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Current Affair 4 August 2021

Current Affairs – 4 August, 2021

फास्टट्रैक विशेष न्यायालयों

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 389 विशेष पोक्सो न्यायालयों सहित 1023 फास्ट ट्रैक विशेष न्यायालयों (एफटीएससी) को केंद्र प्रायोजित योजना (सीएसएस) के रूप में 01 अप्रैल, 2021 से 31 मार्च, 2023 तक जारी रखने की मंजूरी दी है और इसके लिए कुल 1572.86 करोड़ रुपये (केंद्रीय हिस्से के रूप में 971.70 करोड़ रुपये और राज्य के हिस्से के रूप में 601.16 करोड़ रुपये) की धनराशि निर्धारित की गयी है। केंद्रीय हिस्से की धनराशि निर्भया फंड से उपलब्ध करायी जाएगी। यह योजना 02 अक्टूबर, 2019 को शुरू की गई थी।

सरकार ने महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा को हमेशा सर्वाधिक महत्व दिया है। बालिकाओं को सशक्त बनाने की दिशा में सरकार ने पहले ही ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे कई कार्यक्रम शुरू किए हैं। बारह वर्ष से कम उम्र की नाबालिग लड़कियों और सोलह वर्ष से कम उम्र की महिलाओं के साथ दुष्कर्म  की घटनाओं ने पूरे देश की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया था। इस तरह की घटनाओं और लंबे समय तक चलने वाली अदालती प्रक्रिया को देखते हुए दोषियों के परीक्षण के लिए एक समर्पित न्यायालय तंत्र बनाने की आवश्यकता थी, जो मुकदमे में तेजी ला सके और यौन अपराधों के पीड़ितों को तत्काल राहत प्रदान कर सके।

ऐसे मामलों में अधिक कड़े प्रावधान, त्वरित सुनवाई और मामलों के निपटान के लिए, केंद्र सरकार ने “आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2018” लागू किया और दुष्कर्म  के अपराधियों के लिए मौत की सजा सहित कड़ी सजा का प्रावधान किया। इससे फास्ट ट्रैक विशेष न्यायालय (एफटीएससी) की स्थापना हुई।

फास्ट ट्रैक विशेष न्यायालय समर्पित अदालतें हैं, जिनमें अदालती प्रक्रिया तेजी से पूरी की जाती है। इन न्यायालयों की अंतिम फैसले देने की दर नियमित अदालतों की तुलना में बेहतर है और ये न्यायालय अदालती प्रक्रिया तेज गति से पूरा करते हैं। असहाय पीड़ितों को त्वरित न्याय प्रदान करने के अलावा, यह व्यवस्था यौन अपराधियों के खिलाफ निवारक ढांचे को मजबूत करती है।

वर्तमान में ये न्यायालय 28 राज्यों में कार्यरत हैं और सभी 31 राज्यों, जो योजना में शामिल होने के पात्र हैं, में इनके विस्तार का प्रस्ताव है। यह देश के दूरदराज क्षेत्रों सहित पूरे देश में यौन अपराधों की असहाय पीड़ितों को समयबद्ध न्याय प्रदान करने के लिए राज्य / केंद्र शासित प्रदेश सरकारों के प्रयासों का समर्थन कर रहा है। योजना के अपेक्षित परिणाम इस प्रकार हैं:

  • महिलाओं और बालिकाओं की सुरक्षा के लिए राष्ट्र की प्रतिबद्धता।
  • दुष्कर्म और पॉक्सो अधिनियम के लंबित मामलों की संख्या कम करना।
  • यौन अपराधों के पीड़ितों को त्वरित न्याय प्रदान करना और यौन अपराधियों के खिलाफ एक निवारक के रूप में कार्य करना।
  • इन मामलों की तेज अदालती प्रक्रिया, न्यायिक प्रणाली में लंबित मामलों के बोझ को कम करेगी।

SOURCE-PIB

 

