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Current Affair 6 August 2021

Current Affairs – 6 August, 2021

मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि उन्हें देश भर के नागरिकों से ‘खेल रत्न पुरस्कार’ का नाम मेजर ध्यानचंद के नाम पर रखने के लिए अनगिनत अनुरोध प्राप्त हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि उनकी भावनाओं का सम्मान करते हुए ‘खेल रत्न पुरस्कार’ को अब से ‘मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार’ कहा जाएगा।

प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि मेजर ध्यानचंद भारत के उन अग्रणी खिलाड़ियों में से एक थे जिन्होंने भारत के सम्मान और गौरव को नए शिखर पर पहुंचा दिया था। अत: यह बिल्कुल उचित है कि हमारे देश का सर्वोच्च खेल सम्मान उन्हीं के नाम पर रखा जाएगा।

खेल रत्न पुरस्कार और मेजर ध्यानचंद

राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार 1991-92 में दिया जाना शुरू किया गया था। सबसे पहले खेल रत्न शतरंज खिलाड़ी विश्वनाथन आनंद बने थे। लिएंडर पेस, सचिन तेंदुलकर, धनराज पिल्ले, पुल्लेला गोपीचंद, अभिनव बिंद्रा, अंजू बॉबी जॉर्ज, मेरी कॉम और रानी रामपाल समेत 43 खिलाड़ियों को यह पुरस्कार दिया जा चुका है। इस पुरस्कार में खिलाड़ियों को 25 लाख रुपए भी दिया जाता है।

1926 से 1949 तक हॉकी में भारत का परचम लहराने वाले दिग्गज मेजर ध्यानचंद ने अपने करियर में 400 से अधिक गोल किए। वे स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय ओलंपिक टीम के तीन बार (1928, 1932 और 1936) हिस्सा रहे।

खेल में देश का सर्वोच्च लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार भी ध्यानचंद के नाम पर ही दिया जाता है। इसकी शुरुआत 2002 में की गई थी।

साथ ही 2002 में ही नई दिल्ली स्थित नैशनल स्टेडियम का नाम भी बदल कर मेजर ध्यानचंद स्टेडियम रखा गया था।

भारतीय ओलंपिक संघ ने मेजर ध्यानचंद को शताब्दी का खिलाड़ी घोषित किया था और उनकी जन्मतिथि 29 अगस्त को भारत में ‘राष्ट्रीय खेल दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन खिलाड़ियों को देश के सर्वोच्च खेल पुरस्कार दिए जाते हैं।

मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार

मेजर ध्यान चंद खेल रत्न पुरस्कार (पूर्व राजीव गांधी खेल रत्न) भारत में दिया जाने वाला सबसे बड़ा खेल पुरस्कार है। इस पुरस्कार को भारत एवं विश्व हॉकी के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी के नाम पर रखा गया है, जो तीन बार ओलम्पिक के स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम के सदस्य रहे। यह प्रतिवर्ष खेल एवं युवा मंत्रालय द्वारा प्रदान किया जाता है। प्राप्तकर्ताओं को मंत्रालय द्वारा गठित एक समिति द्वारा चुना जाता है और उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पिछले चार साल की अवधि में खेल क्षेत्र में शानदार और सबसे उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए सम्मानित किया जाता है। इस पुरस्कार मे एक पदक, एक प्रशस्ति पत्र और नगद राशि पुरस्कृत व्यक्ति को दिये जाते है। सन् २०१८ में यह राशी ७.५ लाख रुपये थी। लेकिन अब यह राशि बढ़ाकर २५ लाख कर दिया गया है। सम्मानित व्यक्तियों को रेलवे की मुफ्त पास सुविधा प्रदान की जाती है जिसके तहत मेजर ध्यान चंद खेल रत्न पुरस्कार विजेता राजधानी या शताब्दी गाड़ियों में प्रथम और द्वितीय श्रेणी वातानुकूलित कोचों में मुफ्त में यात्रा कर सकते हैं।

