।

दिग्विजय सिंह जाला (Digvijaysinh Zala)

दिग्विजय सिंह जाला भारत के पहले पर्यावरण मंत्री (India’s First Environment Minister) थे, उन्होंने इस पद पर 1982 से 1984 तक काम किया। इसके अलावा वे गुजरात के वाकानेर (Wakaner) से विधायक भी रह चुके हैं, वे 1962-67 तक वाकानेर से निर्दलीय विधायक रहे। बाद में 1967-71 तक वे स्वतंत्र पार्टी (Swatantra Party) के सदस्य रहे। बाद में वे कांग्रेस में शामल हुए और 1979 से 1989 तक दो बार सुरेंदरनगर (Surendranagar) से सांसद बने। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी (Indira Gandhi) द्वारा पर्यावरण मंत्रालय की स्थापना किये जाने के बाद वे 1982 से 1984 तक भारत के पहले पर्यावरण मंत्री बने। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र समेत कई अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर पर्यावरण सम्बन्धी मुद्दों पर भारत का प्रतिनिधित्व भी किया था।

दिग्विजय सिंह जाला को भारत में वन्यजीवन संरक्षण में उनकी भूमिका के लिए जाना जाता है, इसके अलावा उन्होंने कई राष्ट्रीय उद्यानों की घोषणा में भी योगदान दिया।

SOURCE-G.K.TODAY

 

‘World in 2030 : Public Survey Report’

हाल ही में यूनेस्को द्वारा ‘World in 2030 : Public Survey Report’ प्रकाशित की गई। यूनेस्को द्वारा मई 2020 और सितंबर 2020 के बीच किए गए सर्वेक्षण के आधार पर यह रिपोर्ट प्रकाशित की गई है। इस सर्वेक्षण में दुनिया भर के 15,000 से अधिक लोगों से प्रतिक्रियाएं एकत्रित की गई हैं।

रिपोर्ट के मुख्य बिंदु

इस रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन, हिंसा और संघर्ष, जैव विविधता की हानि और भेदभाव और असमानता, पानी और आवास, भोजन की कमी 2030 के शांतिपूर्ण समाज के लिए चार सबसे बड़ी चुनौतियां हैं।

प्रतिभागियों के अनुसार, 2030 में आने वाली कई कठिनाइयों के लिए शिक्षा एकमात्र महत्वपूर्ण समाधान है। हालांकि, उत्तर अमेरिकी (अमेरिका, कनाडा) विज्ञान में विश्वास करते हैं और शिक्षा में नहीं।

शिक्षा के अलावा, एकमात्र अन्य समाधान अंतर्राष्ट्रीय सहयोग है।

चुनौतियाँस रिपोर्ट के अनुसार 2030 में आने वाली शीर्ष चुनौतियां इस प्रकार हैं :

हिंसा और संघर्ष

भेदभाव और असमानता

गलत सूचना और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता का नुकसान

भोजन, पानी और आवास की कमी

स्वास्थ्य और रोग

कार्य और अवसरों का अभाव

राजनीतिक भागीदारी और लोकतांत्रिक सिद्धांत

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और नई तकनीकें

परंपरा और संस्कृति जोखिम में

एशिया प्रशांत

जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता की हानि एशिया और प्रशांत क्षेत्र में सबसे बड़ी चिंता थी। सर्वेक्षण के एशिया प्रशांत उत्तरदाताओं ने प्राकृतिक आपदा जोखिम, स्थानीय प्रभावों और अन्य प्रमुख चुनौतियों के रूप में संस्कृति के महत्व पर प्रकाश डाला। एशिया प्रशांत में चिंताओं को दूर करने के लिए शीर्ष समाधान निम्नानुसार हैं:

प्रभावी स्वास्थ्य शिक्षा

अनुसंधान और वैज्ञानिक ज्ञान को साझा करना

प्रभावी अंतर्राष्ट्रीय सहयोग

प्रकृति के साथ एक स्वस्थ संबंध सुनिश्चित करना

विश्वसनीय और सटीक जानकारी तक पहुंच सुनिश्चित करना

उप-सहारा अफ्रीका, अरब देशों, पूर्वी यूरोप, लैटिन अमेरिका और कैरेबियन में शीर्ष चुनौती भी जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता थी।

यूनेस्को (UNESCO)