चुम्बक का उपयोग करके जल से हाइड्रोजन
उत्पादन की नई विधि

भारतीय शोधकर्ताओं ने हाइड्रोजन निर्माण का एक अभिनव तरीका प्रस्तुत किया है, जो इसके उत्पादन को तीन गुना बढ़ाता है और आवश्यक ऊर्जा खपत को कम करता है। यह कम लागत पर पर्यावरण के अनुकूल हाइड्रोजन ईंधन निर्माण की दिशा में नया मार्ग प्रशस्त कर सकता है।

एक ईंधन के रूप में, हाइड्रोजन को एक हरित एवं टिकाऊ अर्थव्यवस्था की दिशा में बदलाव लाने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है। कोयला और गैसोलीन जैसे गैरनवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की तुलना में लगभग 3 गुना अधिक कैलोरी मान होने के अलावा, ऊर्जा को मुक्त करने के लिए हाइड्रोजन के दहन से पानी उत्पन्न होता है और इस प्रकार से यह पूरी तरह गैरप्रदूषणकारी ईंधन है।

पृथ्वी के वायुमंडल (350 पीपीबीवी) में आणविक हाइड्रोजन की बेहद कम प्रचुरता के कारण, पानी का विद्युतक्षेत्र चालित विघटन हाइड्रोजन के उत्पादन के लिए एक बेहतर तरीका है। हालांकि, ऐसे इलेक्ट्रोलिसिस के लिए उच्च ऊर्जा इनपुट की आवश्यकता होती है और यह हाइड्रोजन उत्पादन की धीमी दर से जुड़ा होता है। महंगे प्लैटिनम तथा इरिडियम आधारित उत्प्रेरक का उपयोग भी इसे व्यापक प्रसार व्यावसायीकरण करने से रोकता है। यही कारण है कि, ‘हरित-हाइड्रोजन-अर्थव्यवस्था’ के लिए परिवर्तन ऐसे ही उपायों की मांग करता है, जो ऊर्जा लागत और सामग्री लागत को कम करते हैं और साथ ही साथ हाइड्रोजन उत्पादन दर को बेहतर बनाते हैं।

प्रो.सी. सुब्रमण्यम के नेतृत्व में आईआईटी बॉम्बे के शोधकर्ताओं का एक दल एक अभिनव प्रणाली लेकर सामने आया है, जो इन सभी चुनौतियों का व्यवहारिक समाधान प्रदान करता है। इसमें बाहरी चुंबकीय क्षेत्र की उपस्थिति में पानी का इलेक्ट्रोलिसिस शामिल है। इस पद्धति में वही प्रणाली इस्तेमाल की गई है, जो 1 मिलीलीटर हाइड्रोजन गैस का उत्पादन करती है, ठीक उसी समय में 3 मिलीलीटर हाइड्रोजन का उत्पादन करने के लिए 19% कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यह परिणाम उत्प्रेरक पर विद्युत और चुंबकीय क्षेत्रों को सहक्रियात्मक रूप से जोड़कर प्राप्त किया जाता है।

एक आसान पद्धति किसी भी मौजूदा इलेक्ट्रोलाइज़र (जो हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में पानी को तोड़ने के लिए विद्युत का उपयोग करता है) को बाहरी मैग्नेट के साथ डिजाइन में किसी बड़े परिवर्तन के बिना ही वापस लेने की क्षमता प्रदान करती है, जिससे हाइड्रोजन उत्पादन की ऊर्जा दक्षता में वृद्धि होती है।

हाइड्रोजन के उत्पादन के लिए यह प्रूफ ऑफ कॉन्सेप्ट प्रदर्शन एसीएस सस्टेनेबल केमिस्ट्री एंड इंजीनियरिंग में प्रकाशित हुआ है। इलेक्ट्रोकैटलिटिक पदार्थ-कोबाल्टऑक्साइड नैनोक्यूब जो हार्ड-कार्बन आधारित नैनोस्ट्रक्चर्ड कार्बन फ्लोरेट्स पर फैले हुए हैं,इस प्रभाव को प्राप्त करने के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण है और इसे प्रौद्योगिकी मिशन डिवीजन में ऊर्जा भंडारण कार्यक्रम के लिए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग की सामग्री के सहयोग से विकसित किया गया था। इसे डीएसटीएसईआरबी अनुदान के माध्यम से मैग्नेटोइलेक्ट्रोकैटलिसिस के लिए उपयोग में लाया गया था।