१९९१-९२ में स्थापित यह पुरस्कार पहले किसी खिलाड़ी को एक वर्ष में शानदार प्रदर्शन के लिए दिया जाता था। २०१४ की पुरस्कार चयन समिति द्वारा दिए गए सुझावों के आधार पर, मंत्रालय ने चार वर्षों की अवधि में प्रदर्शन पर विचार करने के लिए फरवरी २०१५ में मानदंडों को संशोधित किया। किसी दिए गए वर्ष के लिए नामांकन ३० अप्रैल तक या अप्रैल के अंतिम कार्य दिवस तक स्वीकार किए जाते हैं, जिसमें एक खेल परकार के दो खिलाड़ियों से अधिक नामांकिन नहीं कर सकते है। एक बारह सदस्यीय समिति ओलंपिक खेलों, पैरालम्पिक खेलों, एशियाई खेलों और राष्ट्रमंडल खेलों जैसे विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय आयोजनों में एक खिलाड़ी के प्रदर्शन का मूल्यांकन करती है। समिति बाद में खेल एवं युवा राज्यमंत्री के पास अपनी मंजूरी के लिए अपनी सिफारिशें भेजती है।

इस पुरस्कार के पहले प्राप्तकर्ता शतरंज के ग्रैंडमास्टर विश्वनाथन आनंद थे, जिन्हें वर्ष १९९१-९२ में अपने प्रदर्शन के लिए सम्मानित किया गया था। २००१ में, निशानेबाज अभिनव बिंद्रा, जो १८ वर्ष की आयु के थे, पुरस्कार के सबसे कम उम्र के प्राप्तकर्ता बने। आमतौर पर यह पुरस्कार एक वर्ष में केवल एक खिलाड़ी को सम्मानित किया जाता है, जिसमें कुछ अपवाद बने हैं (१९९३-९४, २००२, २००९, २०१२, २०१६, २०१७, २०१८ और २०१९) जब एक वर्ष में कई प्राप्तकर्ता सम्मानित किए गए थे। २०१९ के अनुसार अड़तीस प्राप्तकर्ता हुए हैं जो चौदह खेलों में से हैं: एथलेटिक्स, बैडमिंटन, बिलियर्ड्स, बॉक्सिंग, शतरंज, क्रिकेट, फील्ड हॉकी, जिमनास्टिक्स, शूटिंग, स्नूकर, टेनिस, कुश्ती, भारोत्तोलन और नौका दौड़। इस पुरस्कार के सबसे हालिया प्राप्तकर्ता पैरा-एथलीट दीपा मलिक और पहलवान बजरंग पूनिया हैं।

SOURCE-PIB

 

नये डिजिटल भुगतान के साधन ई-रुपी

(प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने 2 अगस्त को कैशलेस और संपर्क रहित भुगतान के साधन के रूप में डिजिटल भुगतान समाधान ई- रुपी का शुभारंभ किया। प्रधान मंत्री ने कहा कि देश में डिजिटल लेनदेन में प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) को और अधिक प्रभावी बनाने में ई-रुपी वाउचर एक बड़ी भूमिका निभायेगा और डिजिटल शासन व्यवस्था को एक नया आयाम देगा। उन्होंने कहा कि ई-रुपी इस बात का प्रतीक है कि भारत, लोगों के जीवन को तकनीक से जोड़कर कैसे आगे बढ़ रहा है।)

ई-रुपी क्या है और यह कैसे काम करता है?

ई-रुपी मूल रूप से एक डिजिटल वाउचर है जो एक लाभार्थी को उसके फोन पर एसएमएस या क्यूआर कोड के रूप में मिलता है। यह एक प्रीपेड वाउचर है, जिसे वह किसी भी केंद्र पर, जो इसे स्वीकार करता है, जाकर उसका उपयोग कर सकता है।

उदाहरण के लिए, यदि सरकार अपने कर्मचारी का किसी निर्दिष्ट अस्पताल में विशेष उपचार का खर्च वहन करना चाहती है, तो वह एक भागीदार बैंक के माध्यम से निर्धारित राशि के लिए ई-रुपी का वाउचर जारी कर सकेगी। कर्मचारी को उसके फीचर फोन/स्मार्ट फोन पर एक एसएमएस या एक क्यूआर कोड प्राप्त होगा। वह निर्दिष्ट अस्पताल में जा कर उसकी सेवाओं का लाभ उठायेगा और अपने फोन पर प्राप्त ई-रुपी वाउचर से भुगतान कर सकेगा।

