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CURRENT AFFAIRS – 12th JULY 2021

CURRENT AFFAIRS – 12th JULY 2021
राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक के 40वें स्थापना दिवस

केंद्रीय कृषि मंत्री श्री नरेंद्र सिंह तोमर ने राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक के 40वें स्थापना दिवस पर एक वेबिनार को संबोधित कियाछोटे व मझौले किसानों की प्रगति सरकार का प्रमुख लक्ष्य
सरकार ने आत्मनिर्भरता का विजन निर्धारित किया है, जिसका आधार आत्मनिर्भर कृषि क्षेत्र व आत्मनिर्भर किसान होंगे। 3 कृषि कानूनों के रूप में केंद्र सरकार ने संरचनात्मक सुधार किए हैं, जो आत्मनिर्भरता की दिशा में उठाया महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी कदम है। उन्होंने विश्वास जताया कि हम सामूहिक रूप से, मिल-जुलकर काम करते हुए अपने किसानों को उत्साही उत्पादक के रूप में परिवर्तित करेंगे तथा भारतीय कृषि क्षेत्र को राष्ट्रीय और वैश्विक अर्थव्यवस्था के समन्वित व अनिवार्य हिस्से के रूप में विकसित करने में अहम योगदान देंगे।
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि ग्रामीण व कृषि आधारभूत संरचनाओं पर ज़ोर देते हुए आत्मनिर्भर भारत अभियान के अंतर्गत प्रधानमंत्री जी ने कृषि व सम्बद्ध क्षेत्रों के विकास के लिए 1.5 लाख करोड़ रू. से अधिक पैकेज दिए हैं, जिनका लाभ देश में खेती को मिलेगा। इसमें एक लाख करोड़ रू. की विशेष “कृषि आधारभूत संरचना निधि” द्वारा निवेश को बढ़ावा देना उद्देश्य है। किसानों को अब सरकार से 3 प्रतिशत ब्याज व ऋण गारंटी के साथ वित्तीय सहायता मिलेगी। योजना में भागीदार नाबार्ड ने 35 हजार प्राथमिक कृषि सहकारी समितियों को ‘वन-स्टॉप शॉप’ के रूप में विकसित करने का लक्ष्य रखा है। नाबार्ड ने 3 हजार पैक्स को बहु सेवा केन्द्रों की स्थापना के लिए 1,700 करोड़ रू. मंजूर किए है। श्री तोमर ने कहा कि बीते 7 वर्षों में नाबार्ड ने ग्रामीण आधारभूत संरचना विकास निधि के तहत राज्यों को 1.81 लाख करोड़ रू. का ऋण दिया, जिसमें से एक-तिहाई का उपयोग सिंचाई के लिए किया है। यह फंड बढ़ाकर 40 हजार करोड़ रू. कर दिया गया है। पीएम कृषि सिंचाई योजना में ‘प्रति बूंद- अधिक फसल’ में भी नाबार्ड व अन्य ने अच्छा योगदान दिया है। इस अभियान में केंद्र ने, नाबार्ड के तहत सूक्ष्म सिंचाई निधि की समूह राशि बढ़ाकर 10 हजार करोड़ रू. कर दी है।
राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक
राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) मुम्बई, महाराष्ट्र अवस्थित भारत का एक शीर्ष बैंक है। इसे “कृषि ऋण से जुड़े क्षेत्रों में, योजना और परिचालन के नीतिगत मामलों में तथा भारत के ग्रामीण अंचल की अन्य आर्थिक गतिविधियों के लिए मान्यता प्रदान की गयी है।
इतिहास
शिवरामन समिति (शिवरामन कमिटी) की सिफारिशों के आधार पर राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक अधिनियम 1981 को लागू करने के लिए संसद के एक अधिनियम के द्वारा 12 जुलाई 1982, को नाबार्ड की स्थापना की गयी। इसने कृषि ऋण विभाग (एसीडी (ACD) एवं भारतीय रिजर्व बैंक के ग्रामीण योजना और ऋण प्रकोष्ठ (रुरल प्लानिंग एंड क्रेडिट सेल) (आरपीसीसी (RPCC)) तथा कृषि पुनर्वित्त और विकास निगम (एआरडीसी (ARDC)) को प्रतिस्थापित कर अपनी जगह बनाई. यह ग्रामीण क्षेत्रों में ऋण उपलब्ध कराने के लिए प्रमुख एजेंसियों में से एक है।