कार्बन और कोबाल्ट ऑक्साइड के बीच का इंटरफेस मैग्नेटोइलेक्ट्रोकैटलिसिस की कुंजी है। यह काफी लाभदायक है क्योंकि इससे एक ऐसी प्रणाली बनती है जिसमें बाहरी चुंबकीय क्षेत्र की निरंतर उपस्थिति की आवश्यकता नहीं होती है और इसमें लंबे समय तक चुंबकत्व को बनाए रखने की क्षमता निहित होती है; प्राप्त हुए परिणाम (वर्तमान घनत्व में 650% की वृद्धि, आवश्यक ऊर्जा की 19% कमी और वॉल्यूमेट्रिक हाइड्रोजन उत्पादन दर में 3 गुना वृद्धि) अद्वितीय हैं, इसके लिए आवश्यक आंतरायिक चुंबकीय क्षेत्र एक फ्रिज चुंबक ही प्रदान कर सकता है। इस तरीके को मौजूदा इलेक्ट्रोलाइज़र में सीधे डिज़ाइन या संचालन के तरीके में बदलाव के बिना ही इस्तेमाल किया जा सकता है और 10 मिनट के लिए चुंबकीय क्षेत्र का एक बार एक्सपोजर 45 मिनट से अधिक हाइड्रोजन उत्पादन की उच्च दर प्राप्त करने के लिए पर्याप्त है।

हाइड्रोजन आधारित अर्थव्यवस्था के महत्व को देखते हुए, हमारा लक्ष्य परियोजना को मिशन-मोड में लागू करना और स्वदेशी भरोसेमंद मैग्नेटो-इलेक्ट्रोलाइटिक हाइड्रोजन जनरेटर को तैयार करना है।” उन्होंने कहा कि, यदि उनके प्रयास सफल होते हैं, तो हम भविष्य में पर्यावरण के अनुकूल ईंधन, हाइड्रोजन, पेट्रोलियम, डीजल और संपीड़ित प्राकृतिक गैस (सीएनजी) की जगह ले सकते हैं।

SOURCE-PIB

 

एक विकेन्द्रीकृत जैव चिकित्सा अपशिष्ट भट्टी

भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार प्रो. के. विजय राघवन ने बक्सर नगर पालिका, बिहार में एक विकेन्द्रीकृत जैव चिकित्सा अपशिष्ट भट्टी का वर्चुअल उद्घाटन किया। गणेश इंजीनियरिंग वर्क्स द्वारा विकसित इस तकनीक का चयन जून 2020 में वेस्ट टू वेल्थ मिशन द्वारा शुरू किए गए बायोमेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट इनोवेशन चैलेंज के माध्यम से किया गया था। यह मिशन प्रधान मंत्री विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार सलाहकार परिषद (पीएम-एसटीआईएसी) के नौ वैज्ञानिक मिशनों में से एक है और इसका नेतृत्व भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार के कार्यालय द्वारा किया जाता है।

बक्सर में पायलट प्रोजेक्ट के आधार पर स्थापित भट्टी एक पोर्टेबल मशीन है जो कपास, प्लास्टिक या इसी तरह की सामग्री के 50 किलो जैव अपशिष्ट को वेस्ट हीट रीकवरी के जरिये प्रबंधन करने में सक्षम है। इस इकाई को स्थापित करने के लिए सिर्फ दो वर्ग मीटर क्षेत्र की आवश्यकता होती है और कचरे के प्रारंभिक प्रज्वलन के लिए केवल 0.6 केडब्ल्यूएच बिजली की आवश्यकता होती है। यह स्वत: बिजली बंद करने के विकल्प के साथ आती है।