इस प्रकार ई-रुपी एक बार का संपर्क रहित, कैशलेस वाउचर-आधारित भुगतान का तरीका है जो उपयोगकर्ताओं को कार्ड, डिजिटल भुगतान ऐप या इंटरनेट बैंकिंग तक पहुंचे बिना वाउचर भुनाने में मदद करता है।

ई-रुपी को वैसी डिजिटल मुद्रा मानने का भ्रम नहीं होना चाहिए जिसे लाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक विचार कर रहा है। इसकी बजाय ई-रुपी एक व्यक्ति विशिष्ट, यहां तक कि उद्देश्य विशिष्ट डिजिटल वाउचर है।

ई-रुपी उपभोक्ता के लिए कैसे फायदेमंद है?

ई-रुपी के लिए लाभार्थी के पास बैंक खाता होना आवश्यक नहीं है, जो अन्य डिजिटल भुगतान माध्यमों की तुलना में इसकी एक प्रमुख विशिष्टता है। यह एक आसान, संपर्क रहित भुगतान पाने की दो-चरणीय प्रक्रिया सुनिश्चित करता है जिसमें व्यक्तिगत विवरण साझा करने की भी आवश्यकता नहीं होती है।

एक अन्य लाभ यह भी है कि ई-रुपी बुनियादी फोन पर भी संचालित होता है, इसलिए इसका उपयोग उन लोगों द्वारा भी किया जा सकता है जिनके पास स्मार्ट फोन नहीं है या उन जगहों पर जहां इंटरनेट कनेक्शन कमजोर है।

प्रायोजकों को ई-रुपी से  क्या लाभ हैं?

प्रत्यक्ष-लाभ हस्तांतरण को मजबूत करने तथा इसे और अधिक पारदर्शी बनाने में ई-रुपी एक प्रमुख भूमिका निभा सकेगा ऐसी आशा है। चूंकि, वाउचर को भौतिक रूप से जारी करने की कोई आवश्यकता नहीं है, इससे लागत की भी कुछ बचत होगी।

सेवा प्रदाताओं को क्या लाभ होंगे?

ई-रुपी प्रीपेड वाउचर होने के नाते सेवा प्रदाता को रीयल टाइम भुगतान का भरोसा देगा।

ई-रुपी किसने विकसित किया है?

भारत में डिजिटल भुगतान पारिस्थितिकी तंत्र की देखरेख करने वाले नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) ने कैशलेस लेनदेन को बढ़ावा देने के लिए यह वाउचर-आधारित भुगतान प्रणाली ई-रुपी लॉन्च की है।

वित्तीय सेवा विभाग, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय तथा राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण के सहयोग से इसे विकसित किया गया है।

कौन से बैंक ई-रुपी जारी करते हैं?

नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया ने ई-रुपी लेनदेन के लिए 11 बैंकों के साथ साझेदारी की है। ये बैंक हैं एक्सिस बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा, केनरा बैंक, एचडीएफसी बैंक, आईसीआईसीआई बैंक, इंडियन बैंक, इंडसइंड बैंक, कोटक महिंद्रा बैंक, पंजाब नेशनल बैंक, भारतीय स्टेट बैंक और यूनियन बैंक ऑफ इंडिया।इसे लेने वाले ऐप्स हैं भारत पे, भीम बड़ौदा मर्चेंट पे, पाइन लैब्स, पीएनबी मर्चेंट पे और योनो एसबीआई मर्चेंट पे हैं।जल्द ही ई-रुपी स्वीकार करने वाले और अधिक बैंकों तथा ऐप्स के इसमें शामिल होने की उम्मीद है।

अभी ई-रुपी का उपयोग कहां किया जा सकता है?