राष्‍ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक एक एेसा बैंक है जो ग्रामीणों को उनके विकास एवं अ‍‍ार्थिक रूप से उनकी जीवन स्तर सुधारने के लिए उनको ऋण उपलब्‍ध कराती है।
कृषि, लघु उद्योग, कुटीर एवं ग्रामीण उद्योग, हस्तशिल्प और अन्य ग्रामीण शिल्पों के उन्नयन और विकास के लिए ऋण-प्रवाह सुविधाजनक बनाने के अधिदेश के साथ नाबार्ड 12 जुलाई 1982 को एक शीर्ष विकासात्मक बैंक के रूप में स्थापित किया गया था। उसे ग्रामीण क्षेत्रों में अन्य संबंधित क्रियाकलापों को सहायता प्रदान करने, एकीकृत और सतत ग्रामीण विकास को बढ़ावा देने और ग्रामीण क्षेत्रों में समृद्धि सुनिश्चित करने का भी अधिदेश प्राप्त है।
भूमिका
ग्रामीण समृद्धि के फैसिलिटेटर के रूप में अपनी भूमिका का निर्वाह करने के लिए नाबार्ड को निम्नलिखित जिम्मेदारियाँ सौंपी गई हैं :
ग्रामीण क्षेत्रों में ऋणदाता संस्थाओं को पुनर्वित्त उपलब्ध कराना
संस्थागत विकास करना या उसे बढ़ावा देना
क्लाइंट बैंकों का मूल्यांकन, निगरानी और निरीक्षण करना.
ग्रामीण क्षेत्रों में विभिन्न विकासात्मक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए जो संस्थान निवेश और उत्पादन ऋण उपलब्ध कराते हैं उनके वित्तपोषण की एक शीर्ष एजेंसी के रूप में यह कार्य करता है।ऋण वितरण प्रणाली की अवशोषण क्षमता के लिए संस्थान के निर्माण की दिशा में उपाय करता है, जिसमे निगरानी, पुनर्वास योजनाओं के क्रियान्वयन, ऋण संस्थाओं के पुनर्गठन, कर्मियों के प्रशिक्षण में सुधार, इत्यादि शामिल हैं।
सभी संस्थाएं जो मूलतः जमीनी स्तर पर विकास में लगे काम से जुडी हैं, उनकी ग्रामीण वित्तपोषण की गतिविधियों के साथ समन्वय रखता है, तथा भारत सरकार, राज्य सरकारों, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई (RBI)) एवं नीति निर्धारण के मामलों से जुडी अन्य राष्ट्रीय स्तर की संस्थाओं के साथ तालमेल बनाए रखता है।
यह अपनी पुनर्वित्त परियोजनाओं की निगरानी एवं मूल्यांकन का उत्तरदायित्व ग्रहण करता है।
नाबार्ड का पुनर्वित्त राज्य सहकारी कृषि और ग्रामीण विकास बैंकों (SCARDBs), राज्य सहकारी बैंकों ((SCBs), क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (RRBs) बैंकों, वाणिज्यिक बैंकों (सीबीएस (CBS)) और आरबीआई अनुमोदित अन्य वित्तीय संस्थानों के लिए उपलब्ध है। जबकि निवेश ऋण का अंतिम लाभार्थियों में व्यक्तियों, साझेदारी से संबंधित संस्थानों, कंपनियों, राज्य के स्वामित्व वाले निगमों, या सहकारी समितियों को शामिल किया जा सकता है, जबकि आम तौर पर उत्पादन ऋण व्यक्तियों को ही दिया जाता है।
नाबार्ड का अपना मुख्य कार्यालय मुंबई, भारत में है।नाबार्ड अपने 28 क्षेत्रीय कार्यालय और एक उप कार्यालय, जो सभी राज्यों / केंद्र शासित प्रदेशों की राजधानियों में स्थित हैं, के माध्यम से देश भर में परिचालित है। प्रत्येक क्षेत्रीय कार्यालय [आरओ] में प्रधान कार्यकारी के रूप में एक मुख्य महाप्रबंधक [CGMs] है और प्रधान कार्यालय में कई शीर्ष अधिकारी कार्यकारी होते हैं जैसेकि कार्यकारी निदेशक [ईडी], प्रबंध निर्देशकों [एमडी] और अध्यक्ष.संपूर्ण देश में इसके 336 जिला कार्यालय, पोर्ट ब्लेयर में एक उप-कार्यालय और श्रीनगर में एक सेल है। इसके पास 6 प्रशिक्षण संस्थान भी हैं।