विभिन्न स्थानों जैसे डिस्टिल्ड वाटर, भाप, गर्म पानी, गैस जलने आदि पर पायलट के दौरान विभिन्न प्रकार के अपशिष्ट और उत्पादों का परीक्षण किया जाएगा। आवासीय या सार्वजनिक स्थानों पर प्रौद्योगिकी के सर्वोत्तम उपयोग के लिए प्रयास किए जाएंगे ताकि हवा में धुआं बिल्कुल न फैले, चिमनी का उपयोग, कॉम्पैक्ट सिस्टम, प्लाज्मा (स्पार्क) जलाना, वेस्ट हीट रीकवरी आदि सुनिश्चित किया जा सके।

छोटे शहरों और गांवों में कोविड-19 महामारी के कारण जैव कचरे के प्रबंधन और निपटारे से जुड़ी समस्या और बढ़ गई है। उन क्षेत्रों में यह समस्या तेजी से बढ़ी है जहां केंद्रीय जैव अपशिष्ट कचरे के प्रंबधन सुविधाओं तक उनकी पहुंच नहीं है। मौजूदा समय में चल रहे कोविड-19 महामारी के दौरान बड़ी मात्रा में उत्पनन जैव चिकित्सा कचरे के निपटान के लिए विकेन्द्रीकृत प्रौद्योगिकियों की आवश्यकता को समझते हुए, वेल्थ मिशन ने सुरक्षित संग्रह की चुनौतियों का समाधान करने के लिए अनुसंधान संस्थानों से स्टार्ट-अप, कॉर्पोरेट्स और उद्यमियों से प्रौद्योगिकी आवेदन आमंत्रित किए। पूरे देश से 460 आवेदन प्राप्त हुए थे और तीन प्रौद्योगिकियों को अंतिम रूप से पायलट प्रोजेक्ट के लिए चुना गया था। स्थानीय प्रशासन द्वारा निरंतर निगरानी और मूल्यांकन के परिणामों के आधार पर विशिष्ट संदर्भ में इन प्रौद्योगिकियों का मूल्यांकन आगे इस्तेमाल बढ़ाने के लिए किया जाएगा। एमएंडई डेटा वेस्ट-टू-वेल्थ मिशन (पोर्टल) के डैशबोर्ड पर उपलब्ध होगा।

वेस्ट टू वेल्थ मिशन:

यह मिशन अपशिष्ट से ऊर्जा उत्पन्न करने, बेकार सामग्री के पुनर्चक्रण आदि के लिये प्रौद्योगिकियों की पहचान करने के साथ ही उनके विकास और उपलब्धता सुनिश्चित करेगा।

“द वेस्ट टू वेल्थ” मिशन प्रधानमंत्री की विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार सलाहकार परिषद (PM-STIAC) के नौ राष्ट्रीय मिशनों में से एक है।

यह मिशन स्वच्छ भारत और स्मार्ट शहर जैसी परियोजनाओं में मदद करेगा, साथ ही एक ऐसा वृहद् आर्थिक मॉडल तैयार करेगा जो देश में अपशिष्ट प्रबंधन को कारगर बनाने के साथ-साथ उसे आर्थिक रूप से व्यवहार्य भी बनाएगा।

ई-वेस्ट टू वेल्थ: नई प्रौद्योगिकी (आईआईटी दिल्ली)

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, दिल्ली ने धन के लिये ई-कचरे का प्रबंधन और पुनर्चक्रण करने हेतु एक शून्य-उत्सर्जन तकनीक विकसित की है।

ई-कचरे की नई कार्यप्रणाली मेटल रिकवरी और एनर्जी प्रोडक्शन के लिये “शहरी खदानों” (Urban Mine) का उपयोग करेगी।

ई-कचरे से तरल और गैसीय ईंधन प्राप्त करने के लिये इसे पायरोलाइसिस (Pyrolysis) किया जाता है। यह ई-कचरे को गर्म करके अलग-अलग पदार्थों में विभक्त करने की प्रक्रिया है।

इन अलग हुए ठोस अवशेषों में 90-95% शुद्ध धातु मिश्रण और कुछ कार्बनयुक्त पदार्थ होते हैं।