शुरुआत में नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया ने 1,600 से अधिक अस्पतालों के साथ करार किया है जहां ई-रुपी को भुनाया अर्थात उससे भुगतान किया जा सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले दिनों में ई-रुपी का उपयोग का आधार व्यापक होने की उम्मीद है। यहां तक कि निजी क्षेत्र भी इसका उपयोग अपने कर्मचारियों को लाभ देने के लिए कर सकेंगे। सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग भी इसे बिजनेस टू बिजनेस लेनदेन के लिए अपना सकेंगे।

SOURCE-PIB

 

भारत का पहला हार्ट फेलियर रिसर्च बायो-बैंक

श्री चित्रा तिरुनल इंस्टीट्यूट फॉर मेडिकल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी (एससीटीआईएमएसटी) में देश के पहले हार्ट फेलियर रिसर्च बायो-बैंक (एनएचएफबी) का उद्घाटन किया गया, जो भविष्य के उपचारों के लिए एक गाइड के रूप में रक्त, बायोप्सी और नैदानिक डेटा एकत्र करेगा। एनएचएफबी का 5 अगस्त को वर्चुअल उद्घाटन करते हुए, स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग (डीएचआर) के सचिव और भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के महानिदेशक प्रो. बलराम भार्गव ने कहा कि देश में कोई हार्ट फेलियर बायो-बैंक नहीं है और यह भविष्य के उपचारों और प्रौद्योगिकियों का मार्गदर्शन करने में बहुत मदद करेगा, साथ ही यह हार्ट फेलियर के रोगियों को काफी लाभ पहुंचाएगा। उन्होंने कहा कि बायो-बैंक भारतीय बच्चों और वयस्कों में दिल की बीमारियों और दिल की विफलता के बारे में अंतर्दृष्टि प्रदान करेगा, जो कि पश्चिमी देशों की तुलना में काफी अलग हैं।

एससीटीआईएमएसटी के अध्यक्ष और नीति आयोग के सदस्य डॉ. वी. के. सारस्वत ने  आशा व्यक्त करते हुए कहा कि एनएचएफबी आणविक तरीकों को समझने में बहुत मददगार साबित होगा और दिल की विफलता की पहचान, निदान और उपचार में सुधार करेगा। उन्होंने कहा कि यह भारत में हार्ट फेलियर में अनुसंधान के एक नए युग की शुरुआत करेगा और हृदय के रोगियों के निदान और उपचार के परिदृश्य को बदल देगा।”

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के सचिव प्रो. आशुतोष शर्मा ने अपने संदेश में बताया, “यह सुविधा कोविड-पश्चात् हार्ट फेलियर के क्षेत्र में अनुसंधान और उपचार के लिए उपयोगी होगी। लॉन्ग-कोविड लक्षणों और पोस्ट-कोविड हार्ट फेलियर के मामले में वृद्धि होने से रोगियों के आंकड़े तथा बायोस्पेसिमेन एकत्र करने की आवश्यकता होती है, जो भविष्य के अनुसंधान के लिए बायोबैंक हो सकते हैं। एनएचएफबी के माध्यम से, अनुसंधानकर्ता गुणवत्ता और सुरक्षा के समुचित मानकों को कायम रखते हुए, नैदानिक डेटा से जुड़े अच्छी तरह से परिभाषित जैविक नमूनों तक पहुंच प्राप्त कर सकते हैं। मुझे पूरी उम्मीद है कि एनएचएफबी भारत और विदेशों में अनुसंधान की सुविधा प्रदान करेगा, जिससे चिकित्सकों और वैज्ञानिकों को दिल की विफलता से संबंधित रुग्णता और मृत्यु दर को समझने के साथ-साथ समाधान खोजने में मिलकर काम करने में मदद मिलेगी।’’

एससीटीआईएमएसटी के निदेशक प्रो. अजीत कुमार वीके ने कहा कि बायो-बैंक महत्वपूर्ण संसाधन है, जिसमें मानव शरीर के अंगों के उच्च गुणवत्ता वाले जैविक नमूनों का संग्रह होता है जिनका उपयोग आणविक तरीकों को समझने और दिल की विफलता की पहचान, निदान और उपचार में सुधार के लिए किया जा सकता है।

परियोजना के प्रमुख अन्वेषक और एससीटीआईएमएसटी में कार्डियोलॉजी के प्रो. डॉ. हरिकृष्णन एस ने बताया कि भंडारण सुविधाओं में -20, -80 डिग्री मैकेनिकल फ्रीजर और एक तरल नाइट्रोजन भंडारण प्रणाली शामिल है, जो – 140 डिग्री पर जैव-नमूने को कई वर्षों तक स्टोर कर सकती है। वर्तमान में, लगभग 25,000 बायोसैंपल को स्टोर करने की सुविधा है।