नाबार्ड को इसके ‘एसएचजी (SHG) बैंक लिंकेज कार्यक्रम’ के लिए भी जाना जाता है जो भारत के बैंकों को स्वावलंबी समूहों (एसएचजीज (SHGs)) उधार देने के लिए प्रोत्साहित करता है। क्योंकि एसएचजीज का गठन विशेषकर गरीब महिलाओं को लेकर किया गया है, इससे यह माइक्रोफाइनांस के लिए महत्वपूर्ण भारतीय उपकरण के रूप में विकसित हो गया है। इस कार्यक्रम के माध्यम से मार्च 2006 तक 33 मिलियन सदस्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले 2200000 लाख स्वयं सहायता समूह ऋण से जुड़ चुके थेनाबार्ड के पास प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन कार्यक्रम का भी एक (विभाग) पोर्टफोलियो है जिसमें के एक समर्पित उद्देश्य के लिए स्थापित कोष के माध्यम से जल संभर विकास, आदिवासी विकास और नवोन्मेषी फार्म जैसे विभिन्न क्षेत्रों को शामिल किया गया है।

SOURCE-PIB

 

एपीडा ने किसान सहकारी समितियों और एफपीओ के निर्यात को मजबूत करने के लिए नेफेड के साथ मसौदा पत्र पर हस्ताक्षर किए
सहकारी समितियों के साथ-साथ किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) के कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों की निर्यात क्षमता का बेहतर इस्तेमाल करने के लिए, कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) ने आज भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ लिमिटेड (नेफेड) के साथ मसौदा पत्र पर हस्ताक्षर किए।
मसौदा पत्र के अनुसार, सहयोग के प्रमुख क्षेत्रों के तौर पर एपीडा पंजीकृत निर्यातकों को नेफेड के जरिए भारत सरकार की चलाई जा रही सभी योजनाओं का लाभ उठाने के लिए सहयोग करेगा। मसौदा पत्र में प्रौद्योगिकी, कौशल, गुणवत्ता वाले उत्पादों और बाजार में उनकी पहुंच जैसे कदमों पर जोर देने की भी बात कही गई है। जिससे कि सहकारी समितियों द्वारा टिकाऊ निर्यात और उसमें बढ़ोतरी सुनिश्चित करने का परिकल्पना की गई है।
एपीडा, वाणिज्य मंत्रालय और नेफेड के तहत काम करता है। जो कि बहु राज्य सहकारी समिति अधिनियम के तहत पंजीकृत है। एपीडा इसके अलावा कृषि उत्पादन में सुधार के लिए कृषि उत्पादों की गुणवत्ता और किसानों को कृषि उत्पादों की बेहतर कीमत दिलाने के लिए भी काम करता है।
नेफेड द्वारा पहचान और प्रमोट की गई सहकारी समितियों, एफपीओ, पार्टनर को एपीडा निर्यात सुविधा बढ़ाने में मदद करेगा।
एपीडा और नेफेड भारत और विदेश में आयोजित होने वाले बी-टू-बी और बी-टू-सी मेले में किसान सहकारी समितियों में वैश्विक भागीदारी कराने में भी सहयोग करेंगे। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय कारोबार के विकास और प्रोत्साहन में भी मिलकर सहयोग करेंगे।
इसके अलावा वैश्विक व्यापार में किसान सहकारी समितियों की भागीदारी की सुविधा प्रदान करेंगे और साथ ही अंतर्राष्ट्रीय व्यापार विकास और प्रचार में पारस्परिक रूप से सहयोग करेंगे।
मसौदा पत्र में सहकारी समितियों, स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) के क्षमता निर्माण के लिए उनके सामाजिक और पर्यावरणीय कम्प्लायंस और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार कौशल प्रदान करने के लिए सहायता प्रदान करने का भी प्रावधान शामिल किया गया है। इसके तहत दोनों संगठन क्षेत्रीय, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर जागरूकता कार्यक्रम, कौशल विकास कार्यक्रम और कार्यशालाएं आयोजित करेंगे। एपीडा और नेफेड इस बात पर सहमत हुए है कि कृषि निर्यात नीति के तहत विभिन्न राज्यों में मौजूद क्लस्टर के सतत् विकास के लिए मिलकर काम करेंगे।
एपीडा के बारे में
कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) की स्थापना दिसंबर, 1985 में संसद द्वारा पारित कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण अधिनियम के अंतर्गत भारत सरकार द्वारा की गई। इस अधिनियम (1986 का 2) को गजट असाधारण भाग – II (खण्ड 3 (II) में 13.02.1986 से लागू किया गया। प्राधिकरण ने संसाधित खाद्य निर्यात प्रोत्साहन परिषद का स्थान लिया।