कार्बनयुक्त पदार्थ को एयरोजेल (Aerogel) में बदला जाता है, जिसका उपयोग तेल रिसाव की सफाई, डाई हटाने, कार्बन डाइऑक्साइड को कैप्चर करने आदि में किया जाता है।

यह तकनीक स्मार्ट सिटी मिशन, स्वच्छ भारत अभियान और आत्मनिर्भर भारत जैसी पहलों की ज़रूरतों को पूरा करेगी।

स्वच्छता सारथी फेलोशिप

  • यह फेलोशिप उन युवा नवोन्मेषियों को सशक्त करने के लिए एक पहल है जो अपशिष्ट प्रबंधन, जागरूकता अभियान, अपशिष्ट सर्वेक्षण/अध्ययन इत्यादि के कार्यों में सामुदायिक स्तर पर स्वच्छता सारथीके रूप में लगे हुए हैं।
  • यह प्रयास अपशिष्ट को कम करने के लिए विभिन्न उपायों को क्रियान्वित किए जाने के लिए है ताकि पृथ्वी को और हरा-भरा बनाया जा सके।
  • स्कूलों और कॉलेजों के युवा छात्र और स्वयं सहायता समूह के माध्यम से कार्य कर रहे आम नागरिक (या स्वतंत्र रूप से काम कर रहे नागरिक) कचरा प्रबंधन के लिए विभिन्न समुदायों को संवेदनशील बनाने और कचरे को उपयोगी स्वरूप देने के लिए नए विकल्प उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इस फेलोशिप का उद्देश्य उन इच्छुक छात्रों और नागरिकों को सशक्त करना है जो निरंतर अपने प्रयासों से शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में कचरे को कम करने में लगे हुए हैं।
  • ‘स्वच्छता सारथी फैलोशिप’ उन लोगों के कार्यों को मान्यता देना है जो किसी भी क्षेत्र से संबंधित हैं और वैज्ञानिक तथा टिकाऊ पद्धति से कचरे के प्रबंधन में अपने दायित्व या अपनी जिम्मेदारियों से आगे बढ़कर अनुकरणीय कार्य करते हैं।
  • यह फेलोशिप भारतीय समुदाय की सहभागिता के जमीनी स्तर को लक्षित करेगा और भारत को जीरो वेस्ट नेशन बनाने के लिए नागरिकों के प्रयासों को मान्यता देगा।
  • सामुदायिक सहभागिता को प्रोत्साहित करने के लिए लक्षित ‘स्वच्छता सारथी फ़ेलोशिप’ ऐसे छात्रों और सामुदायिक कार्यकर्ताओं से आवेदन आमंत्रित करता है जिन्होंने अपशिष्ट प्रबंधन के क्षेत्र में अब तक कार्य किया है या वर्तमान समय में काम कर रहे हैं। इसमें जागरूकता अभियान से लेकर सर्वेक्षण और अध्ययन भी शामिल

SOURCE-PIB

 

स्वदेशी विमानवाहक पोत विक्रांत

केंद्रीय पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्री श्री सर्बानंदसोनोवाल ने भारतीय नौसेना के लिए कोचीन शिपयार्ड द्वारा स्वदेशी रूप सेनिर्मित किए गए भारत के सबसे जटिल स्वदेशी विमानवाहक पोत ‘विक्रांत’ के समुद्री परीक्षणों की शुरुआत की सराहना की है। उन्होंने कहा कि स्वदेशी विमानवाहक पोत का डिजाइन और निर्माण राष्ट्र के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। उन्होंने कहा कि यह प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की ‘मेक इन इंडिया’ और आत्मनिर्भर भारत पहल का सही प्रतिबिंब है। मंत्री महोदय ने देश को गौरवप्रदान करने के लिए कोचीन शिपयार्ड और भारतीय नौसेना को बधाई दी।