बायोसैंपल्स में ओपन-हार्ट सर्जरी के दौरान प्राप्त रक्त, सीरम, ऊतक के नमूने और हृदय की विफलता के रोगियों से एकत्र किए गए पेरिफरल रक्त मोनोन्यूक्लियर सेल (पीबीएमसी) और जीनोमिक डीएनए शामिल हैं। आईसीएमआर के एक सदस्य के साथ एक तकनीकी सलाहकार समिति (टीएसी) द्वारा बायो-बैंक की गतिविधि की निगरानी की जाती है।

नमूने दान करने के इच्छुक रोगियों से सहमति प्राप्त करने के बाद नमूने एकत्र किए जाते हैं। संग्रहीत और सूचीबद्ध नमूनों को नैदानिक डेटा जैसे – शरीर-विज्ञान संबंधी उपायों, इमेजिंग डेटा जैसे ईसीजी, इकोकार्डियोग्राफी एमआरआई, और अनुवर्ती डेटा से जोड़ा जाएगा। टीएसी और एससीटीआईएमएसटी की आचार समिति द्वारा प्रस्ताव को मंजूरी मिलने के बाद दिल की विफलता से संबंधित अनुसंधान में रुचि रखने वाले अनुसंधानकर्ता और चिकित्सक एससीटीआईएमएसटी के साथ सहयोग कर सकते हैं।

एससीटीआईएमएसटी के बायो-बैंक ने हाइपरट्रॉफिक कार्डियोमायोपैथी में सहयोगात्मक अनुसंधान के लिए इनस्टैम बैंगलोर के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जो दिल की मांसपेशियों फूलने से संबंधित है।

भारत में हार्ट फेलियर के एक प्रमुख स्वास्थ्य समस्या के रूप में उभरने के साथ, आईसीएमआर ने क्षेत्र में अनुसंधान को बढ़ाने के लिए एससीटीआईएमएसटी में नेशनल सेंटर फॉर एडवांस्ड रिसर्च एंड एक्सीलेंस इन हार्ट फेलियर (केयर-एचएफ) की शुरुआत की थी। हार्ट फेलियर बायो-बैंक इस परियोजना के प्रमुख घटकों में से एक है, जिसमें अत्याधुनिक भंडारण सुविधाओं के विकास के लिए 85 लाख रुपये की धनराशि आबंटित की गई है।

SOURCE-PIB

 

पीएम-दक्षपोर्टल और पीएम-दक्षमोबाइल ऐप

केन्द्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री डॉ. वीरेन्द्र कुमार 7 अगस्त, 2021 को नालंदा सभागार, डॉ अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर, दिल्ली में ‘पीएम-दक्ष’ पोर्टल और ‘पीएम-दक्ष’ मोबाइल ऐप लॉन्च करेंगे।

सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने एनईजीडी के सहयोग से पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों और सफाई कर्मचारियों के लक्षित समूहों के लिए कौशल विकास योजनाओं को आसान बनाने के लिए इस पोर्टल और ऐप को विकसित किया है। इस पहल के माध्यम से लक्षित समूहों के युवा अब अधिक आसानी से कौशल विकास प्रशिक्षण कार्यक्रमों का लाभ उठा सकेंगे।

सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय द्वारा वर्ष 2020-21 से प्रधानमंत्री दक्षता और कुशलता सम्पन्न हितग्राही (पीएम-दक्ष) योजना लागू की जा रही है। इस योजना के तहत पात्र लक्ष्य समूह को कौशल विकास प्रशिक्षण कार्यक्रम (i) कौशल उन्नयन/पुन: कौशल (ii) अल्पकालिक प्रशिक्षण कार्यक्रम (iii) दीर्घकालिक प्रशिक्षण कार्यक्रम और (iv) उद्यमिता विकास कार्यक्रम (ईडीपी) पर उपलब्ध कराया जा रहा है।

SOURCE-PIB

 

