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राष्ट्रीय सहकारी नीति 2025: भारत के सहकारी आंदोलन का पुनर्जीवन

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राष्ट्रीय सहकारी नीति 2025: भारत के सहकारी आंदोलन का पुनर्जीवन

चर्चा में क्यों है?  

  • 24 जुलाई को, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नई राष्ट्रीय सहकारी नीति 2025 का अनावरण किया, जो पिछले 23 वर्षों से चली आ रही नीति का स्थान लेगी।
  • इस नीति का उद्देश्य सहकारी क्षेत्र की संस्थागत क्षमता को मज़बूत करना, नए क्षेत्रों में इसकी पहुँच का विस्तार करना और भारत के व्यापक विकास लक्ष्यों के साथ इसकी भूमिका को संरेखित करना है।
  • उल्लेखनीय है कि ‘सहकार से समृद्धि (सहकारिता के माध्यम से समृद्धि)’ के दृष्टिकोण पर आधारित, यह नीति अगले 20 वर्षों में इस क्षेत्र के विकास के लिए एक रोडमैप की रूपरेखा प्रस्तुत करती है, जिसमें समावेशिता, पारदर्शिता, तकनीक अपनाने और ग्राम-स्तरीय आर्थिक सशक्तिकरण पर ध्यान केंद्रित किया गया है।

राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 की प्रमुख विशेषताएं:

  • राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 से 2045 तक, यानी लगभग भारत की स्वतंत्रता की शताब्दी तक प्रभावी रहेगी। इस नीति का मसौदा सुरेश प्रभु की अध्यक्षता वाली 48 सदस्यीय समिति द्वारा तैयार किया गया है।
  • नई सहकारिता नीति का उद्देश्य ‘सहकार से समृद्धि’ के माध्यम से 2047 तक एक विकसित भारत का निर्माण करना है।
  • नीति के छह मुख्य स्तंभ:
    1. नींव को मजबूत करना,
    2. जीवंतता को बढ़ावा देना,
    3. सहकारी समितियों को भविष्य के लिए तैयार करना,
    4. समावेशिता को बढ़ाना और पहुँच का विस्तार करना,
    5. नए क्षेत्रों में विस्तार करना और
    6. युवा पीढ़ी को सहकारी विकास के लिए तैयार करना।
  • प्रमुख वैश्विक और राष्ट्रीय पहल:
    • संयुक्त राष्ट्र ने 2025 को अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता वर्ष घोषित किया है, जिसकी थीम है: “Cooperatives Build a Better World”. इसका उद्घाटन भारत में नवंबर 2024 में हुआ।
    • भारत में सहकारिता को बल देने के लिए 2021 में अलग ‘सहकारिता मंत्रालय’ बनाया गया, जिसका प्रभार अमित शाह को सौंपा गया।
  • बीते चार वर्षों की प्रमुख उपलब्धियाँ:
    • मल्टी-स्टेट को-ऑपरेटिव सोसाइटी एक्ट, 2023 लागू किया गया
    • National Cooperative Exports Limited (NCEL) की स्थापना, जिससे सहकारिता क्षेत्र को निर्यात का अवसर मिला — शुरुआती ऑर्डर ₹5,000 करोड़ के
    • दुनिया की सबसे बड़ी अनाज भंडारण योजना और 2 लाख नई प्राथमिक कृषि क्रेडिट समितियाँ (PACS) की योजना
    • गांधीनगर में मॉडल को-ऑपरेटिव विलेज पहल की शुरुआत
    • गुजरात के आनंद में त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय की आधारशिला रखी गई, और स्कूलों में सहकारी शिक्षा को शामिल करने की वकालत की गई

भारत में सहकारिता का इतिहास:

    • भारत में सहकारिता क्षेत्र का इतिहास स्वतंत्रता से पहले का है, जब एडवर्ड लॉ समिति की सिफारिशों के आधार पर 1904 में को-ऑपरेटिव क्रेडिट सोसाइटी एक्ट पारित किया गया। इसके बाद इस क्षेत्र में तेजी से विस्तार हुआ, और 1911 तक 5,300 सहकारी समितियाँ पंजीकृत हो चुकी थीं, जिनकी सदस्यता 3 लाख से अधिक थी।
    • 1912 का सहकारी समितियाँ अधिनियम इन संस्थाओं को संगठित करने का मूल ढांचा लेकर आया, जिससे 1914 में मद्रास कोऑपरेटिव यूनियन जैसी पहली आवास सहकारी समिति की स्थापना हुई।
    • प्रथम विश्व युद्ध और बैंकिंग संकट के दौरान मैक्लेगन समिति (1914) गठित की गई, जिसने क्रेडिट कोऑपरेटिव की स्थिति पर सुझाव दिए। भारत सरकार अधिनियम 1919 के तहत सहकारिता को प्रांतीय विषय बनाया गया, और बॉम्बे सहकारी समिति अधिनियम 1925 पहला प्रांतीय कानून बना।
    • स्वतंत्रता से आठ महीने पहले, 14 दिसंबर 1946 को अमूल (खेड़ा जिला दूध उत्पादक सहकारी संघ) की स्थापना हुई, जिसने आगे चलकर डॉ. वर्गीज़ कुरियन के नेतृत्व में भारत को 239 मिलियन टन दूध उत्पादन के साथ विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश बना दिया।
    • 2002 में एनडीए सरकार के दौरान सहकारिता क्षेत्र को नया बल मिला और राष्ट्रीय सहकारिता नीति लागू हुई। अब, 23 वर्षों बाद, एक नई राष्ट्रीय सहकारिता नीति (2025–2045) अपनाई जा रही है, जो इस ऐतिहासिक क्षेत्र को भविष्य के विकास की ओर ले जाने का प्रयास है

97वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2011:

  • 97वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2011 के माध्यम से, भाग IXB (सहकारी समितियाँ) को संविधान में शामिल किया गया।
  • इस संविधान संशोधन अधिनियम के तहत सहकारी समितियाँ बनाने के अधिकार को संविधान के भाग-3 के अनुच्छेद 19(1) के अंतर्गत स्वतंत्रता के अधिकार के रूप में शामिल किया गया।
  • इसके अतिरिक्त, अनुच्छेद 43-B (सहकारी समितियों का संवर्धन) को भी भारतीय संविधान के भाग 4 के अंतर्गत राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों में से एक के रूप में शामिल किया गया।
  • उल्लेखनीय है कि संविधान के तहत सहकारी समितियाँ राज्य का विषय हैं, अर्थात वे राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आती हैं, लेकिन कई ऐसी समितियाँ हैं जिनके सदस्य और कार्यक्षेत्र एक से अधिक राज्यों में फैले हुए हैं। उदाहरण के लिए, कर्नाटक-महाराष्ट्र सीमा पर स्थित जिलों की अधिकांश चीनी मिलें दोनों राज्यों से गन्ना खरीदती हैं। अंतरराज्यीय सहकारी समितियां बहु-राज्य सहकारी समितियाँ (संशोधन) अधिनियम, 2023 द्वारा शासित होती हैं।

आर्थिक प्रभाव और समावेशी दृष्टिकोण:

  • सहकारी क्षेत्र वर्तमान में भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देता है:
    • कुल कृषि ऋण का 20%
    • उर्वरक वितरण का 35%
    • चीनी उत्पादन का 30% और दूध उत्पादन का 10%
    • मत्स्य पालन क्षेत्र का 21% से अधिक
    • गेहूँ उत्पादन का 13% और धान खरीद का 20%
  • इन आधारों के साथ, नीति एक सदस्य-केंद्रित मॉडल की परिकल्पना करती है जहाँ छोटी से छोटी सहकारी इकाइयाँ भी आत्मनिर्भर और भविष्य के लिए तैयार हो जाएँगी, जिससे रोज़गार सृजन, आय स्थिरता और सामाजिक सम्मान में योगदान मिलेगा।

सहकारी समितियाँ क्या होती हैं?

  • सहकारी समितियाँ बाजार में सामूहिक सौदेबाजी की शक्ति का उपयोग करने के लिए लोगों द्वारा जमीनी स्तर पर गठित संगठन हैं।
  • इसका अर्थ विभिन्न प्रकार की व्यवस्थाएँ हो सकती हैं, जैसे कि एक साझा संसाधन का उपयोग करना या पूँजी साझा करना, ताकि एक साझा लाभ प्राप्त किया जा सके जो अन्यथा किसी एक उत्पादक के लिए प्राप्त करना मुश्किल होता।
  • कृषि में, सहकारी डेयरियाँ, चीनी मिलें, कताई मिलें आदि उन किसानों के संयुक्त संसाधनों से बनाई जाती हैं जो अपनी उपज का प्रसंस्करण करना चाहते हैं

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