विक्रांत के प्रणोदन संयंत्रों का विभिन्न नेविगेशन, संचार औरहल उपकरणों के परीक्षणों के अलावा समुद्र में कठिन परीक्षण किया जाएगा। बंदरगाह पर विभिन्न उपकरणों के परीक्षण के बाद स्वदेशी विमानवाहक पोत (आईएसी) के समुद्री परीक्षणों की शुरुआत विशेष रूप से कोविड-19 महामारी केइस कठिन समय के दौरान देश के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड सार्वजनिक क्षेत्र का सबसे बड़ा शिपयार्ड और पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय के अधीन एकमात्र शिपयार्ड है। मंत्रालय के पुख़्ता समर्थन से अगस्त 2013 में कोचीन शिपयार्ड के बिल्डिंग डॉक से स्वदेशी विमानवाहक पोत की शुरूआत ने राष्ट्र को एक विमान वाहक डिजाइन का निर्माण करने में सक्षम देशों की सूची में ला खड़ा किया।

स्वदेशी विमानवाहक पोत की मूल डिजाइन भारतीय नौसेना के नौसेना डिजाइन निदेशालय द्वारा स्वदेशी रूप से विकसित की गई है और संपूर्ण विस्तृत इंजीनियरिंग, निर्माण और सिस्टम का एकीकरण कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड द्वारा किया जाता है। शिपयार्ड ने उन्नत सॉफ्टवेयर का उपयोग करके जहाज कीविस्तृत इंजीनियरिंग की, जिससे डिजाइनर को जहाज के डिब्बों का पूरा 3 डीदृश्य प्राप्त करने में मदद मिली। यह देश में पहली बार है कि किसी एयरक्राफ्ट कैरियर के आकार का जहाज पूरी तरह से 3डी मॉडल में तैयार किया गया है और 3डी मॉडल से प्रोडक्शन ड्रॉइंग निकाली गई है।

स्वदेशी विमानवाहक पोत देश का सबसे बड़ा युद्धपोत है जिसमें लगभग 40,000 टन विस्थापन की सुविधा है। जहाज स्वदेशी रूप से विकसित 21,500 टन विशेष ग्रेड स्टील की एक विशाल इस्पात संरचना है और पहली बार इसका भारतीय नौसेना के जहाजों में उपयोग किया गया है। जहाज की विशालता का अनुमान लगभग 2000 किलोमीटर की केबलिंग, 120 किलोमीटर पाइपिंग और जहाज पर उपलब्ध 2300 कम्पार्टमेंट्स से लगाया जा सकता है।

एयरक्राफ्ट कैरियर एक छोटा तैरता हुआ शहर है, जिसमें एक फ्लाइट डेक का इलाका है जो दो फुटबॉल मैदानों के आकार को कवर करता है। स्वदेशी विमानवाहक पोत 262 मीटर लंबा, 62 मीटर चौड़ा और 59 मीटर ऊंचा है, जिसमें सुपर स्ट्रक्चर भी शामिल है। ‘विक्रांत’ की अधिकतम गति लगभग 28 समुद्री मील और लगभग 7,500 समुद्री मील की एंड्योरेंस के साथ 18 समुद्री मील की परिभ्रमण गति है। सुपर स्ट्रक्चर में पांच डेक समेत कुल 14 डेक हैं। जहाज में 2,300 से अधिक कम्पार्टमेंट्स हैं, जिन्हें लगभग 1700 लोगों केक्रू के लिए डिज़ाइन किया गया है, जिसमें महिला अधिकारियों को समायोजित करने के लिए विशेष केबिन भी शामिल हैं।

SOURCE-PIB

 

लवलीना बोरगोहेन

लवलीना बोरगोहेन (Lovlina Borgohain) ने भारत के लिए टोक्यो ओलंपिक में तीसरा पदक जीता। उन्होंने 4 अगस्त, 2021 को 69 किग्रा वेल्टरवेट सेमीफाइनल में तुर्की की बुसेनाज सुरमेनेली के खिलाफ 0-5 से हारने के बाद कांस्य पदक जीता।