ट्राईफेड ने अपना 34वां स्थापना दिवस मनाया

चौंतीसवें स्थापना दिवस के अवसर पर 6 अगस्त, 2021 को ट्राईफेड मुख्यालय में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था, जिसमें श्री अर्जुन मुंडा, माननीय जनजातीय कार्य मंत्री उपस्थित थे।

इस अवसर पर, ट्राईफेड दल ने जनजातीय जीवन को बदलने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। यह कार्यक्रम केवल ‘स्थापना दिवस उत्सव’ ही नहीं था, बल्कि जनजातीय क्षेत्रों में व्यापार से संबंधित मुद्दों और जनजातीय समुदाय के लिए उनके उत्पादों के व्यापार में उचित सौदा सुनिश्चित करने की आवश्यकता के बारे में सभी के अंदर जागरूकता बढ़ाने के लिए भी आयोजित किया गया था

  • भारतीय जनजातीय सहकारी विपणन विकास परिसंघ (TRIFED) की स्थापना वर्ष 1987 में हुई। यह राष्ट्रीय स्तर का एक शीर्ष संगठन है जो जनजातीय कार्य मंत्रालय के प्रशासकीय नियंत्रण के अधीन कार्य करता है।
  • ट्राइफेड का मुख्यालय दिल्ली में है और इसके 13 क्षेत्रीय कार्यालय हैं जो देश के विभिन्न स्थानों में स्थित हैं।

उद्देश्य

  • ट्राइफेड का प्रमुख उद्देश्य जनजातीय उत्पादों, जैसे- धातु कला, जनजातीय टेक्सटाइल, कुम्हारी, जनजातीय पेंटिंग, जिन पर जनजातीय लोग अपनी आय के एक बड़े भाग हेतु बहुत अधिक निर्भर हैं, के विपणन विकास द्वारा देश में जनजातीय लोगों का सामाजिक-आर्थिक विकास करना है।
  • ट्राइफेड जनजातियों को अपने उत्पाद बेचने में एक समन्वयक और सेवाप्रदाता के रूप में कार्य करता है।
  • ट्राइफेड का उद्देश्य है जनजातीय लोगों को जानकारी, उपकरण और सूचनाओं से सशक्त करना ताकि वे अपने कार्यों को अधिक क्रमबद्ध और वैज्ञानिक तरीके से कर सकें।
  • इसमें जागरूकता, स्वयं सहायता समूहों की रचना और कोई खास कार्यकलाप करने के लिये प्रशिक्षण देकर जनजातीय लोगों का क्षमता निर्माण भी शामिल है।

कार्य

यह मुख्यतः दो कार्यों का दायित्व लेता है अर्थात लघु वनोत्पाद विकास और खुदरा विपणन और विकास।