एपीडा प्राधिकरण का संयोजन
जैसे कि सविंधान में निर्धारित किया गया है एपीडा प्राधिकरण के निम्नलिखित सदस्य हैं-
केन्द्र सरकार द्वारा नियुक्त एक अध्यक्ष ।
भारत सरकार का कृषि विपणन सलाहकार, पदेन।
योजना आयोग के प्रतिनिधि रूप में केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त एक सदस्य ।
संसद के तीन सदस्य, जिसमें दो लोकसभा द्वारा निर्वाचित और एक राज्य सभा द्वारा निर्वाचित ।केन्द्रीय सरकार के मंत्रालयों से क्रमश: संबंध रखने तथा प्रतिनिधित्व करने वाले 8 सदस्यों को सरकार द्वारा नियुक्त किया जाता है ।
(क) कृषि एवं ग्रामीण विकास
(ख) वाणिज्य
(ग) वित्त
(घ) उद्योग
(ड.) खाद्य
(च) नागरिक आपूर्ति
(छ) नागर विमानन
(ज) शिपिंग एवं परिवहन
राज्यों और संघशासित प्रदेशों के प्रतिनिधि के रूप में वर्णक्रम के अनुसार चक्रानुक्रम से 5 सदस्यों को केन्द्र सरकार द्वारा नियुक्त किया जाता है ।
प्रतिनिधि के रूप में केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त सात सदस्य हैं-
(क) भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद
(ख) राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड
(ग) राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ
(घ) केन्द्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान
(ड.) भारतीय पैकेजिंग संस्थान
(च) भारतीय पैकेजिंग संस्थान
(छ) काजू निर्यात संवर्धन परिषद
केन्द्र सरकार के प्रतिनिधित्व द्वारा नियुक्त 12 सदस्य:
फल और सब्जी उत्पाद उद्योग
मांस, कुक्कुट और डेरी उत्पाद उद्योग
अन्य अनुसूचित उत्पाद उद्योग
पैकेजिंग उद्योग
कृषि अर्थशास्त्र तथा अनुसूचित उत्पादों के विपणन के क्षेत्र में विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों में से केन्द्र सरकार द्वारा नियुक्त 2 सदस्य
निर्दिष्ट कार्य
• वित्तीय सहायता प्रदान कर या सर्वेक्षण तथा संभाव्यता अध्ययनों, संयुक्त उद्यमों के माध्यम से साम्या पूँजी लगाकर तथा अन्य राहतों व आर्थिक सहायता योजनाओं के द्वारा अनुसूचित उत्पादों के निर्यात से संबद्ध उद्योगों का विकास करना ।
• निर्धारित शुल्क के भुगतान पर अनुसूचित उत्पादों के निर्यातकों के रूप में व्यक्तियों का पंजीकरण करना ।
• निर्यात उद्देश्य के लिए अनुसूचित उत्पादों के लिए मानक और विनिर्देश तय करना ।
• बूचड़खानों, संसाधन संयंत्रों, भंडारण परिसर, वाहनों या अन्य स्थानों में जहाँ ऐसे उत्पाद रखे जाते हैं या उन पर कार्य किया जाता है, उन उत्पादों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से निरीक्षण करना ।
• अनुसूचित उत्पादों की पैकेजिंग में सुधार लाना ।
• भारत से बाहर अनुसूचित उत्पादों के विपणन में सुधार लाना ।
• निर्यातोन्मुख उत्पादन का प्रोत्साहन और अनुसूचित उत्पादों का विकास ।
• उत्पादन, प्रसंस्करण, पैकेजिंग, विपणन या अनुसूचित उत्पादों के निर्यात में लगे संगठनों या कारखानों के मालिकों या अनुसूचित उत्पादों से सम्बद्ध मामलों के लिए निर्धारित ऐसे अन्य व्यक्तियों से आंकड़े एकत्र करना तथा इस प्रकार एकत्रित किए गए आंकड़ों या उनके किसी एक भाग या उनके उद्धरण प्रकाशित करना ।
• अनुसूचित उत्पादों से जुड़े उद्योगों के विभिन्न पहलुओं पर प्रशिक्षण देना ।
• निर्धारित किए गए अन्य मामले ।
एपीडा की उपस्थिति