मुख्य बिंदु

  • लवलीना बोरगोहेन एमसी मैरी कॉम के बाद ओलंपिक कांस्य पदक जीतने वाली दूसरी भारतीय महिला मुक्केबाज भी बन गई हैं।
  • मैरी कॉम ने 2012 के लंदन ओलंपिक में पदक जीता था।
  • लवलीना के कांस्य पदक सहित भारत ने अब तक तीन पदक हासिल किए हैं।
  • इससे पहले मीराबाई चानू ने भारोत्तोलन में रजत और बैडमिंटन महिला व्यक्तिगत स्पर्धा में पी.वी. सिंधु ने कांस्य पदक जीता था।
  • लवलीना ओलंपिक पदक जीतने वाली पहली असमिया महिला बन गई हैं।
  • लवलीना बोरगोहेन महान मुक्केबाज मैरी कॉम और विजेंदर सिंह के बाद ओलंपिक कांस्य जीतने वाली तीसरी भारतीय मुक्केबाज हैं।
  • मैरी कॉम और विजेंदर सिंह ने 2012 लंदन ओलंपिक और 2008 बीजिंग ओलंपिक में क्रमश: कांस्य पदक जीता था।

लवलीना बोरगोहेन कौन हैं?

लवलीना बोरगोहेन असम के गोलाघाट जिले की रहने वाली हैं। उसके पिता एक छोटे व्यवसायी हैं। उन्होंने किकबॉक्सर के रूप में अपना करियर शुरू किया और मैदान से अवसर मिलने के बाद बॉक्सिंग की ओर रुख किया। उन्होंने भारतीय खेल प्राधिकरण द्वारा आयोजित अपने हाई स्कूल में ट्रायल में भाग लिया। उन्हें प्रसिद्ध कोच पदुम बोरो (Padum Boro) द्वारा चुना गया था। उन्होंने 2012 में लवलीना को प्रशिक्षण देना शुरू किया। उन्हें 2018 राष्ट्रमंडल खेलों में वेल्टरवेट मुक्केबाजी वर्ग में भाग लेने के लिए चुना गया था। हालांकि, वह पदक नहीं जीत सकीं और क्वार्टर फाइनल में हार गईं थी ।

लवलीना द्वारा जीते गए पदक

  • लवलीना ने फरवरी, 2018 में इंटरनेशनल बोइंग चैंपियनशिप में वेल्टरवेट कैटेगरी में गोल्ड मेडल जीता था।
  • उन्होंने 2017 में वियतनाम में एशियाई मुक्केबाजी चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता था।
  • जून 2017 में अस्ताना में प्रेसिडेंट्स कप में उन्होंने कांस्य पदक जीता और जून 2018 में मंगोलिया के उलानबटार कप में रजत पदक जीता।
  • सितंबर 2018 में पोलैंड में 13वीं अंतर्राष्ट्रीय सिलेसियन चैम्पियनशिप में उन्होंने कांस्य पदक जीता।
  • उन्होंने नई दिल्ली में 2018 AIBA महिला विश्व मुक्केबाजी चैम्पियनशिप में भारत का प्रतिनिधित्व किया और 69 किलोग्राम वर्ग में कांस्य पदक जीता।

SOURCE-DANIK JAGARAN

 

ट्रिब्यूनल सुधार बिल

लोकसभा ने 3 अगस्त, 2021 को ट्रिब्यूनल सुधार बिल (Tribunals Reforms Bill) पारित किया, जिसके द्वारा 9 अपीलीय ट्रिब्यूनल को खत्म किया जायेगा।

मुख्य बिंदु

  • फिल्म प्रमाणन अपीलीय न्यायाधिकरण (FCAT) सहित न्यायाधिकरणों (tribunals) को समाप्त कर दिया जाएगा।
  • इस विधेयक को बिना किसी बहस के ध्वनि मत से पारित कर दिया गया।