लघु वनोत्पाद (MFP) विकास

  • जनजातीय लोगों की आजीविका का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है गैर-काष्ठ वनोत्पाद जिसे सामान्यतः लघु वनोत्पाद कहा जाता है। इसमें पौधीय मूल के सभी गैर-काष्ठ उत्पाद शामिल हैं जैसे बांस, बेंत, चारा, पत्तियाँ, गम, वेक्स, डाई, रेज़िन और कई प्रकार के खाद्य जैसे मेवे, जंगली फल, शहद, लाख, रेशम आदि हैं।
  • ये लघु वनोत्पाद जंगलों में या जंगलों के नजदीक रहने वाले लोगों को जीविका और नकद आय दोनों उपलब्ध कराते हैं। ये उनके खाद्य, फल, दवा और अन्य उपभोग वस्तुओं का एक बड़ा भाग हैं और विक्री से उन्हें नकद आय भी प्रदान करते हैं।
  • लघु वनोत्पाद वनवासियों के लिये उल्लेखनीय आर्थिक और सामाजिक महत्व के हैं क्योंकि अनुमानतः 100 मिलियन लोग अपनी आजीविका का स्रोत लघु वनोत्पाद के संग्रह और विपणन से प्राप्त करते हैं, (वन अधिकार अधिनियम, 2011 पर राष्ट्रीय समिति की रिपोर्ट)।
  • वनों में रहने वाले लगभग 100 मिलियन लोग खाद्य, आश्रय, औषधि और नकद आय के लिये लघु वन उत्पादों पर निर्भर हैं। जनजातीय लोग अपनी वार्षिक आय का 20 से 40 प्रतिशत लघु वनोत्पाद से प्राप्त करते हैं जिस पर वे अपने समय का एक बड़ा भाग खर्च करते हैं।
  • महिलाओं के वित्तीय सशक्तीकरण से भी लघु वन उत्पादों का एक मजबूत संबंध है क्योंकि अधिकतर लघु वन उत्पाद महिलाओं द्वारा संग्रहीत और प्रयुक्त/विक्री किये जाते हैं।
  • लघु वनोत्पादों पर निर्भर लोग सामान्यतया अन्य समस्याओं से पीड़ित रहते हैं, जैसे उत्पादों की नश्वर प्रकृति, धारण क्षमता का अभाव, विपणन ढांचे का अभाव, विचौलियों द्वारा शोषण आदि।
  • इन कारणों से लघु वनोत्पाद संग्राहक जो कि अधिकतर गरीब लोग होते हैं, उचित मूल्य के लिये मोलभाव करने में असमर्थ रहते हैं।
  • इन समस्याओं से निपटने के लिये भारत सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य और वैल्यू चेन विकास द्वारा ‘लघु वनोत्पाद के विपणन के लिये व्यवस्था’ योजना शुरू करने का निश्चय किया है।
  • यह योजना लघु वनोत्पाद संग्राहकों की आजीविका में सुधार के लिये उनके द्वारा संग्रहीत वनोत्पादों का उचित मूल्य देने हेतु एक सामाजिक सुरक्षा नेट के रूप में डिज़ाइन किया गया है।

खुदरा विपणन और विकास

  • ट्राइफेड का लक्ष्य है, जनजातीय लोगों के लिये एक संधारणीय बाजार का सृजन और व्यावसायिक अवसर पैदा कर जनजातीय लोगों की आजीविका में सुधार।
  • इसमें शामिल है जनजातीय उत्पादों के विपणन के लिये संवहनीय आधार पर विपणन संभावनाओं की खोज, ब्रांड सृजित करना और अन्य आवश्यक सेवायें प्रदान करना।
  • देशभर में इसके 13 क्षेत्रीय कार्यालयों का संजाल है जो अपने खुदरा विपणन नेटवर्क ट्राइब्स इंडिया आउटलेट्स के माध्यम से विपणन हेतु जनजातीय उत्पादों की पहचान करने और उन्हें मंगाने का कार्य करता है।
  • यह देश भर में अपने आपूर्तिकर्ता पैनलों के माध्यम से कई दस्तकारी, हथकरघा और प्राकृतिक तथा खाद्य उत्पादों को मंगाने का कार्य करता है। आपूर्तिकर्ताओं में शामिल हैं, निजी जनजातीय दस्तकार, जनजातीय स्वयं सहायता समूह, जनजातीय लोगों के साथ कार्य कर रहे संगठन/एजेंसियां/एनजीओ आदि। ये आपूर्तिकर्त्ता ट्राइफेड की सूची में आपूर्तिकर्त्ताओं की सूचीबद्धता के लिये नीति-निर्देशक तत्त्वों के अनुसार सूचीबद्ध हैं।
  • ट्राइफेड देश भर में मौजूद अपने खुदरा केन्द्रों और अपनी प्रदर्शनियों के माध्यम से जनजातीय उत्पादों का विपणन कर रहा है। इसने जनजातीय हस्तशिल्प के संवर्धन के लिये अपने स्वयं के 35 शोरूम और 8 माल प्रेक्षण शोरूम की एक शृंखला की स्थापना राज्यस्तरीय संगठनों के सहयोग से की है।

SOURCE-PIB

 

पृथ्वी अवलोकन उपग्रह

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (Indian Space Research Organisation – ISRO) 12 अगस्त को एक पृथ्वी अवलोकन उपग्रह लॉन्च (Earth Observation Satellite) करने जा रहा है। इस उपग्रह को श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से लॉन्च किया जाएगा।

  • EOS-03 नामक उपग्रह को GSLV-F10 की 14वीं उड़ान में ले जाया जाएगा।
  • GSLV-F10 उपग्रह को जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में स्थापित करेगा।
  • EOS-03 अपने ऑनबोर्ड प्रणोदन प्रणाली का उपयोग करके अंतिम भूस्थिर कक्षा (geostationary orbit) में पहुंच जाएगा।