एपीडा ने भारत के लगभग सभी कृषि संभावित राज्यों में अपनी उपस्थिति स्थापित कर ली है और अपने प्रधान कार्यालय, 5 क्षेत्रीय कार्यालय और 13 आभासी कार्यालयों के द्वारा कृषि निर्यात समुदाय को सेवाएं प्रदान करता रहा है ।
प्रधान कार्यालय
• नई दिल्ली
क्षेत्रीय कार्याल
• मुंबई
• कोलकाता
• बंगलौर
• हैदराबाद
• गुवाहाटी
PM Kisan FPO Yojana:
एफपीओ (FPO) का फुल फॉर्म है फॉर्मर प्रोड्यूसर ऑर्गेनाइजेशंस. यह एक संगठन है जिसके सदस्य खुद किसान ही होते हैं. यह संगठन छोटे और सीमांत किसानों को पूरी की पूरी मदद करता है. चाहे वह तकनीकी सहायता हो, मार्केटिंग, प्रॉसेसिंग और अन्य सिंचाई की सुविधाएं हों
जो किसान कृषि उत्पादों को पैदा करते हैं वे अपना एक समूह बनाकर उसे इंडियन कंपनीज एक्ट के तहत रजिस्टर करवा सकते हैं. इस प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए भारत सरकार के कृषि मंत्रालय और कृषि को-ऑपरेशन विभाग द्वारा यह किसानों को सहायता पहुंचाने के लिए किया गया है. यानी इसके जरिए किसानों को मदद पहुंचाई जा सकती है. इस संगठन के जरिए बीज, खाद, मशीनरी, मार्केट लिंकेज, ट्रेनिंग, नेटवर्किंग, वित्तीय सहायता और तकनीकी मदद उपलब्ध कराई जाती है
एफपीओ की मुख्य बातें
1. एफपीओ में नॉर्थ-ईस्ट और पहाड़ी इलाकों में कम से कम 100 सदस्य होने चाहिए, वहीं मैदानी इलाकों के लिए कम से कम 300 किसानों को संगठन में होना चाहिए.
2. यह क्लस्टर बेस्ड बिजनेस ऑर्गेनाइजेशंस द्वारा फॉर्म किया जाना चाहिए और प्रमोट किया जाना चाहिए और राज्य या क्लस्टर स्तर पर इसे लागू करने के लिए एजेंसी होनी चाहिए.
3. इसे वन डिस्ट्रिक्ट, वन प्रोडक्ट के तहत प्रमोट किया जाना चाहिए. इसके लिए बेहतर मार्केटिंग, ब्रैंडिंग, प्रोसेसिंग और एक्सपोर्ट के लिए प्रमोट किया जाना चाहिए.
4. यह पर्याप्त प्रशिक्षण और हैंड होल्डिंग प्रदान करता है और सीबीओ के स्तर से प्राथमिक प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है.
5. एफपीओ के निर्माण में उन जिलों को प्राथमिकता दी जाती है जो एस्पीरेशनल होते हैं और कम से कम एक जिले के एक ब्लॉक में एक एफपीओ होना चाहिए.
नफेड
भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ मर्यादित (National Agricultural Cooperative Marketing Federation of India / NAFED / नेफेड) भारत की बहु-राज्य सहकारी सोसायटीज अधिनियम के अंतर्गत पंजीकृत सहकार। सहकारी संस्था है। इसकी स्थापना गांधी जयंती के पावन अवसर पर 2 अक्तुबर, 1958 को की गई थी। नेफेड की स्थापना कृषि उत्पादों के सहकारी विपणन को बढ़ाने के लिए की गई थी ताकि किसानों को लाभ मिल सके। नेफेड के सदस्य प्रमुख रूप में किसान है जिन्हें नेफेड के क्रियाकलापों में सामान्य निकाय के सदस्यों के रूप में विचार प्रकट करने तथा नेफेड के संचालन कार्यो में सुझाव देने का अधिकार है एंव उनका बहुत महत्व है।
नेफेड के प्रमुख उद्देश्यों मॆं कृषि, उद्यान कृषि एवं वन उत्पाद का विपणन, संसाधन, भण्डारण की व्यवस्था करना, उन्नयन और विकास करना, कृषि यंत्रों, उपकरणों एवं अन्य प्रकार के उपकरणों का वितरण करना, अंतर्राज्यीय, राज्यांतर्गत, यथास्थिति थोक या खुदरा आयात-निर्यात व्यापार करना, भारत में इसके सदस्यों एवं सह्कारी विपणन, संसाधन एवं संभरण समितियों के उन्नयन एवं कृषि के लिए कृषि उत्पादन में सहायता और तकनीकी परामर्श देने का कार्य करना हैनेफेड “आपरेशन ग्रीन्स” के अंतर्गत मूल्य स्थिरीकरण उपायों को क्रियान्वित करने के लिए नोडल एजेंसी है।
SOURCE-PIB

 

इंटरनेशनल फाइनेंसियल सर्विसेज सेंटर्स (‘आईएफएससी’)