यूनेस्को (UNESCO) का अर्थ United Nations Educational, Scientific and Cultural Organisation (संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन) है।

इसकी स्थापना 1945 में हुई थी।

यूनेस्को का मुख्यालय फ्रांस के पेरिस में स्थित है।

यूनेस्को की कुछ प्रमुख पहलें इस प्रकार हैं :

विश्व धरोहर सूची (World Heritage List) : यूनेस्को किसी स्थान को “वर्ल्ड हेरिटेज साइट” का टैग प्रदान करने के लिए जिम्मेदार है। यूनेस्को के अनुसार, 167 देशों में 1,121 विश्व विरासत स्थल हैं।

मैन एंड द बायोस्फियर प्रोग्राम (Man and the Biosphere Programme) : इस कार्यक्रम का उद्देश्य बायोस्फीयर रिजर्व की स्थापना करना है। वर्तमान में 124 देशों में स्थित 701 बायोस्फीयर रिजर्व हैं। भारत में 18 बायोस्फीयर रिजर्व हैं। इनमें से ग्यारह को ‘Man and the Biosphere Programme’ द्वारा मान्यता दी गई है।

HSN

वित्त मंत्रालय ने हाल ही में घोषणा की है कि 5 करोड़ रुपये से अधिक के वार्षिक कारोबार वाले व्यवसायों को अपने कर चालान पर छह अंकों का HSN कोड प्रस्तुत करना होगा। पांच करोड़ रुपये से कम के वार्षिक कारोबार वाले व्यवसायों को चार अंकों का HSN  कोड प्रस्तुत करना होता है। पहले, आवश्यकता क्रमशः चार अंकों और दो अंकों की थी।

HSN कोड क्या है?

HSN का अर्थ Harmonised System of Nomenclature है। यह 1988 में विश्व सीमा शुल्क संगठन (World Customs Organization) द्वारा अपनाया गया था। यह छह अंकों का कोड है जो विभिन्न उत्पादों को वर्गीकृत करता है। भारत ने मुख्य रूप से सीमा शुल्क और केंद्रीय उत्पाद शुल्क के लिए वस्तुओं को वर्गीकृत करने के लिए 1986 में (WCO से पहले) एचएसएन कोडिंग प्रणाली को अपनाया।

HSN कोड GST और सीमा शुल्क दोनों पर लागू होता है।

इसका उपयोग पूरी दुनिया में किया जाता है।

एचएसएन कोड जीएसटी दाखिल करने की प्रक्रिया को आसान बनाते हैं क्योंकि वे माल के बारे में विवरण अपलोड करने की आवश्यकता को दूर करते हैं।

HSN Code

HSN कोड में 21 सेक्शन होते हैं। प्रत्येक सेक्शन को 99 अध्यायों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक अध्याय को 1244 शीर्षकों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक शीर्षक को 5,224 उप शीर्षकों में विभाजित किया गया है। भारत आठ अंकों के एचएसएन कोड का उपयोग करता है।

HSN कोड के पहले दो अंक माल के अध्याय (chapter) को दर्शाते हैं। यह खाद्य वस्तुओं, गैर-खाद्य वस्तुओं, खराब होने वाले सामान, ज्वलनशील सामान आदि हो सकता है।

HSN कोड में अगले दो अंक अध्याय में शीर्षकों (headings) को दर्शाते हैं। यह टमाटर, मछली, पेट्रोल आदि हो सकता है।

बाकी कोड सब-हेडिंग को दर्शाता है। यह ठंडा, ताजा, सूखा आदि हो सकता है।

भारत में HSN कोड की आवश्यकता किसे है?

भारत में, आयातक, निर्यातक और निर्माता लंबे समय से HSN कोड का उपयोग कर रहे हैं। 1.5 करोड़ रुपये से कम वार्षिक आय वाले भारतीय डीलरों को अपने वस्तुओं के लिए HSN कोड अपनाने की आवश्यकता नहीं है।

HSN कोड का महत्व

200 से अधिक देश HSN कोड का उपयोग अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के आंकड़े इकट्ठा करने, व्यापार नीतियां बनाने और माल की निगरानी के लिए कर रहे हैं। इस प्रकार, HSN प्रणाली पूरी दुनिया में एक सामंजस्यपूर्ण व्यापार प्रक्रिया को बनाए रखने में मदद करती है। यह अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में लागत को कम करने में भी मदद करता है।

SOURCE-G.K.TODAY

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