EOS-03 एक अत्याधुनिक उपग्रह है। यह बाढ़ और चक्रवात जैसी प्राकृतिक आपदाओं की वास्तविक समय की निगरानी में सक्षम होगा। यह जल निकायों (water bodies), फसलों (crops), वन आवरण परिवर्तन (forest cover changes) और वनस्पति की स्थिति (vegetation condition) की निगरानी भी करेगा। EOS-03 पूरे देश की प्रतिदिन चार से पांच बार इमेजिंग करने में सक्षम है।

जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (GSLV)

GSLV भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) का एक एक्सपेंडेबल लॉन्च सिस्टम है। 2001 से 2018 के बीच, GSLV का इस्तेमाल 13 लांच में किया गया था। हालांकि, GSLV मार्क III एक पूरी तरह से अलग प्रक्षेपण वाहन (launch vehicle) है। GSLV परियोजना 1990 में भू-समकालिक उपग्रहों (geosynchronous satellites) के लिए भारत की लांच क्षमता हासिल करने के उद्देश्य से शुरू की गई थी।

SOURCE-GK TODAY

 

बांध सुरक्षा कार्यक्रम

भारत सरकार, केंद्रीय जल आयोग, 10 भाग लेने वाले राज्यों के सरकारी प्रतिनिधियों और विश्व बैंक ने लंबी अवधि के बांध सुरक्षा कार्यक्रम के लिए 4 अगस्त, 2021 को $250 मिलियन की परियोजना पर हस्ताक्षर किए।

मुख्य बिंदु

  • यह परियोजना भारत में विभिन्न राज्यों में मौजूदा बांधों की सुरक्षा और प्रदर्शन में सुधार करने में मदद करेगी।
  • इस परियोजना के लिए समझौते पर वित्त मंत्रालय के तहत आर्थिक मामलों के विभाग के अतिरिक्त सचिव, राज्य सरकारों के प्रतिनिधियों और विश्व बैंक की ओर से जुनैद अहमद द्वारा हस्ताक्षर किए गए थे।

दूसरी बांध पुनर्वास और सुधार परियोजना (Second Dam Rehabilitation and Improvement Project – DRIP-2)

यह परियोजना बांध सुरक्षा दिशानिर्देशों के निर्माण, वैश्विक अनुभव और नवीन तकनीकों को पेश करके बांध सुरक्षा को मजबूत करने में मदद करेगी। इस परियोजना के तहत  बांध सुरक्षा प्रबंधन पर बल दिया जायेगा।

DRIP-2 के तहत महत्वपूर्ण उपाय

DRIP-2 द्वारा किए जाने वाले महत्वपूर्ण उपायों में बाढ़ पूर्वानुमान प्रणाली (flood forecasting systems) और एकीकृत जलाशय संचालन (integrated reservoir operations) शामिल हैं। यह जलवायु लचीलापन (climate resilience) बनाने में योगदान देगी। यह परियोजना आपातकालीन कार्य योजनाओं को तैयार करने और लागू करने का कार्य भी करेगी, जो कमजोर डाउनस्ट्रीम समुदायों को जलवायु परिवर्तन के संभावित नकारात्मक प्रभावों और जोखिमों के प्रति लचीलापन बढ़ाने में सक्षम बनाएगी। यह फ्लोटिंग सोलर पैनल जैसी पूरक राजस्व सृजन योजनाओं का भी संचालन करेगा।

इससे किन राज्यों को फायदा हो सकता है?

बांध सुरक्षा परियोजना छत्तीसगढ़, केरल, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, मेघालय, मणिपुर, राजस्थान, ओडिशा और तमिलनाडु राज्यों में 120 बांधों में लागू की जाएगी। केंद्रीय जल आयोग इस परियोजना को राष्ट्रीय स्तर पर लॉन्च करेगा। समय के साथ परियोजना कार्यान्वयन के दौरान अन्य राज्यों या एजेंसियों को भी परियोजना में जोड़ा जा सकता है।

SOURCE-GK TODAY

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