इंटरनेशनल फाइनेंसियल सर्विसेज सेंटर्स (‘आईएफएससी’) में वित्तीय उत्पादों, वित्तीय सेवाओं और वित्तीय संस्थानों को विकसित और विनियमित करने के लिए आईएफएससीए अधिनियम, 2019 के तहत इंटरनेशनल फाइनेंसियल सर्विसेज सेंटर्स अथॉरिटी (आईएफएससीए) की स्थापना की गई है। इस दिशा में, आईएफएससीए ने इंटरनेशनल फाइनेंसियल सर्विसेज सेंटर्स (‘आईएफएससी’) में व्यापार संबंधी वित्तीय सेवाएं प्रदान करने के लिए इंटरनेशनल ट्रेड फाइनेंस सर्विसेज (‘आईटीएफएस’) प्लेटफॉर्म की स्थापना और उसके संचालन के संबंध में एक रूपरेखा जारी की है।
यह रूपरेखा निर्यातकों और आयातकों को आईटीएफएस जैसे एक समर्पित इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म के जरिए अपने अंतरराष्ट्रीय व्यापार के क्रम में लेनदेन के लिए प्रतिस्पर्धी शर्तों पर विभिन्न प्रकार की व्यापार संबंधी वित्तीय सुविधाओं का लाभ उठाने में सक्षम बनाएगी। इससे उनकी व्यापारिक प्राप्य राशियों को लिक्विड फंड में बदलने और अल्पकालिक वित्त पोषण (फंडिंग) प्राप्त करने की उनकी क्षमता में मदद मिलेगी।
यह रूपरेखा प्रतिभागियों को व्यापार के क्रम में लेनदेन के लिए आईटीएफएस प्लेटफॉर्म पर एक्सपोर्ट इनवॉइस ट्रेड फाइनेंसिंग, रिवर्स ट्रेड फाइनेंसिंग, बिल डिस्काउंटिंग अंडर लेटर ऑफ क्रेडिट, निर्यातकों के लिए सप्लाई चेन फाइनेंस, एक्सपोर्ट क्रेडिट (पैकिंग क्रेडिट), बीमा / क्रेडिट गारंटी, फैक्टरिंग और अन्य योग्य उत्पाद जैसी व्यापार संबंधी वित्त सुविधाओं का लाभ उठाने का अवसर प्रदान करेगी।
तरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र (International Financial Services Centres – IFSC)
• अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र (International Financial Services Centres -IFSC) को किसी भी देश में स्थापित करने का प्रमुख लक्ष्य अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवाओं का विकास करना होता है।
• अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र (आईएफ़एससी) को किसी भी देश में अंतर्राष्ट्रीय निवेशकों और व्यापार के विकास हेतु एक प्रवेश द्वार माना जाता है।
• यह घरेलू अर्थव्यवस्था के क्षेत्राधिकार से बाहर के ग्राहकों की वित्तीय सेवाओं से संबन्धित आवश्यकताओं की पूर्ति करता है।
• गौरतलब है कि भारत का पहला अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र (IFSC) गुजरात के गांधीनगर में स्थापित किया गया है। वर्तमान में आईएफ़एससी में बैंकिंग, पूंजी बाजार और बीमा क्षेत्रों को कई नियामकों, अर्थात् आरबीआई, सेबी और आईआरडीएआई द्वारा नियंत्रित किया जाता है।
अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र प्राधिकरण अधिनियम, 2019
• भारत की संसद ने अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र प्राधिकरण अधिनियम, 2019 को पारित किया है।
• यह अधिनियम भारत में विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) के अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्रों में वित्तीय सेवा बाजार को विकसित और रेगुलेट करने के लिए एक प्राधिकरण की स्थापना का प्रावधान करता है।
अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र प्राधिकरण के कार्य
• किसी आईएफएससी में वित्तीय उत्पादों, वित्तीय सेवाओं और वित्तीय संस्थानों, जिन्हें अधिनियम केलागू होने से पहले किसी रेगुलेटर (जैसे आरबीआई या सेबी) द्वारा मंजूर किया गया है, को रेगुलेट करना।