ट्रिब्यूनल सुधार बिल, 2021

  • ट्रिब्यूनल सुधार बिल, 2021 Tribunals Reforms (Rationalisation and Conditions of Service) Ordinance, 2021 की जगह लेगा।
  • 1 अगस्त, 2021 को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने यह बिल पेश किया था।
  • यह बिल 1952 के सिनेमैटोग्राफ एक्ट, 1957 के कॉपीराइट एक्ट, 1962 के कस्टम्स एक्ट, 1970 के पेटेंट एक्ट, 1994 के एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया एक्ट और साथ ही 1999 के ट्रेड मार्क्स एक्ट में संशोधन करके कई अधिनियमों के तहत ट्रिब्यूनल या प्राधिकरणों को समाप्त करने का प्रावधान करता है।
  • यह कुछ ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष और सदस्यों के लिए सेवा के एक समान नियम और शर्तों का भी प्रावधान करता है।

लंबित मामलों का क्या होगा?

ऐसे न्यायाधिकरणों या प्राधिकरणों के समक्ष सभी लंबित मामलों को वाणिज्यिक न्यायालय या उच्च न्यायालय में स्थानांतरित कर दिया जाएगा।

पृष्ठभूमि

सरकार ने 2015 के सात अधिकरणों के युक्तिकरण (rationalisation) की प्रक्रिया शुरू कर दी थी। वित्त अधिनियम के तहत कार्यात्मक समानता के आधार पर 7 न्यायाधिकरणों का  विलय किया गया।

SOURCE-GK TODAY

 

ऑक्सीजन उत्पादन संवर्धन नीति

दिल्ली कैबिनेट ने मेडिकल ऑक्सीजन उत्पादन को बढ़ावा देने और निजी क्षेत्र को मेडिकल ऑक्सीजन के लिए उत्पादन संयंत्रों, टैंकरों और भंडारण सुविधाओं में निवेश करने के लिए प्रोत्साहन प्रदान करने की अपनी नीति को मंजूरी दे दी है।

मुख्य बिंदु

  • मेडिकल ऑक्सीजन उत्पादन नीति (Medical Oxygen Production Policy) ऑक्सीजन उत्पादन संयंत्र स्थापित करने, ऑक्सीजन टैंकरों में निवेश करने और ऑक्सीजन भंडारण सुविधाओं की स्थापना के लिए निजी क्षेत्र को कई प्रोत्साहन प्रदान करती है।
  • यह दिल्ली में ऑक्सीजन की उपलब्धता में सुधार करने में भी मदद करेगी।
  • इससे पहले जुलाई में, लेफ्टिनेंट गवर्नर अनिल बैजल ने 160 PSA ऑक्सीजन संयंत्रों की प्रगति की समीक्षा की थी जो दिल्ली में सार्वजनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र के अस्पतालों दोनों में स्थापित किए जाने थे।
  • इन 160 PSA की सामूहिक रूप से प्रति दिन लगभग 148 एमटी मेडिकल ऑक्सीजन की उत्पादन क्षमता है।
  • 31 अक्टूबर तक विभिन्न अस्पतालों में 34 PSA ऑक्सीजन प्लांट चालू कर दिए जाएंगे।
  • PMCARE फण्ड के तहत 17 सहित 66 PSA प्लांट दिल्ली सरकार द्वारा संचालित अस्पतालों में स्थापित किए जा रहे हैं जबकि 10 केंद्र सरकार के अस्पतालों में स्थापित किए जा रहे हैं। 84 निजी अस्पतालों में स्थापित किए जाएंगे।
  • दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में 66 संयंत्रों में से 36 चालू हो चुके हैं, 3 तैयार हैं। शेष PSA 31 अगस्त तक चालू कर दिए जायेंगे।

पृष्ठभूमि

अप्रैल 2021 में, दिल्ली में कोविड-19 मामलों में भारी वृद्धि देखी गई थी। मामलों में अचानक वृद्धि ने स्वास्थ्य सेवा के बुनियादी ढांचे को बुरी तरह से प्रभवित किया था। दिल्ली में अप्रैल में रोजाना औसत 25,294 नए कोविड-19 मामले आ रहे थे। मेडिकल ऑक्सीजन के गंभीर संकट से यह स्थिति और बिगड़ गई।

SOURCE-GK TODAY

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