• किसी आईएफएससी में वित्तीय उत्पादों, सेवाओं या संस्थानों को रेगुलेट करना, जिन्हें केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित किया जाए, और उन वित्तीय सेवाओं, उत्पादों और संस्थानों के संबंध में केंद्र सरकार को सुझाव देना, जिन्हें आईएफएससी में मंजूर किया जा सके।
• अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र प्राधिकरण अधिनियम, 2019 के अनुसार, आईएफएससीज में वित्तीय सेवाओं के सभी लेन-देन उस करंसी में किए जाएंगे, जिन्हें प्राधिकरण केंद्र सरकार की सलाह से विनिर्दिष्ट करेगा।
इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ इंश्योरेंस सपुरवाइजर्स (आईएआईएस)
• इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ इंश्योरेंस सपुरवाइजर्स (International Association of Insurance Supervisors -IAIS) का गठन वर्ष 1994 में हुआ था।
• इसका मुख्यालय स्विटजरलैंड में स्थित है।
• यह 200 से अधिक इन्श्योरेंस सुपरवाइजर और नियामकों का एक स्वैच्छिक संगठन है। जो कि दुनिया के 97 फीसदी इंश्योरेंस प्रीमियम में हिस्स्दारी रखते हैं।
• इन्श्योरेंस क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर के मानक बनाने, नियमों को तय करने और उसके लिए जरूरी सहयोग देने में इस संगठन की अहम भूमिका रहती है।
• आईएआईएस इसके अलावा अपने सदस्यों को एक प्लेटफॉर्म भी मुहैया कराता है, जहां पर वह अपने, इंश्योरेंस सुपरविजन और इंश्योरेंस बाजार के अनुभवों को साझा करते हैं।
• अपनी इन्हीं उपर्युक्त विशेषताओं के कारण इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ इंश्योरेंस सपुरवाइजर्स (आईएआईएस) को जी-20 देशों के नेताओं और दूसरे अंतराष्ट्रीय संगठनों द्वारा नियमित से आमंत्रित किया जाता है।
• वर्तमान में आईएआईएस के अग्रणी सदस्यों में यूनाइटेड किंगडम- फाइनेंशियल कंडक्ट अथॉरिटी (एफसीए), यूएसए-नेशनल एसोसिएशन ऑफ इंश्योरेंस कमिशनर्स (एनआईएएस), यूएसए-फेडरल इंश्योरेंस ऑफिस ऑफ द इंश्योरेंस ऑफ द यूनाइटेड स्टेट्स डिपार्टमेंट ऑफ ट्रेजरी (एफआईओ), सिंगापुर- मॉनेट्री अथॉरिटी ऑफ सिंगापुर (एमएएस), भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) शामिल हैं
SOURCE-PIB

 

राष्ट्रीय डॉल्फिन अनुसंधान केंद्र
बहुप्रतीक्षित राष्ट्रीय डॉल्फिन अनुसंधान केंद्र (National Dolphin Research Centre – NDRC) जल्द ही पटना में स्थापित किया जायेगा। इस अनुसंधान केंद्र स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।
मुख्य बिंदु
• इस अनुसंधान केंद्र का खुलना लुप्तप्राय गंगा नदी डॉल्फिन (Gangetic River Dolphin) के संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम होगा।
• अनुसंधान केंद्र स्थापित करने के लिए, गंगा नदी के किनारे पटना विश्वविद्यालय के परिसर में 4,400 वर्ग मीटर भूमि पर NDRC का निर्माण किया जा रहा है।
• बिहार शहरी विकास विभाग ने गंगा से 200 मीटर की दूरी पर NDRC के भवन के निर्माण को पहले ही मंजूरी दे दी है।
प्रोजेक्ट डॉल्फिन (Project Dolphin)
प्रोजेक्ट डॉल्फ़िन, प्रोजेक्ट टाइगर की तर्ज पर शुरू किया गया था, जिससे बाघों की आबादी बढ़ाने में मदद मिली है। इस पहल को दिसंबर 2019 में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में राष्ट्रीय गंगा परिषद (National Ganga Council – NGC) की पहली बैठक में सैद्धांतिक मंजूरी मिली। यह गंगा की डॉल्फिन को बचाने के लिए शुरू किया गया एक “विशेष संरक्षण कार्यक्रम” है। यह परियोजना पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा कार्यान्वित की जाएगी।
चिंताएं
गंगा नदी में डॉल्फिन का आवास खतरे में है। इस प्रकार, NDRC अब डॉल्फ़िन के संरक्षण के लिए प्रयास करेगा। NDRC बदलते व्यवहार, खान-पान की आदतों, उत्तरजीविता कौशल, मृत्यु के कारण और ऐसे अन्य पहलुओं सहित डॉल्फिन पर गहन शोध का अवसर प्रदान करेगा।
गंगा नदी डॉल्फिन (Gangetic River Dolphin)
गंगा नदी डॉल्फिन भारत का राष्ट्रीय जलीय जंतु है। इसे वन्य जीवन (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत अनुसूची I पशु के रूप में सूचीबद्ध किया गया है। इसे International Union for Conservation of Nature (IUCN) द्वारा “लुप्तप्राय” घोषित किया गया है। गंगा नदी डॉल्फिन दुनिया भर में ताजे पानी की चार डॉल्फिन प्रजातियों में से एक है। अन्य तीन मीठे पानी की डॉल्फ़िन चीन में यांग्त्ज़ी नदी (अब विलुप्त हो चुकी हैं), पाकिस्तान में सिंधु नदी और दक्षिण अमेरिका में अमेज़ॅन नदी में पाई जाती हैं। वे कम से कम पाँच से आठ फीट गहरे पानी को पसंद करते हैं और आमतौर पर अशांत पानी में पाए जाते हैं, जहाँ वे अपने लिए पर्याप्त मछलियाँ पा सकते हैं।
SOURCE-GK TODAY

 

उत्तर प्रदेश कानून पैनल ने जनसंख्या मसौदा विधेयक का प्रस्ताव पेश किया
उत्तर प्रदेश सरकार ने उत्तर प्रदेश जनसंख्या (नियंत्रण, स्थिरीकरण और कल्याण) विधेयक, 2021 शीर्षक से जनसंख्या नियंत्रण विधेयक प्रस्तावित किया है।
मुख्य बिंदु
• उत्तर प्रदेश राज्य विधि आयोग (UPSLC) द्वारा राज्य की जनसंख्या को नियंत्रित करने और स्थिर करने और कल्याण के लिए यह बिल लाया गया है।
• यह जनता के सुझावों के लिए 19 जुलाई, 2021 तक खुला है।
विधेयक के प्रमुख प्रावधान
• दो से अधिक बच्चों वाले लोगों को स्थानीय चुनाव लड़ने से रोकने के लिए विधेयक का आह्वान किया गया है।
• उन्हें सरकारी नौकरियों में आवेदन करने या पदोन्नति पाने से भी रोका जाएगा।
• उन्हें सरकारी सब्सिडी प्राप्त करने से भी वंचित किया जाएगा।
• इस मसौदा प्रस्ताव के अनुसार, माध्यमिक विद्यालयों में जनसंख्या नियंत्रण पर एक अनिवार्य विषय पेश करना सरकार का कर्तव्य होगा।
• इस विधेयक में अधिक समान वितरण के साथ सतत विकास को बढ़ावा देने के लिए राज्य की जनसंख्या को नियंत्रित करने और स्थिर करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।यह विधेयक दो बच्चों के मानदंड को लागू करने का प्रयास करता है।
• इस विधेयक में राष्ट्रीय पेंशन योजना के तहत नियोक्ता के योगदान कोष में 3% की वृद्धि करने का प्रस्ताव है।
• जनसंख्या नियंत्रण विधेयक को लागू करने के लिए राज्य जनसंख्या कोष की भी स्थापना की जाएगी।
• इस ड्राफ्ट बल के अनुसार, सभी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) में मातृत्व केंद्र स्थापित किए जाएंगे।पीएचसी गैर सरकारी संगठनों के सहयोग से गर्भनिरोधक गोलियां आदि वितरित करेंगे।
विधेयक का महत्व
उत्तर प्रदेश के पास सीमित पारिस्थितिक और आर्थिक संसाधन हैं। इस प्रकार, यह आवश्यक है कि मानव जीवन की बुनियादी आवश्यकताएं जैसे आवास, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंच, किफायती भोजन, सुरक्षित पेयजल, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंच, आर्थिक या आजीविका के अवसर, बिजली और सुरक्षित जीवन सभी नागरिकों के लिए सुलभ हो। यह बिल सभी कमियों को भरने में मदद करेगा। यह विधेयक राज्य भर में जनसंख्या नियंत्रण, स्थिरीकरण और इसके कल्याण के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए एक स्वस्थ जन्म अंतर भी सुनिश्चित करेगा।
SOURCE-GK TODAY

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